Aksharwarta Pre Pdf

Saturday, April 24, 2021

आंँचलिक उपन्यास अंश __ ' पीर परबत -सी'

 ( उपन्यास अंश)

              पीर परबत - सी
             -------------------------
                  - भरत चन्द्र शर्मा

            रुपली के जीवन में बसंत आ चुका हैं। बसंत के आगमन के साथ ही हवाएँ खूब बसंती हो जाती हैं। सपने सतरंगे हो जाते हैं। देह की धरती पर न केवल फूल खिलते है बल्कि उन्मत्त भौंरों को आमन्त्रण भी देते हैं। देह की भाषा को क्या कहें, गूंगे का गुड़ ?संभवतः हाँ, संभवतः नहीं, न जाने कौन- से रसायन घुल जाते हैं कि वातायन का मौन आमंत्रण गंध के नाम होता है। आँखें भाषा के शब्दकोश को बहुत ही बौना कर कर देती हैं। एक चंचल और व्याकुल  हिरनी की तरह आँखें न जाने क्या, क्यों और किसे खोज रही होती हैं। कभी ओस की बूंद को, जो पत्ती पर ठहरती  और पत्ती  हवा के साथ हिलना बंद कर देती है, कहीं ओस की बूंद को कोई खरोंच न आ जाए। पलकों के भीतर कोई मधुर सपना बंद हो, तो वो भी झपकने से परहेज करने लगती हैं।
 रुपली की हय्योरण ( सहेली) कंकू का नोतरा क्या पडा  वो अपने सारे दुःख भूलकर आनंद के अतिरेक में हिलोरे  लेरही हैं। बचपन में ढेंगला - ढेंगली का खेल जिसके साथ खेलती थी उस चंचल , हँसमुख, मसखरी करने वाली कंकू का लगन गारा  प्रारंभ हो गया ।
     कंकू की देह पर हल्दी का उबटन लगाती महिलाएँ गा रही हैं 
       ' ओनी -ओनी लापी कंकू ने विवा में रांदी, ढोल ने ढमके पीटी सडावी।'
       रवे की गुड़ वाली लपसी बन रही हैं। कंकू को हल्दी लग रही हैं,ढोल बज रहा हैं।
     जब कंकू ने पाँव में तोड़े(पायजेब), गले में चाँदी की हंसुली, लाल टीपकी वाली ओढ़नी, नया घाघरा पहन कर गांवों के हाट-बाजार में जाने के लिए तैयार हो गयी। 
कंकू ने रुपली का हाथ पकड़ा
     चल मेरे साथ बाजार में , मैं काकी को बोल देती हूं ,आज वो भी नन्ना (ना) नहीं कर सकती हैं।
        हडकाया ( पागल) कुत्ता काटने से  असमय काल -कवलित नानजी हलवाहे की दुःखी बेटी रुपली जो रात-दिन कर्कश विमाता  के ताने उलाहनों से त्रस्त थी  ,उन्मुक्त आकाश में उडान को तैयार हो गई।
      हाट बाजार में कंकू के साथ लडकियों की टोली  - सोमली, मंगली, बुधी, वेस्ती -- 
 जो जिस वार को जन्मी वही उसका नाम, लेकिन रुपली तो बहुत रुपवती हैं सो यही नाम पड गया।
 विवाह और लगन गारे के दिनों में हाट बाजार नये लाड़े लाड़ियों से ठसाठस भरे हुए हैं।
दूल्हों की टोलियां  दुल्हनों को रोमांचित करती नाचती -गाती हैं - 
     'थावरी तारा पग मा रमजणियों रे पैजणियों वागे, हल कटुडी हल।'
   (पांव की पायजेब बज रही हैं, आगे बढो।)
      कंकू के संग उसकी टोली भी  खिल - खिलाकर हँसती हैं, लगता हैं अनारदाने झर रहे हों।
     रुपली -  कंकू तेरे हाथ में यह कटार क्यों हैं?
   कंकू - मेरी बा कहतीहैं ,यह कटार  गंदी हवा, बुरी नजर  से बचाती हैं।
रुपली - लाड़ो के हाथ में तलवार, लाड़ियों के हाथ में कटार -----------------
         विचारों में पड जाती हैं रुपली ,जाने कब आयेगा मेरा लाड़ा, ------
      कौन हैं उसका सपनों का राजकुमार ,कैसा होगा   उसका लाड़ा?
कुछ दिनों से रुपली को अपनी  विमात के स्वभाव में आश्चर्य जनक बदलाव नजर आ रहा हैं । रुपली के पास कभी नहीं खत्म होनेवाले इतने काम हैं जिनका कोई अंत नहीं हैं -   सौतेले भाई बहन की सार संभाल से लेकर वगडा (लकडी लाना) , चारा लाना, हवेली के खेत संभालना, चूल्हा चौका, नदी पर कपडे धोना, पानी लाना
 ऊपर से विमाता के कडुए बोल ताने
    पर आज तो विमाता की बोली में मिसरी घुली हैं ।
        रात को विमाता रुपली के माथे पर प्यार से हाथ फेर रही हैं -
      देख। बेटी आज तेरा बापू तो है नही। आई -बाप जो समझे मैं ही हूँ। रात-दिन यही विचार करती हूं, ऊपरवाला तेरी जोड़ी जमा दे। लड़का कमाता-धमाता हों,दाल रोटी का फांका न रहे। रुप रंग तो औरत का होता हैं  आदमी का क्या मर्दों जैसी कदकाठी हों, दो पैसा कमाता हो।
 थोड़ी साँस लेकर फिर बोली
                तेरी सब सहेलियाँ ब्याह कर ससुराल गई। अब तू ज्यादा दिन बैठी रही तो जोने पाणी की कन्या (शादी की उम्र पार कर चुकी लड़की) कहलाने लग जाएगी। रुप की रानी भी हैं तो लोग दूसरी शंकाएं भी करेंगे।
      हम इतने गरीब है कि शादी ब्याह कराने की हैसियत नहीं हैं। नातरा ही कराना पडेगा।
     हां नातरा पातरा ( कमजोर) नहीं हो, इसका ध्यान रखूंगी।
अनेक लड़के  वाले पूछ रहे हैं पर निठल्ले हैं। खूब विचार कर एक समझ में आया हैं, 'शंकरिया'  माही बांध पर चौकीदारी करता हैं।
   सो जा बेटी रामधणी सब अच्छा करेंगे।
आज रुपली के जीवन में भी अजनबी की तरह व दिन आ खडा हुआ।
आंगन में कुछ हलचल हो रही हैं, विमाता ने कहा आज ही पामणे (मेहमान) आ रहे हैं , ।जा ।नदी से नहाकर आजा
            रुपली  ने माही माता में अनेक दिए तैराये हैं, किधर कहां तक गए वो नहीं जानती।
          आज उसने स्नान करने से पहले मइ माता ( माही नदी) को प्रणाम किया।
  आज नदी शांत और गंम्भीर हैं। बापू बताते थे, एक बार बरसात में इतनी बाढ़ आयी थी कि बूढ़े बरगद तक को बहा ले गयी थी। क्यों बिफरती हैं नदी ,क्यों आती हैं बाढ़, जो बहा ले जाती हैं मकान, टापरे,खलिहान, मवेशी,इन्सान सब कुछ।
आखिर क्यों क्रुद्ध हो गई मई माता। सुना है माही माता पर बांध बांधा जा रहा हैं। माही माता को बंधन में बांधना कैसा होगा? लोग कहते हैं , जमीने चली जाएंगी, कोई कहता हैं, खूब हरेभरे हो जाएंगें खेत । धान से भर जाएंगे कोठार गोदाम। माही माता के पानी से बिजली पैदा होगी। आज तक तो आकाश में कड़कती बिजलियाँ ही देखी--------पानी से बिजली, पानी के भीतर बिजली। 
एक दिन बापू से पूछा भी था - क्या कभी बांध टूटते भी हैं
       बापू ने कहा था - मनक नी नियत में खोट आवी जाए तो नदी वकरी जाए ने बांद टूटी जाए।(  मनुष्य की नियत में खोट आ जाए तो नदी के बिफरने से टूटते हैं बांध)
 क्या वो स्वंय भी एक नदी हैं? क्या उस पर बाँध बांधा जा रहा है?नदी पर बांधा बाँध  नदी के नाम से जाना जाता हैं, पर स्त्री पर बांधा गया बाँध स्त्री के नाम से नहीं जाना जाता।नदी से निकली धाराएँ जो बंजर भूमि को सब्ज करती हैं,उसी नदी के नाम से जानी जाती हैं,पर स्त्री के गर्भ से पैदा हुई संततियां उसके नाम से नहीं जानी जाती। क्या नदी और स्त्री में कोई समानता हैं।
क्या बाँध शब्द प्रतीक हैं बंधन का? क्या पुरुष रुपी बाँध उसे अपनी  सीमाओं के भीतर बांधता हैं? क्या वह जीवन को अपने पक्ष में भरपूर दोहन और अधिकतम उपयोग करने की कला का नाम है?
