Monday, June 29, 2020

मेरी लिपि मेरी शान, क्यों करूँ विदेशी का गुणगान।      भारतीय भाषा मंच,  वैश्विक हिंदी सम्मेलन एवं नागरी लिपि परिषद 


मेरी लिपि मेरी शान, क्यों करूँ विदेशी का गुणगान।   

  भारतीय भाषा मंच,  वैश्विक हिंदी सम्मेलन एवं नागरी लिपि परिषद 

की ओर से राष्ट्रीय गोष्ठी का आयोजन  

 

 




भारतीय भाषा मंच,  वैश्विक हिंदी सम्मेलन एवं नागरी लिपि परिषद की ओर से 26/06/2020 को राष्ट्रीय गोष्ठी का आयोजन गूगल मीट पर किया गया। इसका विषय था- मेरी लिपि मेरी शान, क्यों करूं विदेशी का गुणगान।  इसकी अध्यक्षता डॉ. विनोद बब्बर, पत्रकार एवं सदस्य नागरी लिपि परिषद ने की। मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. मोतीलाल गुप्ता, निदेशक वैश्विक हिंदी सम्मेलन एवं पूर्व उपनिदेशक राजभाषा, गृह मंत्रालय भारत सरकार ने भाग लिया।  श्री ईश्वर दयाल, राष्ट्रीय सह संयोजक भारतीय भाषा मंच एवं डॉ. ब्रजेश गौतम अध्यक्ष संस्कृत शिक्षक संघ दिल्ली का सान्निध्य रहा। इस वेबिनार का संचालन डॉ. वी दयालु, संयोजक, भारतीय भाषा मंच दिल्ली ने किया। भारतीय भाषा मंच 2015 में स्थापित हुआ। इसके संरक्षक श्री अतुल कोठारी जी हैं। यह संगठन पूरे देश में विभिन्न भाषाओं पर काम करने वाले लोगों  को एक मंच पर लाकर भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन का कार्य करता है तथा सभी भारतीय भाषाओं को सम्मान देता है। 

 

'वैश्विक हिंदी सम्मेलन' भारतीय भाषाओं की प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी प्रशिक्षण और हिंदी के प्रचार प्रसार  के क्षेत्र में कार्यरत है। पूज्य विनोवा भावे ने 1975 में नागरी लिपि परिषद की स्थापना की थी। उनका आग्रह था कि भारत की सभी भाषाओं की लिपि एक हो ताकि एक दूसरे की भाषा को  जान सकें।   कार्यक्रम में डॉ. मोतीलाल गुप्ता जी ने बताया कि किस तरह हम कंप्यूटर में, हिंदी  देवनागरी  अथवा अन्य भारतीय भाषाओं की लिपि को टाइप कर सकते हैं। अपना कंप्यूटर खोलें उसके बाद कंट्रोल पैनल पर जाएं  और फिर clock and Region पर जाएं,  फिर Region पर जाएँ। उसके बाद Language prefrenced पर क्लिक करें और हिंदी, गुजराती मराठी जो भी आपकी इच्छा हो उस भाषा का चयन करें। लैंग्वेज हॉट की पर ओके करें। उसके बाद इच्छित कीबोर्ड को एक्टिव करें। हिंदी अथवा कोई भी भाषा सक्रिय करने पर आपको स्वत: Inscript कीबोर्ड मिल जाता है। प्रारंभ में स्वत: English आती है। बाद में आप लैंग्वेज बार पर Eng से अथवा Shift + Alt  को एक साथ दबा कर अपनी भाषा बदल सकते हैं। इस तरह से यहां पर आप हिंदी गुजराती, मराठी, देवनागरी या अन्य किसी लिपि को आप टाइप करना शुरू कर सकते हैं। विशेष अक्षरों के लिए शिफ्ट की दबाकर  काम करना है। bhashaindia.com से आप हिंदी इंडिक कीबोर्ड भी डाउनलोड कर सकते हैं। जी मेल से एप्स, एप्स से Docs  और Tools,  उससे गूगल वॉइस, उससे माइक के निशान पर अपनी भाषा चयनित करते हुए क्लिक करें । आप अब बोल कर टाइप कर सकते हैं। इस तरह आप कंप्यूटर में माइक लगाकर, माइक्रोफोन लगा कर के बोलकर आप यहां पर टाइप करना सीख सकते हैं ।


मोबाइल  पर अपनी भाषा और लिपि में लिखना और भी आसान है। मोबाइल की सेटिंग में जाएं। वहां लैंग्वेज इनपुट पर जाना है।( हर मोबाइल में व्यवस्था थोड़ी अलग होती है इसलिए किसी मोबाइल में जनरल/ एडिशनल सेटिंग में या सिस्टम में यह  हो सकता है।) उसके बाद लैंग्वेज इनपुट पर जाएं, लैंग्वेज इनपुट के बाद गूगल वॉइस टाइपिंग पर जाना है। यह सीधे उसमें मिल सकता है या वर्च्युल कीबोर्ड में होगा। गूगल वॉइस टाइपिंग पर क्लिक करें,  Languages पर जा कर अपनी भाषा चुनें और सेव करें। उसके बाद भाषा बदलें। गूगल वॉइस टाइपिंग पर जाने से पहले भाषा न बदलें, अन्यथा पूरी सेटिंग आपकी दूसरी भाषा में हो जाएगी। गूगल वॉइस टाइपिंग के बाद ही भाषा को बदलना है। आप बाहर आएंगे। उसके बाद आपके वर्चुअल कीबोर्ड पर  आपको आपकी मनचाही भाषा दिखाई देगी।
 वहां दो माइक के चिह्न  दिखाई देंगे। जहां कीबोर्ड है उसके ठीक ऊपर वाले माइकपर क्लिक करें। वहां उसका रंग बदलेगा और आप बोल कर टाइप कर सकते हैं । आप इसे वाट्स ऐप, फेसबुक, ट्विटर और ई-मेल पर शेयर कर सकते हैं। कॉपी कर वर्ड फाइल में सुरक्षित कर  सकते हैं। इस तरह आप से बड़ी से बड़ी पुस्तक भी लिख सकते हैं। पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन बनाकर छात्रों को पढ़ाने में प्रयोग कर सकते हैं। अपनी भाषा और लिपि के प्रयोग में आप और आगे बढ़ते जाएंगे। आप दूसरे लोगों को भी सिखा सकते हैं । 


कुछ शब्दों की वर्तनी अशुद्ध हो सकती है, उनको ठीक करने के लिए मैनुअल टंकण से ठीक करें। बोलकर टंकण के समय आराम से बोलना जरूरी है। उच्चारण स्पष्ट होना चाहिए। उच्चारण स्पष्ट होगा तो गूगल वॉइस आपकी आवाज के अनुसार टाइप करेगा।  इस तरह आप अपनी भाषा और लिपि की फाइल को किसी और को भी शेयर कर सकते हैं। चाहे पीडीएफ में या किसी और सॉफ्टवेयर में। 


डॉ ब्रजेश गौतम ने अपनी भाषा और लिपि की सुरक्षा हेतु प्रयोग आवश्यक बताया । अपनी भाषा और लिपि का खुद ही संरक्षण और संवर्धन करने के लिए कहा, किसी दूसरे से अपेक्षा न करें। स्वयं ही ब्रांड एम्बेसडर बनें। आपकी अपनी लिपि का खुद ही प्रचार प्रसार करेंगे तो लिपि बचेंगी अन्यथा समाप्त हो जाएंगी।
अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए डॉ विनोद बब्बर  ने बताया- हमें अपनी भाषा और लिपि में तथा  देवनागरी लिपि में भी लिखना चाहिए, ताकि अपनी भाषाओं को दूसरे लोगों तक पहुंचा सकें। हमें अंग्रेजी के शॉर्ट्स रूप में नहीं जाना चाहिए।  26 अक्षर है इसलिए अंग्रेजी ठीक है ऐसा नहीं है। हम 'छत' को लिखते हैं तो हिंदी में दो अक्षर आते हैं और अंग्रेजी में पांच अक्षर आते हैं। तो आप समझ सकते हैं कि कम अक्षर किसमें आते हैं । और हम दूसरे की बात क्यों करें अपनी लिपि की विशेषताएं खुद बताएं । क्योंकि देवनागरी की विशेषता है- जैसी लिखी जाती है, वैसी ही पढ़ी जाती है। जैसी पढ़ी जाती है, वैसी सुनी जाती है, और उसी तरह से उसका अर्थ भी  निकलता है । अंग्रेजी में बोला कुछ जाता है, लिखा कुछ जाता है ,समझा कुछ और जाता है।  अपनी देवनागरी लिपि वैज्ञानिक भी है । इसके लिए हमें काम करना चाहिए। ऐसा नहीं है  कि कोशिश करें और सफलता न मिले। ऐसी जगह जहां आपको स्वीकार किया जाता हो, वहां पर आप आग्रह करें-  आपका कार्ड देवनागरी में होगा तो हम अवश्य आएंगे। जब हम लोगों की बातों पर ध्यान दें, तो पता चलता है कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके  घर में अंग्रेजी बोलना कोई जानता, न पढ़ता है; फिर भी प्रिंटर के पास जाकर  झूठे स्टेटस के चक्कर  में अंग्रेजी में कार्ड छपवाते हैं। अतिथि उसमें केवल स्थान देखते हैं कहां पर दावत मिलेगी? और किस समय  में मिलेगी? लोग नाम तक नहीं जानते कि किस लड़का या लड़की की शादी है? ऐसे कार्ड  का फायदा क्या। 


श्री ईश्वर दयाल ने सभी का धन्यवाद करते हुए  कहा कि हर व्यक्ति को अपनी भाषा को टाइप करना सीखना चाहिए। तभी भाषा और लिपि प्रयोग में बढ़ती जाएगी। हमें सोशल मीडिया पर अपनी लिपि में ही लिखना चाहिए। हमारे कंप्यूटर सॉफ्टवेयर भारतीय भाषाओं में होने चाहिए। अन्यथा एक दिन ऐसा भी आएगा कि हमारी लिपि के साथ हमारी भाषाएं भी समाप्त हो जाएंगी। हमें सरकार को सचेत करने की  आवश्यकता है। 


कार्यक्रम में श्रोताओं के प्रश्नों का उपस्थापन श्री राहुल शर्मा रेडियो जॉकी ने किया और तकनीकी सहयोग डॉ संदीप उपाध्याय और डॉ सोहन कुमार ने किया। इस राष्ट्रीय वेबिनार में 970 लोगों ने पंजीकरण कराया। 250 प्रतिभागी कार्यक्रम के दौरान लगातार उपस्थित रहे। गूगल मीट पर सीमित संख्या होने के कारण काफी लोग प्रतीक्षा में रहे, कुछ प्रतिभागियों ने यूट्यूब और फेसबुक पर भी कार्यक्रम को देखा। सभी प्रतिभागियों ने गोष्ठी को उपयोगी और ज्ञानवर्धक बताया। धन्यवाद।



DigiLEP-अब पढ़ाई नहीं रुकेंगी* " *दूरस्थ शिक्षण" प्रशिक्षण-4*   *मौहल्ला-क्लास ...और मेरे पूर्व प्रयास ...* 

DigiLEP-अब पढ़ाई नहीं रुकेंगी*

 

" *दूरस्थ शिक्षण" प्रशिक्षण-4* 

 

 *मौहल्ला-क्लास ...और मेरे पूर्व प्रयास ...* 

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          ✍️ *गोपाल कौशल* 

 

 *CM Rise* *शिक्षक प्रशिक्षण कोर्स भाग-4 "दूरस्थ शिक्षण"* किया गया , उसके तहत मेरे द्वारा पूर्व से ही लगातार अपनी शाला शासकीय नवीन प्रावि नयापुरा माकनी के उन बच्चों को घर-घर जाकर शिक्षण कार्य कराया जा रहा है, जिनके पास मोबाईल-फोन सुविधा ही नहीं है, साथ ही जिस मोहल्ले  में शाला के बच्चे अधिक रहते हैं, उनको एक जगह "सोशल डिस्टेन्स" का ध्यान रखते हुए "मौहल्ला-क्लास" के रूप में पूर्व से ही शिक्षण कार्य करवाया जा रहा है, मेरे द्वारा बनाएं *कबाड़ से जुगाड़  स्मार्ट टीवी* का उपयोग मोबाइल हीन बच्चों के लिए किया जो कारगर सिद्ध हुआ । वहीं *ब्लूटूथ माइक* का उपयोग किया ताकि आवाज सब तक पहुंच सकें । अपने मोबाइल से फ्लिप बुक की कहानियों व अन्य शिक्षाप्रद कहानियों पर *ऐनिमेशन फिल्मों का भी निर्माण* किया जा रहा जो देशभर में सराही जा रहीं हैं । गत दिवस अपनी शाला के ऐसे ही बच्चो के घर पर  पुनः जाकर  पालको, बच्चों को "रीडिंग क्विज़" प्रतियोगिता की जानकारी दी गई तथा 19 जून को बच्चो को 'रीडिंग सप्ताह' के तहत 'शपथ' भी दिलाई गई और सम्बंधित कक्षा के बच्चों को सम्बंधित कहानी पढ़ाते हुए प्रश्न-उत्तर कार्य भी उक्त "मोहल्ला-क्लास" के अंतर्गत करवाया गया । और पुरुस्कृत भी किया गया । इस अवसर पर कोरोना महामारी के प्रति जागरूक करने की दृष्टि से बनाएं गए "कोरोना से संबंधित स्लोगन,नारों, कविताओं ",आदि के द्वारा जागरूक करने का भी एक प्रयास किया, और जो बच्चे बिना मोबाईल-फोन के भी नियमित रूप से घर पर प्रतिदिन पढ़ाई कार्य जो उनको दिया गया था, उसे कर रहे थे, उन सभी बच्चों को भी मेरे द्वारा उनके घर-मोहल्ले में जाकर "मोहल्ला-क्लास" में ही पुरूस्कृत कर उनका उत्साहवर्धन करने का एक प्रयास किया गया , जिससे उन बच्चों के पालको को भी आज इस महामारी में भी पढ़ाई नहीं रुकने पर "सरकारी शिक्षा" पर आज गर्व महसूस हुआ, मेरे लिए भी यह एक बहुत ही सुखद अनुभव रहा.....

