Monday, March 23, 2020

 कब तक ,क्यों , किसलिए !!

 कब तक ,क्यों , किसलिए !!


आदि काल से नकारात्मक शक्तियों का अस्तित्व रहा।पौराणिक काल में इन्हें दानव, दुष्ट ,राक्षस कहा गया और इन आसुरी शक्तियों पर विजय बुराइयों पर अच्छाइयों की प्रतीक बनी ।साहित्य तो हमेशा ही वह आवाज़ बना जो शासकों को सही दिशा निर्देश दे , जनहित की ओर प्रेरित करे ।समाज की विसंगतियों, बुरी प्रवृत्तियों को दूर करने हेतु जन संचेतना पैदा करें ।अपनी प्रखर लेखनी से झकझोर दे,आंदोलित कर दे ,ऊर्जा का ऐसा प्रवाह कर दे ,कि हर व्यक्ति अपनी सही भूमिका निभाने हेतु उत्साहित, आतुर हो उठे।


लेखनी सिर्फ़ श्रंगार के गीत न गाए ,ज़रुरत पड़ने पर आग उगलती तलवार बन जाए,और शब्दों की मार से कोई न बच पाऐ।
बहुत सारे उदाहरणों से हम परिचित हैं जहां कवि दरबार में बैठे मखमली शब्दों की माला गूंथ कर गीतों की महफ़िल ही नहीं सज़ा रहे बल्कि कुशल योद्धा की तरह रणभूमि में उतरे,और बड़े बड़े क्रांतिकारी परिवर्तनों का इतिहास साक्षी है।
हर दौर में नकारात्मक शक्तियां भिन्न-भिन्न रुपों में सामने आती रही हैं। आधुनिक काल में भी नक्सली , आतंकवादी , उग्रवादी नामों से हमारे सामने खड़ी हैं और गाहे-बगाहे निर्दोष लोगों को इनका शिकार होना पड़ता है , जो सिर्फ़ एक सवाल उत्पन्न करता है कि अच्छाई, सच्चाई कमज़ोरी है !! नहीं ! "बुराइयां तभी तक मुखर हैं ,जब तक अच्छाइयां मौन हैं" । सवाल यहां भी है कि क्यों मौन हैं, पस्त हैं ! रुग्ण हैं!! क्यों नहीं अपनी समस्त ऊर्जा और शक्ति के साथ इन आसुरी शक्तियों का फन नहीं कुचल देते! क्यों और कब तक तमाशबीन , मूकदर्शक हैं !! क्यों अलमस्त हैं अपने आनंद में कि निर्दोष लोगों का ख़ून बहते देख , अन्याय का शिकार बनते देख, ख़ून नहीं खौलता!! क्यों मौन रह मूक समर्थन दे , अन्याय में शामिल है! क्यों पलटवार करके एक स्वस्थ, सुरक्षित समाज की स्थापना में योगदान नहीं देते!!


कविवर दिनकर जी की कुछ पंक्तियां उद्घृत करती हूं ।
" कहता हूँ¸ ओ मखमल–भोगियो।
श्रवण खोलो¸
रूक सुनो¸ विकल यह नाद
कहां से आता है।
है आग लगी या कहीं लुटेरे लूट रहे?
वह कौन दूर पर गांवों में चिल्लाता है?


जनता की छाती भिदें
और तुम नींद करो¸
अपने भर तो यह जुल्म नहीं होने दूँगा।
तुम बुरा कहो या भला¸
मुझे परवाह नहीं¸
पर दोपहरी में तुम्हें नहीं सोने दूँगा।।


हो कहां अग्निधर्मा
नवीन ऋषियो? जागो¸
कुछ नयी आग¸
नूतन ज्वाला की सृष्टि करो।
शीतल प्रमाद से ऊंघ रहे हैं जो¸ उनकी
मखमली सेज पर चिनगारी की वृष्टि करो।


गीतों से फिर चट्टान तोड़ता हूं साथी¸
झुरमुटें काट आगे की राह बनाता हूँ।
है जहां–जहां तमतोम
सिमट कर छिपा हुआ¸
चुनचुन कर उन कुंजों में
आग लगाता हूँ।


आज भी अन्यायियों, अत्याचारियों, आतंक का जहर उगल रहे आतंकवादियों को उनकी सही जगह दिखाना ,करारा सबक़ सिखाना, मुंह तोड जवाब देना ज़रूरी है।
" अन्याय,अत्याचार देख, रहे ख़ामोश ।
मेरे देश में ऐसी, जवानी न रहे।
दुश्मनों की जड़ें, हिला दे जो,
ख़ूं वह ख़ूं हो , पानी न रहे।


@अनुपमा श्रीवास्तव 'अनुश्री'


 


"आस्था का व्यापार- उजले पाखंडियों की काली करतूतें "





"आस्था का व्यापार- उजले पाखंडियों की काली करतूतें "


आजकल ढोंगी साधुओं और धर्म गुरुओं की भरमार हो चुकी है ।खरपतवार की तरह उग आए हैं जहां तहां समाज में! आधुनिकता जो आदमी को अधिक से अधिक भौतिकवाद की ओर ले जा रही है आजकल जिस तरह नवयुवक  / नवयुवतियां पश्चिम का अंधानुकरण  कर रहे हैं बिना उचित-अनुचित का ख्याल कर बिना अपनी संस्कृति और सभ्यता का ध्यान रखे । आज  इस कारण से भी तनाव और अनगिनत परेशानियां उत्पन्न हो रही है और आदमी का  इन तथाकथित धर्म गुरुओं और साधु बाबाओ के  की शरण में जाने लगा, उनकी हकीकत और सच्चाई  जाने बगैर !


व्यक्ति आज के इस दौर में प्रसिद्धि दौलत,पद , प्रशंसा पाने की  दौड़ में शामिल हो गया है कोई भी रास्ता शॉर्टकट हो शीघ्रता से दिलवा दे यह सब , ढूंढता रहता है।


और उसकी इसी कमजोरी और मनोस्थिति  का फायदा  इन पाखंडी बाबाओं और साधुओं ने उठाकर  बेहिसाब संपत्ति  जमा की है ,अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है और स्वयंभू सम्राट / भगवान बन अपने ऐशो-आराम, शानौ शौकत, भोगविलास के अकूत साधन एकत्रित कर लिए हैं।


  दोष अंधानुकरण करने वाले अंध भक्तों का भी कम नही, जो दुख का  निदान या महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति,छ्दम सुखों  के लिए , स्वयं के पुरुषार्थ और  परमात्मा  पर विश्वास न रखते हुए ना रखते हुए ऐसे साधु -बाबाओं के दरवाजे पर टेक लगाते रहते हैं।उनके झांसे में आ जाते हैं और इन्हीं जादूगर समझते हुए किसी चमत्कार की उम्मीद करते हैं।  समझने की बात  यह है कि  स्वर्ग नहीं धरती है  यहां बड़े महापुरुषों और भगवान तक को कष्टों का सामना करना पड़ा तो साधारण इंसान की बात ही क्या!!


क्यों नहीं हम अपने आप पर , विवेक ,बुद्धि ,मेहनत ,सच्चाई लगन ,भक्ति और शक्ति पर भरोसा ना करते हुए, असहाय निरूपाय ,बेबस किसी चमत्कार की उम्मीद करते हैं ,जैसे इन पाखंडी बाबाओं के हाथों में जादू की छड़ी है जो पलक झपकते ही छोटे-मोटे उपाय करने से सारी इच्छाएं पूरी कर देगी!


आधुनिकता और भौतिकवाद के चलते मनुष्य की इच्छाएं भी सुरसा के मुंह की तरह फैल गई है एक के बाद दूसरी और दूसरी से तीसरी ,चौथी और   अनंत। जो उसे कभी इस दर तो कभी उस दर भटकाती रहती हैं।


हमारे धर्म ग्रंथ सिखाते हैं सुख-दुख में निस्पृहऔर समभाव रखना ।थोड़ा मुश्किल है लेकिन नामुमकिन नहीं ।मन के हारे हार है ,मन के जीते जीत । जरूरत है अपनी अंतर्निहित शक्तियों को पहचानने, मनन, चिंतन करने , सकारात्मक सोच रखने , स्वयं में समस्याओं का समाधान खोजने की। बहुत सारी समस्याएं तो स्वाजनित हैं। जब हम भगवान में आस्था विश्वास खो देते हैं ,हमारा आत्मविश्वास डगमगा जाता है और हमारे चीजों को सही परिप्रेक्ष में देखने की शक्ति झीण हो जाती है ।


भगवान भी सब कुछ बिना किसी मूल्य के हर एक मनुष्य को प्रदान कर रहा है यह हवा, पानी, धरती  लेकिन आज धर्म के नाम पर कारोबार चल रहा है। कृपा की दुकान खड़ी  है । पैसा फेंको ,कृपा प्राप्त करो   अगर इनके व्यवसाय को फलता-फूलता देखना है ,तो  इंटरनेट पर इनकी वेबसाइट खोलें ,आधुनिक तकनीकों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है किसी भी प्रोफेशनल व्यवसाई और विक्रेता से कम नहीं है !कृपा के खरीददार को लुभाने हेतु आकर्षक प्रस्ताव और फीस का पूरा प्रबंध किया गया है।भक्तो से पैसा लेकर उन्हें थ्री स्टार,फाइव स्टार सुविधाएं भी दी जाती हैं ।ढ़ोगी बाबा ,साधुओं के खजानों को भर रही है अज्ञानी जनता।


आलस, ईर्ष्या ,लालच, स्वार्थ, मक्कारी, भ्रष्ट आचरण, चरित्रहीनता, हिंसा ,क्रोध हमारे भीतर ही है और उन्हें दूर किए बगैर हम सारी खुशियां पा लेना चाहते हैं किसी भी रास्ते पर चलकर येन-केन-प्रकारेण !! हमारी स्वार्थ गत सोच ,लालच हमें चेतना के निम्न स्तर पर ले जाकर  तामसिक कर्म करवाती है और हम खुद के बनाए दुखों के जाल में फंसते हैं, फिर ऐसे ढोंगी साधु बाबाओं की शरण में जाकर सुखी होना चाहते हैं जो प्रकृति के नियम के खिलाफ है।


क्या   उन सुखों को पाने के हम सच्चे हकदार हैं जिन्हें पाने हेतु हम लगातार भटके हैं , दौड़ लगा रहे हैं  ! क्या हम भगवान के सच्चे और ईमानदार भक्त हैं !इतने शुद्ध, पवित्र हैं  कि सारी खुशियां हमारे दामन में चली आएं! बहुत सारी अंध गलियों में भटक रहा है आज का आदमी।  उसकी कमजोरी, विवेकहीनता  अज्ञानता का फायदा उठाकर कारोबार कर रहे हैं ढोंगी साधु ।
खूब प्रचार प्रसार हो रहा है विभिन्न चैनलों माध्यमों से धर्म के कारोबार का  ,भक्तों से पैसा लूट कर उन्हें ही रिश्ता फाइव-स्टार की सुविधाएं दी जा रही हैं और अपने लिए भोग विलास के महल खड़े किए जा रहे हैं। पहले कभी नहीं सोचा गया कि सत्संग में जाने का कथा सुनने का मूल्य चुकाना है!
सत्संग के अच्छे और सच्चे तत्वों को  आत्मसात करना और तत्सम्मत जीवन में व्यवहार ,एक आदर्श , विवेक पूर्ण, संतुलित और परिपूर्ण जीवन जीना ,यही था इसका सार ।


अब दुकानें खुल गई है कृपाएं बिक रही हैं ।नित्यानंद आसाराम, रामपाल, रामवृक्ष राम रहीम और जाने कितनों ने कर दिया है धर्म को बदनाम! 


धर्म है  धारणा ,कहां से आई इसमें पाखंडी की अवधारणा!!


अभी कितने और रावण राम के वेश में भारत में जमे हैं ! कितने और गंदे धंधे अंधेरी गुफा में छिपे हैं ! कितनी और महिलाओं निर्दोषों का शोषण और दुराचार बाकी है!  कितने अंधभक्त, मूर्ख, अज्ञानी तथाकथित धार्मिक भेड़चाल में लगे हैं  ! अभी कितने और कंस कृष्ण का रूप ले रहे हैं !
कब शीघ्र और सटीक न्याय की व्यवस्था होगी और ऐसे अपराधियों को कड़े से कड़ा दंड तुरंत किया जाएगा!


जो पाखंडी, दरिंदे बाबा गुफा से बाहर लाए जा चुके हैं उन्हें और जो अभी तक बाहर उजले बने हुए ,काली गुफाओं में छुपे हुए हैं,  उन्हें भी बाहर निकाला जाए और भारतीय धर्म ,संस्कृति गरिमा ,श्रेष्ठ ऋषि परंपरा और भारतीय धर्म संस्कृति गरिमा श्रेष्ठ ऋषि परंपरा को धूमिल करने उपहास, अपमान करने अपनी मानसिक विकृति और व्याभिचार का गंदा रंग मिलाने, महिलाओं का शोषण और दुराचार करने जैसे जघन्य अपराधों के लिए उदाहरण स्वरुप कड़ा से कड़ा दंड दिया जाए ,ताकि कोई  पाखंडी, दुराचारी साधु का चोंगा ओढ़ भारतीय धर्म, संस्कृति, अस्मिता के साथ खिलवाड़ न कर सके।


@ अनुपमा श्रीवास्तव'अनुश्री, साहित्यकार, एंकर, कवयित्री, समाजसेवी । भोपाल
Mob- 8879750292


 

 



 



"आधी आबादी और जी एस टी"





"आधी आबादी और जी एस टी"

  हम शक्ति पर्व मनाते आए हैं। शक्ति के आवाहन ,पूजन ,अर्चन ,आराधन से
शक्ति  की मन्नतें मांगते आए हैं। शक्ति स्वरूपा माता से सुख समृद्धि ,ऐश्वर्य  ,धन वैभव का वरदान मांगते रहे हैं, और हमारे घर में ही शोभनीय है शक्ति स्वरूपा नारी मां ,बेटी, पत्नी, दादी,  नानी,  सहकर्मी,  सहयोगी के रुप में  अनगिनत भूमिकाएं निभाती है। जो ज़मी है पुरुष की  उड़ान के आकाश की।  रीढ़ है परिवार की। आज तो तकनीक के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही है। ऊंचे ऊंचे पदों पर कार्य कर रही है।  आज वह गूगल माम बन गई है । सुपर माम  बन गई है  घर परिवार की कार्यक्षेत्र की दोहरी   ज़िम्मेदारियां निभाते हुए , उन्हें कुशलता से   अंजाम देते हुए।

शहर की स्मार्ट नारियों की बात करें या गांव की मेहनतकश महिलाओं की बात ! बात वही है, एक मत से सही है और सभी के लिए है।  यह शक्तिस्वरूपा महिलाएं  किस तरह अपने घर परिवार और कार्य क्षेत्र को संभालती हैं ,अपनी ऊर्जा , शक्ति से घर और बाहर की बहुत सारी प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करते हुए । उसी की सेहत, स्वास्थ्य सुरक्षा के प्रति हम लापरवाह हो सकते हैं ,  यह बहुत अन्याय पूर्ण और अनुचित है। जिसके स्वास्थ्य की  देखभाल  की  ज़िम्मेदारी  सदस्यों के साथ ,समाज और सरकार की भी है।

आधी आबादी नारी ,जो सहनशक्ति की मूर्ति है,  सृजन कर्ता   है उसी के स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर हम इतने निश्चिंत हो जाते हैं  कि उसी के  हित में बनाए गए नियमों और  उठाए गए कदमों को उस तक पहुंचने नहीं देते ! या ऐसे नियम बना देते है ,जो उसकी जिंदगी स्वास्थ्य और सुरक्षा को नजरअंदाज कर दे ! बड़ा ज्वलंत सवाल है कि क्यों महिलाओं को ही पीछे रखा जाता है हितग्राही होने से ! क्या  अपनी स्वास्थ्य सुरक्षा का अधिकार नहीं है उन्हें ! क्या उन्हें आपकी ही तरह , अपनी जिंदगी से प्यार नहीं है !