 रुपली ने मन की नाव को अज्ञात दिशा में छोड़ दिया।श्रद्धाभाव से  माही माता को प्रणाम कर  गजगामिनी की तरह अपने गंतव्य टापरे की तरफ लौटने लगी। संभवतः टापरा भी नातरे के माध्यम से उसकी मार्मिक विदाई की प्रतीक्षा कर रहा होगा।  कंकू के लगन से इस नातरे में जमीन आसमान का फर्क हैं।
    एक आह उठी रुपली के मन में काश, आज मेरा बापू जीवित होता।
नदी से लौटती हुई रुपली आगे की रस्म अदायगी संकेत समझ चुकी थी। रास्ते में खडा था महुआ वन उसकी कटू स्मृतियों में कालिये की नादानियाँ,छेडखानियां थी। सुना हे वो रुपली को हर कीमत पर खरीदने का प्रण लेकर ढेर सारा रुपया कमाने खाड़ी देशों में गया हैं।
      दूर से दिख रही हैं ठाकुर साहब की हवेली  ,जिनका हाली था उसका बापू मनजी।  उसे याद आरहा हैं , छोटे बाई साहब का घियोरी आणा( पहली जच्चगी के बाद की विदाई) ,जब वो हवेली में काम करने गई थी।
 ठाकुर साहब का छोटा बेटा अभय जो उसका हमउम्र ही था, उसकी भानजी को विचित्र प्रकार के खिलौने से खेला रहा था। एक नीली आंखों वाली गुडिया जिसके बाल बहुत लंबे थे,उसमें चाबी भरने से वो गुड़िया चलती थी ,मुंह हिलाती थी। अभय ने वो गुड़िया रुपली को भी खेलने दी तो आंखों ने अनायास मौन की नई भाषा रच दी। 
बहुत बाद में पता चला ठाकुर साहब ने अभय को बहुत बडा आदमी बनाने पढ़ने के लिए विलायत भेज दिया हैं।
        स्मृतियों को छिटककर रुपली एक चाबीवाली गुडिया की तरह टापरे पर लौट आई।
       विमाता ने बताया मेहमान आगये हैं  ,आंगन में जीमण चल रहा हैं, तू अब लाड़ी बन रही हैं घूंघट निकाल ले।
 विदाई के मार्मिक क्षणों में   छोटे भाई बहनों के रुदन के साथ अनेक प्रश्न थे, जीजी कहाँ जारही हैं,क्यों जारही हैं?
       अश्रुधारा के बीच जीजी बमुश्किल कह पा रही थी - जल्दी ही आऊँगी।
 पता नहीं नीम के पेड की पत्तियां हिल रही थी या रो रही थी।
     एक ऊपर से ढकी हुई बैलगाड़ी खडी थी जिसमें  मेहमानों के साथ आई किसी लुगाई ने रुपली का हाथ थाम कर  गाडी में चढ़ाया। आगे कोई तीन आदमी थे जिसमें एक बैलगाड़ी हांक रहा था। यही पालकी है, यही डोली हैं, बैल ही कहार हैं।   यह बैलगाड़ी माही डेम के मजदूरों की कच्ची बस्ती की दिशा में चल पडी। अस्ताचलगामी सूर्य के साथ  बैलगाड़ी अपने गंतव्य पर पहुंची। नववधू बनी रुपली का ध्यान भंग हुआ। साथ आयी महिला ने सहारा दे कर नीचे उतारा टीन शेड के मजदूरों की खोली के बाहर खड़े रहने का संकेत किया। उसका प्रतीकात्मक द्वाराचार हुआ। पडौस की उत्सुक लुगाइयाँ  फुसफुसा रही थी
      ' हंस के गले में कागला बांध दिया।'
साथ वाली महिला ने सबको दूर हटाया
रुपली ने अनुमान लगा लिया बापू के घर में खुली पडसाल और नीम का पेड हैं यहाँ धणी का घर बंद संकरी खोली हैं। साथ वाली महिला ने उसे भीतर चटाई पर बिठाया। गुड की डली खिलाकर मुंह मीठा कराया।
     आज तेरी पहली रात है, सगुन करा रही हूं। उम्र में तो मैं बडी हूं, मेरा नाम बुदी हैं पर रिश्ते में तू बडी हुई , मेरी जेठानी हुई। अब हम गांव जाते हैं ,तेरा देवर बाहर खडा है। जेठ जी आते ही होंगे अब वो ही तेरे धणी हैं,रामधणी  हैं जो भी समझे ।
         खोली में कन्दील की मरियल रोशनी अन्तिम चरण में हैं।
 सुहाग रात, मधुयामिनी, मधुर मिलन जैसी शब्दावली  से अनभिज्ञ रुपली  आज उसी रात की चौखट पर खड़ी है। आत्मिक, शारीरि मिलन, देह यात्रा का प्रथम पडाव यह सब कुछ तो यात्रा के अनुभव और परिणाम से तय होगा। पर्वत के शिखर से जब किसी नदी का प्राकट्य होता हैं,उसे भी अपने यात्रा पथ का कोई ज्ञान नहीं होता है। सबकुछ भावी के गर्भ में रहस्य की तरह छुपा होता हैं। आखिर  वह किसमें मिलने को  हाँफती-काँपती दौड़ती हैं? कहाँ जाकर रुकेगी, कहाँ जाकर सुखेगी, कहाँ जाकर  बिखरेगी, कहाँ जाकर बंधेगी, किन अस्थियों को गलाएगी या स्वंय सूख खर कंकाल हो जाएगी, देह यात्रा, बाँध, नदी क्या इन सबमें कोई अन्तर्सम्बन्ध हैं, क्या जीवन देह गाथा है?
     विचार मग्न रुपली कभी कंकू के अनुभवों से रोमांचित होती हैं तो दूसरे ही पल विमाता के संभावित षड्यंत्रों से आशंकित होती हैं।
 उसके पति ने उसका घूंघट उल्टा, ठुड्डी पर हाथ रखा और एकदम चहक उठा-  'अरे वा। तू तो बहुत ही खूबसूरत हैं। मैने तो आज तक तेरे जैसी सुन्दर स्त्री नहीं देखी। जितना बताया था ,उससे भी कहीं ज्यादा सुन्दर निकली तू तो।
रुपली का मुख मंडल थोड़ा ऊपर उठा। उसने देखी - ' बड़ी भद्दी मुखाकृति, अधेड़ आदमी की भीमकाय थुलथुली काया।' भारी -भरकम काया से  बिस्तर पर बहते पसीने के रेले, मुंह से उठी मउड़ी की दुर्गंध।
      रुपली के मुंह से एक आह निकली -
        तू   शं  क रि या ------
  ' हाँ, हाँ, मैं ही शंकरिया हूँ, तेरा धणी ......।'
 शंकरिया की विभत्स हँसी में  उसके काले आबनूसी चेहरे पर चमकती श्वेत दंत पंक्ति स्पष्ट  दिखाई दी।
' अब तू पूछेगी, कानिया कौन हैं?' मैं ही कानिया हूँ। यह देख मेरी एक आंख बचपन से फूटी हैं।' फूटी आँख रुपली को दिखा दी, बचपन से छोरे ' काणिया- काणिया ' कह कर चिढ़ाते थे, सो दूसरा नाम हो गया कानिया। कभी कानिया आगे खड़ा हो जाता हैं, कभी शंकरिया। तू जिसमें खुश हो , वो ही मान ले। नाम पीछे रह गया , अब मैं रुप की राणी का धणी हूं, पर चोरों का राजा नहीं हूं।  म़ै तुझे किसी धोखे में नहीं रखूँगा। यदि तुझे लगता हैं कि तेरे साथ धोखा हुआ है तो वो तुझे तेरी माँ ने दिया हैं। सत्य कडुवा एवं नंगा होता हैं।
 मैंने तेरे साथ सात फेरे ले कर विवाह नहीं किया है, न ही मैं तुझे भगाकर लाया हूँ। तेरी माँ ने मेरे साथ तेरा नातरा कराया हैं। तेरे रुप जोबन को देखने के लिए हजार आंँखें भी कम पड़ती हैं, मेरे पास तो एक ही आँख हैं।
     शंकरिया की वो आँख ज्यादा खुलने लगी -   
     मेरे कोई औलाद थी नहीं। बयालीस बरस की उमर में जब उम्मीद जगी थी तो मैं खुशी के मारे बावला हो रहा था। मेरी लुगाई जब औलाद जनने अस्पताल गई तो जापे में न लुगाई बची न औलाद। भगवान ने निवाला दे कर थाली सहित निवाला  छीन लिया। मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा हिम्मत हार कर बैठ गया। बयालीस साल के अधेड़ ,भद्दे , बदसूरत आदमी को कौन लड़की देता।      पर वाह। रे ऊपरवाले तेरी माया , जो एक हाथ से लिया दूसरे हाथ से छप्पर फाड़कर दे दिया, तभी तो गौरी -चिट्टी  रुपली मेरे सामने बैठी हैं।
मेरा बाप जो इसी खोली में रहता था, यहीं चौकीदारी करता था, संभवतः उससे मेरा दुःख देखा न गया। दारु पी कर नशे में बीच रास्ते ट्रक के नीचे आ गया ।उसका माथा फूट गया, पर मौताणे में मुझे अपने हिस्से के पचास हजार  रुपये मिले, वो ही कड़क-कड़क नोट तेरी माँ के हाथ में दिये।अनपढ़ है पर चार बार गिनकर लिये, तब तेरा नातरा मेरे साथ करने को मानी।देख तेरे ससुर का भूत यहीं कहीं होगा। बेटे की बहू को आशीर्वाद दे रहा होगा।