सीएम राइस प्रशिक्षण - 4 *दूरस्थ शिक्षण* से भी मुझे ओर बेहतर कार्य करने की ऊर्जावान प्रेरणा मिली ......कोटिश आभार ...राज्य शिक्षा केन्द्र परिवार के हम ऋणी हैं ....जो हमें ऐसे उत्कृष्ट प्रशिक्षण प्रदान कर शैक्षिक गुणवत्ता एवं तकनीकी कौशल से प्रशिक्षित कर हमें अभिनव प्रयोग करने हेतु प्रोत्साहित कर रहें ।

 

Friday, June 26, 2020

चरित्र छिपाते चेहरे


चरित्र छिपाते चेहरे

 

आजकल  उस  पर अपनापन  छाया है।

लगता है फिर चेहरे पर चेहरा लगाया है।।

 

उसके अपनेपन से,तूने हर बार धोखा खाया है।

क्या करें , उसने गिरगिट जैसा हुनर जो पाया है।।

 

वो जल से निश्छल रंग को भी बदल देता है।

उसने मयखाने की मय का हुनर जो पाया है।।

 

बता  मुझे  तू  कैसे बचेगा उसकी अय्यारी से,

उसके हुनर से तो आईना भी ना बच पाया है।

 

वो जो कहते है कि आईना झूठ बोलता ही नही,

उन्हें    जाकर    जरा    ये    समझा    दे    कोई,

झूठा मुखोटा चेहरे का,आईना भी ना हटा पाया है।

 

अब चैन से जीना है  तो तू भी रंग बदलना शीख ले,

सीधे-साधे लोगो को तो सबने बेवकूफ ही बताया है।

 

जो आजकल तेरे काँधे पर हाथ रख साथ चल रहा है।

ध्यान से देख,उसने  दूसरे  हाथ  मे  छुरा  छुपाया  है।।

 

किसी भी पल वो तेरी पीठ में छुरा घोप सकता है।

उसने हर बार की तरह  चेहरे पर चेहरा लगाया है।।

 

 

नीरज त्यागी

ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश ).


व्यंग्य-ऑफिस से टपके, पंेशन में अटके

आदमी अक्सर जिं़दगी में कई तरह के झटके खाता है। कभी  बिजली के तो कभी बिजली के बिल के, कभी दिल के तो कभी डॉक्टर के बिल के। अब भूकंप के झटके तो आम हो गए हैं। दिल्ली वालों के लिए तो कोरोना के झटके हों या भूकंप के ....... हुण की  फरक पैंदा है जी ? जैसा मजदूर से लेकर मंत्री तक का एटीच्यूड हो गया है। 

 खर्चों में कटौती करने का बहाना बना कर , सरकार ने हमें 60 की बजाय 58 में ही नौकरी से टपका दिया जैसे आंधी में अधपके आम । सेवा मुक्त किया , पेंशन युक्त किया और  एक खूंटी मंेे टांग दिया। 

साल भर पहली पेंशन के  इंतजार के बाद  , मुंह पर मॉस्क लगाए , हाथों पर  ग्लॅव्ज़ चढ़ाए , हम बैंक के गेट पर जैसे ही पहुंचे, वहां के सिक्योरिटी गार्ड ने हमारा स्वागत वैसे ही किया जैसे हमारे जमाने में बारातियों का स्वागत उन पर गुलाब जल या केवड़ा छिड़क कर किया जाता था। श्राद्ध जीमने आए  पंडितों की तरह वह हर आने जाने वाले के हाथ - पैर सेनेटाइजर सें धुलवा रहा था। सोशल डिस्टेंसिंग की वजह से अछूतों की तरह हमें दूर खड़ा किया गया। घ्ंाटे भर बाद नंबर आया तो पता ही नहीं चला कि किस बाबू के मत्थे लगना है। हर बाबू पिंगपांग की तरह हमें , एक काउंटर से दूसरे कांउंटर तक उछालने में लगा हुआ था।  पता चला पेंशन बाबू आज कोरोना पाजिटिव हो गए हैं और उनका काम काउंटर नंबर 30 पर  एक मोटे चश्में और भरी भरकम डील डौल वाली प्रौढ़ महिला एडीशनली कर रही हैं। हिम्मत कर के उनके सम्मुख  उपस्थित हुए जहां एक रस्सी की सहायता से तीन फुट की दूरी  बना कर रखी गयी थी। उनके चेहरे के भाव देखकर ऐसा लग रहा था मानों कह रही हों - तुझे भी आज ही मरना था ?

उसने ऐनक के निचले हिस्से से झांक कर हमारी श्री मती जी की तरह तुनक के पूछा ,‘ क्या है?‘

खैर ! हमने अपनी फरियाद रखी कि हमारी पहली पेंशन आ गई होगी ! 

वह गुर्राई ,‘ नाम ?’

हमने कहा -मास्टर राम लाल ।

कंप्यूटर में चेक कर के बोली,‘ आप मास्टर होकर धोखाधड़ी कर रहे हो ? तीन साल  पहले मास्टर रामलाल की डेथ हो चुकी है , आप उसकी पंेशन क्लेम कर रहे हो ?’

हम चौंके और रिक्वेस्ट की ,‘ मैम ! आपको गलती लग रही है। मैं तो आज पहली पेंशन लेने आया हूं।आप इस एकांउट में चेक करिए। ‘आर‘ से चेक करिए । उसने नाक भौं सिकोड़ते हुए माउस इधर उधर घुमाया और पूछा ,‘ नाम?‘

- राम लाल।

बाप  का नाम -  शाम लाल ?

- जी ! यही है।

आप स्कूल में मास्टर होंगे । रिकार्ड में केवल राम लाल हैं।

- जी पासबुक में पेंशन नहीं आई।

- आएगी कैसे ? जिंदा होंगे तो आएगी न ?

- अरे  मैम ! मैं जीता जागता आपके सामने खड़ा हूं । हाथ पकड़ कर देख लीजिए।’

बस इस बात पर वह और भड़क गई । हम सहमे कि  कहीं दफा 376 ही न लगवा दे। पंेशन भूल कर उससे क्षमा मांगी।

एक गिलास पानी पीकर  बोली,‘ रिकार्ड में जिन्दा होना जरुरी है।अपना लाइफ सर्टिफिकेट  का एफिडेविट लाइये कि आप वर्ष 2019 से लेकर आज की तारीख तक जिन्दा हैं।’

खुद के माथे पर हाथ फेरा। पसीना भी असली लगा और खुद भी। पंेशन तो नहीं मिली पर ,टेंशन पूरी मिल गई ।

इस दुर्घटना जिक्र जब हमने अभिन्न मित्र से किया तो वे बोले,‘ मास्टर रामलाल !  आज जमाना बदल गया है। जमाना लाइव दिखने का है। आप अलाइव हैं या नहीं पर फेस बुक , व्हॉट्स एप, ट्वीटर , इंस्टा वगैरा वगैरा पर लाइव दिखना  जरुरी है । लाइव होना इतना इर्म्पोंटंेट  नहीं है जितना दिखना ।’

हमने कहा,‘ भाई जी! हम तो हमेशा लाइवली और पाजिटिव ही रहते हैं।’

वे बोले ,‘ खबरदार जो आगे से ऐसे लफजों का इस्तेमाल किया । बड़ी मुसीबत में पड़ जाओगे। किसी को गलती से भी खुद को पाजिटिव न बता देना।  वक्त बदल गया है । हर चीज के मायने बदल गए हैं।परिभाषाएं बदल गई हैं। लोग मोबाइल तक ब्लॉक कर देंगे तुम्हारा कि कहीं तुम्हारे अंदर छिपा कोरोना निकल कर उनके कान में न घुस जाए।  जमाना कहीं का कहीं जा पहुंचा है। सब कुछ मोबाइल में हैं और सब लाइव है।‘

लॉक डाउन के पहले चरण में जो डेड हो गए थे , वे दूसरे चरण में लाइव हो गए। कोई किचन में कोई क्लास में। जिसकी रोटी कभी गोल नहीं बनी, वह कुकरी क्लासें लाइव ले रहा है। जिन्हें ज्योतिष का क ख ग नहीं पता ,वे एस्ट्र्ालॉजी के लाइव कोर्स चला कर जम कर पैसा कूट रहे हैं। महिलाएं पार्ट टाईम लाइव होकर टेरो कार्ड सिखा रही हैं । जिनकी दूकान पर मक्खी तक नहीं घुसती थी वे ऑनलाइन सड़ा माल बेच रहे हैं। बच्चे ऑनलाइन पढ़ रहे हैं। मैडमें बच्चों के मोबाइल, लैपटॉप पर जीती जागती पूरे मेकप में हाजिर है। बुजुर्ग लाइव लूडो खेल रहे हैं या तंबोला में वक्त काट रहे हैं। कोई ऑनलााइन खाना बना रहा है तो गाना गा रहा है। कोई खा रहा है तो कोई बेच रहा है । 

जिन्हें चुटकला तक समझ नहीं आता था, वो वेबीनार पर लाइव होकर कविता पाठ कर रहे हैं, साहित्यिक चर्चा कर रहे हैं। ज्निहें यह नही मालूम कि भारत में कितने राज्य , कितने केंद्र शासित प्रदेश हैं , वे गलवान मुददे पर इंडो - चाइना रिलेशन, भारत की विदेश नीति क्या हो ...जैसे मुदद्ों पर बतिया रहे हैं छुटभइये चैनलों पर लाइव होकर एक दूसरे को गरिया रहे हैं।

जो आजकल किसी के मोबाइल पर लाइव नहीं दिखता तो लोग शक करने लगते हैं कि भाई कहीं पाजिटिव होकर चुपचाप निकल तो नहीं लिया ? दिल्ली जैसी जगह तो घर वालों को ही नहीं पता चलता कि आखिर हुआ क्या हैं

सो भइये ! आज लाइवली और पाजिटिव रहने की बजाय लाइव दिखना लाइव होने से ज्यादा इम्पोर्टेंट है। 

सो  बेशक लाइव हो , पर लाइव दिखो ।  

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- मदन गुप्ता सपाटू,

458, सैक्टर 1, पंचकूला.-134109 , हरियाणा।

Friday, June 19, 2020

 " आ अब लौट चलें"

शीर्षक :- 


             " आ अब लौट चलें"
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हैं चारों ओर वीरानियाँ
खामोशियाँ, तन्हाईयाँ,
परेशानियाँ, रुसवाईयाँ
सब ओर ग़ुबार है !
        आ अब लौट चलें.....................

                               चीत्कार, हाहाकार है
                               मृत्यु का तांडव यहाँ,
                               है आदमी के भेष में
                              यहां भेड़िये हजार हैं !
                             आ अब लौट चलें...................

      खून से सनी यहाँ
इंसानियत की ढाल है,
नफ़रतों के ज़हर से
भरी आँधियाँ बयार हैं !
       आ अब लौट चलें.................

                             ज़मीर मिट चला यहाँ
                             क़ायनात शर्मसार है,
                             घोर अंधकार में यहां
                             गुमनामियाँ सवार हैं !
                       आ अब लौट चलें................

कस्तियां यहाँ डूब रही
लहरों में उभार है
है डूबता वही यहाँ
गुमाँ का जिसमें ख़ुमार है !
              आ अब लौट चलें....................

                         मुफ़लिसी के दौर में
                       मजबूरियां बेशुमार हैं,
                       नज़र जहां भी पड़े
                       अंगार ही अंगार हैं !
                        आ अब लौट चलें......................

      मंज़र ये कैसा यहाँ
       फ़िक्र में जहान है
ना सरहदें महफ़ूज यहाँ
सब  दिलों में ख़ार हैं !
       आ अब लौट चलें.....................
             
                          स्वार्थ को बेड़ियों से बंधे
                       सब गुमनामियों की कैद में,
                                सब्र है किसे यहाँ पे
                              तंग सोच से बीमार हैं !
                           आ अब लौट चलें................... 

  विश्वास के पनपते बूटों पे
दगाबाज़ इल्लियाँ सवार हैं,
कब तलक जलेगा "दीप" यूँ
दामन सभी दाग़दार हैं !
       आ अब लौट चलें...................!

           कुलदीप दहिया " मरजाणा दीप"
            शिक्षक एवं साहित्यकार 
             हिसार  ( हरियाणा )
            भारत ।

Wednesday, June 17, 2020

लघुकथा--*गुरन बसर*

विषय- मज़दूर


विशेष- *गुरन बसर* नाम अरुणाचल प्रदेश  के अनुसार दिया गया है


विधा-लघुकथा


शीर्षक-  तमाशा


कोरोना काल की इस संकट घड़ी में यदि भूख से कोई अधीर हो रहा है तो वो है मज़दूर। पहाड़ो को तोड़कर, जमीन की काटकर रास्ता बनाने वाला, कल-कारखानों में पसीना बहा   पैसा कमाने वाला।


सोसल मीडिया के इस दौर में कुछ एक लोगों ने इन मजदूरों की भूख पर चिंता व्यक्त  की ।


फिर क्या था समाज के कुछ एक धनिक वर्ग, सामाजिक कार्यकर्ताओं व विभिन्न दलों से जुड़े नेताओ में इनकी बेबसी का तमाशा बनाने की होड़-सी मच गई। तब शुरु हुआ इनकी मदद करने का दिखावटी सिलसिला।


इसी क्रम में ईटानगर के प्रतिष्ठित साहूकार गुरन बसर की कोठी में समाज के कुछ प्रतिष्ठित लोगो की बैठक रखी गई जिसमे गरीब , बेघर मजदूरों की सहायता कैसे की जाए पर चर्चा की जा रही है।  पास ही एक टेबल पर मजदूरों को बांटने के लिए राशन के समान रखे हुए हैं।


कोठी के बाहर ही चौखट के किनारे पालती मार गुरन बसर के यहाँ काम करने वाला एक माली जिसे इस संकट की घड़ी में  काम में आने से मना कर दिया गया है, बैठे हुए ईश्वर तुल्य मालिक से मिलने के लिए अधीर है। शायद कुछ मदद की आस से आया हो।उसके पिचके गाल, करुणा से भरी आंखे ही उसका सारा हाल कह रही हैं।


 बैठक समाप्त हुई , मालिक की नज़र  माली पर पड़ी तो डांटते हुए  तीखे लहज़े में कहा कि क्या तुम मुझे मरवाओगे, घर पर आराम करो, मालूम है न कोरोना वायरस फैला है,मुझे बहुत काम है मालिक की डांट सुन कर वह मूक हो  कहीं और काम की तलाश में निकल जाता है। 


अगली सुबह शहर में चर्चा थी……. गुरन बसर ने एक हज़ार गरीब मजदूरों को अन्न, राशन बांटा। संकट की घड़ी में भगवान बन असहायों की सहायता की।


लेकिन माली को इन खबरों से क्या ?