किस तरह  उनके लिए


सबसे ज्यादा ज़रूरी, उन पांच दिनों की स्वास्थ्य सुरक्षा और हाइजिन को नजरअंदाज करते हुए 'सैनिटरी नैपकिन 'पर,  बारह   प्रतिशत जीएसटी लगाकर और महंगा कर दिया गया है , उसे साधारण वस्तुओं की तरह मापते हुए और उसे मेडिकल डिवाइस न मानते हुए , जबकि सभी विकसित देशों में इससे हेल्थ प्रोडक्ट माना गया है और  बहुत स्वाभाविक है,  क्योंकि यह महिलाओं के माहवारी के उन पांच   दिनों की  स्वास्थ्य सुरक्षा और हाइजिन से जुड़ा हुआ है ।एक अहम और अति गंभीर मुद्दा है , तो कैसे भारत सरकार इसे हल्के में ले कर महिलाओं के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रही है !!


होना तो यह चाहिए कि इतनी आवश्यक वस्तु को मुफ़्त में प्रदान करने की योजना बनाई जानी चाहिए या फिर बहुत कम दर पर शहरों में और गांव में उपलब्ध कराया जाना चाहिए और सरकार तो बिल्कुल उल्टा कर रही है !! पहले ही एक बड़े प्रतिशत की पहुंच से दूर थे  सैनिटरी नैपकिन और अब जो खरीद पाते हैं  , उनका खरीदना भी असंभव कर रही है !


कुछ राज्यों ने सेनेटरी पैड कम दर पर उपलब्ध कराने की योजना बनाई,  लेकिन वह दलालों की वजह से महंगे ही पहुंचे और कहीं तो वितरित ही नहीं हुए, साथ ही खराब क्वालिटी की  शिकायतें भी सामने आई। आंकड़ों की बात करें तो अभी भी तेईस प्रतिशत से ज्यादा लड़कियां माहवारी शुरू होने के साथ ही स्कूल जाना छोड़ देती है पर्याप्त सुविधाएं न होने के कारण,  स्वास्थ्य कारणों से और सरकार इतनी आवश्यक वस्तुओं पर टैक्स लगाकर महिलाओं के स्वास्थ्य शरीर सुरक्षा को ताक पर रखकर दोयम दर्जे का और लापरवाह रवैया दिखा रही है , इतने तमाम विरोध होने के बावजूद भी !


कहीं-कहीं महिलाओं के मध्य सैनिटरी नैपकिन को लेकर जागरूकता ना होने की वजह से और कुछ  इतने महंगे होने की वजह से ग्रामीण अंचलों में रहने वाली महिलाएं , कम पढ़ी लिखी  , दूर-सुदूर  रहने  वाली महिलाओं द्वारा ,कपड़ों के अलावा भी कुछ ऐसे व्यर्थ, अस्वास्थ्यकर पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है जो माहवारी के दौरान  उन्हें संक्रमित करते हैं ,गर्भाशय से जुड़े हुए  रोग उत्पन्न करते हैं।


माहवारी, जो एक आवश्यक प्रक्रिया है सृजन की,  उसी के प्रति उपेक्षा, लापरवाही पूर्ण और गैर जिम्मेदाराना रवैया दुखद है।    कैसे सरकार ने अपनी नासमझी का परिचय देते हुए परिचय देते हुए महिलाओं से जुड़ी अन्य वस्तुएं चूड़ियां , सिंदूर ,  कुमकुम को जीएसटी से पूर्णतः मुक्त रखा है ,  महिलाओं के लिए इतने आवश्यक हेल्थ प्रोडक्ट सैनिटरी नैपकिन को मुफ्त में या बहुत कम दर पर देने की बजाय उसे महंगा कर उनकी पहुंच से और दूर कर दिया है ,  यही कारण है कि अभी भी महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और समाधान , परिवार और सरकार की चिंता का विषय नहीं है और गर्भाशय कैंसर से होने वाली मौतों की संख्या  भारत विश्व में नंबर वन है, जो बहुत अफसोस की बात है। हम बुलेट ट्रेन की बात करते हैं ,भारत की आधी आबादी की स्वास्थ्य सुरक्षा को दरकिनार कर के हम किस विकास के परचम लहराना चाहते हैं ! किस खोखली  धरातल पर बुलंदी छूना चाहते हैं !
सही मायनों में शक्ति पूजन तभी है जब हमारे घर परिवार में उपस्थित जीवंत शक्ति प्रतिमाओं , सृजन की अधिष्ठात्री  देवियों की स्वास्थ्य सुरक्षा को सुनिश्चित करके  स्वयं सशक्त बने और देश को मजबूत बनाएं।


@ अनुपमा श्रीवास्तव 'अनुश्री'
Mob- 8879750292


 

 



 



gazal

मुझे इंसाफ दिल दो


 

मैं रास्ते पे खड़ी थी और रात अंधेरी थी।
के खाली था वो रस्ता खामोशी बड़ी थी ।

कोई दीपक न दिखता था कहीं पर एक भी
तभी आए वो चारों, दिखते थे जो ना नेक भी

मैंने माँगी मदद उनसे इसरार करके
उनकी ओर बढ़ी इंसानियत पर ऐतबार कर के

मगर वो तो निकले अंधेरे के दानव कोई
लगे नोचने मुझको, ना था मानव कोई।।

मेरी चीख तब फैली थी हवाओं में
बड़ा दर्द था मेरी सदाओं में।।

बहुत तड़पी बहुत लरज़ी मैं रोई बहुत थी
मगर उनको रहम ना आया, गैरत उनकी सोई बहुत थी

मैं मिन्नतें करती रही के कोई कृष्णा आये
लूट रही आबरू द्रौपती की कोई तो बचाये

मगर भगवान बहरा हो गया था इंसान की तरह
कि शहर मुर्दा पड़ा हो जैसे शमशान की तरह।

मैं चीथड़ों में लिपटी आखरी सांसे गिन रही थी
लगा के मुझसे मेरी ज़िन्दगी छिन रही थीं।।

किसी ने डाला तेल फिर मेरे जिस्म पर ऐसे
लगानी आग हो किसी लकड़ी में जैसे।।

कि अगले पल वही हुआ जिसका अंदेशा था
मेरी मौत का अब आया संदेशा था।।

अब तो मेरीचीख भीनिकल ना पाई
बड़ी बेरहमी से फिर सबने मेरी चिता जलाई

मैं दहकी कोयले सी पड़ी सड़क पर सबसे
के माँग रही रही इंसाफ पूरे वतन से कब से

मिलेगा मुझको कब इंसाफ मुझे इतनाबता दो
या खुद अपने घर में ही अपनी बेटियों की चिता सजा दो।।

चाँदनी समर

Tuesday, March 17, 2020

मिट्टी ( कहानी)

ष्वाह मिश्रा जी वाह ! क्या गाना बनाया है !ष्ए सनी सोफ़े पर बैठा हुआ अचानक टीवी की तरफ़ झुककर ज़ोर से बोला । कमरे में बैठे बाक़ी सभी ने चौंक कर देखा ।टीवी पर किसी कार्यक्रम में गाना बज रहा हैए श्उजला ही उजला शहर होगाए जिसमें हम तुम बनायेंगे घरए दोनों रहेंगे कबूतर सेए जिसमें होगा न बाज़ों का डर।ष् पीछे से सनी के पिता महेश रैना चश्मा ख़ोल से निकालते हुए बोलेए ष्अर्रेए कुछ समाचार वैगैरह लगा देए देखें तो सही देश में चल क्या रहा हैष्
पास ही टीक की कुर्सी पे बैठे दादू ने अपने चश्मे में से आँखें उचकाईं और बड़बड़ाएए ष्जिस मुल्क का दम घुट रहा होए वो कैसा चलेगा भलाए हुँह !श् सनी ने बेमन से रिमोट में नंबर ढूंढे और लगा दिए समाचार । रोज़मर्रा की ख़बरें आईं और फिर मौसम के हाल चाल । नीचे चेन्नई से शुरू होते.होते जब तक समाचार पढ़ने वाला कश्मीर के मौसम तक पहुँचताए दादू अपनी छड़ी उठा अंदर कमरे की तरफ़ चल दिए। मौसम पसन्द नहीं आया या देश के हालातए मालूम नहीं । 


दिगम्बर लाल रैना यानी दादू अपने बेटे महेशए बहू राधा और पोते सनी के साथ ही दिल्ली के शास्त्री नगर में रहते हैं । सन 90 के शुरुआती सालों में जब लाखों कश्मीरी पंडितों ने वादी छोड़ी थीए उसी वक़्त दादू भी अपने बेटेए बहू और तीन महीने के पोते के साथ दिल्ली में आ गिरे थे । सन श्92 से अब तलक कुछ सनी बड़ा हुआए कुछ बड़े हुए खिड़की.दरवाज़े और घर के कमरे । फिर भी सनी की माँ राधाए अकायस ही कहती रहतीए ष्कश्मीर में हमारे घर में सत्रह दरवाज़े थेए अब लगालो कमरे कितने होंगे ।ष् शाम रोज़ इसी तरह बीता करती टीवीए गानेए मौसम और दादू ।


सुबह उठते ही सनी को काम पे जाने की जल्दी होती। अभी अभी कॉलेज पूरा हुआ ही था कि सनी ने काम पकड़ दिया। ष्आज भी इतनी सुबह बुलाया है घ् और ये क़मीज़ कैसी अजीब सी हैए कुछ सोबर सा पहनए सफ़ेद क़मीज़ पहन लेए अच्छी लगेगी ।ष्ए राधा कमरे में घुसते ही सनी से बोली।ष्सफ़ेद नहीं माँए बहुत श्बोरिंगश् लगता हैए जनाज़े का रंगष्ए सनी ने आईने में बाल सँवारते हुए जवाब दिया और फ़ौरन ही अपनी बाइक को रॉकेट बना घर से निकला ।
ष्कहाँ हो यार मेघाए जल्दी आओ। मैं गली के कोने पे ही खड़ा हूँष्ए सनी कान पे फ़ोन लगाए यहाँ वहाँ देखने लगा ।ष्वाह ! पंजाबनए क्या लग रही हो ! ऑफिस में सब देखते रह जाएंगे।ष्ए सनी मेघा के आते ही मुस्कुराकर बोला। मेघा और सनी दोनों कम ही वक़्त में एक दूसरे के क़रीब आ गए और एक दूजे के साथ वक़्त बिताने लगे । ष्यारए तुम न होती तो मेरा क्या होता !ष्ए कहकर बाइक में किक मारी सनी ने। मेघा ने सनी को कसकर पकड़ा और देखते ही देखते दोनों धुआँ हो गए ।


महेश और सनी के दफ़्तर जाने के बाद राधा घर का काम निपटाकर जो भी वक़्त मिलता कश्मीरी फिरन ;पैरहनद्ध बुनती रहती । कश्मीरी कढ़ाई में बड़ी माहिर थी। ष्अरे राधाए मेरा मफ़लर देना ज़राए यहाँ तो सर्दी कम धुंध ज़्यादा हैष्ए कहते कहते दादू हॉल में छड़ी टिकाकर दाख़िल हुए । राधा बुनाई सोफ़े पे पटककर फ़ौरन उठी और दादू का हाथ पकड़ कर कुर्सी पर बिठाने लगी।ष्पंडितजीए आप यहाँ बैठोए मैं लाती हूँ अंदर सेष्ए राधा ने तसल्ली देकर कहा।चूँकि महेश बचपन से ही अपने पिता को पंडितजी कहता था सो राधा भी कह निकली। महेश की ये आदत उसे उसके गाँव और अपनी माँ से मिली। पहले सभी घाटी में उन्हें पंडितजी ही कहते थेए वो तो एक दौर ही ऐसा आया कि सब बस श्पंडितश् कहने लगे। शायद इसीलिए महेश और राधा ने उन्हें कभी पंडितजी कहना नहीं छोड़ा। दादू ने मफ़लर लपेटा और बड़े इतरा के बाहर टहलने निकल गएए अक्सर शाम पाँच बजे इसी तरह निकला करते । फिर यूँ ही कई शामें ख़र्च हो गईं। एक रोज़ बड़ी बेचैनी में लौटे और बोलेए ष्ये घर के बाहर खड़िया से कैसा निशान बना है और जाने क्या क्या नंबर लिखे हैंए समझ नहीं आ रहा। राधाए देखना ज़रा। आओ जल्दी आओ। आने दो महेश कोए पूछता हूँ घर की किश्त दी कि नहींए कल को कोई आ धमका तोए हे भगवानए हे ईश्वर !ष् राधा थोड़ी सी चिड़चिड़ाकर बोलीए ष्एक मिनटए एक मिनट।श् गौर से दरवाज़े को देखाए फिर गहरी साँस लेकर बोलीए ष्कुछ नहीं है पंडितजीए पोलियो की दवा पिलाने वालों ने लगाया हैए कि कौन सा घर हो गया और कौन सा बाकी हैए बस। दिल्ली में होता है ऐसा । आप घबराइए मतए आइए अंदर आइए।ष् दादू दुर्गा.सप्तसती गुनगुनाते हुए घर के अंदर चले गए ।


रोज़ की तरह सात बजे जब दरवाज़े पे छोटी छोटी दो घंटियाँ बजी तो महेश के आने की आहट हुई। राधा ने दरवाज़ा खोलाए दादू बैठे टीवी देख रहे थे। चाबी रखते रखते महेश बोलाए ष्कमाल की मॅहगाई है भई दिल्ली शहर मेंए आज भट्ट साब की दुकान गया थाए वो श्कश्मीर प्रोडक्ट्सश् वाली। हैरान रह गया यहाँ के रेट सुनकरए केसर दस ग्राम हज़ारए अख़रोट बारह सौए काजू हज़ारए हद है। कहाँ मुट्ठियाँ भर.भर के यूँ ही उड़ाया करते थे। हैं न पंडितजी घ्ष् दादू ने टीवी की आवाज़ बन्द की और गर्दन घुमाकर बोलेए ष्कश्मीर की हर चीज़ महँगी हैए सिवाए इंसानी जान के।ष् महेश और राधा ने एक दूसरे को देखा और कुछ न बोले। टीवी की आवाज़ फिर से तेज़ हो गयी।


खाने के बाद राधा ने महेश को अकेले में ले जाकर बात बताई कि आज कैसे दादू इतने परेशान हो गए थे। महेश ने पूरी बात सुनी और राधा को समझाया कि ज़्यादा चिंता न करेए जिस इंसान ने रईसी के दिन जिये हों और अचानक सब उजड़ जाए तो हमेशा एक खौफ़ सा बना रहता है। एक गुम सा लम्हा बीता और महेश मुस्कुरा कर बोलाए ष्क्योंए तुम्हें याद नहीं है क्याए कैसे हम दोनों महाराज गंज बाज़ार में घंटों बिता दिया करते थे ऐश से ख़रीददारी करतेश् 
राधा भी मुस्कुराकर बोलीए ष्हाँ सब याद हैए और कैसे मेरे लिए पश्मीना लाये थे आप पंडितजी से छुपाकेए सब याद है। शादी के अगले ही दिन ऐसी चोरा.चोरी कौन करता है भला।ष् दोनों ठहाका मार के हँस दिए । महेश कुर्सी से उठने लगा तो अचानक पूछता हैए ष्ये सनी कहाँ हैए दिखाई नहीं दे रहा घ्श् राधा ने तसल्ली दी एष्बाहर गया है अपने दोस्तों के साथए देर होगी आने मेंष्
महेश ने थोड़ा रुककर एक लंबा सा श्अच्छाश् कहा और चला गया । कुछ घंटों बाद सनी कान पे फ़ोन लगाए दाख़िल हुआ ।ष्अच्छा सुनो नए अभी रात में बात कर पाओगी न प्लीज़ घ् मैं अपने कमरे में पहुँच के कॉल करता हूँष्ए सनी फुसफुसाया । इश्क़ में वक़्त सूखी रेत होता हैए फ़ौरन फिसलता है । घर की लाइटें बन्द हो चुकी थीं मग़र सनी के कमरे में जैसे हज़ार चराग़ रोशन थे। आज फ़ोन पर मेघा से शादी की बात जो करनी थी।
ष्हायष्
ष्हेल्लो जीष्
ष्यार मेघाए ऐसा लग रहा है अब भी झूले पर ही बैठा हूँए तुम्हारा हाथ पकड़ेष्एसनी तकिया गोद में दबाये बोला। मेघा खिलखिला पड़ीए ष्आज बहुत मज़ा आया ना !ष्
सनी गंभीरता से बोलाए ष्हाँए हमेशा की तरह। तुम्हारे साथ हमेशा ही अच्छा लगता हैए एक अलग सा सुकूँ मिलता हैए अलग साण्ण्ण्अम्म कैसे बताऊँ कैसा।ष् मेघा ने हिम्मत दिखाकर पूछाए ष्घर जैसा घ्ष्
सनी तकिया छटककर बोलाए ष्हाँए सही कहाए घर जैसा सुकूनए जैसे हम घर में होते हैं बेपरवाह बेख़ौफ़ए सब अपना साए कुछ भी कह सकोए कुछ भी सुन सको। और तो और तुम जब भी साथ बाहर जाती होए मेरे लिए पानी की बोतल संग लेके चलती हो। चलता फिरता घर ही तो हो तुम मेराए हाँ ! सच मेघाए यू आर माई होम डार्लिंगष्
ष्तुम भी तो मेरा कितना ध्यान रखते हो सनीष्
ष्मेघाए चलो ना जल्दी से शादी करते हैंए फिर साथ रहेंगेए और मज़े करेंगे ज़िन्दगी भरए अपने घर को घर लाना चाहता हूँ मैंष्ए सनी ने झिझकते हुए बात पूरी की। मेघा एक पल को ठहरकर बोलीए ष्पहले घर में बात तो करोए और उससे पहले जो जॉब बदलने की बात करनी हैए वो भी करोए हम ज़रूर साथ रहेंगे जान। तुम ज़रा भी फ़िक्र मत करो।ष्
ष्हम्मए कल छुट्टी है सोच रहा हूँ बात शुरू करूँ मौका देख करए ख़ैर कल देखता हूँ सुबहए तुम बिल्कुल चिंता न करो।ष्ए सनी ने भरोसा जताया। मेघा ने शरारत करके सनी का मूड ठीक किया और रोज़ की तरह दोनों दो बजे फ़ोन रखकर सो गए।