 तू चिन्ता मत कर। मैं पियक्कड़ ,शराबी नहीं हूं।वार -तेवार पर कभी-कभार एकाध घूंट ले लेता हूं, वह तो आज छोटे भाई ने जिद कर पिला दी, कह रहा था- 
           'पुराने सदमे से उबर कर नयी भाभू के साथ नयी जिन्दगी शुरु कर।'

रुपली  जम कर  एकदम बर्फ होती जा रही हैं, उसको पग-पग पर धोखे  मिले  हैं, क्या शंकरिया कोई अचूक शिकारी हैं, अचूक निशाने के वक्त प्रायः  शिकारी की एक आँख बंद हो जाती हैं, कानिया ऊर्फ शंकरिया ने पेड़ों की ओट में छिपकर  क्या अपना वांछित शिकार कर लिया, क्या इस युद्ध का वो स्वघोषित विजेता हैं।  
        एक सिहरन से जब रुपली के पांव की रमजोड़ ( चांदी का आभूषण) के घूंघरू स्पन्दित हुए तो शंकरिया के मन में अनेक घंटियाँ एक साथ बज उठी।
 डेर-पेर( चेतना शून्य) रुपली के दुस्वप्न में बाज के पंजों के भीतर फड़फड़ाता कबूतर हैं।वो किंकर्तव्यविमूढ़ होकर  कभी मरे भूत को देखती हैं तो कभी जिंदे भूत को जो धणी के स्थान पर कोई कसाई लग रहा हैं। इस रात्रि को वो किसके नाम का रंडापा रुदन करे, उसका धणी तो उसके सामने बैठा हैं, जैसे यम का दूत किसी द्वार से आत्मा को देह से चुरा लेना चाहता हैं।
 ------------–-----------------------------------
 रश्मि प्रकाशन लखनऊ से सद्य प्रकाशित उपन्यास ' पीर परबत- सी' का एक अंश
--------------------------------------------------
   -भरत चन्द्र शर्मा, बाँसवाड़ा राजस्थान

प्रकृति की सहनशीलता अब खत्म होने को _

 प्रकृति की सहनशीलता अब खत्म होने को _


प्रकृति, जिसके जितने करीब जाओ उतनी ही अपनी ओर खींचने को आतुर। बाहरी और आंतरिक सौंदर्य से लबालब। अद्भुत सम्मोहन शक्ति की स्वामिनी। इतनी मोहक कि एक रूखा व्यक्ति भी दो पल के लिए ठिठक जाता है। विभिन्न रूप और हर रूप का अपना अलग दैवीय सौंदर्य। इसके सौंदर्य का रसपान एक प्रकृति प्रेमी ही कर सकता है। वही महसूस कर सकता है इसकी विभीषिक में, कांटों में और संघर्षों में भी इसका अनूठा सौंदर्य। 
 
सघन अरण्य की ओर रुख करें तो अपने बाहुपाश में बांध लेती है प्रकृति। अनुपम सौंदर्य, लंबे घने तरुवरों का सागर, नाना रूप। कुछ नन्हें तो कुछ आसमां को चूमते। सबके अलग रंग, सबकी अलग पत्तियां। स्वयं के रूप से संतुष्ट। न ईर्ष्या न द्वेष, जो मिला उसमें खुश, स्वयं में मस्त, झूमते गाते जीवन को सरलता से जीते नजर आते हैं। इनसे लिपटी खूबसूरत लताएं अपने प्रिय से प्रेम प्रदर्शित करती हुईं, थोड़ी-सी इठलाती हुई मनमोहक। नयन-आकर्षक जंगली फूलों से सज्जित, एक अलग खुशबू से महकता हुआ सुरभित अरण्य। इसकी गोद में विचरते सुंदर जीव-जंतु। रंग-बिरंगे आकर्षक पक्षियों के कलरव से गूंजता हुआ सन्नाटा अद्भुत। 

 
रेगिस्तान, रेत का अनूठा सौंदर्य। सूर्योदय-सूर्यास्त के समय स्वर्णथाल, तो दुपहरी में रजतथाल। रेत के चमचमाते टीले। टीलों में पवन की चंचलता प्रकट करती हुई नक्काशी-सी लहरदार लकीरें। मानो रात राधा का इंतजार करते कान्हा ने बैठे-बैठे लकीरें खींच दी हों। उत्कट जिजीविषा को दर्शाती कंटीली हरीतिमा। थोड़े में संतुष्ट हो खुश रहने की कला सिखाते रंगीन फूलों से युक्त कैक्टस। संघर्षों में जीना सिखाता टेढ़ा-मेढ़ा सा फिर भी खूबसूरत ये ऊंट। कितना सौन्दर्य, प्रकृति ने किसी का हाथ खाली नहीं रखा, सबको कुछ न कुछ विशिष्टता से अलंकृत किया है।

 
पहाड़ों की ओर जाओ तो हीरक ताज धारण किए हुए पर्वतराज का चित्ताकर्षक सौंदर्य स्तब्ध कर देता है हमें। सर्पिल सड़कों से गुजरो, तो ये कहती हैं - देखो तुम्हारी जिंदगी की राह भी तो कुछ ऐसी ही हैं न। हर चंद कदमों के बाद एक नया मोड़। कभी राहत का मोड़ तो कभी संघर्षों का मोड़। ये मोड़ जरूरी भी तो हैं लक्ष्य तक पहुंचने के लिए। उन्नति की चढ़ाई को आसान जो करते हैं। पानी का ऊंचाई से गिर, हार नहीं मान, पहाड़ों और पत्थरों से ठोकर खाकर अप्रतिम झरने में परिवर्तित होना हमें सिखा जाता है। यही कि संघर्षों से हार न मान, गिरने का शौक न मना हमें नई राह पर चल स्वाभिमान से अपने व्यक्तित्व को नए सौंदर्य में ढाल लेना चाहिए। पहाड़ों के कोख से निकल बाबुल के दामन में हरियाली बिछाती हुई ये नदियां निकल पड़ती हैं नए परिवेश को हरीतिमा देने। एक नई संस्कृति को जन्म देने, सृजनशील नारी की तरह। 
 
कितना सौंदर्य बिखरा पड़ा है हर दिशा में। संपन्नता में भी सौंदर्य, तो विपन्नता में भी सौंदर्य, सुरुपता में भी सौंदर्य तो कुरूपता में भी सौंदर्य। विश्वास नहीं होता कि हमारी धरती कभी सूर्य की तरह धधकती थी। करोड़ों वर्षों की तपस्या के बाद धरती ने यह रूप पाया है। शानदार वृक्ष, खूबसूरत पहाड़, शांत-सौम्य सागर, उछलते खेलते नटखट झरने और उत्तरीय सी लिपटी नदियां। 
 
जब मानव आया धरा पर, इन वृक्षों ने पनाह दी, अपने फलों से उनकी क्षुधा तृप्त की। जीवित रहने के लिए प्राणवायु उपहार में दिया। नदियों ने उनकी प्यास मिटाई। सबने नवागत का दिल खोल कर स्वागत किया। मानव ने भी उन्हें देवी-देवताओं का दर्जा दिया। फिर हुआ यह कि मानव बुद्धिमान हो गया। बुद्धिमान होते ही मूर्ख हो गया। सोचने लगा कि यह सब बस हमारा है। वह और-और की चाह करने लगा। लोभ की पराकाष्ठा, विकास की उत्कट चाह में अपने जीवनदायक का विनाश करने लगा। भूल गया कि ये हैं तभी उनका अस्तित्व है। लालसा थम नहीं रही, मूक साथी मौन हो बलिदान दे रहे हैं। पर प्रकृति अब नहीं सह पा रही है। अब ये प्रतिकार करने लगी है। मानव अब भी न समझा तो उसे इसका भयानक रूप देखने के लिए तैयार रहना होगा।।


प्रफुल्ल सिंह "बेचैन कलम"
युवा लेखक/स्तंभकार/साहित्यकार
लखनऊ, उत्तर प्रदेश

दक्षिण भारत का साहित्यिक व सांस्कृतिक परिदृश्य

 दक्षिण भारत का साहित्यिक व सांस्कृतिक परिदृश्य

खान मनजीत भावड़िया मजीद
गांव भावड तह गोहाना जिला सोनीपत हरियाणा-१३१३०२
फोन नंबर-९६७१५०४४०९


 कर्नाटक के हरिदास ने दर्शन को आम जनता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।  यह आश्चर्य की बात नहीं है कि अभी तक कोई भी सही समाधान में भेजने में सक्षम नहीं था, जो अजीब नहीं है।  ऐसा इसलिए है क्योंकि वे माधव विचारधारा के अनुयायी थे।

 हरिदास साहित्य आज तक कई कला रूपों के लिए एक आधार है।  इस निबंध में हम कामकम (पद्य महाकाव्य) की उपस्थिति महसूस कर सकते हैं।  यह नृत्य से संबंधित है।  दसा साहित्य को कर्नाटक संगीत के साथ रखा गया है, जो कला में सबसे आगे है।  यह कहानी के अनुरूप है।  इनके अलावा, हमें ध्यान देना चाहिए कि दास साहित्य भी यत्सकान कला से जुड़ा है।

 हमारे लिए यह कहना गलत नहीं होगा कि उडुपी जिले में नर्तकियों द्वारा किए गए यत्सकाना नृत्य में दास सकिता का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।  इस स्थान के कई हरिदास ने अपने गीतों (दसरा पद) के साथ यत्संकन को समृद्ध किया।

 यत्सकाना केवल नृत्य के बारे में नहीं है।  यह एक डांस ड्रामा है।  यह हरिदास साहित्य और श्रीकृष्ण की भक्ति में बताई गई चीजों को देखने का प्रयास है।

 हालाँकि कर्नाटक के पारंपरिक नृत्य रूप (भरतनाट्यम) और यत्सकानम के बीच कई अंतर हैं, दोनों का उद्देश्य समान है।  कर्नाटक के पारंपरिक नृत्य और संगीत प्रभु की भक्ति को व्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।  यत्संकानम में नृत्य के अलावा, संगीत और नाटक का भी उपयोग किया जाता है जहाँ आवश्यक हो।  यत्सकाना प्रदर्शन नृत्य, संगीत और नाटक का मिश्रण होगा।  बिल्कुल नहीं नाटक या विशुद्ध नृत्य।

 इस तरह का आर्ट शो उडुपी, मंगलौर, सिरसी, धर्मस्थल, होन्नावर, धारवाड़ और मनावी जैसे कई स्थानों पर होता है।  भारत के अलावा, यात्सकाना कला को अंतर्राष्ट्रीय चरणों में भी मान्यता प्राप्त है।

