Wednesday, November 20, 2019

माई - बाप

रॉय विला आज दुल्हन की तरह सजी हुई थीण् हर तरफ कृतिम प्रकाश की जगमगाहट थीण् वैसे भी हमारा जीवन कृतिम प्रकाश में ही जगमगाता हैण् सूरज के तेज के सामने टिकने की हमारी न औकात बची है न क्षमताण् गार्डेन का पोर.पोर रोशनी से जगमग कर रहा थाण् फूलों के पौधों पर फूल की जगह लाइट के बल्ब खिले थे और घर के कोने. कोने में फूल खुशबू बिखेर रहे थेण् जैसे जीते जी इंसान पर लानत भेजने के हम आदी हैं लेकिन मरने के बाद ही कहते हैं फलां बहुत अच्छा थाण् अपनी इच्छाई को साबित करने के लिए हमें मरना पड़ता हैण् हमें डाली पर खिला फूल कहां भाता हैए जब तक उसे तोड़कर उसकी खुशबू न सूंघ लेंए हमें उसकी खुशबू नहीं समझ आती और उस खुशबू के लिए हम उसे तोड़ ही लेते हैंण् अक्सर ही डाली पर खिले फूलों की खुशबू हमें महसूस नहीं होतीण् रॉय विला में भी हर तरफ चंपा की बगिया खिली थीण् भगत चाचा भी चहक . चहककर काम करवा रहे थेण् विला को सजाने की जिम्मेवारी उन्हीं की थीण् वो अपने उत्साह के दोगुने जोश से काम में लगे थे और लगें भी क्यों न घ् चार साल बाद जो घर का लाडला विदेश से वापस आ रहा थाण् वैसे वो आठवीं क्लास से ही घर से बाहर रहाण् वो दिल्ली में पढ़ा दृलिखाण् फिर उसे कैंब्रिज भेजा गयाए एमबीए करने के लिए और फिर वो वहां से वापस नहीं आना चाहता था लेकिन बहुत कहने. सुनने के बाद वो भारत वापस आने के लिए राजी हो गयाण् इस कारण घर के सभी लोग खुश थे कि इकलौता वारिस वापस आ रहा था और भगत चाचा भी बहुत खुश थे क्योंकि उनका अवि बाबा जो आ रहा थाण् भगत चाचा ने उसे गोदी में खिलाया थाण् उसके लिए रोज घोड़ा वही बनते थेण् जब भी अवि यानी अविनाश गुस्सा होताए बस भगत चाचा के घोड़ा बनते ही वो खिलखिलाने लगताण् भगत बीच की लॉबी में खड़े होकर यही सोच रहा था कि अवि बाबा यहीं तो उसकी पीठ पर चढ़ा करते थे और यही वो तीन. तीन घंटे घोड़ा बनकर उसे घुमाया करता थाण् तभी आवाज आईण् 
ष्भगतण्ण्ण् ओ भगतण्ण्ण्ष् भगत की तंद्रा टूटी और वो बोला 
ष्जी मालकिन आयाण्ण्ण्ष्
ष्ये क्या !!! तू यहां खड़े. खड़े क्या सोच रहा है घ् अभी तक सीढ़ियों की रेलिंग पर चंपा की लड़ियां नहीं लगींण्ष्
ष्जी मालकिनए बस यही बाकी हैण् दस मिनट में लग जाएगीण्ष्
ष्तू जानता है फ्लाइट आ चुकी हैण् अवि आधा. पौन घंटे में ही घर आ जाएगाण्ष्
ष्बस मालकिन दस मिनट में सब काम खत्म हो जाएगाण्ष् कहकर भगत काम में लग गयाण् जैसे ही वो सीढ़ी पर चढ़ा उसे फिर याद आया कि कैसे अवि बाबा एक बार सीढ़ी से गिरे थेण् उस समय वो सात साल का था और भगत उसे बचाने के लिए भागा थाण् अवि को बचाते दृ बचाते उसकी अपनी चार साल की बेटी को चोट लग गई थीण् उसके माथे पर तीन टांके आए थे लेकिन भगत ने अवि को बचा लिया थाण् इस बात को बीस बरस हो गए लेकिन उसकी बेटी के माथे पर वो निशान आज भी बना हुआ है जो एक गड्ढे की तरह दिखाई देता हैण् उस गड्ढे को देखकर भगत कहता कि चांद में कितने सारे गड्ढे हैं फिर भी वो खूबसूरत है तो मेरी बेटी के माथे पर तो एक ही हैण् देखना इसके गड्ढे में धन दृ दौलत और ढेर सारी खुशियां ही भरेंगीण् भगत के न जाने कितने दुख. सुख इस विला से जुड़े थेण् भगत ने कुछ सोचाए मन ही मन कुछ कहा और फिर काम में लग गयाण् 10 मिनट में वाकई फूलों की सजावट का खत्म हो गया था और वो बाहर आकर अवि बाबा का इंतज़ार करने लगाण् वैसे तो अवि विदेश से चार साल बाद लौट रहा था लेकिन वो आठवीं से दिल्ली में पढ़ा और हॉस्टल में रहता थाण् कभी. कभार ही रामपुर आता थाण् जब दृजब वो घर आताए घर में उत्सवी माहौल हो जाताण् उसकी पसंद का खानाए मिठाई और कचौड़ी की महक घर में भरी रहतीण् तभी उसे याद आया कि अवि को जलेबी और गुलाबजामुन बहुत पसंद हैंण् उसने आकर मालती से कहाण्ण्ण् 
ष्मालकिन क्या मैं गुलाबजामुन ले जाऊं घ् अवि बाबा को मैं अपने हाथों से खिलाऊंगाण्ष् 
ष्क्यों घ् मैं करूंगी न उसको तिलकण् तो मैं ही मुंह मीठा कराऊंगीण्ष् 
भगत मुंह लटकाकर जाने लगा तो मालती ने कहा 
ष्अच्छाए मुंह मत बनाए तू भी उसको खिला देना ठीक घ् खुश घ्ष्
ष्जी मालकिनण्ण्ण्ष् भगत खुश होकर फिर बाहर आ गयाण् जैसे ही बाहर आयाण् गाड़ियों का काफिला अंदर आने लगाण् तीसरी गाड़ी में अविनाश और गुप्ता भाई थेण् अविनाश गाड़ी से उतराण् बालों में बरगेंडी कलर का हल्का. सा टचए काला बड़ा. सा चश्माए ग्रे कलर का पैंट और काला कोट चमचमाते जूते और चेहरे पर चमकण् मेन गेट पर पहुंचते ही मालती ने उसको टीका लगाया और जैसे ही आरती उतारने लगी वो बोला. 
ष्क्या मांए ये सब क्या है घ् मैं मंदिर की मूर्ति नहीं हूं जो आरती उतार रही होण् आरती छोड़ो और गले लगोण्ष् उसने आरती की थाली किसी और को पकड़ा दी और मां को गले लगा लियाण् तब मालती का मुंह उतर गयाण् फिर भी उसने कहा अच्छा मुंह तो मीठा कर लेण् मालती ने जैसे ही उसे गुलाबजामुन खिलाया उसने कहा ष्बस थोड़ा. साण्ष् तभी भगत आगे आया और एक गुलाब जामुन उठाया और बोला 
अवि बाबाए 
ष्एक मेरी तरफ सेण्ण्ण्ष्
और झट से उसने गुलाबजामुन उसके मुंह में डालने के लिए हाथ आगे बढ़ायाण् अवि ने डांटते हुए कहा. 
ष्क्या है अविनाश घ् देख नहीं रहे हो कि अभी मां ने खिलायाए मुझे नहीं पसंद ये सब और तुम फिर मुंह में डाले दे रहे होण्ष् 
जैसे ही अविनाश ने हाथ झटका गुलाबजामुन का रस उसके कोट पर गिर गयाण् उसने गुस्से से कहा. 
ष्कर दिया न खराब कोट  घ् पता है कितना महंगा है घ् 25 हजार का हैण् कभी देखे हैं इतने रुपए घ् और ये अवि बाबा. अवि बाबा लगा रखा हैण् अब मैं छोटा नहीं रहाण् अवि साहब कहोए समझे घ्ष्
ये कहना था कि भगत उसे देखता रहाण् उसके मुंह से ष्साहब गलती हो गईष्ए ये भी नहीं निकलाण्ण्ण् बस आंखे नम हो गईंण् सब अंदर चले गएण् भगत वहीं जड़ हो गया थाण् उसके सामने न जाने कितने मंज़र नाचने लगेण् कुछ खुशी के और कुछ दुखों केण् उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उसका दुलारा अवि बाबा उससे इस तरह बात करेगाण् उसका नाम लेगाण् वो बड़. बड़ाने लगा कि भगत तेरी ही गलती हैण् अवि बाबा बड़े हो गएण् विदेश से पढ़कर आये हैंण् अब वो बहुत पढ़ गए हैंए अब भला वो उन्हें चाचा क्यूं कहेंगे घ् बड़े घरवाले तो ऐसे ही होते हैंण् वो धीरे. धीरे अपने घर की तरफ लौटने लगाण् बाहर आकर उसने एक पेड़ के नीचे गुलाबजामुन रख दियाण् उसका घर पास ही में थाण् उसे इतनी जल्दी घर आया देख उसकी पत्नी सुखमनी ने कहा .
क्यों जीए इत्ती जल्दी काहे को आ गए घ् अभी तो अवि बाबा आएं होंगे और तुम घर आ गए घ् भगत ने भावशून्य चेहरे से कहा. 
ष्अवि बाबा नहींए अवि साहब बोलण् अब अवि बाबा बड़े हो गएण् बिदेस से पढ़कर आए हैंण्ण्ण्ष्
ष्क्यों क्या हुआ घ्ष् सुखमनी ने थोड़ा घबराते हुए पूछाण्ण्ण्
ष्कुछ नहींए अभी मुझे परेसान मत करष् और अंदर जाकर लेट गयाण्