सुबह से ही घर पे हलचल मची थी। सनी नाश्ते के लिए आया और बोलाए ष्क्या हो रहा हैए कोई आ रहा है क्या घ्ष् अंदर से राधा की आवाज़ आयीए ष्हाँए जम्मू वाले तेरे पृथ्वी चाचाश्
ष्ओह्हए अच्छा ।ष् नाश्ता ख़त्म करते करते सनी किसी सोच विचार में पड़ गया था। राधा और महेश भी नाश्ता शुरू कर चुके थे। दादू अपने पीतल के छोटे गिलास में कहवा पीने में मशगूल थे।
ष्मम्मी मैं कुछ सोच रहा थाष्ए सनी ने हल्के स्वर में बात रखी।
ष्क्या हुआ घ्ष्
ष्एक नई जगह काम शुरू करने का सोचा हैए अच्छी कंपनी हैए अच्छा पैकेज हैए और फिर वीज़ा के लिए भी मान गए हैं तो अच्छा रहेगाष्ए सनी ने बात पूरी की ।
ष्वीज़ा घ्ष्ए दादू चश्मे में से झांककर बोले।
ष्हाँए यूण्एस कम्पनी हैए तो वहाँ का भी काम देखना होगा और यहाँ का भीण्ण्ण्कभीण्ण्ण्कभार।ष् राधा ने निवाला नीचे रखते हुए पूछाए ष्बेटा यहाँ दिल्ली वाली कंपनी में कोई दिक्कत है क्या घ्ष्
ष्नहीं मम्मीए बस आगे का भी तो देखना हैष्
दादू सख़्ती से बोल पड़ेए ष्और जो पीछे रह जायेगाए उसका क्या घ्ष्
ष्क्या पीछे दादू घ् इंसान आगे नहीं बढ़ेगा क्या घ् हमेशा घर से ही बंधके रहे बसष्ए सनी भी गरम हुआ। महेश ने बीच में ही बात काटीए ष्वो सब बात ठीक हैए लेकिन तुम्हारी शादी का भी तो देखना हैए कम से कम इंडिया में ही ऑप्शन देखलो। घर के पास भी रहोगे।श् सनी तमतमा गया। 
ष्पापाए होम इज़ ए फ़ीलिंग । जहाँ मान लोए वहीं घर है।श् अब दादू का पारा चढ़ गया। 
ष्अजी हाँ ! ज़रूर ! दुनिया पागल है जो अपनी ज़मींए अपनी मिट्टी से जुड़ी रहती है। घर क्या होता है ये उनसे पूछ जिसका कभी छूटा हो। तू तो अपनी माँ के पेट में था जब हम तीनों अपना एकड़ों में फैला घर और बगीचा छोड़कर जम्मू में आ छुपे थे। वो तो शुक्र है पृथ्वी लबरु का जो हमें पनाह दी और फिर महेश ने दिल्ली में पैर जमाये। तू क्या जाने क्या गँवाया है हम सबने ।ष् कहते कहते दादू की आँखों से आँसू फूट पड़े। 
सनी ने भी नाख़ुश होकर जवाब दियाए ष्ये अच्छा हैए जो बीत चुका बस उसी पर रोते रहेंए आगे बढ़ने का सोचें ही न। सब अपना घर छोड़ते हैंए लड़की शादी के लिएए लड़का नौकरी के लिएए इतनी बड़ी बात क्या है घ् व्हाट्स द बिग डील घ्ष्
दादू तपाक से बोलेए ष्बिग डील है. हालात । फ़र्क इस बात से पड़ता है कि घर किन हालातों में छोड़ा है।ष् सनी लाल चेहरा लिए कुर्सी से उठा और अपना फ़ोन और मोटरसाइकिल की चाबी लेकर बड़बड़ाता हुआ निकलाए ष्इस घर में किसी से बात करना ही बेकार है।ष् दरवाज़े की ज़ोर की धड़ाक ने हॉल में चुप्पी बिखेर दी। दादू के होंठ कंपकपाने लगे तो महेश ने फ़ौरन संभालाए राधा ने पानी दिया।महेश ने कंधे पे हाथ रखके समझायाए ष्पंडितजीए आप अपना दिल न दुखायेंए सनी तो बच्चा हैए नासमझ है। उसे कुछ पता ही नहीं है कि घर की एहमियत क्या है। आप ही के कहने पर हमने उसे कोई भी बात ज़्यादा गहराई से नहीं बताई कि कहीं गुस्से में आकर कोई ग़लत रास्ता न चुन लें।ष् दादू और राधा ख़ामोश थे। थोड़ी ही देर में दादू ने चुप्पी तोड़ी। 
ष्अपने बाप दादा के समय से उसी आँगन में पला था हम सबका बचपन। महेश का भीए बिट्टी का भी। जितना वहाँ जीने की ख़्वाईश थी उससे कहीं ज़्यादा वहाँ दम निकलने की।श् तीनों की आँखों में आँसू छलक उठे और यादें बहने लगीं। कब उन्नतीस साल पहले फिसल गिरे मालूम ही नहीं हुआ । 
......
मई 1991ए कश्मीर रू
आँगन में महेश पंडितजी के साथ बाड़ा.बंदी कर रहा था और बहन बिट्टी औऱ नई बहू राधा माँ के साथ काम में हाथ बँटा रही थीं। तभी बाहर से दौड़ते हुए पड़ोसी शम्भू नाथ आया। हाँफते हुए एक ही साँस में उफ़न पड़ाए ष्अरे पंडितजी गज़ब हो गया। कोहराम मचा है कोहराम । लाल चौक चौराहे पे सुबहण्ण्ण्वो नवीन भट कोण्ण्ण्वो३३ष्
ष्क्या हुआ लाल चौक पर शम्भू घ्ष्ए पंडितजी ने करीब आ गर्दन एक तरफ झुकाकर शम्भू के कंधे पे हाथ रखकर पूछा। महेश और बिट्टी ध्यान से सुन रहे थेए नवीन भट उनका कॉलेज सीनियर था और पड़ोसी भी। शम्भू ने बदहवासी में बताया कि चार उग्रवादियों ने सुबह लाल चौक पर नवीन को गोलियाँ मारी और हाथ पैर शरीर से अलग कर दिए। उसकी लाश उठायी नहींए बीनी गयी थी। उसके घरवाले तो ऐसे पागल हुए कि फ़ौरन ही चिता जलाने का इंतज़ाम किया गया। तभी बीच में किसी ने उसकी कटी उंगलियाँ लाकर दीए अँगूठी पहचानकर । वो भी जलती चिता में बीच में ही डाली गईं जैसे हवन में कोई लकड़ी डालता है बीच बीच में। किसी ने भीड़ में से पूछाए ष्नवीन का कोई झगड़ा हुआ था क्या आतंकियों से घ्ष्
एक दुकान वाला बोलाए ष्नहींए बस उसने कहा था कि वादी मेरी जन्मभूमि हैए मैं अपना घर क्यों छोड़ूँ भला!ष्
वाक्या सुनकर तीनों औरतें सिहर गईं। सभी वादी छोड़कर जम्मू जाने की ज़िद करने लगेए सिवाय पंडितजी के। जाने से पहले रुपयों पैसों के इन्तेज़ामात के लिए पंडितजी ने बगीचे बेचने की ठानी सो महेश को साथ लेकर पास ही के सोपोर कस्बे में चल दियेए किसी व्यापारी विशाल धर से मिलने। घर पर नई बहू राधाए बिट्टी और उसकी माँ को महफूज़ कर गएए एक पहलवान नौकर की रखवाली में। नौकर बाड़े में सेब तोड़ रहा थाए बिट्टी बोरी में भर रही थी। तभी तीन लोग मुँह पर काला कपड़ा बाँधके अंदर घुसने लगे। हाथ में एण्के.47 थी और बिट्टी की जानिब इशारा किया। नौकर रोकने के लिए लट्ठ लेकर आगे आया तो तीनों ने तीन तीन गोलियाँ मारी। पूरी गली गूँज उठीए पड़ोस की कोई खिड़कीए कोई दरवाज़ा न खुला। बिट्टी एक कोने में खड़ी काँपती रहीए माँ ने राधा को ऊपर अटरिया में छुपाया और ख़ुद रसोई से बड़ा चाकू लिए आँगन में दौड़ पड़ी। तीनों ने अपनी बंदूकें कंधे पे डाली और नौकर की लाश को खींचकर बीच में लाये। उसके माथे के बीचों.बीच एक एक गोली और मारी और फिर तीनों ने मिलकर उसपे पेशाब किया। 
बिट्टी और उसकी माँ सुन्न पड़ गए। तीनों में से एक दाढ़ी वाला आदमी कपड़ा हटाकर उनकी तरफ बढ़ने लगाए बाकी खड़े दोनों जिहादी ज़ोर ज़ोर से हँसने लगेए उनकी आँखों में वहशियत की झेलम तांडव कर रही थी। एक बिजली सी कौंधी और अचानक माँ ने चाकू से बिट्टी का गला रेंत दियाए ख़ून का फब्बारा फूटा और आँगन में सन्नाटा पसर गया। तीनों वापस लौट गए। उनकी जीप के पीछे पीछे बिट्टी की माँ बहुत दूर तक भागी और फिर कभी वापस नहीं आयी। 
........
जैसे ही पुरानी यादों की शिकस्त ढीली हुई तो वर्तमान ने जकड़ लिया। दादू और राधा को तो जैसे दौरा पड़ा हो। महेश ने समझाया कि वो सनी से बात करेगा कि अपनी मिट्टी से दूर न जाये। उस रात सनी घर नहीं आयाए बस फोन कर दिया कि दोस्त के घर रुकेगाए कुछ काम है। सनी टहलते हुए माथे पर हाथ फेरे बात करता हैए ष्नहीं नहीं यारए घर नहीं गया। प्रोजेक्ट का काम हैए सिन्हा के घर पे ही हूँ। प्लीज़ खाना खाके ज़रूर बात करनाए बहुत मन है।ष्
ष्सनी तुम ठीक से रहनाए किसी भी बात की चिंता मत करना। अच्छाए तुम अपने घर पर हमारे बारे में बात करो न। यहाँ मैं भी मौका देखके मम्मी से बात करूँगी।ष्ए मेघा ने समझाया। सनी ने गहरी साँस भरते हुए कहाए ष्हम्मए करता हूँ कल घर जाके।ष् एक लम्हा ठहरा और अलसायी सी आवाज़ में बोलाए ष्पता है मेघाए जब तुमसे बात कर लेता हूँ तो बड़ा चैन पड़ता हैए सुबह से अजीब सा लग रहा थाए अब सुकून है। थैंक यू मेघा ।ष्
ष्ओह्ह हो बाबाए कैसा थैंक यू। तुमने ही तो कहा था कि मैं तुम्हारी दुनिया हूँ जहाँ आकर तुम ठहर जाते होए घर जैसा सुकून मिलता है।ष्ए मेघा ने भी अलसायी सी आवाज़ में और ज़्यादा प्यार से जवाब दिया। 


अगले दिन जब सनी घर आया तो बात करने के बहाने तलाशने लगा। राधा समझ गयीए पूछ लिया कि माजरा क्या है।थोड़ा झेंपते हुए सनी ने दिल की बात बता दी। राधा ख़ुश हुई और महेश को मनाने की ज़िम्मेदारी भी ली। दादू को पता चला तो उन्हें भी जाने क्यूँ अजीब सी खुशी हुई। चेहरे पे राहत के निशान खिंच गए। महेश को बस एक ही बात खटकी कि लड़की भी तो अपने घर पर बात करे। सब सुलझने लगा। पूरा हफ़्ता मसरूफियत में गुज़रा । काम के चलते मेघा के फ़ोन का जवाब देना भी दुश्वार हो रहा था। सनी मेघा को खुश करने के लिए मिलने चला गया। सनी को बड़ी हैरानी हुई कि मेघा आने के लिए सहज ही तैयार नहीं हुई। 
ष्क्या हुआ यार ! क्या बात हैघ् फ़ोन भी नहीं उठाया। सब ठीक तो है घ्ष्ए सनी ने मेघा का हाथ पकड़ कर पूछा। अचानक मेघा ने हाथ छुड़ाया और मुहँ फेरकर बोलीए ष्सनीए मैं तुमसे अब नहीं मिल सकती बस। हम शादी नहीं कर सकते।ष्
सनी को कुछ समझ नहीं आयाए वो हड़बड़ाने लगाए ष्लेकिनण्ण्ण्ऐसे कैसे मेघाण्ण्ण्सुनो मेरी बात सुनो३ण्तुम ण्ण्ण्तुम मेरी दुनिया होए मेरा घर होण्ण्ण्तुम सब छीन रही हो ण्ण्मेरा प्यारण्ण् सब कुछ ।ष् सनी के पैरों तले ज़मीन खिसक गईए वो रोयाए बिलखा और बात में बात बढ़ती चली गयीए झगड़ा बड़ा हो गया । दोनों पीठ फेरकर लौटने लगेए मेघा सपाट चेहरा लिए और सनी माथे पे लकीरें। सनी रात को बेसुध होकर घर लौटा और बिस्तर में समा गया। गहरी नींद में सो गया शायद।


ष्नहींण्ण्ण्नहीं ऐसा मत करोए मैं मर जाऊँगा। सुनो मेरी बात तो सुनो।ष् एक आदमी गिड़गिड़ाता है। हाथ जोड़कर कांपता है और ज़बाँ से बिलखता हैए ष्मेरी दुनियाए मेरा सुकूँए सब ख़त्मए सब बर्बाद हो गयाश् आँखों के आगे अँधेरा बढ़ता जाता है और किसी साये के कदम दूर जाते मालूम होते हैं।अचानक नींद टूटी। ष्उफ्फ !सपना था।श्


दादू घबराकर उठ बैठे। दादू का सफ़ेद कुर्ता पूरा पसीने से गीला था। बिस्तर पर बैठे बैठे ही सिसकने लगे। तभी बाहर हॉल के अंधेरे में बैठा सनी दादू के कमरे में दाख़िल हुआए दादू के बिल्कुल क़रीब जाकर बैठा। दादू के हाथ पर हाथ रखा और उनका सर अपने कंधे पे रख लियाए जैसे कभी दूर नहीं होगाए मगर ज़बाँ से कुछ न बोला। देर रात तलक दादू के आँसू सनी की सफ़ेद शर्ट भिगोते रहे।  