 मुख्य व्यक्ति कौन है?  यत्सकाना के विकास के लिए किसने काम किया?  इसका विकास पुजारी माधव के माध्यम से हुआ, क्योंकि उनकी जन्मभूमि भाजपा थी।  कुछ लोग यत्सकाना की कला को "पायलत्ता" कहते हैं।  शायद पुजारी माधव ने भी इस नृत्य के लिए ऑडिशन दिया होगा।  महान भिक्षु जिन्होंने सबसे शानदार तरीके से द्वादासा सुसमाचार गाया, अगर उनके वंश का उद्देश्य आज भी अभ्यास के साथ एकजुट है, तो वे उस कला के विशेषज्ञ रहे होंगे।

 1262 में, राजा मुम्मदी वीरा नरसिम्हर ने श्रीकाकुलम को अपनी राजधानी बनाया, जो कि कलका राज्य से संबंधित थे।  हम इतिहास से जानते हैं कि राजा कलिंग वैष्णव धर्म के अनुयायी थे, और एक बार पुजारी श्री माधव ने कलिंग के राज्य का दौरा किया, राजा ने सम्मान के साथ उनका स्वागत किया और पुजारी से श्री कृष्ण धर्म अर्थात श्रीभगवान धर्म की दीक्षा प्राप्त की और धर्म का प्रसार किया। ।  वीर नरसिम्हन की सरकार में वित्त मंत्री रहे स्वामी शास्त्री और सपना भट्टर का अजरिया माधव के साथ विवाद हुआ और बाद में वह आश्रम गया और उनके शिष्य बन गए।  उन्हें नरहरि तीर्थ और पद्मनाभ तीर्थ के रूप में भी जाना जाता था।

 कलिंग के राजा बनुदेव की मृत्यु के बाद नरहरि तीर्थ ने एक हाथी की माला पहनी और वहां अगले राजा बने।  उसने अगले 9 वर्षों तक राज्य पर शासन किया।  जब राज्य सौंप दिया गया, तो उन्होंने उपहार के रूप में श्री रामचंद्रन की मूर्ति को ले लिया जो खजाने में थी।  हम जानते हैं कि लगभग 1293 नरहरि तीर्थ उडुपी आए और उन्होंने श्री राम की मूर्ति को आचार्य माधव को समर्पित किया।  नरहरि तीर्थ ने कई देवताओं को लिखा और उनके माध्यम से उन्होंने लोगों को भक्ति योग का प्रसार किया।

 नरहरि तीर्थ के कई शिष्य थे।  उनमें गोपाल कृष्ण सरस्वती उनके प्रिय शिष्य थे।  सरस्वती, समय-समय पर संस्कृत के लघु नाटक लिखतीं और नरहरि तीर्थ के सामने प्रदर्शन करतीं।  हम जानते हैं कि ये सभी नाटक श्रीकाकुलम (दुर्गा) मंदिर में हुए थे।  सिद्धप्पा नामक एक व्यक्ति जिसने इन नाटकों को देखा वह प्रबुद्ध हो गया और सिद्धप्पा यति बन गया।  ऐसा माना जाता है कि इन छोटे नाटकों ने लोगों में जागरूकता पैदा की और उन्हें श्रीकृष्ण की भक्ति करने के लिए प्रोत्साहित किया।  नरहरि तीर्थ ने सिद्धप्पा को उडुपी भेजा और उन्हें वेद और नाट्य शास्त्र सीखने का आदेश दिया।  ऐसा कहा जाता है कि 20 वर्षों तक अच्छी तरह से अध्ययन करने के बाद वह श्रीकाकुलम मंदिर (कलिंग राज्य) आए और बाद में वे स्वयं सिद्धेंद्र यति (ऋषि) के रूप में जाने गए।  ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने "बम कलाम" नामक एक भक्तिपूर्ण नाटक लिखा और युवा कुशीपुड़ी ब्राह्मण लड़कों के साथ एक नृत्य नाटक किया।

 यदि डॉ। शिवरामकरांटा और श्री कनागलिंगेश्वर द्वारा बताई गई कहानी सच है, तो कोई यह अनुमान लगा सकता है कि सिद्धेन्द्र यादव 20 साल तक उडुपी में रहने के दौरान यतसकाना और पायलट्टम जैसी प्रसिद्ध कलाओं से मोहित हुए थे।  (यत्सकाना पायलत्त डॉ। शिवरामकांता पृ। ४६-४ Pay)

 हम जानते हैं कि श्री नरहरि तीर्थ इस समय आचार्य माधव के शिष्य थे।  यद्यपि कलिंग साम्राज्य ने नरहरि तीर्थ को श्री राम की मूर्ति लाने के लिए भेजा था, श्रीमद-भागवतम का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में भागवत धर्म (श्री राम के प्रति समर्पण) के बीज बोना था।  श्री नरहरि तीर्थ ने आठवें पर अपना मिशन पूरा किया और आचार्य माधव को गुरु दक्षिणा के रूप में श्री राम की मूर्ति भेंट की।  इसके बाद अजरिया माधव और नरहरि तीर्थ ने हमारे जैसे लोगों के लिए भागवत धर्म का प्रचार करने के लिए यत्सकाना और पायलट्टम का इस्तेमाल किया।  इसके कारण, उडुपी में और उसके आसपास नृत्य लोकप्रिय है।

 शब्द यात्सकाना पायलट्टम, पगवात अट्टम, बड़ा अट्टम, छोटा अट्टम ये सभी शब्द पैरेया से संबंधित हैं।  यह कहना गलत नहीं होगा कि हम कहते हैं कि यह सब दृश्य प्रदर्शन के माध्यम से श्री हरि की सेवा का एक रूप है।

 आज भी उडुपी में अष्टमादम के भिक्षु यत्सकण तीर्थ पर बहुत महत्व रखते हैं।  आचार्य माधव ने श्री नरहरि तीर्थ को इस भगवद गीता के अनुष्ठान को छोटे गांवों में फैलाने के लिए नियुक्त किया।  नरहरि तीर्थ के माध्यम से, आचार्य मधवर ने भगवत् नृत्य या दशावतार नृत्य की कला का अभ्यास किया।  आज भी कला राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में पनपती है।

 जैसा कि विभिन्न क्षेत्रों में लागू कला को पेश किया गया था, स्थानीय भाषा, पर्यावरण और जलवायु के अनुरूप कला में मामूली सुधार किए गए थे।  इनके आधार पर, वर्तमान में नीचे वर्णित के अनुसार आवेदन के पांच अलग-अलग रूप हैं।

 1) आंध्र प्रदेश में इसे कुचुपुड़ी नृत्य कहा जाता है।  यह शुरुआती दिनों से बहुत लोकप्रिय है,

 2) तमिलनाडु में इस भागवत नृत्य को तेरुकुथु कहा जाता है।

 ३) महाराष्ट्र में इस प्रथा को दशरथ (या राधानाट) कहा जाता है।  इसका मतलब है मराठी में कॉमेडी।

 ४) कर्नाटक में इसे भगवता मेला, पायलत्ता, सन्नत, यत्सकाना, थोत्ताटा कहा जाता है।

 ५) केरल में कथकली यत्सकाना के समान है जिसमें नैतिक कहानियों का नृत्य किया जाता है।

 यत्सकाना एक नृत्य है जो इन 5 अलग-अलग नृत्यों को मिलाता है।  इसमें हमें डांस और इंटरल्यूड के बीच के संवाद मिलते हैं।  बीच-बीच में गाने गाए जाते हैं।  अगर कोई गीत है, तो निश्चित रूप से उसमें स्वर और संगत होगी।  खेल मैदान के बीच में खेला जाता था।

 हरिदास के तीन या चार प्रकार हैं।

 1) व्यावसायिक रूप से, जिन्होंने गुरु के प्रति निष्ठा प्राप्त की है और अपने वंश को जारी रखा है।

 2) जिन्हें निशान नहीं मिले।

 ३) जो लोग हरिदास पेशेवर या वंशज थे, उनके बीच बहुत मतभेद हैं।

 इस तरह से श्री नरहरि तीर्थ, यत्सकान और अभ्यास के लिए एक कला रूप देने और लागू करने के गौरव से जुड़ते हैं।  इससे हमें पता चलता है कि श्री नरहरि तीर्थ दो कला रूपों, यत्सना और गंधर्व कण में एक विशेषज्ञ थे।

 नरहरि तीर्थ के माध्यम से आंध्र प्रदेश के लोगों ने इस नृत्य में बहुत प्रयास किया और कर्नाटक में प्रसिद्धि पाई।

 आदमरू मठ के वंश में पहला साधु (मूल पुरुष) नरहरि तीर्थ, श्री पद्मनाभ तीर्थ से सभी विस्तृत मंत्रों को सीखने के बाद हम्पी आया और गुरु और परम गुरु के आशीर्वाद से हम्पी में एक पहाड़ी पर वृंदावन में प्रवेश किया।  ऐसा माना जाता है कि उन्होंने श्री जगन्नाथ तीर्थ को सन्यास आश्रम दिया था।  यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि कुचुपुडी यत्सकाना और पायलट्टम के कला रूपों का जनक है।

 संगीत, नृत्य और संवाद कर्नाटक के यात्सकानम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।  यह आमतौर पर एक वायलिन के बीच में एक मंच पर खेला जाता है।  कर्नाटक भाषा में यत्सकाना, थोट्टा या मूदलपाया के नाम से जानी जाने वाली यह कला लोगों का पसंदीदा शगल है।

 I) थोट्टा की विशेषता क्या है?  इसे क्लोजर कहा जाता है।  इसमें हम देख सकते हैं कि पौराणिक कथाओं का उपयोग दशा साहित्य में बड़े पैमाने पर किया गया है।