रचनाकार- शिवेंद्र यादव



Covid 19: Why Hindi belt is not asking any questions?

In February 2020 media began reporting the spread of a new virus in the world and it soon became the prime topic of discussion among us colleagues. I visited the website of the World Health Organisation (WHO) for authentic information on the issue. 


That was the time when we used to say jokingly that handshakes would soon become history and that we would have to greet each other with a Namaste. At that time, who knew that the day was not far off when we would be penalised for not wearing face masks?


That was the time when we used to discuss the justification for and the pros and cons of installing biometric machines for recording attendance. At that time, who knew that the day was not far off when installing a spy app would be made compulsory for all? Who knew that let alone biometric machines, we would soon allow ourselves to be subjected to surveillance of many kinds?  


I have legions of friends and they include journalists, social activists and academicians working in the Hindi belt. But barring a few, none of them is even remotely concerned about the long term implications of the current goings-on. 


In one city, cameras equipped with face-recognition technology have been installed on the roads. In another, drone cameras are being used to keep an eye on the citizens.


Why are skeptics and questioners in such a short supply in the Hindi belt? In fact, even our language reflects our tendency of keeping mum, of not asking questions. There are very few words in Hindi that can express the dangers inherent in such totalitarian surveillance? Has this anything to do with our culture? 


A new disease made its appearance; it was declared an epidemic and soon we were bombarded with so-called ‘scientific facts’ and ‘expert opinions’. We immediately confined ourselves to our homes without caring to explore the sources of this bombardment and their objectives. 


We were told that this is happening all over the world. But in the age of the Internet, we did have the means to discover that nowhere on the earth were the citizens subjected to such draconian restrictions. 


The claim that India is a ‘Vishwaguru’ (teacher of the world) finds the greatest resonance in the Hindi belt with some worthies basing their claim on Vedic philosophy and others on Buddhist teachings. But why none of us got up and said that we shouldn’t follow other nations blindly?


We were told that this disease is fatal and we accepted it without demur. We did not care to find out the number of deaths due to TB, pneumonia, malaria, chamki bukhar (acute encephalitis syndrome) etc in the Hindi belt. According to one estimate, 5-7 lakh persons die due to these diseases every year in the Hindi-speaking states.


We were told that this disease is highly contagious. But why are we ignoring the fact that its R factor (rate of infection) is one-fifth of that of TB. We were told that a large number of persons are dying of Covid. Why we didn’t try to explore out how many people around us have died of the disease and how many were killed by the lockdown?


We were told that this disease is dangerous because it is caused by a virus and has no cure. Why it didn’t occur to us that chamki bukhar and Japanese Encephalitis, which kill hundreds of children from poor families in the Hindi belt, are also viral diseases and have no cure. Chamki bukhar is such a dangerous and mysterious affliction that we still do not know for sure what causes it. It afflicts thousands of children of 1-15 years age group in the Hindi belt and hundreds of them die within a few days of contracting the disease. 


The Case Fatality Rate (CFR) of Covid 19 is less than three per cent while the death rate of these fevers is 30 per cent. What prevented us from asking that why these diseases are not taken seriously. Is it because most of their victims are the Dalits, the Backwards and the poor or because pharmaceutical companies cannot hope to make a fast buck from them? Why are we not asking whether it is true that the Government of India hides the actual number of deaths from diseases like malaria and cholera, which kill the poor?


Why are we not asking why deaths due to pneumonia, influenza and cardiac arrest are being added to the Covid 19 death toll? What is the objective of this fudging of figures?  


We are being told that everything is being done as per the guidelines of the WHO. Why are we not asking how credible the WHO is? Isn’t it true that WHO has been charged with protecting the interests of Big Pharma? 


In this context, it would be relevant to quote from en email of my friend Riyaz-ul-Haq, who is a research scholar in Germany. He drew my attention to the fact that “The apathy of WHO etc. towards the diseases stalking the poor countries is that the Western nations have, more or less, managed to control those diseases and eliminate their causes. Due to availability of potable water, adequate food and nutrition to their citizens, diseases like cholera and TB are no longer problems for these nations. Healthy lifestyles and robust healthcare systems are an added advantage. Even malaria and AIDS are no longer major problems for these nations. But they are sacred of the diseases that they cannot control. SARS and Covid 19 strike fear in their hearts because they have no way of combating them. As Western countries dominate the world, their priorities become global priorities. No wonder Covid has been proclaimed as a danger for everyone. Once the West manages to come out with a vaccine or a cure for Covid, they would be least concerned about who contracts this disease and who dies of it....Covid is now an affliction of America and Europe. Till it was causing deaths in China, it was of little consequence to them.”


Why are we not asking the question as to why this problem of the European and American nations has been thrust upon us? Isn’t it odd that while action is being taken against those spreading so-called ‘infodemic’ on social media, the media organizations that selectively publish what the WHO says are being spared.   


For the past four months, WHO is holding daily press briefings on Covid 19. The event is held online. Sitting at their Geneva (Switzerland) headquarters, WHO officials answer the questions from journalists all over the world. The briefings are beamed on various social media platforms of the organisation. On the occasions when WHO director general Dr. Tedros Adhanom Ghebreyesus praised Indian Prime Minister Narendra Modi at these briefings, our media organisations reported it in detail with unconcealed glee. 


On March 30, an Indian journalist (his name could not be heard clearly due to network issues) told WHO officials, “You must be aware that India, as part of its lockdown, is witnessing (an) unprecedented humanitarian crisis in the form of the movement of migrants from one part of the country to another. I do understand that you do not like commenting on individual countries, but this is an unprecedented humanitarian crisis. What would be your advice to our government?”


That was the period when reports and visuals of what the hapless poor migrant labourers were going through was sending waves of shock and dismay through the country. Lakhs of labourers, including children, old men and women (many of whom were pregnant), had begun trekking to their homes thousands of miles away. Borders of states were being sealed to stop them. Thousands of people wanted to travel to their native villages from different cities but the police used force on them. It seemed as if the country was on the verge of a civil war. 


WHO officials could not resist answering the question about this migration. Its Executive Director Michael J. Ryan supported the imposition of lockdown but also said that it could be strict or lenient depending on the specific needs of a country and that the human rights of the people should be respected under all circumstances. After Ryan’s reply, Dr Tedros said in an emotional tone, “I am from Africa and I know many people actually have to work every single day to win their daily bread. Governments should take this population into account... I come from a poor family and I know what it means to always worry about your daily bread and that has to be taken into account. We're not seeing it as an economic impact on a country (or) as GDP loss. We have to also see what it means to the individual in the street... it's not about India; it's about any country on earth.” Indian media did not give any space to this opinion of the WHO. 


But after this statement, the Government of India got cracking and the WHO was pressurized to refer to the steps taken by the government to mitigate the economic problems facing the people due to the lockdown. Resultantly, at its press briefing on April 1 2020, WHO chief Dr Tedros referred to the relief package announced by the government - full five days after its announcement on March 26. Tedros said, “Prime Minister Modi has announced a $24 billion US dollars package, including free food rations for 800 million disadvantaged people, cash transfers to 204 million poor women, and free cooking gas for 80 million households for the next 3 months.” In answer to a question by India Today’s Ankit Kumar, Michael Ryan said that it would be a little early to assess the results of the lockdown in India but “it has made a really huge attempt to limit the impact of the shutdowns on the people who are most at risk”.  


The next day, all the Hindi-English news platforms prominently carried the story that the WHO has showered praises on Prime Minister Modi and appreciated the steps taken by him to contain the spread of coronavirus. Many news channels, while reporting the WHO statement, also said that “PM Modi and a team of specialists are working without a break for containing corona virus. The PM has announced the 21-day lockdown at the advice of the team. The PM is working for 17-18 hours every day. Even the WHO has praised India and PM Modi for their campaign against corona.” 


The same media outlets had refrained from publishing the advice of WHO asking the countries to protect the human rights of the people. 


After lockdown ruining the economies of many countries, the WHO is now saying that it had never advised lockdowns!


Our government miserably failed to assess the impact of lockdown on a country like India with its vast population of poor people, most of whom are daily wage earners. Then, what is the guarantee that its other directives are well thought out and efficacious?   


Countries like Sweden, Japan, Tanzania, Belarus, Nicaragua and Yemen either did not go for lockdown at all or imposed restrictions that had the least impact on the liberty of the people. Why India did not tread this path?  


Why are we not asking that when many countries haven’t made wearing of face masks compulsory and when there is no evidence to indicate that not using masks would lead to a faster spread of the disease, then on what ‘scientific grounds’ has our government made wearing masks mandatory for the people. Is the coronavirus a nocturnal organism? If not, why has our government imposed night curfew? Shouldn’t we ask the government to come out with the scientific basis of its decision? Why does the government want that the people should continue to cringe in fear? Are we living in a nanny state? 


You say that you cannot bank on the people of India, who are illiterate, illogical and anarchic. They are not civilized like the Europeans are. But what evidence do you have to support this view? Isn’t it true that the people had significantly curtailed their visits to public places even before the countrywide lockdown was put in place? Is it not true that hundreds of trains had to be cancelled for want of passengers? Wasn’t this ample proof that people of India are disciplined and reasonable? Then, where was the need to crush them under a draconian lockdown?  


We should definitely ask under which law has our basic right to know the truth been abrogated. 


Why are we not asking what relationship does Indian Council of Medical Research have with Bill & Melinda Gates Foundation?  


On 10 April 2020, Ben Parker, editor and co-founder of The New Humanitarian, a Switzerland-based website asked a question during the WHO briefing on Covid 19. The question was about Bill Gates. The alacrity with which WHO officials answered the question was, of course, worth taking note of. But more importantly, the questioner’s credentials indicate how stories favouring Bill & Melinda Gates Foundation are being planted in the media. 


Bill Parker asked, “We're seeing a lot of rumours and conspiracy theories around the Bill & Melinda Gates Foundation, vaccines and a digital identity project called ID 2020. My question is, are you tracking the new ingredients in the misinformation out there?”


Answering the question, Michael Ryan said that they were very pleased with the support Bill & Melinda Gates Foundation had given to them and would look into the platforms that Parker mentioned. He added that the WHO was working with a number of digital companies to counter misinformation.


Dr Tedros, in a detailed answer to the question, showered fulsome praises on Gates. He said, “I have known Bill and Melinda for many, many years now....these two human beings are amazing....Having people like Bill and Melinda with big hearts to support humanity is something we should cherish. I would like to assure you during this COVID situation (that) their support is really big and we're getting all the support we need. Together we believe we can turn the tide....The world recognises their contribution and they deserve our respect and appreciation.” 


A Google search on the questioner Ben Parker reveals that his The New Humanitarian which “puts quality, independent journalism at the service of the millions of people affected by humanitarian crises around the world” is, mainly financed by Bill & Melinda Gates Foundation, which is its biggest donor. In return for it, Ben Parker is busy ‘fact-checking’ on various platforms right from Twitter to his website. Not surprisingly, his so-called fact-checking always shows the Gates’ in favourable light.     


In India too, amid this so-called epidemic, many ‘fact-checking’ institutions financed by foreign sources have sprung up. We should ask ourselves why untruths and half-truths, masquerading as ‘facts’, are floating on social media. Is only the government responsible for it or are we  ourselves signing away our freedom –and voluntarily accepting slavery? 


चिंतन - सीएम राइस प्रशिक्षण पर मेरे विचार 

चिंतन - सीएम राइस प्रशिक्षण पर मेरे विचार 

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निश्चित ही चिंतन " प्रभावी शिक्षण का आधार हैं " । शिक्षण एक ऐसी प्रक्रिया हैं जिसमें बहुत से कारक शामिल होते हैं । सीखाने वाला जिस तरीके से अपने योजित लक्ष्यों की ओर बढ़ते हुए नया ज्ञान,आचार -विचार और नवाचार कौशल को समाहित करता हैं ताकि उसके सीखाने के अनुभवों में विस्तार हो सके । लेकिन मैंने जब cm rise के इस प्रशिक्षण को किया तो इस प्रशिक्षण में बताएं चिंतन के 6 स्तरों ने काफी प्रभावित किया जो मुझे अपनी शाला के उन आखरी पंक्ति में मौन बैठने वाले बच्चों व शरारती बच्चों  की ओर ले जाता हैं जो चिंतन का विषय रहा,जिसके लिए मैंने सबसे पहले ऐसे बच्चों को अभिव्यक्ति के अवसर दिए ,कक्षा प्रतिनिधि की जिम्मेदारी प्रदान की ,शाला की हर गतिविधियों में इनकी भागीदारी सुनिश्चित की ....देखते ही देखते बदलाव के सुखद परिणाम आए आज शाला के सभी बच्चे भयमुक्त और आनंद के साथ कक्षा कार्य हो या गृह कार्य हो या फिर चाहें शालेय गतिविधियां ही क्यों न हों उत्साह के साथ प्रतिभाग करते हैं । जो मन को सुकुन देता है कि हमारा चिंतन ही हमारे कार्य को चेतन करता है । 

डॉनल्ड शून ने सच ही कहा कि :- चिंतनशील शिक्षण की मदद से शिक्षक अपने छिपे ज्ञान के बारे में सजग हो पाते हैं और अपने अनुभवों से सीख पाते हैं । समझ का विकास निरन्तर बढ़ने-लिखने ,स्वयं के चिंतन करने,दूसरे के विचारों को सुनने,समस्याओं का विश्लेषण करने ,विचारों का संश्लेषण करने ,तार्किक ढंग से अपने विचारों को प्रस्तुत करने ,कार्य करने ,कार्य -कारण संबंध ढूंढने, चिंतन प्रक्रिया में पर शोधन करने ,लीक से हटकर चिंतन करने,पूर्वानुमान लगाने, आत्मावलोकन व आत्म परीक्षण से होता हैं । सोचने,विचारने ,चिंतन करने की प्रक्रिया में मौलिकता हो ।