नमस्कारए दोस्तों मैं हूं आपकी सूत्रधारण् आपको भूतकाल में घटी महत्वपूर्ण घटनाओं की जानकारी दे दूंए यानी पार्श्व ने ;तबके वर्तमान ने भविष्य कोद्ध वर्तमान को कैसे बदला ताकि आपको सब कुछ स्पष्ट नज़र आएण् यहां इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि अवि बाबा की एक डांट ने भगत के पूरे जीवन को सामने लाकर खड़ा कर दियाण् दोस्तों ज़िंदगी जितना सरल दिखाई देती हैए दरअसल उतनी सरल होती नहींण् ज़िंदगी की एक ख़ासियत यह भी है कि आपके सामने वही सब आता है जिसकी आपने कल्पना नहीं की होतीण् वो चाहे भले को लेकर हो या बुरे को लेकरण् जन्म लेने के साथ ही इंसानी जीवन की कठिनाई शुरु हो जाती हैण् नन्हे शिशु को भी छाती चूसकर दूध पीना पड़ता हैण् यानी जीवन जीना है तो काम करना हैण् फिर पढ़ाई की मारण् एक बार मेरे साहबज़ादे ने भी खीझकर कहा था कि ये क्या ज़िंदगी हैण्ण्ण् पढ़ोए पढ़ो. पढ़ते रहोण् ये करोए वो करोण् इससे अच्छा तो जीवन होता ही नहींण् फिर बच्चा किशोर वय में आता हैण् स्वप्नलोक में वो घर बनाता हैण् जिसमें वो सुंदर परियों से घिरा रहता हैण् लड़कियों में लड़के और लड़कों में लड़कियां रमने लगती हैंण् इसके साथ ही किशोर बच्चे सदाचारए ईमानदारीए निष्ठाए सच्चाईए प्रेम के गीत गाते हैंण् हर बुराई पर वो शपथ खाते हैं कि उसको वो जड़ से मिटाएंगेए रिश्वतए घूसए झूठ. मक्कारी सबको ख़त्मकर नया समाज बनाएंगेण् वो काफ़ी हद तक प्रयास भी करते हैं लेकिन जैसे दृजैसे उम्र बढ़ती है ये सारी अच्छाइयां कहीं पीछे छूटती जाती हैं और वो बच्चा इस झूठे समाज का एक हिस्सा बन जाता हैण्
भगत भी कभी ऐसा ही थाण् बहुत जोश. हिम्मत वालाण् समाज को सुधारने वालाण् वो अपने गुस्से की वजह से घर में अक्सर डांट खाता थाण् वो तमाम सामाजिक बुराईयों के खिलाफ़ थाण् दहेज का धुर विरोधीण् रिश्वतखोरी के खिलाफए झूठ से नफ़रत करने वालाए धोखा और बेईमानी उसने कभी बर्दाश्त नहीं कीण् रामपुर शहर की एक बस्ती में वो रहता थाण् बस्ती में उसका कोई दोस्त नहीं थाण् कोई अपने बच्चे को उसके साथ नहीं बैठने देता था क्योंकि सबको उसी समाज में रहना हैए उसी के साथ चलना हैण् उन्हीं साहूकारों से उधार लेना है जिनकी वो ख़िलाफ़त करता थाण् वो सबको खुलकर चोर कहताण् रिश्वतखोर कहताण् किसी तरह उसने दसवीं पास की और उसे फिर उसे बस्ती की ही एक दुकान पर लगा दिया गयाण् वहां उसने धनिया पाऊडर में मिलावट होते देखी और तभी उसने जाकर बस्तीवालों को बता दिया कि लाला तो धनिया में मिलावट करता हैण् उसे तत्काल दुकान से निकाल दिया गया और लाला ने ये भी कहा कि भगत ने रुपए उधार मांगे थेए उसने नहीं दिये तभी उसे बदनाम कर रहा हैण् लाला को दोबारा धंधा जमाने में वक्त लगाण् फिर उसके पिता ने उसे एक गत्ते का डिब्बा बनाने वाली फैक्ट्री में लगवायाण् एक बार उसकी रात की ड्यूटी लगीण् वो फैक्ट्री के गेट पर तैनात थाण् उस दिन फैक्ट्री से तीन ट्रक गत्ते जाने थे लेकिन जैसे ही चौथा ट्रक निकला भगत ने उसे रोक दिया और मैनेजर से कहा कि. 
ष्ये ट्रक नहीं जाएगाण् आर्डर तो तीन ट्रक का ही हैष्ण् मैंनेजर ने कहा 
ष्तुम्हें गलत जानकारी हैए चार ट्रक जाने की बात हुई हैण् गेट खोलोष् लेकिन उसने गेट नहीं खोला और कहा 
ष्तुम गलत काम कर रहे होण् मालिक का नुकसान कर रहे होष्ण् 
ष्नफ़ा. नुकसान मुझे मत बताण् मैं वही कर रहा हूं जो कहा गयाण् बरसों से काम संभाल रहा हूंष्ण् 
ष्अच्छा !! तो बरसों से ही मालिक को धोखा दे रहे हो आप घ्ष्
ष्अपनी ज़बान संभालकर बात करण् कल का आया छोकरा मुझे नसीहत दे रहा है घ्ष्
ष्नसीहत नहीं मैनेजर बाबूए जो सही हैए वही कर रहा हूंण्ष् फिर उसने धमकी दी कि 
ष्मैं मालिक को आपकी सारी बात बताऊंगाण् आपकी पोल खोलूंगाण् अब तक जो आपने मालिक को धोखा देकर बेईमानी की उसकी ख़बर दूंगा मालिक कोष्ण् 
मैनेजर ने कहा 
ष्जब तू यहां रहेगा तब न पोल खोलेगा घ् अभी तेरा हिसाब बनाता हूंण्ष् उसने उसे तुरंत बर्ख़ास्त कर दिया और सेठ को फोन कर कहा कि भगत गत्ता चुरा रहा था इसलिए उसे निकाल दियाण् जब अगली सुबह वो सेठ से मिलने फैक्ट्री पहुंचा तो सेठ ने कहला दिया कि चोरों को फैक्ट्री में जगह नहीं दी जाएगी और न ही वो मिलेंगेण् तब भगत ने हल्ला मचाया था कि सेठ जी मैं चोर नहींए ये मैंनेजर चोर है जो आपके गत्ते बाहर ले जा रहा थाण् न यकीन हो तो दूसरे गार्ड से पूछ लीजिए लेकिन सेठ ने कोई बात नहीं कीण् भगत ने कहा कि मैं आपके सामने उस गार्ड से गवाही दिलवाऊंगा जिसके सामने कल ये सब हुआण् जब वो चीख़ने लगा तो सेठ ने उसे बाहर निकलवा दियाण् वो नाइट ड्यूटी वाले गार्ड के घर पहुंचा और उससे कहाए भाई सेठ के सामने चलकर सच बताओ तो उस गार्ड ने मनाकर दियाण् उसने कहा.
ष्भगत भाई मेरा परिवार हैण् दो छोटे बच्चे हैंण् बूढ़े माता. पिता हैंण् तुमको नौकरी से निकाल दिया तो तुम्हें काहे का फरक पड़ेगा घ् तुम्हारा बाप जो है कमाने वालाण् फिर तुम्हारा ब्याह भी नहीं हुआ जो जोरू और बच्चों की जिम्मेवारी होण् मेरे ऊपर तो पूरे परिवार की जिम्मेवारी हैण् मुझे नैकरी से निकाल दिया तो कैसे चलाऊंगा परिवार का खरच घ् इसलिए भाई मुझे माफ़ करोण् मुझे तुम्हारे साथ हमदर्दी है पर भाई तुम्हारे लिए गवाही न दे सकूंगाण्ष् 
ष्भाईए मुझे हमदर्दी नहींए तुम्हारी गवाही चाहिएष्
ष्न भाई गवाही तो न दे सकूंगाष्
ष्तो तुम्हारे सामने एक निर्दोष को निकाल दिया गयाए झूठा इलज़ाम लगाकरए तुम्हारा कोई फरज नहीं है कि उसका साथ दोए सच का साथ दोष्
ष्भाईए सच का साथ देकर मेरे घर का पेट नहीं भरेगाए मुझे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगाण् तब कैसे गुज़ारा करूंगाण् मैं अकेला होता तो कर भी लेताण् मेरा फरज पहले घर का पेट भरना है या मेरी दूसरी नौकरी का जुगाड़ कर दो पहलेए तो बोल भी दूं सचण् गवाही दे दूं जाकरण् अभी मैं गवाही दे दूंए तो साहब मुझे भी नौकरी से निकाल देंगेण् फिर घर. परिवार का क्या होगा घ्ण् ईमानदारीए गवाही का तब मतलब है जब टेंट में रुपए होंण्
भगत गुस्से से बाहर निकल आयाण् घर पहुंचा और बाहर बैठकर लकड़ी से जमीन खुरचने लगाण् वो गुस्से से बड़बड़ाने लगा कि मैनेजर क्या समझता है खुद को घ् उसको न मजा चख़ाया तो मेरा नाम भगत नहींण् तभी उसकी मां ने कहा 
ष्अरेए करमजलेए खुद तो कुछ करता न हैए तेरे बापू का जो काम हैए वो भी छुड़वा देगा क्या घ् खुद तो आज तक धेला न कमायाण् अरेए अब किसको मजा चख़ाएगाए उस मैनेजर को घ् रात में उठवा के फिकवा देगा तुझको और हम सबकोण्ष् 
ष्अरे ऐसे. कैसे फिकवा देंगे घ् कोई जबरदस्ती है क्या घ्ष्
ष्हांए यही समझ लेण् तू किस. किससे लड़ेगा घ्ष्
ष्अम्मा तू ही कहती थी न कि चोरी बुरी बात हैण् चोरी करने वाला भी गुनहगार है और उसका साथ देने वाला और जो उसके खिलाफ आवाज नहीं उठाताए वो भी तो दोषी ही होता है न घ्ष् 
ष्हांए कहती थीए लेकिन हम गरीब हैंण् किससे लड़ेंगे जाकर घ् जब पेट भूखा रहेगा तो सारी ईमानदारी और सच्चाई धरी रह जाएगीण् खाली पेट तो बेईमानों से भी न लड़ा जाएगाण् हम दोनों की तो उम्र हो चलीण् हम तो पैंतालिस की उमर में ही साठ के लगने लगेण् ऐसे ही रहा तो न तू कमाएगा और न तेरे बापू को आराम मिलेगाण् अरे तेइस बरस का हो गयाण् कल को तेरा घर बसेगा तो क्या खिलाएगा अपनी जोरू को घ् रमनी के बापू तुझे रमनी का हाथ भी न देंगेण्ष् 