 *

 उद्यान में दो प्रकार के कलाकार हैं।  जिसे मोर्चा (मुममेला) और बैकग्राउंड (हिममेला) कहा जाता है।  मंच पर प्रवेश करते ही प्रमुख कलाकार अपनी आवाज़ में गाते हैं।  लेकिन जब गीत पृष्ठभूमि में गाया जा रहा है, तो प्रमुख कलाकार मंच पर नृत्य करेंगे।

 जो व्यक्ति नाटक के सामने खड़ा होता है उसे चालक कहा जाता है।  संगीत और वाद्य यंत्र व्यक्ति के गीत और स्थान के अनुरूप होंगे।

 सभी नाटकीय प्रदर्शन श्री गणेश की प्रार्थना के बाद शुरू होंगे।

 ड्राइवर प्रत्येक मंच अभिनेता को दर्शकों के साथ उस भूमिका में पेश करता है जो वह नाटक में निभाता है।  जैसा कि प्रत्येक अभिनेता अपना परिचय देता है, वह चरित्र के अनुसार कुछ छंदों को बोलेगा।  उन दिनों स्टेज लाइट्स, साथ ही बड़े तेल के लैंप (आग के गोले) की व्यवस्था और मंचन किया जाता था।  थोट्टा में "मनो राया" नाटक बहुत लोकप्रिय था।

 II) सन्नदा: यह एक तरह का नृत्य है जो यत्सनाम को गले लगाता है।  Saiva और वैष्णव धर्म का प्रसार करने के लिए बनाया गया।  आज के महान विद्वानों के अनुसार, इस प्रकार का नृत्य पहली बार बेलगाम जिले और इसके वातावरण में पेश किया गया था।  यहां उपयोग किए जाने वाले कुछ उल्लेखनीय सूत्र (गणना) खिलाड़ियों द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं।  प्राचीन काल में इस प्रकार के नृत्य को "दाबिनता" कहा जाता था।  19 वीं शताब्दी में, कलाकार "भट्टारा मास्टर" जिन्होंने "संगियापालय" नृत्य की रचना की थी, बहुत प्रसिद्ध था।  लोक नृत्य, यत्सकाना, आंखों के लिए एक दुर्लभ दावत है।

 III) पारिजात अट्टम: यह पारिजात अट्टम, जप का एक रूप है, जिसे श्री वैष्णव संप्रदाय द्वारा श्री कृष्ण पारिजात अट्टम कहा जाता था।  लोग उस लेखक को बुलाते हैं जिसने कहानी लिखी थी और "दूत" की भूमिका निभाने वाले अभिनेता।  जैसा कि पहले ही समझाया गया है, इस प्रकार का नृत्य भी गणेश प्रार्थना के साथ शुरू होता है।  दोनों गायक पृष्ठभूमि वाले ढोलकियों के साथ होंगे।  यह हर "दूत" को पेश करने की प्रथा है जो नृत्य में भाग लेता है।  नाटक के बीच में, पारंपरिक और अभिनव गीत मिश्रित होते हैं और मंच कलाकारों द्वारा गाए जाते हैं।

 हमेशा की तरह, पौराणिक कथाओं में अभिनय करते समय दिग्गजों का चरित्र वही होता है।  इस तमाशे में विशाल की भूमिका पर बहुत जोर दिया गया है।  यह अनुमान लगाने के बजाय कि वह ऐसा होगा, उत्साह और भय जैसी भावनाएं स्वाभाविक रूप से व्यक्ति में देखने को मिलती हैं।  यहां शोधकर्ताओं और कलाकारों के अनुसार, एक चरित्र, शैली, पोशाक और एक अजीब आवाज को मंच पर लाना मजेदार है।  वे मंच पर विशाल को एक संकेत के रूप में भी दिखाते हैं कि रोशनी और टॉर्च की रोशनी से एक बुरी ताकत आ रही है।

  भगवान की भूमिका पर बहुत जोर दिया गया है, यह दिखाने के लिए कि एक भगवान है जो सभी बुरे लोगों को नष्ट करने के लिए स्वतंत्र है, चाहे वे कितने भी बुरे हों।  यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि अधिकांश पाइलेट्स नृत्य रूपों में यह एक सामान्य लक्ष्य है।

  यत्ज़ाकाना एक शानदार (पाव्य) कला है जो मानव जीवन को उस क्षमता की आवश्यकता देती है, जिसे संरक्षित करना और उसका पोषण करना हमारा कर्तव्य है।  मुझे लगता है कि शायद यह मेरा कर्तव्य भी है।  ऐसा लगता है कि हरिदास ने यात्सकानम के लिए इस तरह के गहन गीत लिखे थे।  उनके गीत इस प्रयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।  ये देवत्व और भक्ति से परिपूर्ण हैं।  यह लोगों में आध्यात्मिकता की भावना को उत्तेजित करता है।  इसके कारण, यत्संकानम में दासता एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।  कर्नाटक सरकार के संस्कृति और विरासत विभाग, और कई अन्य संगठन, सत्संग और कई महान कलाकार इस कला को बनाए रखने के लिए दिन रात मेहनत करते हैं।  उदाहरण के लिए, यह कहा जा सकता है कि 20 वीं शताब्दी में कई लोगों ने पर्दे के पीछे से प्रचार किया।

  1) डॉ कोचा शिवराम करंदर

  २) पेरा।  கு  शि।  हरिदासपतर

  ३) पेरा।  एच  हम कृष्णपट्टार जैसे लोगों का उल्लेख कर सकते हैं।

  4) मणिपाल संगम, बॉलिंग एसोसिएशन, करवल्ली संगम और अन्य टीमें।

  5) नेशनल सेंटर फॉर म्यूजिक एंड डांस पाठ्यक्रम-शैली के पाठ्यक्रम संचालित करता है।

  श्री वाथिराजा तीर्थ, श्री वाथिराजा मैडम के प्रमुख, ने 300 से अधिक छात्रों के प्रशिक्षण में सहायता की है।  यह कहा जा सकता है कि यह वास्तव में गर्व और एक मील का पत्थर है।

  इस कला को संरक्षित करने के लिए, उडुपी में अडमारु मठ में रहने वाले श्री वाथिराज ने, उडुपी जिले के हयाग्रीवनगर में 'शिवपरापाल समुच्चय' की स्थापना की।  यहां सेंट्रल यूनियन ऑफिस, लाइब्रेरी, म्यूजियम, ट्रेनिंग हॉल, सबा हॉल, किचन, स्टूडेंट रूम, गेस्ट रूम आदि उच्च भागीदारी के साथ स्थापित हैं।

  पुरंदरदास के गीतों से प्रेरित होकर, यह कला तमिलनाडु के तंजावुर राजा के बीच बहुत लोकप्रिय हो गई, जो अपने संगीत के लिए प्रसिद्ध हो गए और राजा ने इस कला के विकास को प्रोत्साहित किया।  इसी तरह मुम्मती कृष्णराज उदयार, लिंगराज और मुथन्ना जैसे कवियों ने इस कला का सार अनुभव किया है ताकि इस सरल कला की विरासत को एक कार्यात्मक कला कहा जा सके।

  यह कला भगवान (परमात्मा) के प्रति प्रेम व्यक्त करने में मदद करती है, यही वजह है कि 500 ​​साल बाद भी यह कला अभी भी जीवित है।  यत्सकाना कला, जिसे श्री नरहरि तीर्थ द्वारा आगे बढ़ाया गया था और बाद में श्री वदिराजर द्वारा प्रचारित किया गया, दर्शकों के लिए एक महान दावत है।

  हरिदास के गीतों को भजन के रूप में खूबसूरती से गाया जा सकता है, इतना ही नहीं उनके भजन सुनने में भी बहुत अद्भुत है, लेकिन यह इस कला के अनुकूल है, बिना यह अनुमान लगाए कि यह धनु है, यही कहना है, हरिदास धनु की महिमा।

  हमें ऐसे प्रतिभागियों की आवश्यकता है जो इन कलाओं को बनाए रखने के लिए बहुत अच्छा गा सकें।  दूसरी ओर, संबंधित सरकार, सरकारी संगठनों, शोधकर्ताओं को ऐसे प्रतिभागियों को प्रशिक्षित करने के लिए एक प्रशिक्षण केंद्र खोलना चाहिए।  हम्पी और उडुपी में विश्वविद्यालय इस कला के विभागों को खोलकर इस कला को एक बड़ा बढ़ावा दे सकते हैं।  कला का रूप जो भी हो, इसका निर्माण और विनाश समय के नियंत्रण में है।  इच्छुक लोगों के लिए अपनी रुचि बढ़ाने और कला को बढ़ावा देना भी महत्वपूर्ण है।  इस प्रकार एक फ़ीड भी संभव है।

  जैसा कि पहले बताया जा चुका है, बारिजाता अट्टम यत्सकानम के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।  इस साहित्य को स्थापित करने पर गर्व करने वाले गोकवी आनंदाचार्य शामिल होंगे।  उनका वेंकटेश पारिजात अट्टम नाटक बहुत प्रसिद्ध है।  वह एक कवि हैं जो 1776 से 1840 तक, डेढ़ शताब्दी पहले रहते थे, और यह गर्व की बात है कि उन्होंने इस महाकाव्य की रचना लोक नृत्य की शैली में की।  इस पारिजात खेल में विचारधारा की व्याख्या करने के अलावा, यह एक व्यंग्य होने का भी दावा करता है जिसने इस खेल को अपनाया।  शोधकर्ताओं के अनुसार बेलगाम, बागलकोट, मिराज, विजयपुरा और कोल्हापुर लोगों के बीच लोकप्रिय हो गए और बाद में राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हो गए।

  थिमन्ना का महाकाव्य आनंददेवसर के लिए एक प्रेरणा था।  श्रीमद्भागवतम् से श्रीकृष्ण के इतिहास और श्री माधवाचार्य के द्वादासा स्तोत्रम दोनों को मिलाकर, उन्हें पहले श्रीकृष्ण की कहानी को मंच पर लाने का श्रेय दिया जाता है।