बच्चे उन लोगो से नही सीखते जिनको वह पसंद नही करते । अतः हम सबसे पहले बच्चों के पसंदीदा बनें । जिससे बच्चों को सीखने में मजा,आनंद आए ।बच्चों के प्रयासों की प्रशंसा करें ।जिनके प्रयासों की जाती हैं वह अपने जीवन बेहतर कार्य करते है । हमें अपने व्यक्तित्व की अच्छाइयों- बुराईयों की स्वयं सूची बनानी चाहिए और जो चीजें ज्ञान और टैलेंट से जुडी हो उसे उभारना चाहिए । हर दिन हम कुछ नया सीखनें की कोशिश करें  । बच्चों के मन में एक सपना बुनना सिखाएं , इससे एक प्रेरणा प्राप्त होती हैं । जो भी बच्चे हमारे पास आते हैं वह विभिन्न कठिनाइयों व अभावों से ग्रसित होते हैं ,उन्हें जब हमारा स्नेह मिलता है तो उन्हें लगता है कि हमारा सुनहरा जीवन सही हाथों में है । हम बच्चों को आत्म अभिव्यक्ति से प्रेरित लेखन हेतु प्रोत्साहित करें । बच्चों के मुस्कुराते चेहरे हमारे चिंतन की सार्थकता हैं ,जो हमें राष्ट्र निर्माता जैसे पद से गौरवान्वित कर रही हैं ।


लाॅकडाउन का सफ़र

पढ़ाई के बाद प्लेसमेंट से दूसरे राज्य के दूर एक शहर पूणे में नौकरी मिली थी। माता-पिता के साथ मैं भी बहुत खुश था। सोचा दिनभर काम करूंगा और शाम को पूणे जैसा प्रसिद्ध शहर घुमूंगें। मेरी कई इच्छाओं को पंख लग गए थे, लेकिन जल्द ही लॉकडाउन की घोषणा ने असमंजस की स्थिति में ला दिया। हमने अपने आपको समेट लिया, संभाल लिया। जैसे गीला नारियल अपना पानी स्वयं ही अंदर-अंदर सोख लेता है और सूखा गोला बनकर सुरक्षित नारियल के खोल में रहता है वैसे ही हमने भी अपनी सारी इच्छाओं को त्यागकर एक छोटी-सी खोली में अपने-आपको सुरक्षित रखने के जतन किये। ताकि अपने नही ंतो माता-पिता के सपने को ही साकार कर सकें।   


लाॅकडाउन का सफ़र


एक ऐसा अनुभव जो सबके लिए जानना जरूरी है--


भाग 1ः निर्णय


24 मार्च से शुरू हुई तालाबंदी को लगभग 2 महीने होने को आए। मैं अपने तीन रूममेट के साथ पुणे में हमारे नए किराए के फ्लैट में रह रहा हूं। हम सभी एक ही आईटी फर्म में काम करते हैं और घर से लगातार काम कर रहे हैं। इंजीनियरिंग की श्रमसाध्य पढ़ाई के बाद नौकरी लगने की जितनी खुशी थी. वह अब हमारे चेहरे और मन से गायब होती जा रही है। हम असमंजस में घिरते जा रहे हैं। यहां रहें या घर वापसी करें। पूणे का हमारे लिये नया वातावरण और घर पर माता-पिता की चिंता ने हमें कुछ बैचेन कर रखा था और घर से फोन आने पर मम्मी-पापा को सब ठीक है ये अर्धसत्य बोलने के लिए विवश भी कर रखा था।


जैसे सिर मुड़ाते ओले पड़ने वाली कहावत हमारे लिये ही लिखी हो। चूंकि हम मार्च के पहले सप्ताह में यहां आए थे, इसलिए हम पर्याप्त घरेलू सामान नहीं जुटा पा रहे थे। हमारे पास न बेलन था या ही रोटी बेलने का अन्य सामान हमने गिलास से इस दौरान रोटियां बेलीं और हीटर पर किसी तरह कच्ची-पक्की रोटियां सेंककर खाईं। सब्जी बनाने के लिए भी सामान पर्याप्त नहीं था. हम कम-से-कम ईंधन या ऊर्जा में अपना काम चलाना चाहते थे. इसलिए हमने सब्जी बनाने की जगह चटनी से काम चलाया. लेकिन ये उपाय पौष्टिकता और स्वादिष्ट होने से भरपूर लगा।


मेरे एक रूममेट ने पुणे से जाॅब छोड़ दिया क्योंकि उसे 15 मार्च को डब्ल्यूएफएच की अनुमति मिली थी। तब से हम में से केवल तीन ही लाॅकडाउन के बीच जीवित रहने का प्रबंधन कर रहे थे। हम अपने गृहनगर भोपाल की यात्रा करने की उम्मीद कर रहे थे और योजना बनाने लगे कि जैसे ही पहली तालाबंदी समाप्त होगी। हम पूणे से निकल लंेगे, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, हमने लाॅकडाउन के विभिन्न चरणों को देखा, प्रत्येक में कठिनाइयों का एक नया सेट आया और घर जाने की हमारी उम्मीद कम होती गई।


चिलचिलाती गर्मी, गर्म पानी, अपर्याप्त भोजन और काम के अतिभारित तनाव ने हमारे जीवन को दयनीय बना दिया। प्रत्येक दिन एक नई चुनौती के साथ आया, दिन के अंत में, ऐसा लगा जैसे हमने एक उपलब्धि हासिल की है। हम तीनों में से एक 30 दिनों की अवधि के भीतर दो बार बीमार पड़ गया। हालांकि हमें वर्कफ्राॅम होम की अनुमति मिल गई, जो कुछ हद तक हमें राहत देने वाला कदम था, लेकिन बाकी दिन-रात माता-पिता के बिना गुजारना एक अनजान शहर में मुश्किल लगने लगा। हमारा एक साथी एक बार असहनीय पेट दर्द से कराह उठा, उसे किसी तरह सुबह 3 बजे अस्पताल ले जा पाये। टैक्सी चालक का मोबाइल नंबर डायरी लिखना हमारे लिये लाभदायक रहा। हम बहुत सारे जंक फूड खा रहे थे और इंस्टेंट नूडल्स हमारे प्राथमिक आहार में से एक था। हफ्ते भर हो गए थे जब हममें से किसी एक को पूरी तरह से आहार मिलता था। पेट से संबंधित बीमारी होने के लिए बाध्य थे।


भोजन और किराने का सामान खरीदना हमारे लिए एक और बड़ी चुनौती थी। आस-पास कोई स्थानीय किराना स्टोर नहीं थे। यद्यपि हमने विभिन्न आॅनलाइन किराना प्लेटफ़ार्म के माध्यम से आॅनलाइन आर्डर करने की कोशिश की, लेकिन डिलीवरी के लिए न्यूनतम 7 दिन लगने का मैसेज मिलता रहा, और इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि हमारे द्वारा सूचीबद्ध सभी आइटम डिलीवर हो जाएंगे। हमने सबसे नजदीक के एक शाॅपिंग माॅल जाने का फैसला किया। हम जहां रह रहे थे, वहां से शाॅपिंग माॅल लगभग 1.5 किलोमीटर दूर था। हमें वहां से किराने का सामान खरीदने के लिए कुछ नियमों का पालन करना था।


पहली शनिवार की शाम को शाॅपिंग माॅल पहुंचने पर, हमें उन नियमों के बारे में पता चला। परिसर में केवल 15 लोगों को प्रवेश करने की अनुमति है, हमें टोकन दिया गया है जिसमें उस समय स्लाॅट का वर्णन किया गया है जिसमें हमें खरीदारी करने की अनुमति है और हमारा समय 9 बजे के आसपास है।


जब हम दिए गए समय पर फिर से आए। हम अंदर गए, वहां मौजूद अधिकारियों ने हमें बताया कि हमारे पास केवल 15-20 मिनट हैं जिसमें हमें केवल खाद्य पदार्थों की खरीददारी करने की अनुमति थी। हम तीनों ने हमारे द्वारा बनाई गई सूची को विभाजित किया और 15 मिनट के भीतर हम सभी आवश्यक चीजें खरीदकर बाहर आ गए। इस तरह किराने का सामान खरीदने में हमारे लिए मजेदार था, वह इसलिए भी कि हमें लगा हमने कोरोना से जंग में एक बड़ा पड़ाव जीत लिया है। हम कामयाब हो रहे थे अपनी जीवटता के साथ। किराने का जरूरी सामने मिलने पर हम कुछ उत्साहित हो गए।


दिन बीतते गए और हम इस महामारी के दौरान नई जीवन शैली के आगे झुक गए। हम अपना सिर पानी के ऊपर रख रहे थे। फिर 10 मई को हमने आशा की एक किरण देखी। हमें अपने गृहनगर वापस जाने का मौका मिला। यह एक जोखिम भरा था, लेकिन हमने यह निर्णय लिया कि हम भोपाल पहुंचने वाले हैं।


कई दिन बीत गए। इस दौरान मोबाइल पर हमारी मम्मी-पापा से बात होती तो हम अच्छे बने रहने और कोई कमी नहीं होने का बहाना बना देते ताकि मम्मी-पापा हमारी वजह से दुःखी न हों। मामा जी का भी फोन आता तो कह देते सब ठीक हैं आप अपना ध्यान रखिए। लेकिन सच्चाई ये थी कि घर में सबसे बात करने के बाद हमारी आंखें नम हो जातीं। हमारे साथी हमारी लाल आंखें और रूंआसा चेहरा साफ देख सकते, जिसे हमने मम्मी-पापा से छिपा रखा था।


भाग.2: यात्रा


एक सप्ताह एक पखवाड़े में बदल गया और ऐसे ही एक-एक दिन कर महीना बीत गया। एक दिन हमें पता चला कि हमारा एक दोस्त पुणे छोड़कर अपने गृहनगर जा रहा है। एक प्रक्रिया थी जो हम जैसे लोगों को दूसरे राज्यों में फंसे अपने मूल स्थानों पर लौटने की अनुमति देगी। हमने बहुत सारी जानकारी इकट्ठा की, सभी पहलुआंे पर चर्चा की, सभी जोखिमों की गणना की कि भोपाल पहुंचने के बाद क्या होने वाला है। हमारे दिमाग में एक प्रमुख विचार यह था कि अधिकारी हमें अगले 14 दिनों के लिए क्वारेंटाइन केंद्र में रखेंगे, लेकिन उस संदेह को साफ कर दिया गया क्योंकि हमारे सामने पहुंचने वाले दोस्त को 14 दिनों के लिए खुद को अलग रखने के लिए घर पर रहने के लिए कहा गया था।


अगले दिन मैंने पुणे से भोपाल के लिए ई-पास के लिए आवेदन किया। मेरे पिता एक आॅटोमोबाइल कंपनी में काम करते हैं, उन्होंने ड्राइवर के साथ छह सीट वाली कार की व्यवस्था की जो हमें पुणे से बाहर निकालेगी। लेकिन इससे पहले कि हम यात्रा कर सकें, ई-पास को राज्य सरकारों द्वारा अनुमोदित किया जाना था। पास को मंजूरी मिलने के आसार बेअसर थे। हमें विभिन्न स्रोतों से पता चला कि सुरक्षित मार्ग प्राप्त करने में दो महीने तक का समय लग सकता है। हमने खुद को भाग्यशाली पाया, हमारे ई-पास को 4 दिनों के भीतर मंजूरी मिल गई। हमने अपने माता-पिता और ड्राइवर को सूचित किया। 18 मई को, चालक सुबह भोपाल से रवाना हुआ और उसी दिन सुबह 9 बजे हमारे घर पहुंचा। उसने हमारे साथ भोजन किया और कुछ घंटे आराम किया। हमने तय किया कि हम अगले दिन सुबह 3.30 बजे अपनी यात्रा शुरू करेंगे। चालक का आराम करना इसलिए आवश्यक था, क्योंकि रास्ता दुर्गम था और हमें धीरे-धीरे ही सजगता से अपने गंतव्य तक पहुंचना था। चालक को रास्ते में नींद न आए इसे लेकर हम पूरी तरह सतर्क रहे और हमने उसे भरपूर आराम करने दिया।


अगली सुबह 4 बजे, हमने यात्रा शुरू की। मैं आगे की सीट पर बैठा था। शहर सुनसान नजर आया। मैं इस समय लाॅकडाउन से पहले बाहर था, लेकिन ऐसा परिदृश्य कभी नहीं देखा गया। सड़कों पर एक भी व्यक्ति नहीं दिखाई दे रहा था। यदि भयावह अंदाज में बात करूं तो लग रहा था कोई आत्मा है ही नहीं, एक दम सुई पटक सन्नाटा तोड़ते हुए हम आगे बढ़ने लगे। हमारे मार्ग में सड़क की रुकावटें थीं, इसलिए हमें नासिक पहुँचने के लिए वैकल्पिक रास्ते आजमाने पड़े। हम पुणे में भटक गए जो लगभग एक घंटे तक एक भूत शहर की तरह महसूस हुआ। राष्ट्रीय राजमार्ग पर पहुंचने से पहले एक या दो मील की दूरी पर, हम एक चेक पोस्ट पर आए, कुछ पुलिस कर्मियों ने हमसे हमारे ठिकाने के बारे में पूछा और हमें क्लीन चिट प्रदान की। भोपाल पहुंचने का अनुमानित समय अगली सुबह 8 बजे के आसपास था।