अगली सुबह नाश्ते पर सनी ने सबको बताया कि सभी अपने ज़हन से मेघा और उसके देश से बाहर जाने की बातए दोनों को निकाल दें। बाकी तीनों थोड़ा चौकें मग़र कोई कुछ न बोला। सनी पहले बेचैन रहाए फिर बेपरवाह और फिर धीरे धीरे रोज़मर्रा हो गया। मई गुज़रा जून आने वाला थाए दादू चौरासी साल के होने को थे और देश में भी नई सरकार ने जन्म लिया था। कुछ हालात बदलेए कुछ हुक्मरांए अब श्रीनगर और कश्मीर घूमने फिरने जाने वालों के लिए तो खुला ही था। सनी ने दादू को एक दफ़ा कश्मीर लेके जाने का फैसला किया। महेश और राधा ने भी कोई ऐतराज़ नहीं जताया। वैसे भी दादू आजकल ज़्यादा ही बेचैन रहने लगे थेए पहले की तरह शाम की सैर पे जाना भी बंद कर दिया था। दादू को सनी की कश्मीर जाने वाली बात का पता चला तो वह समझ नहीं पाए कि ख़ुश हों या दुखी। बहरहालए हफ़्ते भर बाद दिल्ली से फ्लाइट में बैठकर सीधा श्रीनगर आ गए। जब टैक्सी में बैठे तो बोलेए ष्अख़बार में पढ़ा था कि कश्मीर में अब पर्यटक सैलानी बढ़ गए हैंए मगर सबने फौजी वर्दी क्यूँ पहनी है यहाँ घ्श्


टैक्सी ड्राइवर ने बस पीछे मुड़कर देखा। घड़ी की लगभग आधी गिनतियाँ और पूरे चेकपोस्ट पार करके दादू अपने गाँव पहुँचे । सनी ने पहले ही महेश से सारी जानकारी इकट्ठा कर ली थी। थोड़ी सी तफ़्तीश के बाद आख़िरकार दादू ने अपना घर पहचान लियाए पड़ोस के कई घर आग लगने से काले पड़ गए थे। दादू ने घर क्या देखाए पलक तक न झपकी। वही नीला लोहे का फाँटकए अब बस किनारे की तीन पत्तियाँ उखड़ गई थीं। फाँटक से कमरे के बीच में फैली कच्ची ज़मीन मिट्टीए घास और वही सेब के पेड़। अब घर किसी अबु बक़र का मकान था। सनी ने मकान.मालिक को बताया कि वो पहले यहाँ रहा करते थे तो बस घर देखना चाहते हैंए ज़रा सी यादें ताज़ा करनी हैं। मकान.मालिक ने हिचकिचाते हुए हामी भरी। कमरे की दीवारों को छूते हुए दादू की आँखें छलक गईंए अब पुताई बदल गयी थी। मकान.मालिक की हिचकिचाहट बढ़ने लगीए सनी ने भांप लिया। पास ही रखी आराम कुर्सी को बाहर कच्चे में डालने की गुज़ारिश की और कुछ तस्वीरें खींचने की ख़्वाईश ज़ाहिर की। दादू बाहर घास मिट्टी के बगीचे में कुर्सी पर बैठ गए। सनी ने आँगन में देवदर लकड़ी से की गई बाड़ा.बंदी की तस्वीरें खींचींए कैमरा लेकर बाहर आया और एकाएक रुक गयाए पीछे से दादू को देखकर । दादू ने चमड़े की चप्पल उतारकर पैर घास में रखे हुए थे और सीधे हाथ की मुट्ठी में मिट्टी दबा रखी थी। सनी मुस्कुराकर आगे बढ़ा और कुर्सी पर बैठे दादू के कंधे पर हाथ रखा। 


देखा तो दादू की आँखें खुली रहीं और गर्दन एक तरफ लुढ़क गयी। मिट्टी के हाथों में से मिट्टी सरक रही थी। सालों गुज़र गएए सनी के पैरों से भी मिट्टी कभी नहीं छूटी। 
.......


Monday, March 16, 2020

हैसियत (कहानी)