  इसके बाद

  1) हनुमथिलासा थिप्पनाचार्य (गीत) द्वारा बनाया गया

  २) कुसेला उपकान

  3) पैर की मालिश

  जितने काम प्रकाशित हुए।  इन सभी कार्यों को हम यत्संकान कह सकते हैं।

  गोकवी आनंदथेसर के बारे में अधिक जानकारी:

  जब वेंकटेश ने विवाह महाकाव्य की स्थापना की, तो यह काम 1000 शब्दों का एक बड़ा महाकाव्य बन गया।  इस काम में 10 अध्याय हैं।  वैकुंठपति श्री श्रीनिवासन ने खुद को एक शिकारी के रूप में प्रच्छन्न किया और अपनी माँ बागदेवी के आदेश पर शिकार करने चले गए।  अकासराजा के बगीचे के रास्ते में, उसने वनजाक्षी को देखा और बोला जैसे वह अभी घर आया है, पुरंदरारास ने कहा।

  पद्मावती और श्रीनिवासन के बीच की बातचीत के लिए आनंददेवसर द्वारा लिखा गया संवाद बहुत सुखद है।  यह इस काम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।  हम जानते हैं कि अद्भुत दृश्यों के माध्यम से होने वाली घटनाओं का वर्णन करके दर्शकों को अच्छी तरह से पकड़ना उनका मुख्य कर्तव्य था।  इसके साथ ही एक दृढ़ भक्ति भी आराम से विकसित हुई।

  यत्सकाना को सीखने का राजा भी कहा जाता है क्योंकि इसने लोगों के बीच महाकाव्य के शीर्ष पर रहने की इच्छा जागृत की।  इस तरह आम जनता के बीच भक्ति को बढ़ावा देना संभव था।  लगभग 150 साल पहले रायचूर जिले में यत्सकानम शैली का अभ्यास स्थापित किया गया था।  लेकिन यह लोगों के बीच उतना लोकप्रिय नहीं था जितना कि यत्सकाना।

  यत्स्नम में सभी कहानी लाइनें हरिदासा साहित्य पर आधारित हैं।  श्री रामबाड़ाका पट्टाभिषेकम, कनकंगी कल्याणम, चंद्रहास की कहानी, प्रभाती परिनाया, थिरपथी सामवदा, भारत की कहानी, रामबा पता, शाबरसंकरा पता, कथा कीर्ति राजन की कहानी, रुक्मंगथान का इतिहास प्रसिद्ध हैं।

  हरिदास हमारे लिए कई गीत छोड़ गए हैं जो कि यात्सकानम के लिए उपयुक्त हैं।  भविष्य के लिए इस कला का संरक्षण और पोषण करना हम सभी की जिम्मेदारी है।

  शोधकर्ताओं के अनुसार, बैरिजाटा खेल के नाम पर सौ से अधिक साहित्यिक विधाएं हैं, जिनमें से कुछ नीचे सूचीबद्ध हैं।

  1) वेंकटेश बरिजाता - गोकवी आनंदथेसर

  2) बंदुरंगा बरिजाता - जगन्नाथ दशर

  3) वेंकटेश बरिजाता - गोपाल दासार

  4) श्रीहनुमथ पारिजात - विजया प्रभु

  5) गीता पारिजात - श्री व्यास तीर्थ

  हम उन्हें इस तरह सूचीबद्ध कर सकते हैं।

  इस प्रकार सभी प्रकार के अभ्यासों में श्रीकृष्ण की प्रसिद्धि और महिमा के बारे में न केवल जानकारी का उद्देश्य है, बल्कि श्री माधवाचार्य द्वारा स्थापित दार्शनिक विचारधारा के बारे में भी बताया गया है।

  शोधकर्ताओं के अनुसार, यत्ज़कानम में 400 से अधिक अध्याय हैं।  उनमें से लगभग 100 अध्यायों को एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया है।  ताड़ के पत्तों और पांडुलिपियों पर भी कुछ अध्याय हैं।  कुछ और पीढ़ियां उन लोगों के दिमाग (मुंह) में हैं जो उन गीतों को गाते हैं।

  एकत्र आंकड़ों के अनुसार, हम अभी भी हमारे बीच अनुभवी कलाकारों को पा सकते हैं जो अभी भी 30 से 40 एपिसोड गाते हैं।  इन मोहिनी बसमासुरों में, इंद्रजीत कालका, देवी महात्मा, पप्पुरुवाहन, अभिमन्यु कालका, धना सुरा कर्णन, सीतामवथम्, कृष्णार्जुन कालका को लोगों के बीच लोकप्रिय प्रदर्शन के रूप में नामित किया जा सकता है।

  हम यात्स्कानम की प्रमुख विशेषताओं पर ध्यान देंगे:

  1) फैंसी, विस्तृत संगठनों और वेशभूषा को देखने के लिए वास्तव में रोमांचक है।

  2) सबसे महत्वपूर्ण तत्व शरीर की भाषा, काया (मंच संरचना), हाथ का इशारा (हाथ के इशारे) और रसचक्लिंडा (चौंकाने वाली आवाज़ / आवाज़) के माध्यम से साहित्य का सार दिखाना है।

  3) लोकप्रिय लोक लोक नृत्य, क्योंकि यह इन क्षेत्रों में श्री नरहरि तीर्थ द्वारा फैलाया गया था।

  ४) पुरंदरदास के गीतों से प्रेरित होकर, यह लोक नृत्य के रूप से मिलता जुलता है।

  5) प्रतिभागियों ने गाने गाए।  ऐसे प्रतिभागियों को प्रशिक्षित करना और प्रशिक्षित करना हमारी जिम्मेदारी है।  सरकारी एजेंसियों और संघों को ऐसे प्रतिभागियों को बनाने, गाने के लिए उनका ध्यान आकर्षित करने की आवश्यकता है।  यह निश्चित रूप से इस कला को बनाए रखने में मदद करता है।

  6) इस प्रकार इन कलाओं का संरक्षण और पोषण करना हमारा कर्तव्य है।  इस प्रकार यह कला स्वाभाविक रूप से विकसित होनी चाहिए क्योंकि यह हमारे देश की है।  किसी विदेशी को दिखाने के लिए इसका उपयोग या खेती नहीं की जानी चाहिए।

  ) इस कला और पेशेवर मंच और अन्य कलाकारों में उपयोग किए जाने वाले पर्क्यूशन और पर्क्यूशन इंस्ट्रूमेंट जैसे उपकरणों के पाठकों को बिना किसी हिचकिचाहट के हरिदासा साहित्य में अपने कौशल का विकास करना चाहिए।  तभी इस कला को मूल्य और व्यवस्था के साथ बरकरार रखा जा सकता है।

  8) कर्नाटक संगीत में, कामाका सजावट (अलंकृत संगीत नोट्स) का महत्व अधिक है।  यत्सकानम में लय और ताल को डिजाइन करने पर बहुत जोर दिया गया है।  इस शैली को मुख्य रूप से वाद्ययंत्र की लय और खेल की लय के अनुरूप बनाया गया है।

  9) यात्सकाना, जो एक लोक नृत्य शैली है, समाज में टैप करने की क्षमता है।  इस प्रकार ललित कलाओं में इसका एक उत्कृष्ट स्थान है।

  10) उडुपी में राष्ट्रीय कवि गोविंदा बॉय रिसर्च सेंटर (एमजीएम कॉलेज के हिस्से के रूप में) की स्थापना ललित कला को बढ़ावा देने के लिए की गई थी।  यह 1971 में लागू हुआ।

  11. क) शिवप्रभा कला समुच्चय, हयग्रीव नागरा, उडुपी, सोदे वथिराज मठ द्वारा स्थापित एक पर्व मंडप।  इसके अलावा छोटे सिस्टम हैं।

  b) मंदारतीमारन कट्टे, कमलाशिले अमृतेश्वरी सवगुरु ये दोनों संगठन अच्छी तरह से जाने जाते हैं।

  c) दक्षिण द्वीप में केडेल और धर्मस्थल सबसे लोकप्रिय टीम हैं।

  d) कर्नाटक की यत्सकाना परिषद

  e) मंगलादेवी यत्सकाना मंडली

  च) केंद्रीय मंजूनाथेश्वर समूह कुछ उल्लेखनीय संगठन हैं।

  यत्सकाना और दासा साहित्य के बीच बहुत करीबी संबंध है।  यह गौरव की बात है कि दासों का उद्देश्य (श्रीकृष्ण के प्रति समर्पण) इस गाँव में हर गाँव में स्थापित किया गया था।  भक्ति को व्यक्त करना बहुत उपयोगी था।

  हरिदास सगीताम श्री हरि से संबंधित कृतियों जैसे पवित्र महाकाव्य रामायण, भगवद गीता, महाभारत, 18 पुराणों और कई उपनिषदों के पवित्र ग्रंथों पर आधारित है।  इस शक्ति के प्रभाव से, 500 साल बाद, हरिदास धनु आज भी अपना उत्साह खोए बिना जीवित है।  यदि गुलामी आज एक जीवित कला है, तो इस बात से कोई इनकार नहीं करता है कि यत्सकाना आज भी एक जीवित कला है।

  वास्तव में, यह 22 वें दार्शनिक, आचार्य माधव का आशीर्वाद था।   बाद में श्री नरहरि तीर्थ ने इस यत्स्नम को और विकसित किया।  उनके बाद आए वादीराजर ने खुद गाने लिखे और उनके साथ नृत्य किया।  इस प्रकार इस यात्सकानम का एक उत्कृष्ट पारंपरिक इतिहास है।