यात्रा के अगले कुछ घंटों में, मैंने वह सब कुछ देखा जो मैंने केवल समाचारों में देखा-पढ़ा था। लोगों की भीड़, हजारों लोग, बसों, ट्रैक्टरों, ट्रकों और सभी प्रकार के लोडिंग वाहनों पर लदे चले जा रहे हैं, जिसे जो साधन मिला वह उस पर सवार हो गया। इसके अलावा लोग रिक्शा, साइकिल और यहां तक कि पैदल भी चले जा रहे हैं, शहर खाली हो रहा है, जो सपने जो अरमान लेकर ये लोग यहां तक आए थे वे सब छोड़कर निकल जाना चाहते हैं लोग....किसी को रूलाई आ रही है तो कोई बार-बार पलटकर अपनी कर्मभूमि की ओर देख रहा है जैसे सूनी पनीली आंखों से कह रहा हो, अलविदा पूना...सब ठीक रहा तो फिर मिलेंगे...। जो कदम हमसे बहुत आगे थे, वे अब पीछे छूटते जा रहे थे और हम आगे बढ़ते जा रहे थे। दूधमुंह शिशुओं को गोद में लिये, छोटे बच्चों को कंधे पर बिठाये लोग, हजारों कदम उनके साथ बुजुर्ग लोग कुछ सामान, पशु और पशुधन। मैंने भारत और पाकिस्तान के विभाजन के दौरान लोगों के बड़े पैमाने पर प्रवास के बारे में इतिहास में पढ़ा था, पर कोरोना के दौरान लोगों का पलायन देखा तो कलेजा मुंह को आने लगा, दिल भर आया, जैसे कोई कुछ कह भर दे तो फूट-फूट कर रो दूं। यहां वहां नजरें दौड़ाकर स्वयं को संभाला। कारण एक ओर ये भी था कि, अब मेरे जहन में 1947 के देश के बंटवारे के समय का भयावह मंजर वर्तमान परिदृश्य से मिलकर जीवंत जो हो रहा था।


पर लगता है मुझे अभी और भी हृदय विदारक घटना का सामना करना था, जिसके लिए मैं किसी भी प्रकार से तैयार नहीं था। आगे कुछ दूर सड़क पर कुछ भीड़ लगी थी। हालांकि लोग मास्क लगाये थे और दूर-दूर भी थे, परंतु सड़क लाल थी। शायद सड़क दुर्घटना हुई। जब सड़कों पर गाड़ियां ही नहीं चल रहीं या कम चल रही हैं तब सड़क दुर्घटना मन को झकझोरने के लिए काफी थी। मैं अंदर तक हिल गया। अपने हौसले से सड़कों को नाप रहे मजदूरों के खून सड़क भी लाल हो गई। मेरे अंदर बहुत देर तक उथल-पुथल मची रही। कई प्रश्नों की झड़ी लग गई। आखिर इस सबका जिम्मेदार कौन है? ये सड़क हादसे रूकते क्यों नहीं?


हम मदद को तत्पर थे, लेकिन बहुत देर से हम यहां पहुंचे, राहत और बचाव कार्य शुरू हो गए थे और हमें एक तरफ से आगे बढ़ा दिया गया। मैंने अपने सिर को थोड़ा झटके-से हिलाया। सड़क पर आने के बाद मुझे उस स्थिति के बारे में पुनर्विचार करना पड़ा, जिसमें मैं रह रहा था। मैंने खुद को शापित कर रखा था, क्योंकि घर में रहते हुए मुझे लगा कि मैं दुख में जी रहा हूं, हालांकि मेरे पास रहने के लिए एक उचित स्थान था, पर्याप्त भोजन और पानी, बिजली, और सबसे महत्वपूर्ण बात मैं मर नहीं रहा था। इन प्रवासी श्रमिकों को शहर छोड़ने के लिए मजबूर किया गया, ये हमारे समाज की हमारे देश की ही नहीं दुनिया कि एक मजबूत ताकत है, जो हमारी जरूरत के सामान को हम तक पहुंचाने में, बनाने में सहयोग करते हैं। एक बारगी लगा कि इन्हें अपने साथ कार में बिठाकर छोड़ दिया जाए, लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग और नियमों का पालन जरूरी था। इस समय बचना और बचाना दोनों जरूरी है।


कोई व्यक्ति अपने बच्चे के साथ पैदल चलकर 1500 किमी से अधिक की दूरी तय करता है। उस व्यक्ति को इस कठिन यात्रा के दौरान होने वाले परिणामों का भी एहसास नहीं हुआ। मुझे लगता है कि उनके दिमाग में केवल एक ही विचार चल रहा था, किसी तरह घर पहुंचना है, अपने गांव, अपने परिवार, परिचितों तक बस। अगर मैं अपने गृहनगर तक पैदल चलता, तो मैं शायद मर जाता। लेकिन अगर मैं वहाँ रहता, तो मैं निश्चित रूप से मर जाता।


सड़क पर जब हमने प्रवासी मजदूरों की विवशताए दुःख और तकलीफ देखी तो लगा हम घर में रहकर बेवजह छोटी.छोटी बातों पर विचलित हो रहे थे। ये प्रवासी मजदूर तो बड़ी.से.बड़ी मुश्किल में भी कैसे शांतए बगैर शिकायत या बिना किसी बैचेनी के बढ़े चले जा रहे हैं और हम घर में जरा.जरा सी बात पर झंुझला रहे थे। मन में प्रश्न उभरा क्या पढ़े.लिखे लोग या कुछ सुविधा संपन्न लोग जल्दी घबरा जाते हैंए या परेशान हो उठते हैंघ् शायदण्ण्ण्! ये शोध का विषय हो सकता है। फिलहाल मेरा मस्तिष्क तो इसका उत्तर हांॅ में ही दे रहा है।


इस तरह की कठिनाइयों के समय में, मैंने देखा कि लोग एक-दूसरे की मदद कर रहे थे। राजमार्ग पर ढाबा मालिकों ने भोजन और विश्राम का प्रबंध पूरे सेवा भाव से प्रदान किया, लोगों को हाइड्रेटेड रखने के लिए प्रत्येक 5 से 6 किमी की दूरी पर जल वितरण की व्यवस्था की गई थी। इनमें से अधिकांश सेवाएँ मुफ्त थीं। इस महामारी ने लोगों को एक स्पष्ट सबक सिखाया, एक सबक जो हम में से अधिकांश सीखने में विफल रहते हैं, कि किसी भी राशि के मुकाबले एक जीवन अधिक महत्वपूर्ण है।


दोपहर के समय जब धूप से पसीना छूटने लगा और हमने लगातार 6-7 घंटे सीधे यात्रा कर ली। तो हमने पहले से तय किये गए कार्यक्रम के अनुसार कहीं कुछ देर रूकने की सोची। हम एक पेड़ की छाँव के नीचे थोड़ा रुक गए। हमने यह भी तय किया था कि बाहर से खाना खरीदना जोखिम भरा हो सकता है, इसलिए हमने क्लासिक इंडियन ट्रैवल फूड, पूड़ी विथ एलो तैयार की। हम चारों ने अपना दोपहर का भोजन पूरा किया, खुद को बढ़ाया और अपनी यात्रा के अगले 8 घंटों के लिए स्वयं को तैयार किया। हमने एक दूसरे को फिर यही कहा कि हमें साहस के साथ-साथ अपने मन को अच्छा रखना होगा और हम इसमें कहीं हद तक सफल भी रहे।


भाग 3ः अंतिम घंटे


900 किमी से अधिक और 17 घंटे की यात्रा के बाद हम भोपाल के बाहर एक औद्योगिक शहर, मंडीदीप आ पहुँचे। उत्साह और खुशी की बढ़ी हुई मात्रा हमारे चेहरों पर साफ देखी जा सकती थी। मैं 5 महीने के बाद अपने घर, मेरी जिम्मेदारी उठाने वाले पापा और मुझे हर समय हिम्मत देने वाली मम्मी से मिलने को बढ़ रहा था, जिसमें विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण स्थितियों के 2 महीने शामिल थे। मैंने अपनी मां को सूचित किया कि 40 मिनट में उनका इकलौता बेटा घर का बना खाना खाएगा। लाॅकडाउन के दौरान और यात्रा के दौरान हमारे सामने आने वाली सभी कठिनाइयों का अंत इस यात्रा के साथ ही समाप्त हो जाएगा। लेकिन, इसके बाद जो हुआ वह भयावह अनुभव का एक नया स्तर था।


भोपाल में प्रवेश करते समय हमें एक चेक पोस्ट पर रोका गया। पुलिसकर्मियों ने ई-पास और भोपाल आने का उद्देश्य पूछा। जैसे ही उन्हें पता चला कि हम पुणे (एक रिजेक्टेड एरिया) से आ रहे हैं, उसने हमें कार को साइड में खड़ी करने के लिए कहा। उन्होंने हमें सूचित किया कि हमें एक क्वारेंटाइन सेंटर पर ले जाया जाएगा जो 16 किमी दूर था। हम चेक अप की एक श्रृंखला के माध्यम से जा रहे हैं और कोविड-19 से संबंधित कोई लक्षण नहीं होने पर ही घर जाने की अनुमति दी जाएगी। मेरे मन में पहले से ही यह भयावह संदेह था, कि क्या होगा अगर हमें अपने अगले 14 दिन एक संगरोध केंद्र यानी क्वारेंटाइन में बिताने पड़ें। कुछ पल को लगा हाय ये क्या हुआ न इधर के रहे न उधर के। आसमान से गिरे और खजूर में अटके वाली बात चरितार्थ होने लगी।


चेकिंग के दौरान हमारा एकमात्र वाहन भी मुश्किल में आ गया। अधिकारी ने बताया कि हमें तीन और वाहनों के इकट्ठा होने तक इंतजार करना होगा। जब तक हमने अस्पताल की ओर चलना शुरू किया तब तक लगभग एक घंटा लग गया। हमें डायल 100 वाहन (पीसीआर) का पालन करना था जो हमें संगरोध केंद्र तक ले जाएगा। पीसीआर वैन एक सुस्ती की गति से आगे बढ़ रही थी। हमें एक गंतव्य तक पहुंचने में एक और लंबा समय लगा जो कहने को केवल 16 किमी दूर था, लेकिन वह 16 दिन से भी अधिक ज्यादा लग रहे थे। हम बता नहीं सकते।


हम केंद्र पर पहुंच गए और कांच के काउंटर के सामने 1 मीटर के अलावा खींची गई मंडलियों में खड़े होने के लिए कहा गया। वहां उन्होंने हमारे तापमान की जाँच की, पूछा कि क्या हम कोई दवा तो नहीं ले रहे हैं, हमसे इस बारे में पूछा कि हमारे घर में कितने कमरे हैं और परिवार में कितने लोग घर में रहते हैं। एकत्रित की गई सभी सूचनाओं के आधार पर, डाॅक्टरों ने हमें क्लीन चिट दे दी। हालांकि उन्होंने हमें अगले 14 दिनों के लिए अलग-थलग रहने के लिए एक कमरे में रहने का आदेश दिया।


हमने राहत की साँस ली और हम जल्दी से गाड़ी में चढ़े और अपने घर को एन-रूट करना शुरू किया। मेरे पहले मेरे दो दोस्त बाहर कर दिए गए थे। उनके माता-पिता उन्हें लेने के लिए अपने घरों से बाहर आए। मैं उनकी मुस्कुराहट से बता सकता हूं कि हमें जितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, उन्होंने सिर्फ हमारे बारे में चिंता करके उन्हें भी झेला। अंत में मेरी बारी थी। मैं घर पहुँचा और मैंने अपनी माँ को अपनी आँखों में आँसू और पिता को संतुष्टि की अभिव्यक्ति के साथ देखा। उनके चेहरों को देखते हुए मुझे पिछले 2 महीनों से उन सभी आतंक को भुला दिया गया है जिनका मैं सामना कर रहा हूं। अंत में, मैं घर में था।


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सौभाग्य श्रीवास्तव


(पूणे से भोपाल)


 


 


 


 


किरदार ऐसा कि दुश्मन भी तारीफ करने मजबूर हो गए # रानी लक्ष्मीबाई


किरदार ऐसा कि दुश्मन भी तारीफ करने मजबूर हो गए # रानी लक्ष्मीबाई















 

































किरदार ऐसा कि दुश्मन भी तारीफ करने मजबूर हो गए # रानी लक्ष्मीबाई

आसान नहीं होता एक महिला होने के बावजूद पुरूष प्रधान समाज में विद्रोही बनकर अमर हो जाना। आसान नहीं होता एक महिला के लिए एक साम्राज्य के खिलाफ खड़ा हो जाना।