 बारिश... जोरों से गिरी। सभी तरफ पानी ही पानी...। मजदूर लोग परेशान थे। इसी समय नदी को बाढ़...। नजदीक बाँध होने के कारण पानी गाँव में घुसा। गाँव पानी में मिला। पानी बढ़ रहा था, लोगों की धड़कन बढ़ रही थी। अनाज भी खत्म हुआ। भूखमरी शुरू हुई। पानी के कारण दूसरे गाँव से संपर्क तुटा। गाँव की स्कूल, बिजली बंद हो गई। बड़े लोग गाँव छोड़कर सुरक्षित जगह जा रहे थे, लेकिन गरीब वही गाँव के स्कूल में रहने लगे। वो जी तो रहे थे, लेकिन लाश बनकर...।
 माँ.... क्या कर रही हो? कुछ नहीं बेटा सोच में हँू कि तेरी जिं़दगी कैसी होगी। तुझे पढ़ना है...। लेकिन मैं पढ़ाऊंगी क्या? तु भी ना.... माँ। ऐसा क्यों सोचती हो? हमारी बस्ती में प्रशांत, हीरा भी तो सामान्य परिवार से हैं, वह भी तो पढ़ रहे हैं। वो मेरे अच्छे दोस्त बने हैं। उनके विचार और मेरे विचारों में साम्य है। उनके साथ मैं पढूँगा। अब तो सो जाओ ना माँ...। लेकिन रमेश बेटा? माँ... 
 ‘‘प्रशांत...‘‘
‘‘हाँ... बोल¨ रमेश...।‘‘
हमंे पढ़ना हैं खुद के लिए नहीं माँ-बाप के सपनों के लिए....। पढ़ने के लिए पैसा ही सब कुछ नहीं, हिम्मत होनी चाहिए वह हमारे पास हैं। हम काम करके पढ़ाई करेगें। आर्थिक स्थिति बिकट हो तब भी...। हमारे माँ-बाप का संघर्ष व्यर्थ नहीं जाने देगें। हीरा भी हमारे साथ है। 
 हीरा नववीं कक्षा तक की पढ़ाई हो गई क्योंकि अध्यापक अच्छे थे इस कारण...। दसवीं कक्षा के लिए बोर्ड परीक्षा है। परीक्षा केन्द्र भी दूर। इस कारण अभी से तयारी करनी पढ़ेगी। पढ़ाई की भी... और पैसों की भी...। हाँ... सही है रमेश।
 हीरा हमारी दसवीं कक्षा की पढाई होगी क्या? क्यों नहीं होगी रमेश... जरूर होगी। हार मत मान। सुल सर जी का प्रोत्साहन भी तो हमारे साथ हैं। हमें सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देना है।
 ‘‘रमेश जल्दी चलो सुल सर इसी रास्तें से जाते है।‘‘ 
 ‘‘हाँ... चल-चल।‘‘
 ‘‘रमेश... पढ़ाई पर ध्यान दो।‘‘
 ‘‘हाँ... सर जी।‘‘
 ‘‘कोई जरूरत पढ़े तो बताना रमेश।‘‘
‘‘जरूर सर जी।‘‘
 हीरा दसवीं की परीक्षा तो नजदीक आई। परीक्षा केन्द्र भी दूर... दस-बारह पेपर... इतने दिनों का खर्चा...। रमेश इसके बारे में मत सोचो। रास्ता निकलेगा। 
‘‘हीरा...‘‘
‘‘बोलो रमेश।‘‘
 हम परीक्षा के कुछ दिन पहले कपास गाड़ी में भरने का काम करेंगें। कुछ पैसा मिल जाएगा। खर्चा भी निकलेगा। जो तुझे सही लगे रमेश। चल प्रशांत से मिलते है।
 प्रशांत कल पेपर है आज ही हाॅलटिकट लाना होगा। हाँ रमेश जाएॅंगें। नही... अभी चल सर इसी रास्तें से गुजरते है।
‘‘रमेश..‘‘
‘‘हाँ... सर...‘‘
‘‘कहाॅं घुम रहें हो। कल पेपर है न, हाॅलटिकट नहीं लेना है क्या? 
‘‘लेना है सर जी।‘‘ 
‘‘रमेश आपकी आँखें इतनी लाल क्यों? रात को ज्यादा पढ़ाई की।‘‘ 
‘‘हाँ... सर जी।‘‘
‘‘परीक्षा केन्द्र पर जाने के लिए पैसे है ना...।‘‘
‘‘हाँ, है सर जी।‘‘
‘‘नहीं होते तो आपको ही माँगता।‘‘
‘‘रमेश...।‘‘
‘‘हाँ... प्रशांत।‘‘
‘‘आपने सुल सर जी को झूठ क्यों बोला?‘‘ 
‘‘क्या?‘‘ 
‘‘वही रातभर पढ़ाई।‘‘
‘‘प्रशांत हम किसी के लिए बोझ नहीं बनना चाहते।‘‘
‘‘चल... चल... बस्स कर। कल पेपर है...।‘‘
 पेपर अच्छी तरह से गए। सिर्फ रिजल्ट की राह देख रहे थे। देखते-देखते समय कैसे बिता पता नहीं चला। जिस दिन की राह देख रहें थे, वो दिन भी आया। दसवीं का रिजल्ट घोषित हुआ। दिल की धड़कन बढ़ने लगी। हम पास होंगें क्या? यह चिंता सता रही थी। हीरा पास हुआ। लेकिन जो नहीं होना था वही हुआ। प्रशांत परीक्षा में असफल.... । दसवीं कक्षा में नापास। परिस्थिति ने तो साथ नहीं दिया... और वक्त ने भी नहीं। उसे बहुत समझाया लेकिन वह बहुत दुखी था। यहाँ तक की उसने पढ़ाई तक छोड़ दी। इतना समझाने के बावजूद भी...। 
‘‘हीरा... तु तो मेरा साथ देगा न...।‘‘
‘‘जरूर दूँगा...।‘‘
‘‘हीरा अब किस विषय में अॅडमिशन लेना है?‘‘
‘‘रमेश... कुछ न कुछ लेगें।‘‘
‘‘हीरा पढ़ने के लिए बहुत पैसे लगते हैं, इसके बारे में भी सोचना पड़ेगा।‘‘
‘‘हम आर्ट्स शाखा में जाएँगे हीरा।‘‘
‘‘क्यो..?‘‘
‘‘ज्यादा खर्चा नहीं होता।‘‘
‘‘लेकिन भविष्य में नौकरी मिलेगी रमेश...।‘‘
‘‘जरूर मिलेगी।‘‘
‘‘रमेश हमें जल्द से जल्द नौकरी करनी है, इसलिए हम कोई दूसरा डिप्लोमा करें तो...।‘‘
‘‘कौन-सा?‘‘
‘‘एम.सी.व्ही.सी. (व्यावसायिक कोर्स) कैसा रहेगा?‘‘
‘‘वही करेंगे हीरा।‘‘
 अॅडमिशन लिया। हँसते-खेलत कैसे दिन बीत गए पता नहीं चला। इसी में ग्यारहवीं, बारहवीं की शिक्षा हुई। फिर... वही सवाल आगे कौनसी पढ़ाई करेगें?‘‘
‘‘हीरा मैं बी.ए. को अॅडमिशन लेनेवाला हँूं?‘‘
‘‘आप हीरा।‘‘ 
‘‘मैं भी वहीं।‘‘
 हीरा इसमें खर्चा भी कम हैं। पढ़ाई के साथ-साथ कुछ काम करेंगें। इसी से बस पास का खर्चा निकलेगा। छुट्टी के दिनों में खेती में काम करेगें। इसी से शिक्षा पुरी करनी थी। समय के साथ हालात बदलते गए ओर स्नातक की शिक्षा हुई। पढ़कर क्या बनना है, कुछ तय नहीं । सिर्फ माँ-बाप के खातिर पढ़ना हैं यही मकसद....। 
‘‘हमारी पढ़ाई करने की हैसियत नहीं है हीरा...। हमें जो पढ़ना है वो हम पढ़ ही नहीं पाते। पैसो के कारण...। रमेश शिक्षा में हैसियत पैसों से नही ज्ञान से तय होती हैं। झूठ... सरासर झूठ हीरा... यह सच होता तो हम रुचि के अनुसार क्यों नहीं पढ़ पाएँ। रमेश समाज के कुछ बच्चें कुछ भी नहीं पढ़ पाते, मजबूरी के कारण...। हम कुछ न कुछ तो पढ रहें हैं।‘‘
 रमेश आगे की शिक्षा के बारे क्या सोचा? अब तक तो हुआ आगे... हीरा हम हार नहीं मानेंगे। पढ़ाई करेंगें, खर्चा कितना भी क्यो न हो।
 रमेश मैंने सुना है विश्ववि़द्यालय में पढ़ाई बहुत अच्छी तरह से होती है। अच्छे लेखक से बाते होती हैं। सही जिंदगी वही समझ में आती है। हाँ, सही है हीरा। हमारे काॅलेज के लड़के हैं वहाँ...। उनके सहारे हम रहेंगे। मैं जाकर आता हॅूं विश्वविद्यालय में। हाॅं...जरूर।
 विश्वविद्यालय का माहौल बहुत बढ़िया लगा। हम कई साथी विश्वविद्यालय में पढाई के लिए दाखिल हुए। अपने-अपने रूचि के अनुसार अॅडमिशन लिया। हीरा और  मैंने वही पैसों के हिसाब से एम.ए. के लिए अॅडमिशन लिया क्योंकि यहाॅं ज्यादा खर्चा नहीं था।  
 सभी पढ़ाई में व्यस्त रहते थे। किसी को कोई दिक्कत हो तो मदत करते थे। पढ़ाई में किस तरह से समय बीत रहा था, समझ में नहीं आता था। हीरा तो पुराना ही साथी था, लेकिन विश्वविद्यालय में विवेक, अमर, सोपान दिलीप, सुमन, जानवी आदि साथ मिले। उन्हीं में जानवी और विवेक मुझे बहुत करीब लगते थे, हर बात मैं उन्हें बता देता था एक भाई, बहन, दोस्त समझकर...। आज मैं जो कुछ भी हँू उन्हीं के कारण हँू। 
 सब मिलजुलकर रहते थे। एक-दूसरे के सुख, दुख में साथ रहते थे। खुन के रिश्तें से गहरे रिश्तें बने थे हमारे। शिक्षा होने के बाद जब जाने की नौबत आएगी तो कैसी अवस्था होगी यही चिंता सताती थी। सभी ने किसी न किसी विषय में एम.ए., एम.फिल्. नेट, सेट पास किया। मैंने भी उन्हीं के कारणवश शिक्षा पुरी की। इसी समय एम.फिल्. में सुजाता नाम की लड़की हमारे ग्रुप में शामिल हुई। वो बहुत शांत स्वभाव की लडकी थी। किसी से ज्यादा बात तक नहीं करती थी। कई दिन गुजरने के बाद वह थोड़ी बहुत बातें करने लगी। जिस दिन से उसे मैंने देखा था, उसी दिन से मैं उसे चाहने लगा था। 
‘‘एक दिन जानवी बहन से कहाँ... ‘‘
‘‘जानवी बहन मुझे आप से बात करनी है।‘‘
‘‘हाँ... कहो न रमेश.‘‘
‘‘मुझे सुजाता अच्छी लगने लगी है।‘‘
‘‘मैं उससे पे्रेम करता हूॅं।‘‘
‘‘सुंदरता देखकर नहीं... स्वभाव देखकर...।‘‘
‘‘लेकिन मुझ में बोलने की हिम्मत नहीं है।‘‘
‘‘लेकिन वो आप से प्रेम करती हैं क्या रमेश?‘‘ 
‘‘पता नहीं।‘‘
‘‘समय मिलने के बाद मैं पूछँूगी रमेश।‘‘
‘‘कुछ दिन गुजरने के बाद जानवी ने कहाँ.... रमेश वो तुमसे प्रेम नहीं करती।‘‘
‘‘क्यों? जानवी बहन...।‘‘
‘‘जानवी मैं उसे बहुत चाहता हूँ।‘‘
‘‘एकबार तुम बोलकर देखो रमेश।‘‘
‘‘जरूर...जरूर...।‘‘
‘‘न बोलने से अच्छा है बोलना।‘‘
‘‘एक दिन हिम्मत करके कह दिया कि सुजाता मैं तुमसे प्रेम करता हूँ।‘‘
उसने कहा ..... ‘‘मैं नहीं करती।‘‘
‘‘क्यों सुजाता।‘‘
‘‘मेरे पास कुछ नहीं इसलिए...।‘‘
‘‘ऐसा कुछ नहीं रमेश।‘‘
 सुजाता में तुम्हें चाहता हूँ। हाँ, मेरे पास नौकरी नहीं... प्राॅप्रर्टी नहीं...। लेकिन इतना तो कह देता हँू तुम्हें जिंदगी भर खुश रखँूगा।‘‘
‘‘रमेश... आप मुझे अच्छे लगते हो, लेकिन...‘‘
‘‘लेकिन क्या सुजाता?‘‘
‘‘आप की जाति...।‘‘
‘‘आप ठहरे सवर्ण जाति के मैं निम्न जाति की।‘‘
‘‘सुजाता मैंने प्रेम जाति को देखकर तो नहीं किया।‘‘
‘‘जाति बदलने से विचार बदलते है?‘‘
‘‘मेरे कहने का मतलब यह नहीं था रमेश...।‘‘
‘‘किसी भी जाति का व्यक्ति किसी भी विचारधारा को आत्मसात कर सकता हैं।‘‘
‘‘सही है रमेश।‘‘
‘‘समय आने के बाद देखेंगे। तब तक पढ़ाई पर ध्यान दो।‘‘
 विवेक जिंदगी में नौकरी मायने रखती है। इसके बिना कोई महत्त्व नहीं देता। कई लोग पढे लिखे हैं लेकिन नौकरी नहीं। बेरोजगार है। राज्यसेवा हो या लोकसेवा या दूसरी नौकरी इसमें भी भ्रष्टाचार हो रहा हैं। पैसे देकर नौकरी हासिल की जा रही हैं। आम बच्चें पढ़ाई तो करते हैं लेकिन पैसे कहाँ से लाएंगे। यह व्यवस्था बदलनी चाहिए।
 विवेक हमारा ही देख न.. हमारे पास योग्यता हैं लेकिन नौकरी नहीं क्योंकि हमारी बड़े लोगों से पहचान नहीं और न ही पैसा है। ज्ञान हैं त¨ उसे महत्व नहीं। 
‘‘रमेश छोड़ न यह बाते।‘‘
‘‘क्यो छोडू? गंभीर होकर भी...।‘‘
‘‘अध्यापक के साक्षात्कार में क्या पूछते है? पता है न तुझे।‘‘
‘‘रमेश परिवर्तन होगा।‘‘
‘‘लेकिन कब?‘‘
‘‘विवेक बहुत दुख होता हैं... योग्यता के बावजूद भी नौकरी नहीं। माँ-बाप के सपने होते हैं बच्चो से। उन्हें तो नहीं न कह सकते अध्यापक बनने के लिए पैसों की जरूरत हैं क्योंकि उन्होंने अनपढ़ होकर हमें पढ़ाया। एक समय की रोटी तक नहीं खाते थे वह... हमारे खातिर। उन्हें और दुख क्यो दूँ? सुख तो नहीं दे सकता तो दुख क्यो?
 विवेक कही परिवार गरीब होकर भी बच्चों को पढ़ाते है। लेकिन इस व्यवस्था को ज्ञान मायने नहीं रखता, जाति मायने रखती हैं। बचपन में कुछ मालून नहीं होता लेकिन जब सब कुछ जान लेते हैं, तो बचपन ही अच्छा लगता है।
 विवेक मेरी तो दसवीं कक्षा में हैसियत तय की व्यवस्था ने। मेरी ही नहीं तो मेरे जैसे कही बच्चें हैं जो विज्ञान, संगणकशास्त्र या दूसरी शाखा में जाना चाहते हैं लेकिन... हैसियत बता देती है आप उधर नहीं जा सकते। क्योंकि आपके पास इतना बोझ उठाने की ताकत नहीं। बोझ ज्ञान का नहीं पैसों का। मेरी उस समय हैसियत तय हुई थी, आज भी हो रही है। 
‘‘सुजाता...।‘‘
‘‘हाँ... रमेश बोलो।‘‘
‘‘सुजाता मेरे परिवार के सदस्य मेरी शादी तय कर रहे हैं मैं क्या करू?‘‘
 कुछ दिन गुजरने के बाद सुजाता ने एक दिन कहाँ... मैं आप से शादी करुँंगी। अंतिम क्षण तर साथ दँूगी। 
‘‘सुजाता हम शादी कब करेंगें?‘‘
‘‘रमेश आप भी न... मुझे समय तो दो। मुझे परिवार के सदस्यों का दिल जितना पड़ेगा।‘‘
‘‘आप जो ठीक समझे।‘‘
 एक दिन अचानक सुजाता ने कह दिया मुुझे परिवारवालों ने लड़का देखा हैं, यह सुनकर कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, करे तो क्यों करें। 
‘‘सुजाता मैं आपके परिवारवालों से बात करूं...।‘‘
‘‘नहीं...‘‘
‘‘मैं करूंगी। समय आने के बाद। आप चिंता मत करो। देखने आए लड़के को सुजाता अच्छी लगी। परिवारवाले भी राजी हुए। ’’कुछ दिनों बाद सुजाता ने कहाॅं... ‘‘
‘‘रमेश मुझे आप से कुछ बात करनी है।‘‘
’’हाँ.... ब¨ल¨ सुजाता’’
‘‘हमारी शादी नहीं हो सकती रमेश...।‘‘
‘‘क्यो?‘‘
‘‘मेरे परिवारवाले जो तय करेंगें वही मुझे मंजुर हैं।‘‘
‘‘सुजाता मैं कैसे रहूं आप के बिना... आप परिवार के विश्वासपात्र व्यक्ति से बात करके देखो ना...।‘‘
‘‘रमेश मैंने मेरी बहन से कहाॅं... लेकिन उसने ना कह दी।‘‘
‘‘क्यो सुजाता?‘‘
‘‘जाति...।‘‘
‘‘माॅं से एक बार... माॅं भी ना ही बोलेगी। सुजाता को ही मुझ से शादी करना पसंद नहीं है, ऐसा कभी-कभी उसके बोलने से लगता था।‘‘
‘‘रमेश... माँ को बी.पी.है... मैं कैसे बताऊं? उन्हें कुछ हुआ तो। कुछ नहीं होगा सुजाता... बताना तो पड़ेगा। सुजाता ने एक दिन फोन किया और कहाॅं... माँ से बात कीजिए। 
‘‘हैलो...।‘‘
‘‘नमस्ते...।‘‘
‘‘आपका नाम?‘‘
‘‘रमेश...।‘‘
‘‘आप कहाँ से हो?‘‘
‘‘देहात से।‘‘ 
‘‘पढाई?‘‘
‘‘शुरू है।‘‘ 
‘‘शादी को आपके परिवारवालों ने ना कहाँ तो?‘‘
‘‘मुझे उनके नजर में विश्वासपात्र होना पड़ेगा।‘‘
‘‘आपकी जाति?‘‘
मैं सोच में पडा। कुछ देर ठहरा... झूठ बोलने से अच्छा है सच ही बोल दूँ। 
‘‘सवर्ण जाति का हूँ।‘‘ कहाॅं और फोन रख दिया। 
 कुछ देर बाद सुजाता से फोन करके पुछा की माँ ने क्या कहाँ। वो कहने लगी शादी को माँ ना कहती है। 
‘‘रमेश...।‘‘
‘‘बोलो सुजाता...।‘‘
‘‘आप मुझे भूल जाओ। आपको मुझ से अच्छी लड़की मिलेगी।‘‘
‘‘मैं शांत रहा सुनकर।‘‘
 विवेक... मेरी सुजाता से शादी नहीं हो सकती। क्यो रमेश? मेरे पास क्या है? न पैसा न नौकरी न अच्छा घर...। रमेश प्रेम में यह मायने नहीं रहता। सही हकीकत तो वही है विवेक...। सुजाता कुछ नहीं बोली... लेकिन उसकी खामोशी सब कुछ कह गयी क्योंकि वो जिस लड़के से शादी कर रही है उसके पास नौकरी है, पैसा है, मोटारगाड़ी है, आराम की जिंदगी और जाति भी एक ही है। मेरे पास तो कुछ भी नहीं... है तो जिंदगी भर संघर्ष...। 
‘‘रमेश छोड़ दे विषय।‘‘
‘‘उसका अंतिम निर्णय क्या है? पुछ ले।‘‘
‘‘बहुत दिनों बाद सुजाता रास्ते में दिखाई दी।‘‘
‘‘सुजाता...।‘‘
‘‘हाँ... जल्दी बोलो रमेश...।‘‘
‘‘सुजाता तुम खुश रह सकती हो तो शादी करों...। तुम्हारी खुशी में मेरी खुशी हैं। बस तुम खुश रहो। तुम्हारी खुशी के खातिर मैं तुम्हें भूल जाऊंगा।‘‘
‘‘चलता हँूूॅं, सुजाता मुझे बाहर जाना है।‘‘
 कुछ दिनों बाद सुजाता विश्वविद्यालय में आने लगी, लेकिन बात करने से इनकार कर दिया। यकीन दिलाने के बाद भी कि मैं तुम्हें भूला हँू। उसे लगने लगा था मैं उसकी जिंदगी में दरार निर्माण करुँगा। वो दोस्त बनकर भी रहना नहीं चाहती थी। वो मुझे घृणा से देख रही थी। उसे रिश्ता ही तोड़ना था। इतना तक कह दिया कि दोस्त के रिश्ते से भी मुझे मत बोलो रमेश... मैं खुश रहना चाहती हँू । आप मेरे बर्बादी का कारण मत बनो। यह सुनकर बहुत दुख हुआ। 
‘‘विवेक दुनिया मतलबी हैं, समय-समय पर बदलती है।‘‘
‘‘विवेक एक बात कहूॅं?‘‘
‘‘बोल¨ रमेश...।‘‘
‘‘माँ-बाप का प्रेम ही सच्चा प्रेम होता है कभी बदलता नहीं...। सुख में भी और दुख में भी। बाकी सब तो ढकोसले है समय के साथ बदलते है...।’’
 विवेक लोग अपने हिसाब से हैसियत तय करते हैं इन्सान की। जो मेरी शिक्षा, नौकरी और यहाँ तक की प्रेम में भी हैसियत तय हुई। 
 ‘‘विवेक माँ कहती थी दुनिया में हर कोई अपने हिसाब से हैसियत ठहराते हैं। लेकिन वह गलत हैं हैसियत तब समझ में आती है जो खुद के नजर में क्या है?‘‘ 
सही है रमेश... माँ सही कहती है... दुनिया क्यो न उनके नजर से हमारी हैसियत तय करें खुद के नजर में हम नहीं गिरे तो हमारी हैसियत हैं। 
 विवेक मैं भूल जाऊंगा बिते हुए कल को। वो खुश है इसके अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए। प्रेम मिले ही ऐसा थोडे ही होता है... प्रेम में त्याग, समर्पण तो मायने रखता है। मैंने भी वही किया। लेकिन अफसोस इस बात का है कि वो फुले, शाहू, आंबेडकर के विचारों को मानती थी, लेकिन आचरण में क्यो नहीं ला सकी? रमेश जाने द¨ न...। तु जिंदगी की नई शुरूआत कर¨। आप अपनी जिंदगी में खुश रहो और उसे भी खुश रहने दो। तुम्हारे प्रेम का उसे कभी न कभी अहसास होगा। इसी में तुम्हारे प्रेम की जीत है। अब तुझे अपने माँ-बाप के लिए जीना हैं। वही तो तुम्हारा सपना था। हाॅं... विवेक मैं अपने माँ-बाप के लिए जिऊंगा। जिंदगी में हार नहीं मानूगाॅं। खुद में काबिलीयत बनाऊंगा। इस भ्रष्ट व्यवस्था से संघर्ष करता रहूँगा। अपने माँ-बाप के खातिर...


संक्षिप्त परिचय
नाम ः वाढेकर रामेश्वर महादेव
पता ः हिंदी विभाग, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विश्वविद्यालय, अ©रंगाबाद -431004 (महाराष्ट्र)
ल्¨खन ः आंबेडकरी इंडिया, भाषा, विवरण, श¨धदिशा, हिंदुस्थानी जबान युवा आदि पत्र्ा-पत्र्ािकाअ¨ं में ल्¨ख तथा    संग¨ष्ठिय¨ं में प्रपत्र्ा प्रस्तुति।
संप्रति ः श¨ध कार्य में अध्ययनरत।
संपर्क ः म¨. 9022561824
ई मेल ः तअंकीमांत/हउंपसण्बवउ


 


Saturday, March 14, 2020

उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान समारोह सम्पन्न

सराईपाली- श्री मौनतीर्थ हिन्दी विद्यापीठ उज्जैन मध्यप्रदेश एवम एम. डी. एजुकेशन सोसायटी सराईपाली छत्तीसगढ़ के संयुक्त तत्वाधान में प्रतिभा पब्लिक स्कूल के सभागृह में उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया।कार्यक्रम नगर पालिका अध्यक्ष अमृत पटेल के मुख्य आतिथ्य एवम विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी सराईपाली आई.पी.कश्यप की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ।विशिष्ट अतिथि के रूप में हायर सेकेंडरी स्कूल बलौदा के प्राचार्य के.आर.चौधरी,डॉ. एम. पी.अग्रवाल एम. डी. मेडिसिन,सी. ए. रवि अग्रवाल,समाजसेवी नरेशचंद्र अग्रवाल,प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन के अध्यक्ष आर.एन. आदित्य,एम. डी. मेमोरियल स्कूल के अध्यक्ष प्रेमलाल अग्रवाल, रामचंडी विहार के एम. डी. प्रमोद देहरी उपस्थित रहे।कार्यक्रम में उपस्थित समस्त अतिथियों का स्वागत बैंड बाजा व पुष्पवर्षा के साथ किया गया। माता सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन कर मुख्य अतिथि के द्वारा कार्यक्रम को सम्बोधन करते हुए कहा कि दो राज्यों की संस्थाओं के द्वारा आयोजित उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान समारोह में दिया जाने वाला अवार्ड अंतर्राज्यीय सम्मान के समकक्ष है जो क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले शिक्षकों को प्रोत्साहित करेगा। यह आयोजन शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देगा। विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी आई.पी.कश्यप के द्वारा अध्यक्षीय उदबोधन में कार्यक्रम की सराहना करते हुए समस्त अवार्डी शिक्षकों को बधाई देते हुए निरन्तर उत्कृष्ट कार्य जारी रखने हेतु प्रेरित किया। कार्यक्रम में आयोजन समिति द्वारा जनसंपर्क एवम समाचार पत्रों में  पूर्व में प्रकाशित उपलब्धियों  के आधार पर चयन करते हए  सराईपाली बसना पिथौरा सारंगढ बरमकेला रायगढ़  बिलाईगढ़ ब्लॉक के 1 प्राचार्य, 17 व्याख्याता,1 पीटीआई,1 ग्रंथपाल,22 शिक्षक,14 सहायक शिक्षक सहित कुल 56 शिक्षकों का  सम्मान प्रमाण पत्र एवम मोमेंटो से किया गया।


कार्यक्रम में के.आर.चौधरी प्राचार्य शा..मा. विद्यालय बलौदा को सराईपाली क्षेत्र में शैक्षणिक चेतनशीलता, शिक्षा गुणवत्ता, साक्षरता वृद्धि,व्यक्तित्व विकास,बेहतर अध्यापन,कुशल प्रबन्धन,उत्कृष्ट नेतृत्व क्षमता एवम शिक्षा के क्षेत्र में निरन्तर सक्रिय भूमिका हेतु लाईफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड-2020 सम्मान मुख्य अतिथि के द्वारा पगड़ी पहनाकर किया गया।इस दौरान सदन तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।