ष्ठीक है न दें हाथ लेकिन मुझे गलत का साथ नहीं देनाण् क्यूं तूने मुझे सही राह पे चलना सिखाया घ् तुझे तो सिखाना चाहिए था कि बेटा जा. जुआ खेलए चोरी. मक्कारी करए जिस पत्तल में खाना उसमें छेद जरूर करनाण्ष्
तभी भगत के बापू ने आकर उसको थप्पड़ माराण् उसने चिल्लाते हुए कहा 
ष्अगर शांति से नहीं रहना तो निकल जा घर सेण् हमारे बस में नहीं कि तुझ जैसे सांड को बिठाकर खिलाएंण् दस जगह काम पर रखाया मगर कहीं टिकता ही नहींण्ष् 
भगत ने भी उसी तरह चिल्लाकर कहाण्ण्ण् 
ष्तो क्या करूं घ् मेरी क्या गलती घ् कैसे गलत काम को सही कहूं घ् वो चोरी कर रहा था तो क्यूं न कहूं घ् लाला ने घोड़े की लीद मिलाई धनिया पाऊडर मेंए तो क्यों न बताता सबको घ् मेरी क्या गलती घ् यही कि सच बोला घ्ष्
ष्हांए यही गलती तेरी कि तूने सच बोलाण् अरेए इस दुनिया में जीना है तो इसी तरह से जीना होगाण् ये बड़े लोग हैंण् जाने कैसे दृ कैसे धंधे करते हैं लेकिन हमें क्या करनाण् कमाना तो इन्हीं के घरों से हैण् बस अपना काम ईमानदारी से करण् दूसरों के पचड़े में मत पड़ और अगर नहीं सुधरना तो घर से निकल जाण् कुछ दिन भूखा. प्यासा रहेगा तो सारा इंकलाब भूख के आगे दम तोड़ देगा और रमनी की बात भी मत करनाण् तेरा ब्याह उससे नहीं होगाण् हमारे बस में नहीं कि तुझे खिलाएं और उसको भी खिलाएंण् फिर बाल. बच्चे हो जाएंगे तो क्या करेंगे हम बुड्ढ़े. बुड्ढी घ् ऐसे ही जीना सीख या फिर जा सड़क पर सच का झंडा लेकर नारे लगाण् कोई नहीं आएगा तेरे साथण् हम मेहनत मजूरी करने वालेण् जिंदाबाद. मुर्दाबाद करेंगे तो हम ही मुर्दा हो जाएंगेण् अब सोच ले कि क्या करना हैण्ष्
भगत घर से निकल गयाण् वो मुरादाबाद चला गयाण् हाथ में 20 रुपए थेण् अब उसे लगा कि क्या करे घ् कहां रुके घ् वो कई दुकानों पर गया कि कोई काम मिल जाए लेकिन कुछ नहीं मिलाण् उसने एक रिक्शावाले से बात की कि किराये पर रिक्शा ही चला लेण् उस रिक्शेवाले ने उसे रिक्शा मालिक से मिलवा दियाण् उसके बीस रिक्शे चलते थेण् उसने उसके लिए भी एक रिक्शे का इंतजाम किया और तय किया कि या तो जो कमाओगे उसका आधा देना होगा या रोज सौ रुपए देने होंगेण् उसने कहा जितना कमाऊंगा आधा दूंगाण् बात पक्की हो गयीण् पहले दिन उसने केवल चालीस रुपए कमाए और बीस रुपए उसे मालिक को देने पड़ेण् अब आज के समय में लोग टेम्पो से जाने लगे तो रिक्शा कौन पूछे घ् फिर उसने अपने साथियों से पूछा कि तुम सब कैसे गुजारा करते हो घ् तो उन्होंने बताया कि हम ज़्यादा मेहनत करते हैंण् अक्सर डेढ़ सौ रुपए तक कमा लेते हैंए कभी. कभी कम रुपए में भी सवारी उठाते हैं लेकिन मालिक को बताते हैं कि साठ रुपए मिलेए पचास मिले और आधा देकर बाकी बचा लेते हैंण् इस पर भगत उखड़ गया और कहा तुम लोग चोरी करते होण् क्या फरक है तुममे और लाला में घ् मैं चोरों का साथ नहीं दूंगा और नही चोरी करूंगाण् इस पर उसके साथियों ने आपस में बात की और तय किया कि इसे हटा दिया जाएण् कहीं किसी दिन ये मुसीबत न खड़ी कर दे और मालिक को बताया कि वो ठीक नहीं लगताण् रिक्शा तो उसने पूरे दिन चलाया मगर आपको कम रुपए बताएण् आप देख लीजिएण् फिर आप न कहना कि हमें बताया नहींण् मालिक ने उससे रिक्शा रखा लियाण् अब बिना काम के वो कब तक रहताण् उसे रमनी और मां की याद भी आने लगीण् वो रामपुर वापस आया तो देखा कि मां उसके जाने के बाद बीमार हो गई थीण् जैसे ही वो आया तो मां ने उसे सीने से लगा लिया लेकिन उसके बापू ने उसी तेवर से कहा. 
ष्क्यों सच्चाई का भूत उतर गया घ् जग को सुधारने का बीड़ा अभी भी कंधे पर चढ़ा है कि पांव तले रौंद दिया उसेण्ष् 
भगत ने धीरे से कहा कि 
ष्अब आप जैसा कहोगे वैसा ही करूंगाण्ष्
इस पर उसके बापू ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा 
ष्बेटाए मैं तेरा दुसमन नहीं हूंण् तू पांच बच्चों में अकेला जिंदा बचाण् तेरी फिकर रहती है मुझेण् तेरी मां ने भी तुझमें अच्छे संस्कार डालेण् मैंने कभी बेईमानी नहीं कीण् हमेशा सच्चाई और ईमानदारी से मेहनत करके ही खायाण् अरेए हम मेहनत मजूरी करने वाले क्या धोखाधड़ी करेंगे घ् और किसके खिलाफ बोलेंगे घ् और खिलाफत करने लगे तो फिर जियेंगे कैसे घ् बस एक ही रास्ता है कि कर लें खत्म अपना जीवनण् आत्महत्या कर लेंण् तेरी मां को जहर दे दूंए तुझे खिला दूं फिर खुद भी जहर खा लूं क्योंकि क्या पता फिर तेरी मां का क्या होए किसके दरवाजे भटकेगी वोण् हमारे पास जमीन जायदाद कहां हैं घ् हम तो काम करने वाले ठहरेण् कुछ गलत भी देखें तोण्ण्ण् हमें तो बस चुप ही लगा जाना हैए नहीं तो कहां से खाएंगे घ् और किस. किसका विरोध करेंगे घ् अगर सबके बारे में बोलना शुरू कर दूं तो कोई भी काम नहीं देगाण् हांए हम इतना जरूर कर सकते हैं कि अपना काम ईमानदारी से करेंण्ष्
ष्हांए बापू समझ गयाण् मैंने भी कुछ दिन में दुनिया देख लीण् सभी बेईमानी कर रहे हैं लेकिन मैं बेईमानी नहीं करूंगाण् अपना काम पूरी ईमानदारी से करूंगाण् दूसरों के बारे में आंखए कान बंद रखूंगाण्ष् 
अगले दिन वो रमनी से मिलने गयाण् रमनी उसे देखकर रो पड़ीण् रोते. रोते बोलीण् इतने दिन कहां रहा घ् तुझे मेरी याद भी नहीं आईण्ष् 
भगत ने कहा'ष्बहुत आई तभी तो वापस आ गया सब छोड़कर'
ष्क्या छोड़कर आया ?'
ष्दूसरों को सुधारने और झूठ के खिलाफ अपनी आवाज को वहीं दफन कर आयाण् मैं तेरे बिना नहीं रह सकताण् क्या फायदा ऐसी जिंदगी का जिसमें प्यार न होए जोरू न हो घ् हमने सपने देखे थे हमारे बच्चे होंगे पर मैं तो इस काबिल भी नहीं कि तुझे खिला सकूंण् फिर सादी करके कैसे निभाऊंगा जिम्मेवारी घ् तू जानती है नए कि घर दृ परिवार के लिए आदमी को कैसे. कैसे गलत धंधे करने पड़ते हैंण्ष्   
ष्तू हिम्मत न हार भगतण् मैं हूं न तेरे साथण् तू सच्चाई का साथ मत छोड़ना लेकिन जो जैसे जी रहा हैए उसको जीने देण् हम क्या कर लेंगे घ् अपने पास रुपए दृ पैसे होंए अपना घर. द्वार होए अपना काम हो तो हम किसी के खिलाफ लड़ भी सकते हैंण् तू नहीं जानताए तेरे जाने के बाद चाची कितना बीमार हो गई थींण् तेरा उनके लिये भी तो कोई फरज है कि नहीं घ्ष्
ष्हां हैए सबके लिए है फरजष् भगत ने कहाण्
ष्मैं तुझे सिकायत का कोई मौका नहीं दूंगीण्ष् रमनी ने कहाण्
ष्रमनीए मां ने मुझे सदाचार की शिक्षा दीण् वो पढ़ी. लिखी नहीं हैण् फिर भी यही कहते. कहते बड़ा किया कि गलत राह परए झूठ की राह पर मत चलनाण् तो क्या परिवार के लिए मुझे भी झूठ की राह चलना होगाण्ष्
ष्नहीं भगतए तू कोई बुरा काम मत करनाण् मैं भी कोई बेजा फरमाइस नहीं करूंगीण् जितना भी लाएगाए उसी में खुस रहूंगीण् हम खेत पर तो काम कर सकते हैंण् तेरे साथ खेत पर भी काम करूंगी और हम प्यार से रहेंगेण् अरेण्ण्ण् मरने देए इन बड़े लोगों कोण् इनके पास जितना भी पैसा आता हैए इनकी भूख उतनी ही बढ़ती रहती हैण् बस हम प्यार से रहेंगे और हमारा एक ही बच्चा होगाण् उसको खूब पढ़ाएंगे जिससे वो बड़ा आदमी बनेण्ष्