आज हम जिस रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस पर उन्हें श्रद्धा पुष्प अर्पित कर रहे हैं वो उस वीरता शौर्य साहस और पराक्रम का नाम है जिसने अपने छोटे से जीवन काल में वो मुकाम हासिल किया जिसकी मिसाल आज भी दुर्लभ है। ऐसे तो बहुत लोग होते हैं जिनके जीवन को या फिर जिनकी उपलब्धियों को उनके जीवन काल के बाद सम्मान मिलता है लेकिन अपने जीवन काल में ही अपने चाहने वाले ही नहीं बल्कि अपने विरोधियों के दिल में भी एक सम्मानित जगह बनाने वाली विभूतियां बहुत कम होती हैं। रानी लक्ष्मीबाई ऐसी ही एक शख्सियत थीं जिन्होंने ना सिर्फ अपने जीवन काल में लोगों को प्रेरित किया बल्कि आज तक वो हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत हैं। एक महिला जो मात्र 25 वर्ष की आयु में अपने पति और पुत्र को खोने के बाद भी अंग्रेजों को युद्ध के लिए ललकारने का जज्बा रखती हो वो निसंदेह हर मानव के लिए प्रेरणास्रोत रहेगी। वो भी उस समय जब 1857 की क्रांति से घायल अंग्रेजों ने भारतीयों पर और अधिक अत्याचार करने शुरू कर दिए थे और बड़े से बड़े राजा भी अंग्रेजों के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। ऐसे समय में एक महिला की दहाड़ ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। क्योंकि रानी लक्ष्मीबाई की इस दहाड़ की गूंज झांसी तक सीमित नहीं रही, वो पूरे देश में ना सिर्फ सुनाई दी बल्कि उस दहाड़ ने देश के बच्चे बच्चे को हिम्मत से भर दिया। जिसके परिणाम स्वरूप धीरे धीरे देश भर के अलग अलग हिस्सों में होने वाले विद्रोह सामने आने लगे। दरअसल झाँसी के लिए, अपनी भूमि की स्वतंत्रता के लिए, अपनी प्रजा को अत्याचारों से मुक्त कराने के लिए रानी लक्ष्मीबाई के  दिल में जो आग  धधक रही थी वो 1858 में उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे कर पूरे भारत में फैला दी। उन्होंने अपनी स्वयं की आहुति से उस यज्ञ अग्नि को प्रज्वलित कर दिया था जिसकी पूर्ण आहुति 15 अगस्त1947 को डली। हालांकि 18 जून 1858 को रानी लक्ष्मीबाई अकेले होने के कारण अपनी झाँसी नहीं बचा पाईं लेकिन देश को बचाने की बुनियाद खडी कर गईं एक मार्ग दिखा गईं। निडरता का पाठ पढ़ा गईं, अमरत्व की राह दिखा गईं। उनके साहस और पराक्रम का अंदाजा जनरल ह्यूरोज के इस कथन से लगाया जा सकता है कि अगर भारत की एक फीसदी महिलाएं इस लड़की की तरह आज़ादी की दीवानी हो गईं तो हम सब को यह देश छोड़कर भागना पड़ेगा। कल्पना कीजिए एक महिला की जिसकी पीठ पर नन्हा बालक हो उसके मुँह में घोड़े की लगाम हो और उसके दोनों हाथों में तलवार!!  शायद हाँ हमारे लिए यह कल्पना करना इतना मुश्किल भी नहीं है क्योंकि हमने उनकी मूर्तियाँ देखीं  हैं उनकी ऐसी तस्वीरें देखी हैं लेकिन ये औरत कोई मूर्ति नही है, कोई तस्वीर नहीं है किसी वीर रस के कवि की कल्पना भी नहीं है, यह हकीकत है। शायद इसलिए वो आज भी जिंदा है और हमेशा रहेगी  हाँ वो अमर है और सदियों तक रहेगी। जानते हैं क्यों? क्योंकि वो केवल इस देश के लोगों के दिलों में ही जिंदा नहीं है, वो आज भी जिंदा है अपने दुश्मनों के दिल में अपने विरोधियों के दिलों में उन अंग्रेजों के दिलोदिमाग में जिनसे उन्होंने लोहा लिया था। हाँ यह सच है कि अंग्रेज रानी लक्ष्मीबाई से  जीत गए थे लेकिन वो जानते थे कि  वो इस लड़ाई को जीत कर भी हार गए थे। वो एक महिला के उस पराक्रम से हार गए थे जो एक ऐसे युद्ध का नेतृत्व निडरता से कर रही थी जिसका परिणाम वो जानती थी। वो एक महिला के उस जज्बे से हार गए थे जो अपने दूध पीते बच्चे को कंधे पर लादकर रणभूमि का बिगुल बजाने का साहस रखती थी। शायद इसलिए वो उनका सम्मान भी करते थे। उस दौर के कई ब्रिटिश अफसर बेहिचक स्वीकार करते थे कि महारानी लक्ष्मीबाई बहादुरी बुद्धि  दृढ़ निश्चयऔर प्रशासनिक क्षमता का दुर्लभ मेल हैं और उन्हें अपना सबसे खतरनाक शत्रु मानते थे। जिस शख्शियत की तारीफ करने के लिए शत्रु भी मजबूर हो जाए तो किरदार का अंदाज़ा खुद ब खुद लगाया जा सकता है। 

आज जब 21 वीं सदी में हम 19 वीं सदी की एक महिला की बात कर रहे हैं उन्हें याद कर रहे हैं उनके बलिदान दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं तो मेरा मानना है कि यह सिर्फ एक रस्म अदायगी नहीं होनी चाहिए। केवल एक कार्यक्रम नहीं होना चाहिए बल्कि एक अवसर होना चाहिए। ऐसा अवसर जिससे हम कुछ सीख सकें। तो कुछ बातें जिनकी प्रेरणा हम रानी लक्ष्मीबाई के जीवन से ले सकते हैं-

1. हर कीमत पर आत्मसम्मान स्वाभिमान की रक्षा। जब आपके पास दो विकल्प हो आत्मसमपर्ण या लड़ाई सरल शब्दों में कहें तो जीवन या स्वाभिमान में से चुनना तो उन्होंने स्वाभिमान को चुना।

2.” आत्मविश्वास” अंग्रेजों के मुकाबले संसाधनों और सैनिकों की कमी ने उनके हौसले को डिगाने के बजाए और मजबूत कर दिया और वो दहाड़ पाईं कि जीते जी अपनी झाँसी नहीं दूंगी 

3. “लक्ष्य के प्रति दृढ़” अपनी झाँसी को बचाना ही उनका लक्ष्य था जिसके वो अपनी जान देकर अमर हो गईं।

4. “अपने अधिकारों के लिए लड़ना” मात्र 25 वर्ष की आयु में अपने राज्य की रक्षा के लिए ब्रिटिश साम्राज्य से विद्रोह हमें सिखाता है कि अपने अधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाया जा सकता है।

5.”अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना” उन्होंने अंग्रेजों के अन्याय के खिलाफ आवाज उठाकर न्याय के लिए लड़कर  गीता का ज्ञान चरितार्थ करकर दिखाया।

6. और अंत में जो सबसे महत्वपूर्ण और व्यवहारिक शिक्षा जो उनके जीवन से हमें मिलती है वो ये कि, शस्त्र और शास्त्र विद्या, तार्किक बुद्धि, युद्ध कौशल, और ज्ञान किसी औपचारिक शिक्षा की मोहताज नहीं है। रानी लक्ष्मीबाई ने कोई औपचारिक शिक्षा ग्रहण नहीं की थी लेकिन उनकी युद्ध क्षमता ने ब्रिटिश साम्राज्य को भी अचंभे में डाल दिया था।

शायद इसलिए वो आज भी हमारे बीच जीवित हैं फिल्मों में टीवी सीरियल में किस्सों में कहानियों में लोक गीतों में कविताओं में उनके नाम पर यूनिवर्सिटी का नामकरण करके उनके पुतले बनाकर। लेकिन इतना काफी नहीं है प्रयास कीजिए उनका थोड़ा सा अंश हमारे भीतर भी जीवित हो उठे।

डॉ नीलम महेंद्र

(लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार है)




























हिन्दी : भारतीय अस्मिता की पहचान

हिन्दी : भारतीय अस्मिता की पहचान


किसी भी देश के निवासियों में राष्ट्रीय एकता की भावना के विकास और पारस्परिक सम्पर्क को बनाये रखने के लिए एक ऐसी भाषा की आवश्यकता होती है, जिसका व्यवहार राष्ट्रीय स्तर पर किया जा सकेl भारतीय जनमानस को जोड़कर रखने के लिए सम्पर्क भाषा के रूप में देश को जिस  भाषा की आवश्यकता है, वह गुण हिन्दी में विद्यमान हैl इसलिए कि हिन्दी किसी क्षेत्र, जाति-धर्म एवं सम्प्रदाय की भाषा न होकर भारतीय संरचना में व्याप्त राष्ट्रीय एकता की अद्भुत कड़ी के रूप में जानी जाती हैl


सौभाग्य की बात है कि हिन्दी के लिए देवनागरी लिपि के रूप में एक वैज्ञानिक एवं ध्वनि प्रधान लिपि मिली है, जिसका उद्भव ब्राह्मी लिपि से हुआ है, जिससे भारत की प्रायः सभी भाषाओं की लिपियाँ विकसित हुई हैंl प्राचीन भारत में ब्राह्मी और खरोष्ठी नामक दो लिपियाँ प्रचलित थींl ब्राह्मी लिपि बाईं ओर से दाहिनी ओर तथा खरोष्ठी (गधे के होंठवाली) लिपि फ़ारसी लिपि की तरह दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती थीl


जिस प्रकार संस्कृत ने आस्ट्रिक, द्रविड़, ग्रीक, लैटिन, चीनी, तुर्की, अरबी आदि  भाषाओं के अनेक शब्द आत्मसात कर अपने शब्द भण्डार को समृद्ध किया हैl उसी प्रकार हिन्दी ने भी अरबी, फारसी और अंग्रेजी से शब्द ग्रहणकर अपनी शब्द सम्पदा को बढ़ाया हैl क्योंकि कोई भी जीवंत भाषा अन्य भाषाओं के शब्द ग्रहणकर अपने शब्द भण्डार को समृद्ध करती हैl हिन्दी, हिन्दीभाषी प्रदेशों की 24 भाषाओं एवं अनेक बोलियों से मिलकर बनी हैl बोलियों के विकास एवं परिमार्जन से ही भाषा समृद्ध होती हैl


भाषा सामाजिकता एवं समस्त ज्ञान-विज्ञानं का आधार होती हैl भारत बहुभाषी देश हैl इसकी प्रादेशिक भाषाएँ हर दृष्टि से समर्थ हैंl हिन्दी समस्त भारतीय भाषाओं को जोड़ने में संयोजक की भूमिका निभा रही हैl बोलियाँ उसकी ताकत हैंl कहा भी गया है कि किसी भी जीवंत भाषा के प्राण उसकी बोलियों में ही बसते हैंl हिन्दी की बोलियों में रचा बसा साहित्य हिन्दी के लिए अजस्र स्रोत की भाँति हैl हिन्दी के आँचल में 18 बोलियाँ (खड़ी बोली, ब्रजभाषा, बांगरू, बुन्देली, कन्नौजी, अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी, मैथिली, मगही, भोजपुरी, सेवाती, मालवी, अहीरवाटी, जयपुरी-हड़ौती, मेवाड़ी, मारवाड़ी, पहाड़ी (पश्चिमी,मध्य एवं पूर्वी) पली-बढ़ी एवं विकसित हुई हैंl


हिन्दी एक जीवंत भाषा हैl हम हिन्दी का एक शब्द बोलते हैं तो उस शब्द की प्रकृति एवं संस्कृति का समन्वयात्मक रूप मन की आँखों के सामने साकार हो उठता हैl वह शब्द अकेला नहीं अपितु अपनी अर्थ संस्कृति के समस्त अलंकरणों के साथ उपस्थित होता हैl ‘गाँव’ शब्द को ही लीजिएl इसका अर्थ केवल उस जगह से तो नहीं है, जहाँ के अधिकांश लोग अशिक्षित और अभाव से भरा जीवन जी रहे होते हैंl बल्कि गाँव जीवन की ज़रूरतों के लिए ईमानदारी के साथ संघर्ष करने के ज़ज्बे का नाम भी हैl घर-आँगन, खेत-खलिहान एवं घर के आसपास स्थित पेड़ की शाखाओं पर घोसले बनाकर रहनेवाले पक्षियों के कलरव ‘गाँव’ शब्द के अर्थ की ही अभिव्यक्तियाँ हैंl        


भारत की तरह चीन भी बहुभाषी देश है, परन्तु उसने राष्ट्रीय भाषा का दर्जा अपने देश की सर्वमान्य भाषा मंदारिन (चीनी) को दी हैl चीन में पढ़ाई-लिखाई का माध्यम भी यही भाषा है, जबकि चीनी चित्रलिपि से विकसित विश्व की सबसे कठिन लिपियों में एक हैl एक लाख करोड़ रुपए की लागतवाली जापान की बुलेट ट्रेन की तकनीक जापानी भाषा के द्वारा ही खोजी गई हैl 12 करोड़ की आबादीवाले जापान में 13 नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक हैंl रूस, चीन, जापान, अमेरिका, जर्मनी, फ़्रांस और इजराइल जैसे दुनिया के सभी विकसित देश ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा अपनी भाषा में ही  देते हैंl   


भारत को अंग्रेजों से आजाद हुए 72 वर्ष से अधिक हो चुके हैं, किन्तु देश की सर्वमान्य भाषा हिन्दी को राष्ट्रभाषा का सम्मान अब तक नहीं प्राप्त हो सका हैl अंग्रेजी मानसिकता से ग्रस्त एवं पाश्चात्य जीवन शैली से प्रभावित कुछ लोग हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की सामर्थ्य पर सवाल उठाते रहते हैं, जबकि हमने अपनी  भाषा में शिक्षा प्राप्त कर विश्व को बुद्ध और महावीर दिएl चरक जैसे शरीर वैज्ञानिक और शुश्रुत जैसे शल्य चिकित्सक दिएl पाणिनि जैसा वैयाकरण, आर्यभट्ट जैसा खगोलविद,पातंजलि जैसा योग गुरु और कौटिल्य जैसा अर्थशास्त्री दिएl तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय भारतवर्ष में ही थे, जहाँ संसार के अन्य देशों के विद्यार्थी ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा ग्रहण करने आया करते थेl


भारतीय संविधान ने हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप में मान्यता प्रदान करते हुए उसके विकास सम्बन्धी अनुच्छेद 351 में कहा है, “संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिन्दी का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्त्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी के और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहाँ आवश्यक और वांछनीय हो, वहाँ उसके शब्द भण्डार के लिए मुख्यतः संस्कृत और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करेl”


परन्तु अंग्रेजी, अंग्रेजों के शासन काल से अब तक देश के शासन की भाषा के रूप में भारतीय जनमानस पर अपना वर्चस्व बनाए हुए है, जबकि जनता के बोलचाल एवं व्यवहार की भाषाएँ भारतीय हैंl उच्च न्यायालय से लेकर उच्चतम न्यायालय की बहसें आज भी अंग्रेजी में होती हैंl फ़ैसले भी अंग्रेजी में ही लिए जाते हैंl एक ऐसा देश जहाँ की बहुसंख्य जनता को न्यायालय के निर्णय को जानने -समझने के लिए वकीलों की शरण में जाना पड़ता है, जिसके लिए उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ती हैl 