कार्यक्रम में जोगीलाल पटेल,सविता तिवारी,अजय भोई,चित्रसेन भोई,लोकेश साहू,श्रीराम साहू,विजयलक्ष्मी पटेल,संजय अग्रवाल,दसरथ प्रधान,मनोज भोई,अजय प्रधान,रेखा पुरोहित,अक्षय साहू, बासंती प्रधान,अजय नायक,विवेक वर्मा,उपेंद्र नायक,शुभ्रा डड़सेना,प्रेमचंद साव,यशवंत चौधरी, लक्ष्मी नायक,हरिराम पटेल,डिजेन्द्र कुर्रे,धीरज सिंह,ज्योति पटेल,संजीत पात्रो,किसन पटेल,बिंदेश्वरी साहू,हेमंत चौधरी, हीराधर साव,गजेंद्र नायक,प्रतिभा चौधरी, श्रवण प्रधान,माधव प्रसाद पंडा,संगीता पंडा,अन्नपूर्णा बुडेक,नेमीचंद भोई,राजू साहू,मकरध्वज साहू,रश्मि राजा,ध्वज पटेल, धर्मेन्द्र नाथ राणा,महेश नायक,विवेक रंजन पटेल,योगेश साहू,नरेंद्र सिदार,रश्मि पटेल,टिकेश्वर सिदार,शंकर अग्रवाल,रोहित शर्मा,सुकमोती चौहान,वीरेंद्र चौधरी, विशम्भर ठाकुर,वीरेंद्र कर,धनीराम नंद को सम्मानित किया गया।


कार्यक्रम का संचालन शुभ्रा डड़सेना एवम आभार संयोजक  डॉ अनिल प्रधान द्वारा किया गया। कार्यक्रम के सफल संचालन में प्रयोजक रामचंडी विहार नया रायपुर सहप्रयोजक नेवज ट्रेवल्स रायपुर,नेवज फ़ूड प्रोडक्ट,विकास विद्यनिकेतन स्कूल विशाखापट्टनम एवम एम. डी. मेमोरियल स्कूल के डायरेक्टर मनोज प्रधान, विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ प्रादेशिक शाखा छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष महेंद्र पसायत एवम एम. डी.मेमोरियल स्कूल स्टॉफ का योगदान उल्लेखनीय रहा।


ग़ज़ल

ग़ज़ल १: दूर चले हम


 


जलते बदन के दाग़ से हो मजबूर चले हम


चलो कि इस शहर से, कहीं दूर चलें हम


 


चैन-ओ-अम्न के सब रास्ते क्या बंद हो गए


इक मज़हब के वास्ते, हो काफ़ूर चले हम


 


आग से ही आग की लपटें बुझाने के लिए


यमुना के बहते दरिया से कहीं दूर चले हम


 


सड़क पे ख़ून देखकर कुछ मजबूर हो गए


उन ज़बानों के ज़हरीले नशे में चूर चले हम


 


पत्थरों के सामने जब ज़ोर लबों का न चला


तो इस जम्हूरियत से रूठ कर हुज़ूर चले हम


 


         





ग़ज़ल २: पहले वतन के बेढके बदन को लुकना चाहिए


 


पहले वतन के बेढके बदन को लुकना चाहिए


जैसे भी हो ये पीप बहता घाव छुपना चाहिए


 


बह चुका ख़ून बहुत, दोनों तऱफ के लोगों का


जैसे भी मुमकिन हो बहता ख़ून रुकना चाहिए


 


मन्दिर और मस्जिद में, इंसां कहीं का न रहा


अब इंसानियत के सामने, धर्म झुकना चाहिए


 


बाँट-बाँट के काटने का सिलसिला कब है नया


पीर उस सीने में हो तो दिल तेरा दुखना चहिए


 


ग़ैर की चिनगारी में घर अपना जला के बैठे हैं


अब ख़ुद के भी ज़मीर पे सवाल उठना चाहिए


 

 


नज़्म : वक़्त का मुसाफ़िर


 


हम सब जो यूँ बढ़ रहे हैं


एक नए वक़्त में चल रहे हैं


आगे बढ़ने में माहिर हैं


कि हम सब एक मुसाफ़िर हैं ।


 


सिर्फ़ गली,शहर या राहों के नहीं


यूँ कि वक़्त की पगडंडी पे


भटक रहे हैं सय्यारे से


कुछ जीते से, कुछ हारे से


 


घड़ी के काँटों का अलग फ़साना


बस गोल गोल है चलते जाना


जो बीत गयीं सदियां वो मानो


जैसे छोड़ा शहर पुराना


एक मुसाफ़िर हार न माना


फिर नया साल है नया ठिकाना।


 


जैसे राही अपनी राह पकड़


बस शहर बदलता जाता है


वैसे ही ये शहर, 'साल' का


हर साल बदलता जाता है।


 


इन वक़्त के शहरों में


क़स्बे महीनों के नाम हैं


कहीं सर्दी की धूप है सेकी


कहीं गर्मी में खाये आम हैं।


 


जब इन महीने वाले कस्बों में


कोई हफ़्ते वाली गली आ जाए


तो नुक्कड़ पे खड़े ख़ड़े


हफ्तों का हाल पूछना


कितने हफ़्ते रोके काटे,


कितने ख़्वाब मिलके बाटें


इन सबका, हिसाब पूछना।


 


हर गली हर नुक्कड़ पे बसा


एक दिन नाम का घर होगा


एक आंगन जैसा लम्हा होगा


और चौका जैसा एक पल होगा ।


 


जैसे सारे कमरे एक जगह


आंगन में मिल जाते हैं


वैसे सब लम्हे इक दूजे के


कंधों पे टिक जाते हैं ।


 


तुम मुसाफ़िर चलते चलते


वक़्त के किसी शहर ठहर जाना


दिन नुमा घर के अंदर


इक लम्हे में फिर रुक जाना


औऱ किसी लम्हे की दीवार पर


कान लगा, दास्ताँ सब सुन जाना ।


 


सुन ना कैसे हसीन याद कोई


गीले पैर ले छप छप करती आई थी


और कैसे कड़वी बातों ने


एक अर्थी वही उठाई थी।


एक तंग रसोई लम्हे में


तुम्हारे हौसले गुड़गुड़ाये थे


यहीं मुझे तुम छोड़ वक़्त के


दूजे शहर चले आये थे।


 


पर तुम्हें तो जाना ही था,


तुम मुसाफ़िर जो थे


एक मुसाफ़िर का फ़र्ज़ है


एक शहर से शहर दूसरे जाना


जैसे आख़िरी तारीख़ बदल जाना


मुसाफ़िर हो,जाओ बिल्कुल जाओ


नए शहर का जश्न मनाओ ।


 


नए साल का जश्न मनाना


पर सुनी दास्तान लम्हों की


फिर अगले मुसाफ़िर को सुनाना ।


 


कभी कभी जब वक़्त मिले


तो गए लम्हों की दास्तान सुनना ।


नए साल का जश्न करना


पर बीते शहर का एक ज़िक्र रखना


कभी कभी जब वक़्त मिले


तो बीते लम्हों की दास्तान सुनना ।


 


हम मुसाफ़िर हैं


आगे बढ़ने में माहिर हैं


हम मुसाफ़िर हैं ।


वक़्त ए ज़ुहूर ए इश्क़ भी बेसत से कम नहीं 

वक़्त ए ज़ुहूर ए इश्क़ भी बेसत से कम नहीं 

ये इंक़लाब ए ज़िन्दगी जन्नत से कम नहीं 

 

तेरी निगाह  ए  इज़्न जो रहती खोई खोई 

ये साथ भी तो हमदम फुरक़त से काम नहीं

 

वो ज़ुल्फ़ ए शबनमी जो बोसा कुनां है रुख से 

मेरे लिए ये क़ुरबत, हसरत से कम नहीं 

 

बुकरात हो गए हो पढ़ते नहीं हो कुछ भी 

ये खुश नुमाई आप की ग़फ़लत से कम नहीं

 

नक़ली उलूम पढ़ कर नक़ली से हो गए हैं 

ये बात है जो तल्ख़ हक़ीक़त से काम नहीं 

 

दौर ए  जदीद है ये तसव्वुफ़ रहा नहीं 

अब हैं जो पीर व मुर्शिद झंझट से कम नहीं  

 

मर मर के जी रहा है ताकि रहे मुबीं याद 

हालाँकि ऐसे जीना मय्यत से कम नहीं

 

बेसत = पैग़ंबर की पैदाइश (जिसके बाद बाद समाज बदल गया है)

इज़्न = इजाज़त  

बुकरात = खूब हांकने वाला 

खुश नुमाई = खुद को अच्छा ज़ाहिर करना

नक़ली उलूम = यानी  उलूम ए नक़लिया (क़ुरान, हदीस, फ़िक़्ह, तफ़सीर की तालीम जो मदरसे में दी जाती है.)

तसव्वुफ़ = यानि असल सूफ़ियत

कोई भी शख्स सुधार कर सकता है. ग़ज़ल के रंग में कुछ कहने की कोशिश भर है. सन्देश पहुँचाना मक़सद है मगर ये शायरी के फन पर कैसे खरा उतरे मुझे नहीं मालूम। कमियों के लिए मैं ज़िम्मेदार हूँ.... तुकबंदी की इस तरक़्क़ी और खूबियों का हक़दार कोई और है.

 