ष्लेकिन रमनी क्या खेत पर काम करने से हमें इतना रुपया मिल जाएगा कि हम अपने बच्चे को अच्छी तरह से पढ़ा सकेंगेण्ष् 
ष्हां भगतए फिर मैंने सिलाई का काम सीखा हैण् मैं सिलाई भी करूंगीण् तेरा हाथ बटाऊंगीण् हम प्यार से रहेंगे और प्यार साथ हो तो सारी मुसकिलों से हम निपट लेंगेण्ष्
आज वो भगत से मिलकर बहुत खुश थीण् उसने अपने बापू से कहा कि जहां वो माली का काम करते हैंए कोसिस करके वहीं भगत को भी लगवा देंण् 
अगले दिन रमनी के पिता उसे लेकर रॉय विला पहुंचे और रास्ते भर डांटते रहेण् उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि जिस दिन बेटी को रोते देखा और अगर विला जाकर कोई गड़बड़ी की तो रमनी को तुरंत घर वापस बुला लेगाण् रमनी के पिता ने उसे रतनलाल रॉय से मिलवाया और कहा कि साहब ये मेरा होने वाला दामाद हैण् इसे कोई नौकरी दे दीजिएण् बहुत मेहनती और ईमानदार है सरकारण्
रतनलाल जी ने उसे बच्चे को संभालने की जिम्मेदारी दे दीण् 
रतनलाल के बाबा अंग्रेजों के यहां काम करते थेण् उनसे खुश होकर अंग्रेजों ने उन्हें रॉय की उपाधि दी और आलीशान कोठी भी दी थीण् अब भी रॉय परिवार की वही शान. शौकत थीण् काफ़ी सारी ज़मीन दृजायदाद थी जिससे रॉय परिवार ऐश का जीवन गुज़ार रहा थाण् 
कुछ समय बाद भगत. रमनी की शादी हो गईण् जब भगत ने उनके घर में काम करना शुरू किया तब अवि दो साल का थाण् तबसे वो हर वक्त अवि के साथ रहताण् डेढ़ साल बाद रमनी ने जुड़वा बच्चों को जन्म दियाण् उसने कहा. ष्हे ईश्वर हम तो एक ही बच्चा चाहते थे और तुमने दो. दो दे दियेण् अब तो दोनों को पढ़ाना. लिखाना होगाण् कैसे पूरे होंगे खर्चघ्ष् वो कभी. कभी अपने बच्चों को वहां ले जाताण् रतनलाल जी नहीं रहेण् उनके बाद उनके बेटे रमनलाल ने भी भगत को नहीं हटाया और अवि के हॉस्टल जाने के बाद भी वो घर के अन्य कामों की देख. रेख करता रहाण् वहां भी वो मन मारकर जीता रहाण् जब भी वो रॉय विला की कोई बात करता तो रमनी उसे अम्मा दृ बापू और अपने बच्चों छिमिया और गन्नू  का वास्ता देकर रोक लेतीण् भगत मन मारकर अपने परिवार के लिए काम करता रहाण् रतनलाल जी की बात और थी मगर रमनलाल अय्याश थाण् लड़कियां उसकी कमजोरी थींण् विला में अलग से एक ऑफिस बना हुआ थाए वहीं से रमनलाल अपना कामकाज संभालता और उसी में अलग से एक गेस्ट हाउस बना था जिसमें अक्सर बिजनेस के संबंध में आने वाले मेहमान ठहरतेण् वहां अक्सर ही नई. नई लड़कियां आतीं और कुछ देर बाद चली जातींण् एक बार भगत ने अपने ससुर को इस बारे में बताया तो उसके ससुर ने कहा अपने काम से काम रखोण् बड़े लोग हैंण् अपना व्यापार कैसे करते हैंए इसे जानने की ज़रूरत नहीं और कोसिस भी मत करनाण् उसने कई बार मालकिन को रोते हुए देखा थाण् जब भी रमनलाल मालती के लिए फूलों का गुलदस्ता और चॉकलेट भिजवाते तो मालती उदास हो जाती और आंखें नमण् शुरू में भगत ने पूछा कि मालिक तो आपके लिए फूल और चाकलेट भेजते हैं तो आप उदास क्यों हो जाती हैंण् मालती ने उदास होकर कहा था. तू नहीं समझेगाण् फिर सहसा गुस्से से बोली ष्अपने काम से काम रखण् फालतू बातों में दिमाग मत लगाया करण्ष् धीरे. धीरे उसे समझ आने लगा कि जिस दिन मालिक फूल और चॉकलेट भिजवाते हैंए वो घर नहीं आते और उनकी रात गेस्ट हाउस में ही गुजरती हैण् उसे ये मालूम करने में देर नहीं लगी कि वो ऑफिस के गेस्ट हाउस में काम के लिए नहीं बल्कि रंग. रलियां मनाने के लिए रुकते हैंण् उस रात गेस्ट हाउस में कवाब और शबाब की महफिल जमतीण् एक बार फिर जब उसने मालती से कहा कि मालकिन आपको पता है कि पीछे ऑफिस में अक्सर नई. नई लड़कियां आती हैं घ् आप जानती हैं वो क्यूं आती हैं घ्
मालती ने गुस्से से एक थप्पड़ लगाया था और चेतावनी दी थीण् अगर नौकरी प्यारी है तो अपनी आंखए नाकए कान और जुबान बंद रख और दिमाग को ताला लगा देए वर्ना निकाल दिया जाएगा यहां सेण् समझे घ् उस दिन के बाद से उसने अपनी सभी इंद्रियां निष्क्रिय कर दी थींण् वो केवल अपने काम करता और परिवार के साथ खुश रहताण्  
अवि बाबा के गुस्सा होने वाले एक पल के कारण भगत पिछले बरसों के कई हिस्सों से गुजर गयाण् कितना क्रोधीए जुनूनी और समाज की बुराइयों के खिलाफ लड़ने वाला आज अपने परिवार की खातिर सब कुछ अनदेखा कर रहा थाण् उसके आदर्श समाज से टकराकर चूर हो चुके थेण् वास्तविकता की धरती पर वो घर. परिवार की ख़ातिर सचए ईमानदारी और उसूलों की फ़सल नहीं उगा सकाण् ईमानदारी और सच की राह पर चलने वाला चोरी. मक्कारी और झूठ के खिलाफ आवाज उठाने वाला भगत अपनी जबान पर खामोशी का ताला जड़ चुका था और बड़े लोगों ने उसकी भी कदर नहीं कीण् जिसकी खातिर अपनी बेटी की परवाह नहीं कीए उसके माथे पर हमेशा के लिए निशान रह गयाए आज उसने भी कुत्ते की तरह दुत्कार दियाण् उसे खुद से नफ़रत होने लगी थीण् उसका दिल टूट गया थाण् आज वो अपनी पूरी हिम्मत हार गया थाण् जिस बच्चे को गोदी खिलायाए पीठ पर बिठाकर दौड़ता रहाए उसी ने आज सबके सामने उसकी इस कदर बेइज्जती की कि वो वहां रुक भी न पायाण् वो कितना प्रेम करता था अवि बाबा सेण् मगर नौकरों को प्रेम का हक कहां घ् वो तो नौकर ही होते हैंण् जिन बच्चों को उंगली पकड़कर चलना सिखाते हैंए वहीं हाथ बड़े होने पर थप्पड़ मारते हैंण् अपने बच्चों को चाहे गोदी लेकर न टहलाएं लेकिन मालिक के बच्चों को एक मिनट भी रोने नहीं देते और वही बच्चे बूढ़ी आंखों की कोरों में आंसुओं का कुआं खोद देते हैण् भगत की आंखों से आंसू बह रहे थेण् परिवार के लिए क्या. क्या नहीं करना पड़ाण् उसने वो जीवन जियाए जो उसके सपनोंए आदर्शों और सिद्धांतों के एकदम विपरीत थाण् उसने बहुत चाहा मगर सच की राह नहीं चल पायाण् आंखें होते हुए भी उसने पट्टी बांध ली थीI
तभी उसका बेटा खुश होते हुए अंदर आकर कहता है कि मां दृ पापा देखो मेरा रिज़ल्ट आ गयाण् मैं मैजिस्ट्रेट बन गयाण् गन्नू ने पीसीएस जे की परीक्षा दी थीण् 
परेशान और सुबकते भगत ने आश्चर्य से कहा. ष्क्याण्ण्ण्ष्
ष्हां पापाए सचण् मैं अब मजिस्ट्रेट बन जाऊंगाण्ष् जो आंसू अभी तक शांत दरिया थे वो झरने की तरह गिरने लगेण् उसने गन्नू को गले से लगा लिया और बोला. 
मेरे बच्चे मैं तो सच की राह तो चला लेकिन अपने आदर्शोंए सिद्धांतों को दफन करकेण् जमाने की ठोकर खाकरए दर. दर भटककर तेरे बाबा. दादी और मां के प्रेम के आगे झुककर ईमानदारी की राह पर तो चला मगर बुराईयों को देखकर भी खामोश रहा क्योंकि मैं ज्यादा पढ़ नहीं सकाण् मालिक को ही माई दृ बाप मानकर चुप रहाण् मगर अब तेरा कोई माई. बाप न हैण् तू कभी रुपए लेकर मत बिकियोण् जो आदर्श मैं नहीं बचा सका तू जरूर बचइयो वर्ना दुनिया से अच्छाई उठ जाएगीण् वो जिंदा रहनी चाहिएए हमारे लिए लेकिन तू गलत करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा देना बेटाण् आंखें मत मूंदियोण्   