   मुझे श्रीपादराज रंगावित्तला रंगवित्तमाला की ओर से इच्छा (भक्ति) के कारण इस तरह चार लाइनें लिखने के लिए प्रेरित किया गया था।  हमें उम्मीद है कि यह कला इससे और बढ़ेगी।  मैंने एम.ए.  (कन्नड़) पढ़ते समय, यह पारिजात गीत (कृति) 20 अंकों के लिए था।  मैं इसके अलावा किसी अन्य साहित्य की सराहना नहीं कर सकता।  यह तब था जब मैंने यात्सकाना का ज्ञान प्राप्त किया।

   एक बार सोथबी और सिरसी के रास्ते में, बस स्टेशन के पास एक यत्सकाना रखने की व्यवस्था की जा रही थी।  जो शो रात 8 बजे शुरू होने वाला था, वह कभी शुरू नहीं हुआ, हमें देखने का मौका मिला क्योंकि हमारी बस रात 10.30 बजे थी और फिर एक रास्ता या दूसरा शो गणपति दूटी से शुरू हुआ।  जिस समय पर्दे ऊपर उठाए गए ठीक उसी समय हमारी बस बैंगलोर के लिए रवाना हुई।

   1965-66 के आसपास हमारे शहर में एक टीम ने एक ही खेल खेला।  मेरा ध्यान तब उस पर नहीं था।  यह सब मैंने टीवी पर 3 से 4 एपिसोड में देखा है।  मैंने बैंगलोर विद्यापीठ में एक शो देखा है।

   यत्सकाना आमतौर पर रात में किया जाता है।  तुरही से आने वाला स्वर / ध्वनि बहुत तेज है।  गीतों को गाते हुए भक्तों की कांस्य आवाज बहुत महत्वपूर्ण है।  बाद में कांदिकारा शेषगिरि भगवतार ने इस कला पर अपने नाम की मुहर लगा दी।  करावली का येदेस्वर भगवान के नाम के स्मरण और यत्स्नानम के माध्यम से भगवान की सेवा के लिए बहुत प्रसिद्ध है।

   सिद्ध है कि भक्ति मोक्ष ला सकती है, शिक्षक माधव थे।  इस आदर्श वाक्य के अनुसार मौन भक्ति "अमाला भक्तिश्च दत्त उपकरण" यत्सक कला संगठन की प्रस्तावना है।  फिर भी, भागवत को कोई महिमा या महत्व नहीं दिया गया।  तमिलनाडु में हम कई विद्वानों को भागवत के नाम से जानते हैं।

   1) 1684 में तंजावुर भोसले वंश के राजाओं ने इस कला को प्रोत्साहित किया।

   २) तुलजाजी १j२36-१ and३६ के लगभग एक प्रसिद्ध संगीतकार, सर्वश्रेष्ठ गायक और नाटककार थे और उन्होंने "संगीता सरमृतम" नामक एक संस्कृत साहित्य लिखा था।  उन्होंने श्री व्यासराज को अपना आत्मा गुरु स्वीकार किया और कहा कि वे स्वयं उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं।

   3) 1669-1734 में, राजा रघुनायक के दरबार में गोविंदा दीक्षित सबसे महत्वपूर्ण भगवतारा थे।  उन्होंने बहुत सारा साहित्य लिखा और प्रसिद्ध हुए।  उन्होंने "संगीता सुधा" नामक एक लोक नाटक लिखा और उसे राजा को सौंप दिया।

   4) इसमें कोई संदेह नहीं है कि भगवान विष्णु की महिमा का वर्णन करने और भगवान विष्णु के प्रति प्रेम और भक्ति व्यक्त करने के लिए बनाई गई एक महान व्यवस्था है।

   ५) क्षेत्रीय अंतर इस प्रकार हैं: १) मूदलपाया यत्सकाना २) पादुवलपय्या यत्सकाना ३) पायलता / पायलू नाटका या दशावतार अट्टा।

   6) "गांव के लोगों की कला" का नाम दिया, यत्सकाना एक सम्मानित विचारक हैं जिन्होंने 20 वीं शताब्दी में कला के सभी क्षेत्रों के विद्वानों को प्रसिद्ध बनाया।  यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि शिवरामकरांतकरे।

   यत्सकन में भावनात्मक रस की अभिव्यक्ति को बहुत महत्वपूर्ण माना गया था।  यात्सकाना लोकगीतों (शाब्दिक मौखिक) की एक शाखा है।

   यहाँ इस्तेमाल किए जाने वाले रागों में केदारकेलई, काम्बोजी, कामज, हमसदवानी, अदाना, आरबी, देवकंदरी, केदारकलाई, पुन्नागरावली, सहाना, नटामकप्रिया, सिंधुभैरवी हैं।  अहिरी, मुखारी आदि।  सारंगा, हिंदुस्तानी, सारंगा बेहग, थोदी, वरली, साम तान्यासी, नीलांबरी, कॉफी, मोहना, पिलहरी। हम उन्हें रसों में गाते हुए देख सकते हैं।

   डॉ। के।  म।  राघवन नांबियार ने यत्सकानम पर अपना शोध प्रबंध लिखा है।

   क्या होगा यत्सकानम?

   1) लोगों को हरिदास साहित्य के समर्थन में यत्सनाम बनाना चाहिए।

   २) कवियों का मत है कि हनुमान का संबोधन यत्सकान की कला है और उसी के अनुसार उसे मंच पर पहचाना जाना चाहिए।

   3) चन्द्रहास चरिथ्रम, सीता स्वयंवरम, गजेन्द्र मोत्साम, शंकर केलदा के गीत, किरियम्मा की उथलिका कथा जैसे हरिदास कृतियों का उपयोग करें।

   4) यात्सकानम स्तर के लोग व्यवहार में उपयोग करना चाहते हैं।

   इतना ही नहीं, वादीराज का लक्ष्मी सोपानम, वैकुंठ का भाष्य, कणगादसर का मोहन तरंगिनी, श्रीपादराज का प्रमरागिता, मोहनदास का कोलू गीत, कुमारवैसा के महाभारत के कई अध्याय, पुरंदरदाससार का सुदामा चरित्र, गीताग्राम, गीताग्रंथ।  हमें समारोह में खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करना है और उन्हें पोशाक, पोशाक, कहानी आदि में मूल तत्वों (जड़ों) को नुकसान पहुंचाए बिना आधुनिकता का मिश्रण करने के लिए प्रशिक्षित करना है।

   दशहरा शब्दों में पाए जाने वाले सामाजिक कल्याण, न्याय, सामाजिक अनुशासन, व्यवहार और समझ का उपयोग यात्सकानम में किया जाना चाहिए।  इससे समुदाय के लोगों में जागरूकता बढ़ सकती है।  हरिदास के जीवन, उपलब्धियों और शिक्षाओं को यत्संकटम के माध्यम से प्रकाश में लाया जाना चाहिए, और पांडुलिपियों में निहित साहित्य को प्रकाश में लाने के लिए सरलता और अप्रकाशित पांडुलिपियों को लाना चाहिए।  हमें अभी भी इस बारे में सोचने और अनुसंधान करने की आवश्यकता है।

   पोलिसो बांदरी पुरैरीया!  भावना काया

   भीमराठी वंश!  पोलीसो पुंडरीकया

   पांडुरंगा पारिजात में, श्रीजकन्नाथ दशर, जो निम्नानुसार शुरू होता है

  

   शरति दानया लोला!  शकवारी करिपला

   श्री अजपाव माला!  शुद्ध दया

   पराहरा सब लीला!  बाहि गोपाल बाला

   इस तरह गाती है।  उस पल का वर्णन करता है, जब वह श्रीहरि से मिलने गया था।  शुद्ध शरीर रखने वाले बांदीपुरम में बंदुरंगान, भीमराठी नदी के तट पर है, और श्रीहरि, जिनके पास बंदरड़ीपुरम है।  जगन्नाथ दास का यह गीत, जो 9 श्लोकों में प्रभु को गाता है कि करुणा मूर्ति सभी जीवित प्राणियों का मूल कारण है और चरवाहों को बचाती है, जो चरवाहे हैं, यत्सकानम के लिए रचित एक गीत है।

   थिप्पन्नार्य द्वारा रचित महाकाव्य हनुमाविलास से:

   कवि उस दृश्य का वर्णन करता है जहां रावण ने हनुमान को देखा और उनसे बात की।

   नीना एक वानर योद्धा है

   मौनवतेक नुडी - राणा सुरेने

   महा थेरेन - कोरकराने (पल्लवी)

   एलिंडा नाडेटेन्ते, इलिकेटकेक बंडे

   यात्रा से पहले

   क्या एक निन्दा, बहादुर हत्यारे

  

   हलु पंक्खकी सिलुकिट

   कुशुलगना बारी निमिषमुद्रथ || १ ||

   द्विपक्षीय धरणीओलेली निवेसा

   शरथ्यान्तथु तन्निष्ठ केश

   पुरहरा श्रीसा ब्रह्म सुरसा

  

   व्यनवलेवा दिलुहिवांनु का

   त्रिनायसिम्हन थेसा मारुति ||

भारतीयता की खोज इस समकालीन नाटक की सबसे अद्भुत विशेषता - प्रो आशीष त्रिपाठी

 भारतीयता की खोज इस समकालीन नाटक की सबसे अद्भुत विशेषता - प्रो आशीष त्रिपाठी

हिन्दू कालेज में अभिधा का समापन

  

नई दिल्ली।  'बिना रंगमंच के नाटक की कल्पना नहीं हो सकतीठीक उसी तरह जैसे बिना शब्द के संगीत की कल्पना संभव नहीं।कवि,आलोचक एवं नाटक-रंगमंच के अध्येता प्रो. आशीष त्रिपाठी ने उक्त विचार हिंदी साहित्य सभाहिंदू कॉलेज द्वारा आयोजित ‘अभिधा’ के तीसरे और अंतिम दिन ‘समकालीन हिंदी नाटक’ विषय पर अपने विचार व्यक्त किए।