@MobeenJamei

 युद्धों को नकारते गीत

               कुछ मंज़र जो इतिहास में दोहराए जाने के लिए बार- बार काम में आते हैं, ऐसी दहशत और नफ़रत की स्थितियाँ धार्मिक चोला ओढ़ कर जिहाद के रास्ते पर आगे बढ़ती हैं। उत्तरआधुनिकता के दौर में यह राजनीति की धार्मिक समांगी मिश्रण का घोल अशिक्षा और उन्माद के रूप में पिलाया जा रहा है, जिसे खैरात और भावना का प्रसाद समझ कर ग्रहण करने में कोई बुराई नहीं समझी जाती। युद्ध, जेल और दहशत ये तीनों बाह्य और आंतरिक हुक़्मरानों के हथियार हैं जो उन्हें तख़्त पर काबिज़ रहने में भारी मदद पहुँचाते हैं। इसका संचालन राजनीतिक चरित्र पर पड़े पर्दे के पीछे से किया जाता है। देश की राजनीति में इनका बहुत योगदान है। जर्मनी का नाजीवाद और यहूदियों की दशा से लगभग सभी वाकिफ़ हैं जिसका सफ़र आज भी कई देशों में जारी है।
               २६ जनवरी की सुबह नहाने के बाद गलियों से होते हुए मुख्य चौराहे की ओर बढ़े, तभी रास्ते में लगे साउंड सिस्टम में जावेद अख्तर का लिखा हुआ गाना सुनाई पड़ा- 'मेरे दुश्मन, मेरे भाई, मेरे हम साए' यह बात कितनी बड़ी है कि कोई अपने दुश्मन को अपना भाई कहे। जो हुआ उन सबको भुला कर जंग को हमेशा के लिए रोक देने की अपील किसी भी अमनपरस्त व्यक्ति को अच्छी लगेंगी। हालांकि यह अपील व्यक्तिगत है, यह किसी सामूहिक प्रक्रिया का भी काम हो सकता है अगर इसके बारे में जागरूकता फैलाई जाए। गाने की एक- एक लाइन पर अगर गौर किया जाए तो उसमें जंग के बाद की भयावाह स्थिति का विस्तृत वर्णन किया गया है। 'जंग तो चंद रोज़ होती है/ ज़िन्दगी बरसों तलक रोती है'! दरअसल ये बात नई नहीं है, दुनिया में जितनी भी जंगे हुई हैं सभी के परिणाम से आप रूबरू हैं। हालांकि की यह बात कम विश्वसनीय है कि बिना जंग के किसी भी मसले का निपटारा कैसे हो सकता। बहुत करेंगे कि हम अपनी तरफ़ से लड़ाई नहीं करेंगे लेकिन क्या ज़रूरी है कि सामने वाला भी यह विचार रखता हो। लेकिन आप सोच कर देखिए और यह बात सच है कि अगर दुनिया में किसी भी मसले का निपटारा बिना लड़े, बिना खून बहाए, बिना घर उजाडे़, बिना जेल गए किया जा सके तो इससे बेहतर क्या हो सकता है। ऐसा सिर्फ भारत के ही नहीं बल्कि बाहरी देशों के भी कुछ चिन्तक विचार दे चुके हैं।
              भयानक स्थिति का दौर है जब नेताओं के द्वारा खुले आम गोली मारने के नारे लगवाए जा रहे हों और देश के सबसे बड़े और सबसे मजबूत नेता शांति और सद्भावना का परिचय देते हुए अंतरराष्ट्रीय मेहमान का महत्मा गांधी से परिचय करा रहे हैं। वैसे बिना युद्ध के किसी भी मसले का निपटारा करना इस समय संभव नहीं लगता क्योंकि हम अपने ही घर में धर्म की राजनीति में फंसकर धर्मयुद्ध पर निकल चुके हैं। शायद कुछ लोगों को याद होगा टीवी पर एक आदमी चिल्ला- चिल्ला कर कह रहा था कि अपने बच्चों पर नज़र रखिए वे कहीं दंगाई न बन जाएं कुछ लोगों ने उसकी बात पर अमल किया लेकिन कुछ लोगों ने अपने बच्चों को देशभक्ति के नाम पर इस युद्ध में झोंकने का पूरा प्रयास किया। देश इससे भी भयानक स्थिति के दौर से गुज़र रहा है जब किसी की मौत पर कुछ लोग जश्न भी मना रहे हैं। मानवता की हत्या का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है। नेताओं का क्या है चाहे धर्मयुद्ध हो या सीमाओं का युद्ध उनके अपने कभी नहीं मरते हैं। मरता तो हमारे और आपके बीच का सदस्य है।
              इतिहास में एक घटना हमेशा याद रखी जाएगी जो शिक्षण संस्थान को ध्वस्त करने के काले कारनामों में शामिल है। २६ दिसंबर २०१४ में पाकिस्तान के पेशावर में एक आर्मी पब्लिक स्कूल पर अतंकवादी हमला हुआ, जिसमें छात्रों और अध्यापकों को मिलाकर कुल १४९ लोग मारे गए उसमें १३२ स्कूल के छात्र थे। ISPR की तरफ़ से एक गीत 'मुझे दुश्मन के बच्चों को पढ़ाना है' प्रकाश में आया और विरोध प्रदर्शित करने का अनूठा तरीका तलाशा गया। बदला लेने जैसी कोई बात नहीं है इस गाने में। क्योंकि बदला लेना एक परंपरा जैसे बन जाता है जो कभी रुकने का नाम नहीं लेगा। इसलिए दुश्मन के बच्चों को पढ़ाने की बात कही गई, उनकी आने वाली पीढ़ियों को जागरूक करने की बात हुई ताकि भविष्य में वे सब इस भयानक परम्परा को छोड़कर अमन के रास्ते पर चलें, सभी को प्यार करें। इसी चैनल की तरफ़ से एक गीत २०१८ में पब्लिश हुआ जिसमें दहशत फैलाने वालों पर लानत भेजता हुआ देखा जा सकता है, 'मै ऐसी क़ौम से हूं जिसके वो बच्चों से डरता है/ बड़ा दुश्मन बना फिरता है जो बच्चों से लड़ता है!' और सबसे ख़ास बात ध्यान देने वाली यह है कि जिस देश के उपर सबसे ज़्यादा आतंकवादी गतिविधियों का ठप्पा लगा है यह गीत उसे देश में बनाया गया। नफ़रत, ख़ून- खराबा, जेल, दहशत से सभी को आज़ादी चाहिए। देश में रहने वाले लोग इंसान होते हैं जो अमन की चाह रखते हैं, किसी भी देश को आतंकवादी देश कह देने से हम वहाँ की मज़लूम आवाम के साथ नाइंसाफी होगी, क्योंकि वहाँ भी हमारे मुल्क़ की तरह मजदूर, किसान, बूढ़े और बच्चे रहते हैं जिन्हे ऐसी गतिविधियों के बारे में कुछ भी पता नहीं होता सभी को उसी में समेट लेना बर्बरता है।
                जब हम अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं उस समय हमसे दर्शक यह उम्मीद करते हैं कि हमारे पास दर्शकों में बैठे हुए लोगों से कुछ बेहतर विचार है जो हम उनके साथ बांटना चाहते हैं, और कला का यह रूप इंसानियत को बचाए रखने के साथ कलात्मक अभिव्यक्ति के ज़रिए आम व्यक्ति को जागरूक किया जाय। यह बात अपने आप में बहुत बड़े मन से निकली है जो अपने गीत के माध्यम से यह अपील करते हैं 'मुझे दुश्मन के बच्चों को पढ़ाना है', वे चाहते तो उनसे बदला लेने के लिए भी सोच सकते थे या इसी दिशा में लोगों को जागरूक करते लेकिन सच कहा जाए तो अमन कायम करने के लिए इससे बेहतर और कोई तरीका हो ही नहीं सकता। यह वैश्विक स्तर पर प्रचारित होने पर कारगर हो सकती है। हम रजाई ओढ़ कर मोबाइल पर आईटी सेल के द्वारा बनाए गए एसएमएस और फोटोशॉप बिना ध्यान दिए फॉर्वर्ड करने में लगे हुए हैं। दरअसल हम युद्ध की पृष्ठिभूमि तैयार करने में लगे हुए हैं।
                  कुछ सालों से युद्ध को लेकर लोगों में कई धारणाएं पनप रही हैं। आज कल यह राजनीतिक हो चुका है। लोग इस बात को समझने का प्रयास कर रहे हैं कि नेताओं के अपने स्वार्थ के चलते कई युद्धों के संकेत प्रायः दिखाई पड़ जाते हैं। वैसे इस तरह की बात १९३६ में 'बरी द डेथ' नाटक के जरिए इरविन शॉ ने भी कहने की कोशिश की थी, जबकि उस समय के समाचार पत्रों ने भी शुरुआत में आज की तरह ही सत्ता की गुलामी करने की कोशिश की और इसे राष्ट्रद्रोह के नजरिए से प्रेषित किया। आज भी देश में लोगों को न्यायपालिका और सेना पर अटूट विश्वास बना है, लेकिन अंधराष्ट्रवाद के शिकंजे में बहुत कुछ मानवता के विनाश और अंधभक्ति की ओर ढकेलने का प्रयास जारी है।
                 साहिर ने अपनी ज़िन्दगी के तमाम अनुभवों और अध्ययन के आधार पर एक ऐसी दुनिया की कल्पना की जिसको सुनने के बाद हम सोचते पर मजबूर हो जाते हैं- 'जेलों के बिना जब दुनिया की सरकार चलाई जाएगी/ वो सुबह कभी तो आएगी!' और आखिर पंक्ति में उन्होंने खुद को शामिल करते हुए लिखा 'वो सुबह हमीं से आएगी!' पता नहीं कितने लोग इस बात पर यक़ीन करेंगे कि ऐसा सम्भव भी हो सकता है लेकिन साहिर लुधियानवी ने इस बात की कल्पना कर ही दी। एक ऐसा समाज बनाया जाए जिसमे दौलत के लिए औरत की अस्मत न लूटी जाए। जाहिर सी बात है हम जब इन बातों का खुलासा करते हैं तब रवीन्द्रनाथ टैगोर का वह संस्मरण 'रूस की चिट्ठी' कैसे भूल सकते हैं जो साहिर से पहले की बात की पुष्टि करता है 'जहाँ की जेलें भी स्वर्ग हैं'। टैगोर ने रूस में ऐसा देखा था और साहिर ने अपने देश में बिना जेल के नियमन की कल्पना करते हैं। 'जंग तो खुद ही एक मसला है/ जंग क्या मसअलों का हल देगी/ खून और आग आज बरसेगी/ भूंख ओर एहतियाज कल देगी!' महात्मा गांधी जी सत्य और अहिंसा के द्वारा समाज को नई ऊंचाई देने का रास्ता अख्तियार करते हैं, उनके तमाम योगदानों में एक पहलू लोगों अंदर से जेलों का भय समाप्त करना भी अति महत्वपूर्ण रहा है। इसे हम नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते।
                 धर्म को लेकर नफ़रत बढ़ती जा रही है जो किसी आग की तरह है, जो सिर्फ बढ़ना जानती है और इस बढ़ने के क्रम में बहुत कुछ नष्ट करते हुए बढ़ती ही जाती है जहाँ इंसानियत या धार्मिक होना कोई मायने नहीं रखता। उसका एकमात्र लक्ष्य विनाश ही होता है। हम जब युद्ध की बात करते हैं तब हमें इसके दूरगामी विनाश को हमेशा याद रखना चाहिए क्योंकि युद्ध होने पर तात्कालिक प्रभाव जितना होता है उससे कहीं ज्यादा उसके बाद दिखाई पड़ता है। युद्ध की भेंट कई पीढ़ियां ऐसे चढ़ती हैं जिसकी भरपाई शायद संभव नहीं है। बीमारियों का अंबार उस समय की सामाजिक परिस्थितियों को ग़मगीन कर देती हैं।
                 द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की स्थिति इतनी भयानक थी जिसका ख़ामियाजा आज भी उसके आस- पास के लोग भुगत रहें हैं। ऐसा ही एक गीत जो युद्ध की विनाशकारी स्थिति को दर्शाता है। 'गांधी टू हिटलर' फिल्म का वह गीत जिसे पल्लवी मिश्रा ने लिखा है - 'हर ओर तबाही का मंज़र/ गरजा विनाश का बादल है/ कहीं सहमा- सहमा बचपन है/ कहीं रोता मां का आंचल है!' यह एक ऐसा गीत है जो मानव सभ्यता के सबसे बड़े युद्ध का दर्द बयां करता है। हिटलर की सोच और राष्ट्रवादी सोच को चरम पर ले जाने का नशा कितना भयनाक हो सकता है इस गीत में साफ झलकता है। 'जो चले जीतने दुनिया को क्या खबर नहीं है यह उनको/ जब जंग जीत कर आएंगे सब कुछ न मुकम्मल पाएंगे!' यह बात जग ज़ाहिर है कि युद्धों से कितना बड़ा नुकसान होता है। इस नुकसान की भरपाई में सबसे अहम इंसानी सभ्यता के विनाश को कैसे पूरा किया जा सकता है। इस साल के आंदोलनों में प्रदर्शनकारियों ने सिपाहियों को फूल बाँट कर अमन की गुज़ारिश की है। यह संकेत है कि हम अमन चाहते हैं। हमें किसी भी प्रकार का दंगा या फसाद नहीं चाहिए।
                युद्धों का विरोध न सिर्फ भारतीय चिंतकों ने किया बल्कि अन्य देश के लेखकों, दार्शनिकों, और गीतकारों ने भी किया। हम युद्ध की शक्ल अक्सर सिर्फ सीमाओं पर होने वाले युद्ध के आधार पर बनाने का प्रयास करते हैं। जबकि हमारे आस- पास न जाने कितने युद्ध हो रहे हैं जिसे हम देख कर भी अनदेखा कर रहे हैं। उसका असर हमारे मन पर तो पड़ ही रहा है उससे कहीं ज्यादा आने वाली अनजानी पीढ़ियों में भी संचित होता जा रहा है जिसका असर सांप्रदायिक दंगे और धार्मिक उन्माद के रूप में सामने आता है। बदले की यह भावना कभी भी युद्ध से ख़तम नहीं की जा सकती है। इसके लिए आपसी सद्भाव और सामंजस्य आवश्यकता है।
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परिचय.....
जुगेश कुमार गुप्ता
शोधार्थी, हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
शिवना साहित्यिकी, रचना उत्सव, सुबह की धूप पत्रिकाओं में लेख, साथ ही राज्य सभा टीवी पर निराला विशेष कार्यक्रम में गायन।


Sunday, March 8, 2020

नारी रुप अनूप

नारी रुप अनूप

 

मातृशक्ति के अनेक रुप

कार्यशैली  इसकी अनूप ।

घर- आंगन की स्वच्छता 

और सेवा का  गुण खूब ।।

 

माँ,बहन,बेटी,पत्नी रुप

दोनों कर है दस अनुरुप ।

पढने -लिखने में है आगे

मुकाम पाकर होय खुश ।।

 

समझें खुद  को  अनुज

कुल को दें छांव सहे धूप ।

ममता,समता का सागर

पूजे बेटी पग,धन्य मनुज ।।

 

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बेटियां

 

 

पढ़-लिखकर आगे बढ़ रही बेटियां

नई  इबारत  लिख  रही है  बेटियां ।

खेत में उगा रही है अन्न - सब्जियां

चला रही है खेत में  ट्रेक्टर बेटियां ।।

 

अंतरिक्ष में मिसाल बनी है बेटियां

हर क्षेत्र में कमाल कर रही बेटियां ।

हौंसला लिए विशाल जागी बेटियां

बनकर लाल आगे निकली बेटियां ।।

          

                 गोपाल कौशल

         नागदा जिला धार मध्यप्रदेश


Saturday, March 7, 2020

  हिन्दी भवन में होली मिलन समारोह 9 मार्च को

 भोपाल। मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा होली मिलन समारोह 9 मार्च सोमवार को सायंकाल 5.30 बजे से रात्रि 8 बजे तक एक दर्जन से अधिक बहुरंगी सांस्कृतिक प्रस्तुुतियों के साथ आयोजित होगा। इस सांस्कृतिक उत्सव के साथ इस साल कुछ नई प्रस्तुतियांँ भी जुड़ रही हैं। प्रो0 राजकुुमारी शर्मा, श्रीमती विभा शर्मा, डॉ. प्रीति प्रवीण खरे, डॉ. वर्षा चौबे और मुुकेश बंसोड़े द्वारा होली गीत प्रस्तुत होंगे, जबकि तुलसी नौटियाल कुुमाऊंँनी होली,, श्रीमती आशा श्रीवास्तव, श्रीमती सविता रिछारिया एवं समूह और श्रीमती लता बाथम द्वारा बुंदेली होली, श्रीमती पूर्णिमा चतुर्वेंदी के समूह द्वारा निमाड़ी होली एवं श्रीमती राधारानी के समूह,  और प्रमोद भट्ट द्वारा ब्रज की होली की प्रस्तुुति होगी। रघुुवीर सिंह का समूह होली फाग और श्रीमती यशोदा दुबे का समूह रसिया गीत प्रस्तुत करेगा। प्रख्यात नृत्याचार्य विजया शर्मा के निर्देंशन में बच्चों द्वारा कथक शैली में सूफी होली की प्रस्तुति हिन्दी भवन के मुुक्ताकाश मंच पर पहली बार होगी। भरत नाट्यम के लिए समर्पित आरंभम् संस्था के कलाकार शिवाजी येवले और पायल येवले के निर्देंशन में- भरत नाट्यम की प्रस्तुति देंगे। इस अवसर पर शिल्पकार रमाकांत शर्मा की काष्ठ कला कृतियों की प्रदर्शनी भी आयोजित की जा रही है।


तिहाड़ जेल के कैदियों में  देशप्रेम की भावना उजागर करने पहुँची दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी


 दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी द्वारा दिनांक 06.03.2020 को केंद्रीय कारागार नं 2, तिहाड़ जेल के अन्दर उपस्थित सभी श्रोताओं में देशप्रेम की भावना उजागर करने हेतु कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें कवियों के रुप में श्री जय सिंह आर्य,श्री देवेंद्र मांझी,श्री शैलेंद्र सिंह, श्री सुनहरी लाल तुरंत,श्री सुरेन्द्र खास,सुश्री सुमेधा शर्मा ने देश प्रेम के गीत सुना कर मन मोह लिया । डॉ बबीता गौड़ वरिष्ठ पुस्त. एवं सूचना अधिकारी ने क़ैदियों को समर्पित एक बहुत ही सुंदर कविता सुनाई । श्री सुनील गुप्ता, सचिव, दिल्ली कानूनी सेवा प्राधिकरण और डॉ. स्वाति कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे। संयोजक श्री आदेश्वर कांत जी, जेल अधीक्षक ने दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी एवं डॉ रामशरण गौड़ जी, अध्यक्ष, दिल्ली लाइब्रेरी बोर्ड का आभार व्यक्त किया । 


शापित शहर ....... 

शापित शहर ....... 

 

किसी मिथक के अनुसार शहर

 फिर से शापित हुआ है! 

 

कभी अपनी चमचमाहट से 

सब को मोह लेने वाला शहर ! 

 

आज धुआँ के गुब्बार में बदल गया है!! 

 

हर तरफ लाशें ही लाशें, 

जले - अधजले मकान और दुकानें!! 

 

कटे -अधकटे  सिर, और

आदिम टुकडे, लाशों को नोचते 

आवारा कुत्ते!! 

 

बच्चे, बूढे, आदमी औरत, 

सब तरफ चीखें ही चीखें

 

 जगह -  जगह आवारा कुत्तों 

के रोने की आवाजें!! 

 

शायद किसी ऋषि ने शाप दिया था! 

 

शहर को कि, तुम बार - बार अपनी खूबसूरती खो दोगे 

 

एक खास समय में !! 

 

शायद फिर से फलीभूत हुआ है ऋषि का श्राप !! 

 

जब आदमी के अंदर का दैत्य जिंदा हुआ है!! 

 

और लील गया है शहर और उसमें रहने 

 

वाले आदमी को  !! 

 

महेश कुमार केशरी

 C/O - मेघदूत मार्केट फुसरो बोकारो झारखंड

Friday, March 6, 2020

अग्निपरीक्षा



व्यर्थ बहाता क्यों है मानव
आँसू  भी  एक  मोती  है
जीवन पथ पर अग्निपरीक्षा
सबको  देनी  होती  है


अवतारी भगवान या मानव
सब  हैं   इसका  ग्रास  बने
राजा  हो  या  प्रजा  कोई
सब परिस्थिति के दास बने


पहले लंका फ़िर एक वन में
सीता   बैठी   रोती   है
जीवन पथ पर अग्निपरीक्षा
सबको  देनी  होती   है


त्रेता, द्वापर या हो कलियुग
कोई  ना  बच  पाया  है
सदियों से ये अग्निपरीक्षा
मानव  देता  आया  है


प्रेम सिखाती राधा की
कान्हा से दूरी होती है
जीवन पथ पर अग्निपरीक्षा
सबको  देनी  होती  है


जीवन  है  अनमोल  तेरा
पर क्षणभंगुण ये काया है
दर्द, ख़ुशी या नफ़रत, चाहत
जीवित  देह  की  माया  है
 
पत्नी होकर यशोधरा भी
दूर  बुद्ध  से  होती  है
जीवन पथ पर अग्निपरीक्षा
सबको  देनी  होती  है


वाणी में गुणवत्ता हो बस
संयम से हर काम करो
कर्म ही केवल ईश्वर पूजा
जीवन उसके नाम करो


सुख, दुःख के अनमोल क्षणों में
आँखें  नम  भी  होती  है
जीवन पथ पर अग्निपरीक्षा
सबको  देनी  होती  है


अमित 'मौन'




 


महाभारत मैं हो जाऊँ



जो बनना हो इतिहास मुझे


तो महाभारत मैं हो जाऊँ
पांडव कौरव में भेद नही
मैं किरदारों में ढल जाऊँ

जो मोह त्याग की बात चले
मैं भीष्म पितामह हो जाऊँ
सत्यवती शांतनु  करें मिलन
मैं ताउम्र अकेला रह जाऊँ

जो पतिव्रता ही बनना हो
मैं गांधारी बन आ जाऊँ
फिर अँधियारा मेरे हिस्से हो
मैं नेत्रहीन ही कहलाऊँ

जो गुरू दक्षिणा देनी हो
तो एकलव्य मैं हो जाऊँ
बस मान गुरू का रखने को
अँगूठा अपना ले आऊँ

बात हो आज्ञा पालन की
तो द्रोपदी सी हो जाऊँ
मान बड़ा हो माता का
मैं हिस्सों में बाँटी जाऊँ
 
जब बात चले बलिदानों की
तब पुत्र कर्ण मैं हो जाऊँ
तुम राज करो सिंहासन लो
मैं सूत पुत्र ही कहलाऊँ

प्रतिशोध मुझे जो लेना हो
तो शकुनि बन के आ जाऊँ
मोहपाश का पासा फेंकूँ
और पूरा वंशज खा जाऊँ
 