वीना श्रीवास्तव, साहित्यकार व स्तंभकार
सी.201ए श्रीराम गार्डेनए कांके रोड
रिलायंस स्मार्ट के सामनेए रांची.834008 ;झारखंडद्ध 
मोण् 9771431900
     


शिक्षा को प्रभावी बनाने के लिए राष्ट्र को भाषा की दरकार है  !

कुछ बातें प्रकट होने पर भी हमारे ध्यान में नहीं आतीं और हम हम उनकी उपेक्षा करते जाते हैं और एक समय आता है जब मन मसोस कर रह जीते हैं कि काश पहले सोचा होता. भाषा के साथ ही ऐसा ही कुछ होता है. भाषा में दैनंदिन संस्कृति का स्पंदन और प्रवाह होता  है. वह जीवन की जाने  कितनी आवश्यकताओं की पूर्ति करती है. उसके अभाव की कल्पना बड़ी डरावनी है. भाषा की  मृत्यु के साथ एक समुदाय की पूरी की पूरी विरासत ही लुप्त होने लगती है. कहना न होगा कि जीवन को समृद्ध करने वाली हमारी सभी महत्वपूर्ण उपलब्धियां जैसे-कला, पर्व, रीति-रिवाज आदि सभी जिनसे किसी समाज की पहचान बनती है उन सबका मूल आधार भाषा ही होती है.  किसी भाषा का व्यवहार में बना रहना उस समाज की जीवंतता और सृजनात्मकता को संभव करता है. आज के बदलते माहौल में अधिसंख्य भारतीयों द्वारा बोली जाने वाली हिंदी को लेकर भी अब इस तरह के सवाल खड़े होने लगे हैं कि उसका सामाजिक स्वास्थ्य कैसा है और किस तरह का भविष्य आने वाला है.


 हिंदी के बहुत से रूप हैं जो उसके साहित्य में परिलक्षित होते हैं पर उसकी जनसत्ता कितनी सुदृढ है यह इस बात पर निर्भर करती है कि जीवन के विविध पक्षों में उसका उपयोग कहां, कितना, किस मात्रा में और किन परिणामों के साथ किया जा रहा है. ये प्रश्न सिर्फ हिंदी भाषा से ही नहीं भारत के समाज से और उसकी जीवन यात्रा से और हमारे लोकतंत्र की उपलब्धि से भी जुड़े हुए हैं. वह समर्थ हो सके इसके लिए जरूरी है कि हर स्तर पर उसका समुचित उपयोग हो. वह एक पीढी से दूसरे तक पहुंचे, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढे, हमारे विभिन्न कार्यों का माध्यम बने, विभिन्न कार्यों के लिए उसका दस्तावेजीकरण हो, और उसे  राजकीय समर्थन भी प्राप्त हो.