राजनीतिक लाभ के लिए भाषा को लेकर भड़काऊ बातें करना तमिलनाडु के नेताओं की प्रकृति रही हैl इस अहिन्दीभाषी प्रदेश में पहले से हिन्दी विरोधी आवाज़ें उठती रही हैंl विरोध करनेवालों में प्रदेश के मुख्यमंत्री भक्त वत्सलम और करुणानिधि भी रहे हैंl 26 जनवरी, सन् 1965 को तत्कालीन मुख्यमंत्री भक्त वत्सलम ने हिन्दी विरोध में शोक दिवस मनाया थाl हिन्दी विरोध के नाम पर यहाँ संविधान की प्रतियाँ भी जलाई गई थींl आगे चलकर एक समय ऐसा भी आया जब सन् 1996 में तत्कालीन मुख्यमंत्री करुणानिधि ने विधानसभा के कामकाज से अंग्रेजी हटाने की घोषणा कर दी, जिसका देश भर में ज़ोरदार स्वागत हुआ थाl बताते चलें कि तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोपालाचार्य ने सन् 1936 में तमिलनाडु में हिन्दी पढ़ना अनिवार्य कर दिया थाl


 इन दिनों भारत में पाश्चात्य शिक्षा पद्धति पर आधारित अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों की बाढ़-सी आ गई हैl इन विद्यालयों की भूमिका के प्रति गहरा आक्रोश प्रकट करते हुए साहित्यकार निर्मल वर्मा जी ने कहा है,“ क्या हम अंग्रेजी भाषा और पश्चिमी शिक्षा पद्धति में ढले विद्यालयों को भंग करने का साहस रखते हैं ताकि अपनी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मनीषा के अनुरूप भारत की युवा पीढ़ी को नये सिरे से दीक्षित किया जा सके?” वर्मा जी ने राजनेताओं के द्वारा जाति और धर्म के नाम पर की जा रही सौदेबाजी से बचने के लिए जनता को सावधान भी किया हैl उन्होंने धर्म को आस्था के स्तर पर भारतीयता की अवधारणा से जोड़ने की अपील की है, ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा हो सकेl गुलामी के दिनों का स्मरण करते हुए वर्मा जी कहते हैं-,“ गुलामी में जीते हुए भी हमारे भीतर वे सभी शक्तियाँ विद्यमान थीं, जो हमें अतीत के प्रति आदर और भविष्य के प्रति आस्था से भर सकेंl’’


अंग्रेजों से स्वतंत्रता के बाद प्राथमिक शिक्षा को लेकर राधाकृष्णन आयोग, मुदालियर आयोग, कोठारी आयोग एवं अन्य राष्ट्रीय तथा सांस्कृतिक महत्त्व की संस्थाओं ने सर्वसम्मति से यह सिफारिश की थी कि बच्चों को प्राथमिक शिक्षा उनकी मातृभाषा में ही दी जानी चाहिएl मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि बच्चे अपनी मातृभाषा के माध्यम से जो भी सीखते हैं, उनके मन-मस्तिष्क पर उसका गहरा प्रभाव पड़ता हैl शोध से यह ज्ञात हुआ है कि किसी विद्यार्थी को विदेशी भाषा के माध्यम से पढ़ाए जाने पर विषय को समझने के बजाय रटकर याद करना पड़ता हैl  मौलिक चिंतन तभी सम्भव है जब शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होl


 इंडियन एक्सप्रेस के अक्टूबर, सन् 2017 के अंक में छपी ख़बर के अनुसार भारत सरकार ने दिल्ली कार्पोरेशन के अन्तर्गत आनेवाले सभी 1700 से अधिक विद्यालयों को अंग्रेजी माध्यम से चलाने का निर्णय लिया हैl इसी तरह का अलोकतांत्रिक निर्णय उत्तराखण्ड की सरकार ने अपने यहाँ के 18000 से भी अधिक विद्यालयों को अंग्रेजी माध्यम का बनाने की घोषणा करके लिया हैl इन दिनों उत्तर प्रदेश सरकार भी प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों के अंग्रेजीकरण में लगी हैl सरकारों के ऐसे फ़ैसले संविधान की मूल भावना के विरूद्ध तो हैं ही, देश के 80 प्रतिशत प्रतिभावान विद्यार्थियों के मौलिक अधिकारों को छीनने जैसे हैंl देश के मुट्ठीभर लोग सत्ता पर अपना आधिपत्य बनाए रखने के लिए अंग्रेजी को हथियार के रूप में इस्तेमाल करते आ रहे हैंl  हमें जब तक भारतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षा नहीं दी जाएगी, तब तक गाँवों की दबी प्रतिभाओं के उभरने और विकास की मुख्य धारा में आने का अवसर उपलब्ध ही नहीं हो सकेगाl        


आज़ादी के 72 वर्षों के बाद भी सरकारी कार्यालयों में हिन्दी में कार्य करने की संस्कृति का अपेक्षित विकास नहीं हो सका हैl स्थिति यह है कि अंग्रेजी आज भी जन-सामान्य के मन-मस्तिष्क पर बोझ के रूप में विराजमान हैl महात्मा गाँधी ने अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को हमारी बौद्धिक चेतना के विकास में बाधक बताया थाl उन्होंने हिन्दू स्वराज में लिखा था, “अंग्रेजी शिक्षा से द्वेष और अत्याचार बढ़े हैंl अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त लोगों ने जनता को ठगने और परेशान करने में कोई कसर नहीं रखी हैl भारत को गुलाम बनानेवाले तो हम अंग्रेजी जाननेवाले लोग ही हैंl” 5 फ़रवरी, सन् 1916 को नागरी प्रचारिणी सभा में भाषण देते हुए गाँधीजी ने अपने 36 समर्थकों के साथ जीवनपर्यंत हिन्दी के व्यवहार की शपथ ली थीl उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन और हिन्दी के प्रचार–प्रसार को एक-दूसरे का पूरक बना दिया थाl


गाँधीजी ने 27 दिसम्बर, सन् 1917 को कोलकाता में भाषा को जीवन से जोड़ने और जनता के निकटस्थ रहनेवाली चीज बताते हुए कहा था, “यदि हम अंग्रेजी के आदी नहीं हो गये होते तो यह समझने में देर नहीं लगती कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होने से हमारी बौद्धिक चेतना जीवन से कटकर दूर हो गई हैl” गाँधीजी ने युवकों को हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी और दुनिया की दूसरी भाषाएँ भी सीखने की सलाह दी थीl एक जगह उन्होंने कहा था, “मेरा नम्र लेकिन दृढ़ अभिप्राय है कि जब तक हम भाषा को राष्ट्रीय और अपनी प्रान्तीय भाषाओं को उनका योग्य स्थान नहीं देंगे, तब तक स्वराज की सब बातें निरर्थक हैंl प्रत्येक प्रान्त में उसी प्रान्त की भाषा तथा सारे देश के पारस्परिक व्यवहार के लिए हिन्दी और अन्तर्राष्ट्रीय उपयोग के लिए अंग्रेजी का व्यवहार होना चाहिएl’’


गाँधीजी ने देश के आम आदमी की समझ में आनेवाली भाषा को अपनाने पर बल दिया और आम आदमी की समझ में आनेवाली उस भाषा को उन्होंने ‘हिन्दुस्तानी’ नाम से संबोधित कियाl  इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए उन्होंने हिन्दीतर प्रदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार का संकल्प लिया और सन् 1918 में उन्होंने अपने 18 वर्षीय पुत्र देवदास गाँधी और स्वामी सत्यदेव को हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए मद्रास भेज दियाl हिन्दी के प्रचार के लिए एक कमेटी भी गठित की गयी थी, जिसके सभापति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद जी थेl गाँधीजी ने सन् 1930 में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए वर्धा में ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ की स्थापना की थीl उन्होंने भाषा के सवाल को बड़ी ही गंभीरता से लिया थाl भाषा को लेकर हिन्दीभाषी प्रदेश के निवासियों की उदासीनता पर उन्होंने  क्षुब्ध होकर कहा था,“ मुझे खेद है कि जिन प्रान्तों की मातृभाषा हिन्दी है, वहाँ पर भी उस भाषा की उन्नति करने का उत्साह नहीं दिखलाई देता हैl”


राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन मानसिक एवं सांस्कृतिक स्वतंत्रता को स्वाधीनता से अधिक महत्त्वपूर्ण मानते थेl यह भी मानते थे कि मनुष्य की मानसिक वृत्तियों का विकास मातृभाषा के द्वारा ही सम्भव हैl टंडन जी चाहते थे कि विधायिका और कार्यपालिका ही नहीं, अपितु समस्त विश्वविद्यालय एवं देश की न्यायपालिका के कामकाज भी हिन्दी में होंl हिन्दी-हिन्दुस्तानी एकता के पक्षधर जमनालाल बजाज ने मद्रास हिन्दी साहित्य सम्मलेन के अध्यक्ष पद से बोलते हुए कहा था, “हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हिन्दी ईमान की भाषा है, प्रेम की भाषा है, राष्ट्रीय एकता की भाषा है और आज़ादी की भाषा हैl” हिन्दी और उर्दू भाषा की एकता के सम्बन्ध में उन्होंने कहा था, “हमें इस देश की भिन्न-भिन्न संस्कृतियों को एक करना है तो उसके लिए हिन्दी और उर्दू का ऐक्य होना चाहिएl इसलिए एक राष्ट्रभाषा का होना ज़रूरी हैl” पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर ए. पी. जे.अब्दुल कलाम ने देश की एकता के लिए हिन्दी की आवश्यकता को इन शब्दों में प्रकट किया है, “मेरी राय है कि सभी राज्यों में बारहवीं कक्षा तक हिन्दी बोलना अनिवार्य कर दिया जाए, ताकि सारे लोग हिन्दी पढ़ना-लिखना सीख सकेंl”


राष्ट्रीय एकता के लिए डॉ राममनोहर लोहिया का हिन्दी को अपनाने पर विशेष बल थाl लोहियाजी कहा करते थे, “हम समझते हैं कि अंग्रेजी के होते यहाँ ईमानदारी का आना असम्भव हैl’’ समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने अंग्रेजी का खुलकर विरोध करते हुए राजनेताओ से अपील की थी कि जिस भाषा में वोट माँगते हो, उसी भाषा में प्रशासनिक काम-काज भी करोl कवि ‘अज्ञेय’ ने बड़े दुःख के साथ कहा था,- “जब हम राजनीतिक दृष्टि से पराधीन थे तब तो हमारे पास स्वाधीन भाषा थीl अब जब हम स्वाधीन हो गये तो हमारी भाषा पराधीन हो गईl” राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जो सरकार जनता से उसकी भाषा में संवाद नहीं करती, वह सरकार अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन में अक्षम मानी जाती हैl  


आपको ज्ञात होगा कि संविधान लागू होने के मात्र 15 वर्षों तक देश का कामकाज अंग्रेजी में किए जाने का प्रावधान थाl उसके बाद हिन्दी को राजभाषा के रूप में पूरे देश में लागू होना था, पर तमिलनाडु के हिन्दी विरोधियों के उग्र एवं अराजक रवैये के आगे झुककर सरकार ने सन् 1963 में ही राजभाषा विधेयक पारित कर दिया, जिससे सन् 1965 के बाद भी देश में अंग्रेजी का वर्चस्व बना ही रह गयाl


संवैधानिक दृष्टि से हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा है किन्तु अंग्रेजी के वर्चस्व ने उसे उसके ही घर में परमुखापेक्षी बना दिया हैl केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दो राजभाषा अधिनियम बनाये थेl अधिनियम की धारा 3/1 के अधीन हिन्दी के साथ अंग्रेजी को सहभाषा के रूप में अपनाने का निश्चय किया गया था l इसके चलते यह स्थिति बन गई कि पहले हिन्दी के साथ अंग्रेजी को जारी रखने की अवधि 15 वर्ष निश्चित की गई, किन्तु सहभाषा के रूप में इसके प्रयोग की अवधि अनिश्चितकालीन कर अंग्रेजी को अनंत काल तक बने रहने की खुली छूट दे दी गईl राजभाषा अधिनियम की धारा 3/2 के अन्तर्गत यह शर्त रख दी गई कि जब तक भारत के किसी एक भी राज्य की सरकार हिन्दी को अपनी राजभाषा के रूप में अपनाने से इनकार कर देती है, तब तक हिन्दी संघ की राजभाषा का दर्जा नहीं प्राप्त कर सकतीl राजभाषा अधिनियम 1963 के अनुसार केन्द्रीय सरकार का कामकाज अंग्रेजी में किया जा सकता हैl राजभाषा नियम 1976 बनने से ‘क’ क्षेत्र के केन्द्रीय कार्यालयों में कामकाज केवल हिन्दी में, ‘ख’ क्षेत्र में हिन्दी और अंग्रेजी में तथा ‘ग’ क्षेत्र के राज्यों की सरकारों को पत्रादि अंग्रेजी में लिखने का प्रावधान हैl


संविधान लागू होने के समय अष्टम अनुसूची में हिन्दी, संस्कृत, गुजराती, मराठी, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, बंगाली, उड़िया, मलयालम, पंजाबी, असमिया, उर्दू एवं कश्मीरी सहित कुल 14 भाषाएँ थीं। सन् 1967 में सिंधी, सन् 1992 में कोंकणी, मणिपुरी एवं  नेपाली सहित 18 हो गईं। सन् 2004 में मैथिली, बोडो, संथाली व डोगरी के सम्मिलित हो जाने से अष्टम अनुसूची में अब कुल 22 भाषाएँ हो गई हैं। राजनीतिक स्वार्थसिद्धि के लिए देश के कुछ राजनेता हिन्दी की बोलियों को संविधान की अष्टम अनुसूची में जगह दिलाने की कोशिश में लगे हैंl जबकि हिन्दी की किसी भी बोली को संविधान की अष्टम अनुसूची में सम्मिलित करवाने की कोशिश या हिन्दी को बचाने के लिए देवनागरी लिपि के बजाय उसे रोमन लिपि में लिखने की क़वायद अनुचित, अव्यावहारिक एवं हिन्दी को ही कमजोर करने जैसी हैl भाषा और बोली के बीच के भेद को शब्दावली से नहीं, बल्कि लिपि के आधार पर समझा जा सकता हैl हिन्दी भाषा की इन बोलियों की लिपि भी देवनागरी है और बोलियों को भाषा मान लेने पर नुकसान हिन्दी का ही होना हैl