जो जिद्दी मैं बनना चाहूँ
क्यों ना दुर्योधन हो जाऊँ
पछतावा ना हो रत्ती भर
मैं खुद मिट्टी में मिल जाऊँ

बात धर्म और सत्य की हो
मैं वही युधिष्ठिर हो जाऊँ
हो यक्ष प्रश्न या अश्वत्थामा
मैं धर्मराज ही कहलाऊँ

आदर्श व्यक्ति की व्याख्या हो
बिन सोचे अर्जुन हो जाऊँ
पति, पिता या पुत्र, सखा 
पहचान मैं अर्जुन सी पाऊँ

तुम बात करो रणनीति की
मैं कृष्ण कन्हैया हो जाऊँ
बिन बाण, गदा और चक्र लिये
मैं युद्ध विजय कर दिखलाऊँ




अमित 'मौन'  





कविता

*"अपनत्व के अहसास से"*

"भीग गई पलके फिर उनकी,

अपनत्व के अहसास से।

सूख गये वो गम के आँसू,

अपनो के व्यवहार से।।

मिलकर उनसे जग में एक पल,

मन महके विश्वास से।

जीत ले यहाँ मन अपनों का,

प्रेम-सेवा-त्याग से।।

डूब जाये धरती अम्बर,

स्नेंह की बरसात से।

बन जाये सागर ये धरती,

अपनत्व के अहसास से।।"

000000000000000000000000000000000000000000000

 

 *" मिट्टी का घर"*

"मिट्टी की भीनी भीनी खुशबू,

भाँति है मन को-

चलो चले गाँव की ओर।

मिट्टी से बने घरो में साथी,

मिलती ठंड़क-

मन भाये हर छोर।

भूल जाओगे शहर की तपन ,

मिलेगा दिल को सकून-

होगी हरियाली चारो ओर।

मिटेगी जलन नैंनो की,

मिलेगी शांति मन को-

होगी शांति चारो ओर। 

माटी का घर माटी का तन,

सब मिल जाना माटी में-

फिर भी भाता मन को माटी का घर।

मिट्टी की भीनी भीनी खुशबू,

भाँति हैं मन को-

चलो गाँव की ओर।।"

000000000000000000000000000000000000

 

     *"पूनम की चाँदनी"*

"पूनम की चाँदनी में साथी,

नहाया धरती -अंबर -

महका रहा उपवन सारा।

ब्रज भूमि के कण कण में,

बसे कृष्ण-

फिर भी राह देखे राधा।

राधा रानी कृष्ण दीवानी,

अँजुली भर फूलों से-

कर रही प्रेम तपस्या।

पूनम का चाँद भी इतरा रहा,

ब्रज भूमि पर चाँद-

अमृत बरसा रहा।

राधा रानी के हर साँस में

बसे कृष्ण ,

हवा का हर झोखा- 

अहसास करा रहा।

पूनम की चाँदनी में साथी,

नहाया धरती -अंबर-

महका रहा उपवन सारा।।"

0000000000000000000000000000000000000000

          *"मन"*

"मन की पीड़ा को साथी,

जग में मन ही जाने।

कोई न जगत में तेरा,

जो इसको पहचाने।।

सच्चे संबंधों को भी,

कोई अपना न माने।

स्वार्थ की धरा पर तो,

हर कोई पहचाने।।

मैं-ही-मैं बसा मन जो,

अपनत्व को न माने।

जीवन है-अनमोल यहाँ,

इसे भी न पहचाने।।

दे शांति तन-मन जो यहाँ,

ऐसा गीत न जाने।

भक्ति रस में डूबे तन मन,

तब प्रभु को पहचाने।।"

0000000000000000000000000000000000000000000000000

 

      *"किसान"*

"किसान परेशान हैरान,

जीवन में-

जाने न कोई इसकी व्यथा।

बाढ़ आये तो भी रोता,

किसान पल पल-

क्या- कहे उसकी व्यथा?

कर्ज़ में डूबा हो गई ओलावृष्टी,

सिर पकड़ कर बैठ गया-

जाने न कोई उसकी व्यथा।

फसल का मिले न मोल,

कैसे-बोले सच्चे बोल-

सूखा पड़ा रोया नयन खोल।

रात -दिन करता मेहनत,

मिला न उसका मोल-

यही है-किसान की व्यथा।।"

00000000000000000000000000000000000000000000000

 

        *"जग में"*

"इतनी चाह रखो साथी,

बना रहे स्नेंह जग में।

इतना न तड़पाना यहाँ,

बस जाये नफरत मन में।।

संग चले जो फिर साथी,

माने न साथी मन में।

स्वार्थ बसा रहा साथी,

कैसे- साथी वो जग में?

सुख दु:ख में संग रहे जो,

साथी वो साथी जग में।

बहके जो कदम मिल उनसे,

साथी नहीं साथी जग में।।"

 

  सुनील कुमार गुप्ता

S/0श्री बी.आर.गुप्ता

3/1355-सी,न्यू भगत सिंह कालोनी,

बाजोरिया मार्ग, सहारनपुर-247001(उ.प्र.)

Wednesday, March 4, 2020

लिंगवाद विरोध का प्रतीक अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस   

    8 मार्च को प्रत्येक वर्ष पूरे विश्व भर में महिला दिवस मनाया जाता है। वास्तव में यह दिवस महिलाओं को उनके योगदान को मान्यता देने के लिए मनाया जाता है। जनसंख्या के आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं की आबादी पूरे विश्व में आधी हैं, फिर भी हमारे समाज में उनको उचित दर्जा और स्थान प्राप्त नहीं है । उन पर कई तरह के अत्याचार किए जाते हैं, इसी बात को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्रीय संघ ने 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है। इस दिन पूरे विश्व में महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाता है। इसी कारण इस दिवस को लिंगवाद दिवस का प्रतीक भी माना गया है, जिससे महिलाओं को भी बिना लिंग वाद के पुरुषों के समान प्रत्येक क्षेत्र में बराबर अधिकार देने के लिए जागरूक किया जाता है। हमारे देश में भी महिलाओं की प्रगति और उत्थान के लिए भी नए-नए कार्यक्रम चलाए जाते हैं ,इसी उपलक्ष्य में, 1996 में भविष्य के लिए योजना ,1997 में महिला और शांति तालिका, 1998 में महिला और मानवाधिकार, 1999 में महिलाओं के खिलाफ हिंसा से मुक्त दिवस, 2000 में शांति के लिए एकजुट महिलाएं ,2001 में महिला और शांतिः महिला का संघर्ष प्रबंधन, 2002 में आज की अफगान महिलाः वास्तविकता और अवसर ,2003 में लिंग समानता और स्त्री विकास लक्ष्य, 2004 में महिला और एचआईवी , 2005 में लिंग समानता :अधिक सुरक्षित भविष्य का निर्माण, 2006 में निर्माण लेने में महिलाएं ,2007 में महिलाओं के खिलाफ हिंसा को समाप्त करना, 2008 में महिला और लड़कियों में निवेश, 2009 में महिला हिंसा को समाप्त करने के लिए महिला और पुरुष एकजुट, 2010 में समान अधिकार, 2011 में शिक्षा, परीक्षण एवं विज्ञान में समान पहुंच, 2012 में ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाना, 2013 में वचन देना एक वचन है, 2014 में महिलाओं के लिए समानता, 2015 में महिला सशक्तिकरण, 2016 में लैंगिक समानता, 2017 कार्य की बदलती दुनिया में महिलाएं ,2018 ग्रामीण और शहरी कार्यकर्ता  द्वारा महिलाओं के जीवन में  बदलाव, 2020 में नारी सशक्तिकरण के नए उपलक्ष्य में है, मैं जनरेशन इक्वेलिटी महिलाओं के अधिकारों को महसूस कर रही हूं वास्तव में महिलाओं के प्रति हमारी जिम्मेदारियों को याद दिलाता है, हम सब को मिलकर महिलाओं को भी उनका अधिकार दिलाने के लिए कार्यरत रहना चाहिए। वर्तमान युग को नारी के उत्थान का युग कहां जाए, तो कोई अतिकथनी नहीं होगी, आज हमारे देश भर की महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी विजय की पताका फैला रही है और मौजूदा सरकारी भी महिलाओं को हर क्षेत्र में अपना भविष्य निर्माण करने का अवसर उपलब्ध करा रही है। महिलाओं के संदर्भ  में जयशंकर प्रसाद की एक खूबसूरत कविता भी है :- नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में ,पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में। 

 

अमित डोगरा,

पी एच.डी :-शोधकर्ता ,गुरु.नानक देव विश्वविद्यालय ,अमृतसरः

कविताएं






नई अस्पृश्यताएँ
****************
समानताएं पहाड़ से गिरेंगी
और चकनाचूर हो जाएंगी


ज्ञान के कीड़े दिमाग के सड़े हुए नाद में
बजबजाएँगे!


बड़ी बड़ी बातों पर दंगल होंगे
और छोटी छोटी बातों पर लड़ाइयां


हर बड़ा छोटे को उसी नज़र से देखेगा?


जैसे कोई अधिकारी चपरासी को देखता है
जैसे बड़का वाला साहित्यकार
हाथ पांव मारने वाले को देखता है।
जैसे टीवी वाला पत्रकार
प्रिंट वालों को देखता है।
जैसे कोई बड़ा उद्योगपति
निरीह किसान को देखता है।


ठीक वैसे ही जैसे
बौड़म बुर्जुआ
गिरमिटियों को देखता रहा होगा
या अंग्रेज भारतीयों को देखते रहे हों


नई अस्पृश्यताएँ हैं  ये
जहाँ साहब के गिलास में
चपरासी नहीं पी सकता
चपरासी के गिलास में
किसान नहीं पी सकता
किसान के गिलास में मजदूर नहीं पी सकता
और मजदूर के गिलास में कोई याचक
#चित्रगुप्त
********************************************
नियति
***************
बच्चों को पढ़ाओ लिखाओ
इंजीनियर बनाओ, डॉक्टर बनाओ
बिजनेस मैन बनाओ
कोई भी काम सिखाओ
ताकि दंगाई आएं और मार दें


तिल-तिल काटो पेट
जोड़ो पाई पाई
एक एक ईंट जोड़ो
घर बनाओ
ताकि दंगाई आयें और सब जला दें


खूब किताबें पढ़ो
अच्छी अच्छी बातें सीखो
बड़ी-बड़ी बातें
जो कहने सुनने में अच्छी लगती हों
जिससे दंगाई आएं तो उन्हें समझाने जाओ
और वो तुम्हें चाकुओं से गोद दें
#चित्रगुप्त
*****************************************
गोष्ठी
********
एक ने कहा -"राजनीति भ्रष्ट है।"
दूसरे ने कहा-"पुलिस भ्रष्ट है।"
तीसरे ने कहा- न्याय ब्यवस्था ... हाय ! हाय ! हाय !
चौथे की चिंता किसी चौथे पर थी।
और पांचवे की पांचवे पर....


सबने सबकी वाजिब चिंताओं पर
वाजिब हामी भरी
दुःख ब्यक्त किया
रोष जताया


गोष्ठी की सबसे गौरतलब बात ये
कि सब अपने-अपने दफ्तर
बंक करके आये थे।
#चित्रगुप्त
*******************************************
दो दृश्य
*********
(1)
राप्ती के उफान में
एक बबूल का पेड़ जो आधा डूबा है
उसकी शाखाओं पर
सांप, नेवले, खरगोश, बिल्ली
सब एक साथ बैठे हैं।
अपनी- अपनी जान बचाने की जुगत में
कोई किसी से नहीं लड़ रहा...
(2)
नदी सूख गई है
तटों पर तरबूज, खरबूज, और ककड़ियों की फसलें लहलहा रही हैं।
नेवला सांप के पीछे भाग रहा है और
बिल्ली खरगोश को खाने पर आमादा है


दोनों दृश्यों को एक साथ रखकर सोचता हूँ
'समरसता' आपदाओं में ही पनपती है
जीवों को परेशान होने का कोई कारण चाहिए
नहीं ये दूसरों को परेशान करने लग जाते हैं।
#चित्रगुप्त
********************************************
मैंने उससे कहा था-
कि दुनिया की बड़ी बड़ी बातों के पीछे
छुपी हुई
ओछी हरकतों की आकांक्षाओं को देखना
और फिर चुनना
क्या गलत है?
क्या सही है?


इसपर वो हल्के से मुस्कराई और बोली
'तू भी वही है'
#चित्रगुप्त
*******************************************
जब वो प्रेम में थे


खूबियां ढूढ़ते थे


अब नहीं हैं


तो कमियां ढूढ़ते हैं
********************************************
नहीं पढ़े वेद पुरान
बाइबिल कुरान


नहीं पता धर्म कर्म
जाति सम्प्रदाय और स्थानीयता का मर्म


मुझे तो बस इतना याद है
कि राह चलते हुए
माँ अचानक चिल्लाई थी


"अंधे हो क्या दिखाई नहीं देता सामने चींटियां जा रही हैं और तुम उनपर ही चले जा रहे हो...."
#चित्रगुप्त
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खतरा
**********
जब वो कहते हैं..
खतरा है!
तो सचमुच का खतरा है!
उनके बनाये ईश्वर अल्लाह भगवान पर
इनके नाम पर बनाये गये आलीशान भवनों पर
इनके नाम पर लिखी गई गई किताबों पर
इनके नाम पर बनाये गये हर उस ढर्रे पर
जिसपर हमारे-आपके चलते रहने में ही उनकी भलाई है।


जब वो कहते हैं खतरा है
तो सचमुच का खतरा है
हर उस दीवार पर
जो इन्होंने उठाई है
और जिसपर रंगरोगन लगाकर
चमकाते रहना ही इनका पेशा है


जब वो कहते हैं खतरा है
तो सचमुच का खतरा है
इनके फैलाये गये अंधेरे पर
जिसके कायम रहने से ही
जल सकते हैं इनके घरों के चूल्हे
गल सकती है इनकी दाल
और जिसके बल पर ही
ये चुरा सकते हैं मेरे और तुम्हारे थाल की रोटी


जब वो कहते हैं कि खतरा है!
तो चादर तान कर सो जाओ
क्योंकि तब खतरा हम पर आप पर नही है
बल्कि इनके बनाये मजहब पर है
इनकी श्रेष्ठता पर है
इनकी ताकत पर है
इनकी सत्ता पर है......


उन्होंने कहा खतरा है!
हम और आप भिड़ गये
वे सुरक्षति हो गये।
#चित्रगुप्त
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जंगल
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कूकुर बिलार
भेड़िया सियार
बाज चील गिद्ध कौवे
लकड़बग्घे लोमड़ी बाघ
घाघ
सब रहते हैं इस आदमगत जंगल में
बस यहां पेड़ और आदमी नहीं रहते
#चित्रगुप्त
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#चित्रगुप्त
नाम- दिवाकर पांडेय 'चित्रगुप्त'
ग्राम- जलालपुर
पोस्ट- कुरसहा
जिला- बहराइच
उत्तर प्रदेश 271821
मोबाइल- 75260553738118995166
मेल- pandey divakar.pandey.dp@gmail.com



 

 



 



नारी  (कविता)

नारी 

 

जिसकी कोई थाह नहीं, जिसका व्यक्तित्व अपार है,

सागर से भी गहरी है वो, उसका अनंत ही विस्तार है,

तीनों लोक समेट ले जो अपने ममता भरे आंचल में

वो ईश्वर की नायाब कृति, उसको प्रणाम बारम्बार है।

 

है वो सहनशीलता की प्रतिमूर्त, वो प्रेम का आगार है,

है उसके बिना सृष्टि अधूरी और जगत भी निराधार है,

अपना सब कुछ न्यौछावर कर दे बिना किसी चाह के

ख़ुदा भी उसको नतमस्तक है, नतमस्तक ये संसार है।

 

दया, धर्म, शील, त्याग और स्नेह जिसके हथियार है,

वसुंधरा के जैसे उर्वर है वो, उसमें गुणों की भरमार है,

जिसकी गोद में खेलती हैं प्रलय और सृजन की शक्ति

कुछ लिख पाया अरविन्द उसको, शारदे का उपहार है।

 

 

देवकरण गंडास "अरविन्द"

व्याख्याता इतिहास

राजस्थान

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