 वास्तविकता यही है कि जिस हिंदी भाषा को आज पचास करोड़ लोग मातृ भाषा के रूप में उपयोग करते हैं उसकी व्यावहारिक जीवन के तमाम क्षेत्रों में उपयोग असंतोषजनक है. आजादी पाने के बाद वह सब न न हो सका जो होना चाहिए था. लगभग  सात दशकों से हिंदी भाषा को इंतजार है कि उसे व्यावहारिक स्तर पर पूर्ण राजभाषा का दर्जा दे दिया जाय और देश में स्वदेशी भाषा जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में संचार और संवाद का माध्यम बने. संविधान ने अनुछेद 350 और 351 के तहत भारत संघ की राज भाषा का दर्जा विधिक रूप से दिया है.   संविधान के में हिंदी के लिए दृढसंकल्प के उल्लेख के बावजूद और हिंदी सेवी तमाम सरकारी संस्थानों और उपक्रमों के बावजूद हिंदी को लेकर हम ज्यादा आगे नहीं बढ सके हैं.


आज की स्थिति यह है कि वास्तव में शिक्षित माने अंग्रेजीदां होना ही है. सिर्फ हिंदी जानना अनपढतुल्य ही माना जाता है. हिंदी के ज्ञान पर कोई गर्व नहीं होता है पर अंग्रेजी की दासता और सम्मोहन  अटूट है. अंग्रेजी सुधारने के विज्ञापन ब्रिटेन ही नहीं भारत के तमाम संस्थाएं कर रही हैं और खूब चल भी रही हैं. हिंदी क्षेत्र समेत अनेक प्रांतीय सरकारें अंग्रेजी स्कूल खोलने के लिए कटिबद्ध हैं.  भाषाई साम्राज्यवाद का यह जबर्दस्त उदाहरण है. ज्ञान के क्षेत्र में जातिवाद है और अंग्रेजी उच्च जाति की श्रेणी में है और हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाएं अस्पृश्य बनी हुई हैं. उनके लिए या तो पूरी निषेधाज्ञा है या फिर ' विना अनुमति के प्रवेश वर्जित है' की तख्ती टंगी हुई है. इस  करुण दृश्य को पचाना कठिन है क्योंकि वह  सभ्यता के आगामे विकट  संकट प्रस्तुत कर रहा है. आज बाजार का युग है और  जिसकी मांग है वही बचेगा. मांग अंग्रेजी की ही बनी हुई है.


 यह विचारणीय है कि बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में राजा राम मोहन राय, केशव चंद्र सेन, दयानंद सरस्वती बंकिम चंद्र चटर्जी भूदेव मुखर्जी जैसे शुद्ध अहिंदीभाषी  लोगों हिंदी को राष्ट्रीय संवाद का माध्यम बनाने की जोरदार वकालत की थी. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1936 में वर्धा में 'राष्ट्रभाषा प्रचार समिति' की स्थापना की जिसमें राजेंद्र प्रसाद, राजगोपालाचारी, जवाहर लाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, जमना लाल बजाज, बाबा राघव दास, माखन लाल चतुर्वेदी और वियोगी हरि जैसे लोग शामिल थे. उन्होने अपने पुत्र देवदास गांधी को दक्षिण भारत हिंदी प्रचार समिति का काम सौंपा. यह सब हिंदी के प्रति राष्ट्रीय भावना  और समाज और संस्कृति के उत्थान के प्रति समर्पण को बताता है.


 ' हिंद स्वराज'  में गांधी जी स्पष्ट कहते हैं कि ' हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा हिंदी ही होनी चाहिए' .  इसके पक्ष में वह कारण भी गिनाते हैं कि राष्ट्रभाषा वह भाषा हो जो सीखने में आसान हो , सबके लिए काम काज कर पाने संभावना  हो, सारे देश के लिए जिसे सीखना सरल हो, अधिकांश लोगों की  भाषा हो. विचार कर वह हिंदी को सही पाते हैं और अंग्रेजी  को इसके लिए उपयुक्त नहीं  पाते हैं . उनके विचार में अंग्रेजी हमारी राष्ट्रभाषा नहीं बन सकती. वह अंग्रेजी मोह को स्वराज्य लिए घातक बताते हैं. उनके विचार में ' अंग्रेजी की शिक्षा गुलामी में ढलने जैसा है' . वे तो यहां तक कहते हैं कि ' हिंदुस्तान को गुलाम बनाने वाले तो हम अंग्रेजी जानने वाले लोग ही हैं. राष्ट्र की हाय अंग्रेजों पर नहीं पड़ेगी हम पर पड़ेगी' . वे  अंग्रेजी से से मुक्ति को  स्वराज्य की लड़ाई का एक हिस्सा मानते थे . वे मानते हैं कि सभी हिंदुस्तानियों को हिंदी का ज्ञान होना चाहिए . उनकी हिंदी व्यापक है और उसे नागरी या फारसी में लिखा जाता है. पर देव नागरी लिपि को वह सही ठहराते हैं.


गांधी जी मानते हैं कि हिंदी का फैलाव ज्यादा है. वह मीठी , नम्र और ओजस्वी  भाषा है. वे अपना अनुभव साझा करते हुए कहते हैं कि ' मद्रास हो या मुम्बई भारत में मुझे हर जगह हिंदुस्तानी बोलने वाले मिल गए' . हर तबके के लोग यहां तक कि मजदूर , साधु, सन्यासी सभी हिंदी का उपयोग करते हैं. अत: हिंदी ही शिक्षित समुदाय की सामान्य भाषा हो सकती है.  उसे आसानी से सीखा जा सकता है. यंग इंडिया में में वह लिखते हैं कि यह बात शायद ही कोई मानता हो कि दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले सभी तमिल-तेलुगु भाषी लोग हिंदी में खूब अच्छी तरह बातचीत कर सकते हैं .  वे अंग्रेजी  के प्रश्रय को को ' गुलामी और घोर पतन का चिह्न'  कहते हैं . काशी हिंदू विश्व विद्यालय में बोलते हुए गांधी जी ने कहा था :


 ' जरा सोच कर देखिए कि अंग्रेजी भाषा में अंग्रेज बच्चों के साथ होड़ करने में हमारे बच्चों को कितना वजन पड़ता है. पूना के कुछ प्रोफेसरों से मेरी बात हुई , उन्होने बताया कि चूंकि हम भारतीय विद्यार्थी को अंग्रेजी के मार्फत ज्ञान संपादित करना पड़ता है , इस्लिए उसे अपने बेशकीमती वर्षों में से कम से कम छह वर्ष अधिक जाना पड़ता, श्रम और संसाधन का घोर अपव्यय होता  है. 1946 में ' हरिजन' में गांधी जी लिखते हैं कि ' यह हमारी मानसिक दासता है कि हम समझते हैं कि अंग्रेजी के बिना हमारा काम नहीं चल सकता . मैं इस पराजय की भावना वाले विचार को कभी स्वीकार नहीं कर सकता' अभाव है. आज वैश्विक ज्ञान के बाजार में हम हाशिए पर हैं और शिक्षा में सृजनात्मकता का बेहद अभाव बना हुआ है. अपनी भाषा और संंस्कृति को खोते हुए हम वैचारिक गुलामी की ओर ही बढते हैं.  


 हिंदी साहित्य सम्मेलन इंदौर के मार्च 1918 के अधिवेशन में बोलते हुए गांधी जी ने दो टूक शब्दों में आहवान किया था : ' पहली माता (अंग्रेजी) से हमें जो दूध मिल रहा है, उसमें जहर और पानी मिला हुआ है , और दूसरी माता (मातृभाषा ) से शुद्ध दूध मिल सकता है. बिना इस शुद्ध दूध के मिले हमारी उन्नति होना असंभव है . पर जो अंधा है , वह देख नहीं सकता . गुलाम यह नहीं जानता कि अपनी बेडियां किस तरह तोड़े . पचास वर्षों से हम अंग्रेजी के मोह में फंसे हैं . हमारी प्रज्ञा अज्ञान में डूबी रहती है . आप हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनने का गौरव प्रदान करें . हिंदी सब समझते हैं . इसे राष्ट्रभाषा बना कर हमें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए' . 