प्रो त्रिपाठी ने उपनिवेशवाद और साहित्य के सम्बन्ध पर कहा कि उपनिवेशवाद के दौर में अंग्रेजडचफ्रांसिसीइत्यादि अपना प्रभाव जमाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन भारत जैसै पूर्ण विविधता वाले देश में कुछ ऐसा करना बेहद मुश्किल था। आर्थिक रूप से उपनिवेश बना लेने के बाद आवश्यक है कि उस ज़गह को सांस्कृतिक रूप से भी उपनिवेश बनाया जाय। उन्होंने बताया कि विउपनिवेश की प्रक्रिया को दो लोगों ने पुरजोर तरीके से आगे बढायाये दो लोग क्रमशः हिंदी में  भारतेंदु हरिश्चंद्र और बांग्ला में रवींद्रनाथ ठाकुर थे। जिनके द्वारा निर्मित राह पर आगे चलकर कई नाटककारों और निर्देशकों ने विउपनिवेश के विचार को नाटक और रंगमंच के क्षेत्र में आगे बढ़ाया।

समकालीन नाटक और रंगमंच की विशेषताओं का ज़िक्र करते हुए प्रो त्रिपाठी ने कहा कि भारतीयता की खोज इस समकालीन नाटक की सबसे अद्भुत विशेषताओं में से एक है जो अक्सर इस दौर के नाटकों में प्रदर्शित होती है। यह विशेषता भारत के लोक रंगमंच से आई है। भारतीय नाट्य परमपरा ही है कि हमारे यहाँ लोक नाट्यों की स्क्रिप्ट पूर्व लिखित नहीं होतीबस उसी वक़्त गढ़ ली जाती है। समकालीन हिंदी नाटक की अन्य विशेषताओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सबसे ताकतवर तरीके से जो तथ्य इस सम्बन्ध में प्रकट होता है उनमें मुख्य है सत्ता और व्यवस्था के जनविरोधी चरित्र को उभारनाउसकी गहरी आलोचना करना और उसके भीतर की जनविरोधी हिंसात्मक प्रवृत्तियों को अनावृत्त करना है। उन्होंने इस सम्बन्ध में भारतेन्दु हरिश्चंद्र के नाटक अंधेर नगरी का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि राजसत्ता के इसी तरह के चरित्र को आगे बकरीकबिरा खड़ा बाज़ार में जैसे नाटकों ने और उजागर किया। प्रो त्रिपाठी ने अलखनंदन द्वारा रचित अल्पचर्चित नाटक राजा का स्वांग का विशेष उल्लेख कर बताया कि हिंदी में इस तरह के कम ही नाटक हैं जिनमें विचार और प्रभाव का अपूर्व समन्वय देखने को मिलता है  

उन्होंने समकालीन हिंदी नाटक की एक विशेषता यह भी बताई कि समकालीन हिंदी नाटक में प्रयुक्त की जाने वाली कथाओं में बेहद विविधता है और इस मामले में वह किसी भी विधा में सबसे ज्यादा विस्तृत विधा है। कथा आधार या जीवन का जितना विस्तृत फ़लक समकालीन नाटक में दिखाई देता है उतना न कवितान कहानी और न ही उपन्यास में दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि इस लिहाज से समकालीन नाटक को कविता का विस्तार कहा जा सकता है। उन्होंने हिंदी नाटक के पठन कहा कि हिंदी नाटक या सिर्फ किसी एक ही विधा का अध्ययन या पाठन हमारी संवेदना को सूक्ष्म कर देता हैइसलिए विभिन्न विधाओं का समग्रता में अध्ययन करना महत्त्वपूर्ण है।  

व्याख्यान का संयोजन विभाग के प्राध्यापक नौशाद अली ने किया। प्रश्नोत्तर सत्र में प्रो. त्रिपाठी ने विद्यार्थियों के सवालों के जवाब बेहद विस्तार और रोचकता से दिए। इससे पहले व्याख्यान के प्रारम्भ में विभाग की वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. रचना सिंह ने प्रो. त्रिपाठी का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि एक विद्वान अध्येता और कुशल सम्पादक के रूप में प्रो आशीष त्रिपाठी की पहचान सुविदित है लेकिन उनकी कवि कर्म बताता है कि वे कितने संवेदनशील साहित्यकार हैं।  प्रथम वर्ष की छात्रा श्रेया राज ने प्रो. त्रिपाठी का औपचारिक परिचय दिया। अंत में  प्रथम वर्ष के छात्र सूरज सिंह ने सभी का आभार व्यक्त किया। आयोजन में विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ अभय रंजनडॉ पल्लवडॉ विमलेन्दु तीर्थंकर साहित्य अलग अलग महाविद्यालयों के अध्यापक और विद्यार्थी उपस्थित थे। आयोजन को गूगल मीट और फेसबुक पर प्रसारित किया गया।  

व्याख्यान सत्र के बाद लोकगीत प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसका संचालन दिशा ग्रोवरनंदिनी गिरी और अनन्या ने किया। इसके निर्णायक मंडल में भारती कॉलेज के डॉ. नीरज  और हिन्दू कालेज के रमेश कुमार राज थे। परिणामों की घोषणा डॉ नीरज ने की। लोक गीत प्रतियोगा में पहले स्थान पर मिरांडा हाउस की छात्रा संध्या भारती  रही जिन्होंने मगही का दहेज़ विरोधी लोकगीत सुनायादूसरे स्थान पर महाराजा अग्रसेन  कालेज की अन्नू कुमारी थी जिन्होंने नारी जीवन पर मैथिली गीत प्रस्तुत किया और विस्थापन पर कुमाउनी के गीत के लिए विनीत को तीसरा स्थान मिला। समापन सत्र में विभाग के प्रभारी डॉ पल्लव ने साहित्यिक प्रश्नोत्तरी के परिणामों की घोषणा की। इसमें प्रथम स्थान पर किरोड़ीमल कालेज के एम.एस. सरस्वती और सचिन गुप्ता,  दूसरे स्थान पर एस ओ एल के सुमित कुमार और श्रवण शर्मा तथा तीसरे स्थान पर  खालसा कालेज के वसीम और शालिनी राय रहे।  

 

श्रेया राजसूरज सिंह

प्रथम वर्षहिंदी प्रतिष्ठा

हिंदू कॉलेजदिल्ली विश्वविद्यालय

Sunday, April 18, 2021

कविता.. किसान पिता..

 कविता..

 किसान पिता.. 
"""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""
पिता, किसान थें
वे फसल, को ही ओढते
और, बिछाते थें..!! 

बहुत कम- पढें लिखे
थें पिता, लेकिन गणित
में बहुत ही निपुण हो
 चलें थें

या, यों कह लें
कि कर्ज ने पिता 
को गणित में निपुण 
बना दिया था...!! 

वे रबी की बुआई
में, टीन बनना चाहते
घर, के छप्पर
के  लिए..!! 

या  फिर, कभी तंबू
या , तिरपाल, वो 
हर हाल में घर को 
भींगनें से बचाना चाहते
थें.. !! 

घर, की दीवारें, 
मिट्टी की थीं, वे दरकतीं
तो पिता कहीं भीतर से
दरक जाते..!! 

खरीफ में सोचते
रबी में में कर्ज चुकायेंगे
रबी में सोचते की खरीफ
में.. !! 

इस, बीच, पिता खरीफ
और रबी होकर रह जाते... ..!! 

उनके सपने, में, बीज, होते
खाद, होता..... !! 

कभी, सोते से जागते
तो, पानी - पानी चिल्लाते..!! 

पानी , पीने के लिए नहीं ..!! 
खेतों के लिए.. !! 
उनके सपने, पानी पे बनते
और, पानी पर टूटते..  !! 

पानी की ही तरह उनकी
हसरतें  भी  क्षणभंगुर होतीं.... !! 

उनके सपने में, ट्यूबल होता, 
अपना  ट्रैक्टर होता.. !! 
दूर- दूर तक खडी़ 
मजबूत लहलहाती हुई
फसलें  होतीं... !!

 बीज और खाद, के दाम
बढते तो पिता को खाना 
महीनों  
अरुचिकर लगता.. !!

खाद,  और बीज के अलावे, 
पिता और भी चिंताओं से 
जूझते..!! 

बरसात में जब, बाढ़
आती, वो, गांव के सबसे 
ऊंचें, टीले पर चढ जातें.. 

वहां से वो देखते पूरा 
पानी से भरा हुआ गांव ..!! 
 माल-मवेशी
रसद, पहुंचाने, आये हैलिकॉप्टर
और सेना के जवान..!! 

उनको, उनका पूरा 
गांव , डूबा हुआ दिखता.. !! 

और, वे भी डूबने लगते
अपने गांव और, परिवार 
की चिंताओं में

बन्नो ताड़ की तरह 
लंबी होती जा रही थी.. 
उसके हाथ पीले
करने हैं....!! 

भाई, शहर में 
 रहकर पढताहै, उसको
 भी पैसे भेजने हैं..!! 

बहुत, ही अचरज की बात है
कि, वे जो कुछ करते
अपने लिए नहीं करते..!!

लेकिन, वे दिनों- दिन
घुलते जातें. घर को लेकर
बर्फ, की तरह पानी में .. 

और,  बर्फ की तरह घर 
की चिंता में एक दिन.. 
ठंढे होकर रह गये पिता ... !! 

""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""
सर्वाधिकार सुरक्षित
महेश कुमार केशरी 
मेघदूत मार्केट फुसरो

Aksharwarta's PDF

Book On Global Literature : Situations & Solutions

Book on Global Literature : Situations & Solutions PDF