मनुष्यता खो रही हैं.....(कविता)
मनुष्यता खो रही हैं.....

 

आधुनिकता के निरंतर कृष्ण प्रवाह में,

कण-कण गंगा मैया मैली हो रही है,

क्षण-क्षण प्रकृति विहल रो रही है,

रे मन ! आज फिर, मनुष्यता खो रही हैI

 

चारों तरफ शोर है; राहें सभी अंधी है,

'बाहर कुछ भीतर कुछ' मृत जीवन है ,

जन-जन की आत्मा अंतिम साँस ले रही है,

रे मन ! आज फिर, मनुष्यता खो रही हैI

 

इन जंगलों में अजगरों का काला साया है,

आहट सुन कँपकँपाती कोमल काया है,

पग-पग पशुता नग्न खेल, खेल रही है;

रे मन ! आज फिर, मनुष्यता खो रही हैI

 

दानव बन मानव घोटे खुद का गला है,

क्या नीति ? क्या अनीति ? बुने कैसा यह जाला है,

घर-घर काली छाया काले बीज बो रही है;

रे मन ! आज फिर, मनुष्यता खो रही हैI

 

पशु और मनुष्य का एक हो रहा चेहरा है,

मनुजता के गहनों को हमने जो तोड़ा है,

पल-पल मानवता सिसकियाँ ले रही है;

रे मन ! आज फिर, मनुष्यता खो रही हैI

 

 

------कवि:उमेश नारायण चव्हाण

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