 स्वतंत्रता मिलने के बाद भी हिंदी के साथ हीलाहवाली करते हुए हम अंग्रेजी को ही तरजीह देते रहे . ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करते रहे जिसका शेष देश वासियों से सम्पर्क ही घटता गया और जिसका संस्कृति  का स्वाद देश से परे वैश्विक होने लगा . हम मैकाले के तिरस्कार से भी कुछ कदम आगे ही बढ गए. देशी भाषा  और संस्कृति का अनादर जारी  है.  गांधी जी के शब्दों में ' भाषा माता के समान है . माता पर हमारा जो प्रेम होना चाहिए वह हममें नहीं है' .  मातृभाषा से मातृवत स्नेह से साहित्य , शिक्षा , संस्कृति , कला और नागरिक जीवन सभी  कुछ गहनता और गहराई से जुड़ा  होता है.  इस वर्ष महात्मा गांधी का विशेष स्मरण किया जा रहा है . उनके भाषाई सपने पर भी सरकार और समाज सबको विचार करना चाहिए. अब जब नई शिक्षा शिक्षानीति को अंजाम दिया जा रहा है यह आवश्यक होगा कि देश को उसकी भाषा में शिक्षा दी जाय. 


गिरीश्वर मिश्र  Girishwar Misra,  Ph.D. FNA Psy,Special Issue Editor Psychological Studies (Springer), Former National Fellow (ICSSR), 


Ex Vice Chancellor,Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidyalaya,Wardha (Mahaaraashtra), Ex Head & Professor,  Dept of Psychology, University of Delhi


Residence :Tower -1 , Flat No 307, Parshvanath Majestic Floors,18A, Vaibhav Khand, Indirapuram, Ghaziabad-201014 (U.P.), Mobile- +91 9922399666,https://mindandlife.home.blog 


हिंदी  को बोलियों से मत लड़ाइए

मनुष्य की भांति भाषाओं का भी अपना समय होता है जो एक बार निकल जाने के बाद वापस नहीं लौटता।इसे हम संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश इत्यादि के साथ घटित इतिहास के द्वारा समझ सकते हैं।यह ऐतिहासिक तथ्य है कि आदिकाल में राजस्थानी मिश्रित डिंगल और पिंगल शैली तथा बुंदेली एवं मैथिली मुख्य रूप से काव्य- भाषा थी।उसी समय अमीर खुसरो ने खड़ी बोली में काव्य-रचना करके अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।इसके बाद सारा सूफी-  काव्य अवधी में लिखा गया।इस अवधी में मलिक मुहम्मद जायसी और गोस्वामी तुलसीदास जैसे महाकवि भी आए जिन्होंने पद्मावत और रामचरितमानस जैसे महाकाव्य लिखकर अवधी को विश्व-स्तरीय काव्य-भाषा बना दिया।इसके समानांतर सूरदास एवं अन्य कृष्णभक्त कवियों ने ब्रजभाषा को काव्य-भाषा का सबसे लोकप्रिय माध्यम बनाकर उसे आगामी समय के लिए भी प्रतिष्ठित कर दिया।अंग्रेजी शासन के दौरान सबसे पहले सत्ता द्वारा हिंदी-उर्दू विवाद पैदा किया गया।जब स्वाधीनता संग्राम के कठिन संघर्ष के दिनों में देश के नेताओं, सेनानियों और साहित्यकारों-पत्रकारों ने हिंदी को लड़ाई की मुख्य भाषा बनाया तब हिंदी राष्ट्रीय-संवाद का एक व्यापक तथा प्रभावी माध्यम बन गयी।यदि भारत का संविधान लागू होने तक महात्मा गांधी जीवित रहते तो वह हर हाल भारतवर्ष की राष्ट्रभाषा बन जाती।गांधीजी के न होने का खामियाजा उसे राजभाषा बनकर उठाना पड़ा।आज जिस तरह हम लोकतांत्रिक देश के रूप में आगे बढ़ने के बाद वापस राजाओं-महाराजाओं के समय में नहीं लौट सकते ।उसी तरह हम हिंदी के अति-विकसित एवं विश्वव्यापी भाषा बनने के बाद वापस उन बोलियों के युग में नहीं लौट सकते जो किसी समय साहित्य -सृजन का मुख्य माध्यम थीं।यहां तक कि संस्कृत जैसी गौरवशाली भाषा के दौर में प्रत्यावर्तन करना असंभव है।ऐसा करना  न केवल आत्मघाती होगा अपितु संपूर्ण देश में भाषिक अराजकता का माहौल बना देगा।


 आज हिंदी के समक्ष त्रिआयामी संकट उपस्थित हो गया है।पहला संकट उसे हर जगह और हर स्तर पर अंग्रेजी के वर्चस्व एवं साम्राज्यवाद से पार पाने का है।दूसरा संकट वायको जैसे कुछ नेताओं द्वारा हिंदी थोपने के विरोध को लेकर है।ऐसे नेताओं को अंग्रेजी थोपे जाने को लेकर कोई आपत्ति नहीं है।इसी क्रम में तीसरा जो सबसे बड़ा संकट है वह बोलियों से उसे लड़ाने का है।इस समय हिंदी के भविष्य एवं अखंडता के समक्ष इतिहास का सबसे बड़ा संकट उपस्थित है।अंग्रेजों ने दो सौ वर्षों के शासन के दौरान जो सफलता नहीं पायी उसे हमारे  देश के कतिपय स्वार्थी तत्त्व साकार करने के लिए प्रयासरत हैं।कुछ लोग हिंदी की उन बोलियों को जो सैकड़ों साल से उसकी प्राणधारा रही हैं उन्हें संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करवाकर हिंदी की प्रतिस्पर्धा में लाना चाहते हैं।ऐसे लोग उन बोलियों के जो हिंदी का अविच्छिन्न अंग हैं और जिनके साथ उसका संबंध अंगांगिभाव का है उन्हें संवैधानिक दर्जा देकर उसे स्वतंत्र व्यक्तित्व देना चाहते हैं।उसे हिंदी की सौतन बनाना चाहते हैं।हम भारतीयों को यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका एवं चीन जैसे राष्ट्रों के रक्षा बजट की तरह अपनी भाषाओं के प्रसार एवं दूसरी भाषाओं के विस्थापन का बजट भी है।जिस नेपाल में हिंदी कभी दूसरी राजभाषा थी आज वहां हिंदी का स्थान चीन की भाषा मंदारिन ले चुकी है।ठीक इसी तरह अंग्रेजी की समर्थक ताकतें हिंदी को उसकी बोलियों से लड़वाकर दोनों को ही विस्थापित करना चाहतीं हैं।इसके पीछे एक गहरी सांस्कृतिक साज़िश है जिसे क्षेत्रीय स्वार्थ में लिप्त लोग नहीं समझ पा रहे हैं।विश्व की बड़ी ताकतें अपनी भाषा एवं संस्कृति के प्रचार-प्रसार में संलग्न हैं और हम इतिहास से कुछ भी न सीख कर आपसी संघर्ष में।


आचार्य चाणक्य कहा करते थे कि भाषा, भवन, भेष  और भोजन संस्कृति के निर्माणक तत्त्व हैं ।किसी भी संस्कृति की निर्मित इन चारों के समन्वय से होती है। यदि  आज नयी पीढ़ी चीनीव्यंजनों  ,मैकडोनाल्ड के बर्गर  और पेप्सी- कोक पर लार टपकाती है,अंग्रेजों जैसा कपड़ा पहनती है तो भाषा ही एकमात्र साधन है जो हमारी राष्ट्रीय अस्मिता और संस्कृति की रक्षा कर सकती है ।क्योंकि भवन निर्माण के अमेरिकी माॅडल को लगभग पूरे विश्व ने स्वीकार कर लिया है ।ऐसी स्थिति में जिसे हम भारतीय संस्कृति कहते हैं उसका मूल स्वरूप खतरे में है। अतः संकट को उसकी समग्रता में समझने की जरूरत है ।आज फिर से हमारे कुछ नव निर्वाचित  सांसद भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करवाने की बात कर रहे हैं ।इसके अलावा हिंदी की38 बोलियों के तथाकथित पुरस्कर्ता गृहमंत्रालय के पास उसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करवाने के लिए आवेदन कर चुके हैं।इन बोलियों  में अवधी, ब्रज, बुंदेली, मालवी, कुमायूंनी, गढ़वाली,हरियाणवी, निमाड़ी,राजस्थानी,छत्तीसगढ़ी, अंगिका,मगही, सरगुजिया,हालवी, बघेली इत्यादि का समावेश है। लेकिन सबसे ज्यादा दबाव भोजपुरी और राजस्थानी की ओर से बनाया जा रहा है। भोजपुरी के समर्थक तो अवधी भाषी जनसंख्या एवं साहित्यकारों को भी अपने अंतर्गत दिखा रहे हैं।।