हिन्दी की किसी बोली का अष्टम अनुसूची में सम्मिलित होने के पश्चात् उसका स्वतंत्र अस्तित्व बन जाता हैl वह मूल भाषा से अलग  समझी जाने लगती हैl हिन्दी की बोलियाँ जब तक हिन्दी के साथ हैं, तब तक उसके बोलनेवालों की गणना हिन्दी के अन्तर्गत होगीl  जिस दिन कोई बोली संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल हो जाएगी, उस दिन से उसे अपनी मातृभाषा लिखनेवाले संवैधानिक रूप से हिन्दीभाषी नहीं गिने जाएंगेl आज तक अपने बोलनेवालों की संख्या के बल पर ही हिन्दी राजभाषा के पद पर आरूढ़ हैl भोजपुरी और राजस्थानी को संविधान की अष्टम अनुसूची शामिल करने की माँग एक दशक से उठ रही हैl हिन्दी की कई बोलियों के संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल हो जाने से हिन्दी का संख्या बल घट रहा हैl यदि यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा तो संख्या बल की कमी के चलते एक दिन हिन्दी को देश की राजभाषा के पद से पद्च्युत होना भी पड़ सकता हैl ये अंग्रेजीवाले ‘बाँटो और राज करो’ की आदत से बाज आनेवाले नहीं हैंl    


भारतीय संविधान ने भाषा से संबंधित विषयों को संविधान के अनुच्छेद 120 व 210 तथा अनुच्छेद 343 से 351 तक में वर्णित किया है। इसमें भाषा से संबंधित कुल 11 अनुच्छेद हैं। अनुच्छेद 344(1) व 351 अष्टम अनुसूची की भाषाओं की मान्यता को दर्शाते हैं। यह सुनकर हिन्दी प्रेमी आहत होंगे कि अष्टम अनुसूची में जिन 38 भाषाओं को सम्मिलित किए जाने की बात इन दिनों ज़ोरों पर चल रही है, उसमे एक भाषा अंग्रेजी भी है और जिस दिन अंग्रेजी अष्टम अनुसूची में जगह पा गई, उस दिन संविधान के अनुच्छेद 344(1)व 351 के अनुसार भारत सरकार का संवैधानिक उत्तरदायित्व होगा कि अन्य भारतीय भाषाओं की तरह वह अंग्रेजी का भी ध्यान रखेl क्या अंग्रेजी को अष्टम अनुसूची में जगह दिलाने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगानेवालों को नहीं मालूम कि अंग्रेजी को संवैधानिक मान्यता दिलाना दासता की मानसिकता को दृढ़ करने जैसा है?


हिन्दी भारतीय अस्मिता की पहचान हैl राजभाषा के रूप में देश के शासकीय प्रयोजनों को सिद्ध करने के साथ राष्ट्रभाषा के रूप में देश की एकता और अखण्डता को मजबूत बनाये रखने का उत्तरदायित्व भी इसके कन्धों पर हैl इसमें देश की परम्परा, विश्वास, धर्म, संस्कृति एवं लोकनीति के स्वर समाहित हैंl हिन्दी भारतीय जनमानस के हृदय की भाषा हैl भारत का सर्वांगीण विकास  हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की उन्नति के द्वारा ही सम्भव हैl


 जय हिंदी!


ग्राम- जूड़ी, पोस्ट- तेन्दू , तहसील- राबर्ट्सगंज


जनपद- सोनभद्र- 231216 (उत्तर प्रदेश)


पूर्व हिंदी प्रवक्ता, कार्तिक प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज, 450, .टी.सी.रोड, कॉटनपेट, बेंगलूर-560053 (कर्नाटक)



 


मरुस्थलीकरण और सूखा : दुनिया के समक्ष बड़ी चुनौती (17 जून को मरुस्थलीकरण और सूखे से लड़ने का दिवस)

मरुस्थलीकरण जमीन के खराब होकर अनुपजाऊ हो जाने की ऐसी प्रक्रिया होती है, जिसमें जलवायु परिवर्तन तथा मानवीय गतिविधियों समेत अन्य कई कारणों से शुष्क, अर्द्ध-शुष्क और निर्जल अर्द्ध-नम इलाकों की जमीन रेगिस्तान में बदल जाती है। अतः जमीन की उत्पादन क्षमता में कमी और ह्रास होता है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने  'विश्व मरुस्थलीकरण रोकथाम दिवस' पर अपने वीडियो संदेश में सचेत किया है कि दुनिया हर साल 24 अरब टन उपजाऊ भूमि खो देती है. उन्होंने कहा कि भूमि की गुणवत्ता ख़राब होने से राष्ट्रीय घरेलू उत्पाद में हर साल आठ प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है. भूमि क्षरण और उसके दुष्प्रभावों से मानवता पर मंडराते जलवायु संकट के और गहराने की आशंका है.

मरुस्थलीकरण की चुनौती-

मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखा बड़े ख़तरे हैं जिनसे दुनिया भर में लाखों लोग, विशेषकर महिलाएं और बच्चे, प्रभावित हो रहे हैं. इस तरह के रुझानों को "तत्काल" बदलने की आवश्यकता है क्योंकि  इस से मजबूरी में होने वाले विस्थापन में कमी आ सकती है, खाद्य सुरक्षा सुधर सकती है और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिल सकता है. साथ ही यह "वैश्विक जलवायु इमरजेंसी को दूर करने में भी मदद कर सकती है.

मरुस्थलीकरण की चुनौती से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से इस दिवस को 25 साल पहले शुरू किया गया था जो हर साल 17 जून को मनाया जाता है. मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र संधि क़ानूनी रूप से बाध्यकारी एकमात्र अंतरराष्ट्रीय समझौता है जो पर्यावरण और विकास को स्थायी भूमि प्रबंधन से जोड़ता है.

दिवस का महत्व-

2019 में इस विश्व दिवस पर ‘लेट्स ग्रो द फ़्यूचर टुगेदर’ का नारा दिया गया है और इसमें  तीन प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया गया  सूखा, मानव सुरक्षा और जलवायु.
संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक़ 2025 तक दुनिया के दो-तिहाई लोग जल संकट की परिस्थितियों में रहने को मजबूर होंगे. उन्हें कुछ ऐसे दिनों का भी सामना करना पड़ेगा जब जल की मांग और आपूर्ति में भारी अंतर होगा. ऐसे में मरुस्थलीकरण के परिणामस्वरूप विस्थापन बढ़ने की संभावना है और 2045 तक करीब 13 करोड़ से ज़्यादा लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ सकता है.

उल्लेखनीय है कि भारत में 29.3 प्रतिशत भूमि क्षरण से प्रभावित है। मरुस्थलीकरण व सूखे की बढ़ती भयावहता को देखते हुए इससे मुकाबला करने के लिए वैश्विक स्तर पर जागरूकता के प्रसार की आवश्यकता महसूस की गई। उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा में 1994 में मरुस्थलीकरण रोकथाम का प्रस्ताव रखा गया जिसका अनुमोदन दिसम्बर 1996 में किया गया। वहीं 14 अक्टूबर 1994 को भारत ने मरुस्थलीकरण को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (यूएनसीसीडी) पर हस्ताक्षर किये। जिसके पश्चात् वर्ष 1995 से मरुस्थलीकरण का मुकाबला करने के लिए यह दिवस मनाया जाने लगा।

मरुस्थलीकरण के अनेक कारण हैं-

मानव निर्मित कारणों में घास-फूस की अधिक चराई , उत्पादकता और जैव-विविधता को कम करता है। 2005 और 2015 के बीच भारत ने 31% घास के मैदान खो दिये। वनों की कटाई से ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव में वृद्धि  तो होती है साथ ही धरती अपना परिधान लूटा देती है, काटो और जलाओ’ कृषि पद्धति मिट्टी के कटाव के खतरे को बढ़ाती है। उर्वरकों का अतिप्रयोग और अतिवृष्टि मिट्टी की खनिज संरचना को असंतुलित करते हैं। जलवायु परिवर्तन तापमान, वर्षा,  मरुस्थलीकरण को बढ़ा सकता है। प्राकृतिक आपदाएँ जैसे- बाढ़, सूखा, भूस्खलन,पानी का क्षरण,पानी का कटाव उपजाऊ मिट्टी का विस्थापन कर सकता है। हवा द्वारा रेत का अतिक्रमण भूमि की उर्वरता को कम करता है जिससे भूमि मरुस्थलीकरण के लिये अतिसंवेदनशील हो जाती है।

भारत की वर्तमान स्थिति-

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मरुस्थलीकरण भारत की प्रमुख समस्या बनती जा रही है। दरअसल इसकी वजह करीब 30 फीसदी जमीन का मरुस्थल में बदल जाना है। उल्लेखनीय है कि इसमें से 82 प्रतिशत हिस्सा केवल आठ राज्यों राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, जम्मू एवं कश्मीर, कर्नाटक, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और तेलंगाना में है।सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) द्वारा जारी "स्टेट ऑफ एनवायरमेंट इन फिगर्स 2019" की रिपोर्ट के मुताबिक 2003-05 से 2011-13 के बीच भारत में मरुस्थलीकरण 18.7 हेक्टेयर तक बढ़ चुका है। वही सूखा प्रभावित 78 में से 21 जिले ऐसे हैं, जिनका 50 फीसदी से अधिक क्षेत्र मरुस्थलीकरण में बदल चुका है।  भारत का 29.32 फीसदी क्षेत्र मरुस्थलीकरण से प्रभावित है। इसमें 0.56 फीसदी का बदलाव देखा गया है। गौरतलब है कि गुजरात में चार जिले ऐसे हैं, जहाँ मरुस्थलीकरण का प्रभाव देखा जा रहा है, इसके अलावा महाराष्ट्र में 3 जिले, तमिलनाडु में 5 जिले, पंजाब में 2 जिले, हरियाणा में 2 जिले, राजस्थान में 4 जिले, मध्य प्रदेश में 4 जिले, गोवा में 1 जिला, कर्नाटक में 2 जिले, केरल में 2 जिले, जम्मू कश्मीर में 5 जिले और हिमाचल प्रदेश में 3 जिलों में मरुस्थलीकरण का प्रभाव है।


2019 में  विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह के दौरान भारत ने पहली बार ‘संयुक्‍त राष्‍ट्र मरुस्‍थलीकरण रोकथाम कन्‍वेंशन’  से संबंधित पक्षकारों के सम्मेलन के 14वें सत्र की मेज़बानी  की। इस बैठक का आयोजन 29 अगस्त से 14 सितंबर, 2019 के बीच और दिल्ली में किया गया। भारत में भूमि के क्षरण से देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 30 प्रतिशत प्रभावित हो रहा है। भारत लक्ष्यों को प्राप्त करने के साथ-साथ इस समझौते के प्रति संकल्‍पबद्ध है। मिट्टी के क्षरण को रोकने में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना , मृदा स्‍वास्‍थ्‍य कार्ड योजना, मृदा स्‍वास्‍थ्‍य प्रबंधन योजना,प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, प्रति बूंद अधिक फसल जैसी भारत सरकार की विभिन्‍न योजनाएँ काम कर रही  हैं।


निवारण के उपाय-

वनीकरण को प्रोत्साहन इस समस्या से निपटने में सहायक हो सकता है,कृषि में रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैविक उर्वरकों का प्रयोग सूखे को कम करता है ।फसल चक्र को प्रभावी रूप से अपनाना और सिंचाई के नवीन और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाना जैसे बूँद-बूँद सिंचाई, स्प्रिंकलर सिंचाई आदि। मरुस्थलीकरण के बारे में जागरूकता बढ़ाएँ और वृक्षारोपण को बढ़ाया  जाना चाहिये। धरती पर वन सम्पदा के संरक्षण के लिए वृक्षों को काटने से रोका जाना चाहिए इसके लिए सख्त कानून का प्रावधान किया जाना चाहिए। साथ ही रिक्त भूमि पर, पार्कों में सड़कों के किनारे व खेतों की मेड़ों पर वृक्षारोपण कार्यक्रम को व्यापक स्तर पर चलाया जाए।
 
जरूरत इस बात की भी है कि इन स्थानों पर जलवायु अनुकूल पौधों-वृक्षों को उगाया जाए। मरुस्थलीकरण से बचाव के लिए जल संसाधनों का संरक्षण तथा समुचित मात्र में विवेकपूर्ण उपयोग काफी कारगर भूमिका अदा कर सकती है। इसके लिए कृषि में शुष्क कृषि प्रणालियों को प्रयोग में लाने को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। मरुभूमि की लवणता व क्षारीयता को कम करने में वैज्ञानिक उपाय को महत्व दिया जाना चाहिए।ग्रामीण क्षेत्रों में स्वतः उत्पन्न होने वाली अनियोजित वनस्पति के कटाई को नियंत्रित करने के साथ ही पशु चरागाहों पर उचित मानवीय नियंत्रण स्थापित करना चाहिए।

आगे की राह-

जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को स्थिर करने, वन्यजीव प्रजातियों को बचाने और समस्त मानव जाति की रक्षा के लिये मरुस्थलीकरण को समाप्त करना होगा। जंगल की रक्षा करना हम सबकी ज़िम्मेदारी है और दुनिया भर के लोगों और सरकारों को इसे निभाना चाहिये।  मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखा बड़े खतरे हैं, जिससे दुनिया भर में लाखों लोग, विशेषकर महिलाएँ और बच्चे प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में इस समस्या का तत्काल समाधान आज वक्त की माँग हो गई है। चूँकि इस समाधान से जहाँ भूमि संरक्षण और उसकी गुणवत्ता बहाल होगी, वहीं विस्थापन में कमी आयेगी, खाद्य सुरक्षा सुधरेगी और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलने के साथ वैश्विक जलवायु परिवर्तन से संबंधित समस्याओं से निजात मिल सकेगा।

मरुस्थलीकरण व सूखा से मुकाबला करने के लिए विश्व मरुस्थलीकरण रोकथाम दिवस, वैश्विक स्तर पर जन-जागरूकता फैलाने का ऐसा प्रयास है जिसमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग की अपेक्षा की जाती है। विश्व बंधुत्व की भावना के साथ इसमें भागीदारी सुनिश्चित करना धरती तथा पर्यावरण को बचाने में सार्थक प्रयास साबित हो सकता है।
 


--प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,




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