मैं भारत सरकार  से आग्रह करता हूँ कि यह भाषाई राजनीति केवल भोजपुरी और राजस्थानी को स्वतंत्र भाषा का दर्जा देने से खत्म नहीं होगी। यह आरक्षण से भी ज्यादा खतरनाक खेल है जब तक सारी 38 बोलियों को भाषा का दर्जा नहीं मिल जाएगा तब तक वे संघर्षरत रहेंगी। इसके बाद मराठी, गुजराती, बांग्ला समेत दूसरी भाषाओं की बोलियां भी स्वतंत्र भाषा का दर्जा हासिल करने के लिए सन्नद्ध होंगी ।ऐसी स्धिति मे भयावह भाषिक अराजकता फैल जाएगी जिससे निपटना किसी भी सरकार के लिए  आसान नहीं होगा ।केवल वोट की राजनीति के लिए हिन्द और हिंदी के स्वाभिमान पर चोट न की जाए। उसे तोड़ा न जाए। आज जिस भोजपुरी का कोई मानक रूप नहीं है, कोई व्याकरण नहीं है,कोई साहित्यिक परंपरा नहीं है और जिसमें कोई दैनिक अखबार नहीं निकलता है  उसे हिंदी से अलग करने वाले आखिर किस पात्रता के आधार पर बात कर रहे हैं ।इस संदर्भ में महात्मा गांधी का कथन विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि '"जो वृत्ति  इतनी वर्जनशील  और संकीर्ण है कि हर बोली को चिरस्थायी बनाना  और विकसित करना चाहती हो, वह राष्ट्र विरोधी और विश्व विरोधी है ।मेरी विनम्र सम्मति में तमाम  अविकसित  और  अलिखित बोलियों का बलिदान करके  उन्हें हिंदी  (हिंदुस्तानी) की बड़ी धारा में मिला देना चाहिए ।यह देश हित के लिए दी गई कुर्बानी होगी आत्महत्या नहीं ।"यंग इंडिया 27 अगस्त 1925।इसी लक्ष्य को साकार करने का कार्य हमारे संविधान निर्माताओं ने किया है ।इस महादेश में  आंतरिक एकता तथा संवाद का एकमात्र माध्यम बनकर हिंदी ने अपनी  उपयोगिता सिद्ध कर दी है। अंतर्राष्ट्रीय भोजपुरी सम्मेलन के प्रथम अध्यक्ष डाॅ विद्यानिवास मिश्र ने 'हिंदी का विभाजन' शीर्षक  आलेख में लिखा है कि, "जो बोलियों को आगे बढ़ाने की बात करते हैं वे यह भूल जाते हैं कि ये बोलियां एक दूसरे के लिए प्रेषणीय होकर ही इन बोलियों के बोलने वालों के लिए महत्व रखती हैं, परस्पर विभक्त हो जाने पर इनका कौड़ी बराबर मोल न रह जाएगा ।भोजपुरी, अवधी, मैथिली, बुंदेली  या राजस्थानी के लिए गौरव होने का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि हिंदी का अब तक का इतिहास,  एक केंद्र निर्माता  इतिहास झूठा हो जाए और इतने बड़े भू भाग के भाषा- भाषी एक दूसरे से बिराने होकर देश के विघटन के कारण बन जाएँ ।"इस तरह यदि हिंदी का संयुक्त 
आज अपने निहित स्वार्थ के लिए जो लोग हिंदी को तोड़ने का उपक्रम कर रहे हैं वे देश की भाषिक व्यवस्था के समक्ष गहरा संकट  उपस्थित कर रहे हैं ।वे यह नहीं जानते हैं कि हिंदी के टूटने से देश की भाषिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी और देश को एकता के सूत्र में पिरोने वाला धागा टूट जाएगा।वस्तुतः जिसे हम इस देश की राजभाषा हिंदी कहते हैं वह  अनेक बोलियों का समुच्चय है ।हिंदी की यही बोलियां उसकी प्राणधारा हैं जिनसे वह शक्तिशालिनी बनकर विश्व की सबसे बड़ी भाषा बनी है ।लेकिन जो बोलियां विगत 1300वर्षों से हिंदी का अभिन्न अवयव रही हैं उन्हें कतिपय स्वार्थी तत्त्व  अलग करने का प्रयास कर रहे हैं । ऐसी स्थिति में हमें एकजुट होकर हिंदी को टूटने से बचाना चाहिए अन्यथा देश की सांस्कृतिक तथा भाषिक व्यवस्था चरमरा जाएगी ।यहां विचारणीय है कि हिंदी और  उसकी तमाम बोलियां अपभ्रंश के सात रूपों से विकसित हुई हैं और वे एक दूसरे से इतनी घुलमिल गयी हैं कि वे परस्पर पूरकता का अद्भुत  उदाहरण हैं ।यह भी सच है कि हिंदी के भाग्य में सदैव संघर्ष लिखा है ।वह संतों, भक्तों से शक्ति प्राप्त करके लोक शक्ति के सहारे विकसित हुई है।


 आज विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा होने के कारण विश्व की नवसाम्राज्यवादी ताकतें हिंदी को तोड़ने का उपक्रम कर रही हैं ।वे भलीभाँति जानती हैं कि यदि हिंदी  इसी गति से बढ़ती रहेगी तो विश्व की बड़ी भाषाओं मसलन मंदारिन, अंग्रेजी, स्पैनिश, अरबी इत्यादि के समक्ष एक चुनौती बन जाएगी और इंग्लैंड को आज यह भय सता रहा है कि कहीं  ऐसा न हो कि 2050तक अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी वहां की प्रमुख भाषा न बन जाए । अभी कुछ समय पहले पंजाबी कनाडा की दूसरी राजभाषा बना दी गई है और संयुक्त अरब अमीरात ने हिंदी को तीसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा दे दिया है।दूसरी ओर आज हिंदी मानव संसाधन की अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम बन गयी है ।हिंदी चैनलों की संख्या लगातार बढ़ रही है ।बाजार की स्पर्धा के कारण ही सही  अंग्रेजी चैनलों का हिंदी में रूपांतरण हो रहा है । इस दौर में वेब-लिंक्स  और गूगल सर्किट का बोलबाला है  ।इस समय हिंदी में भी एक लाख से ज्यादा ब्लाग सक्रिय हैं ।अब सैकड़ों पत्र- पत्रिकाएँ इंटरनेट पर  उपलब्ध हैं ।गूगल का स्वयं का सर्वेक्षण भी बताता है कि विगत  तीन वर्षों में सोशल मीडिया पर हिंदी में प्रस्तुत होने वाली सामग्री में 94प्रतिशतकी दर से इजाफा हुआ है जबकि  अंग्रेजी में केवल19प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है ।यह  इस बात का द्योतक है कि हिंदी न केवल विश्व भाषा बन गयी है  अपितु वैश्वीकरण के संवहन में  अपनी प्रभावी भूमिका अदा कर रही है। हिन्द और हिंदी की विकासमान शक्ति विश्व के समक्ष एक प्रभावी मानक बन रहे हैं। फलतः कतिपय स्वार्थी तत्त्व हिंदी को तोड़ने में संलग्न हो गये हैं । वे जानते हैं कि हिंदी बाहर की तमाम चुनौतियों का सामना करने के लिए सन्नद्ध हो रही है ।यदि उसे कमजोर करना है तो बोलियों से उसका संघर्ष कराना होगा ।इस लक्ष्य से परिचालित होकर  इस समय हिंदी की 38बोलियां संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने के लिए प्रयासरत हैं । यदि ऐसा होता है तो न केवल हिंदी कमजोर होगी अपितु हिंदी के बृहत्तर परिवार से कटते ही उन बोलियों का भविष्य भी अनिश्चित हो जाएगा। आखिर जो विषय साहित्य, समाज, भाषा विज्ञान और मनीषी चिंतकों का है उसे राजनीतिक रंग क्यों दिया जा रहा है ।


अब तो सर्वोच्च न्यायालय ने भी कह दिया है कि कोई भी राजनीतिक दल जाति, धर्म और भाषा के आधार पर मत नहीं मांग सकता।  हिंदी का प्रश्न अभिनेताओं, नेताओं के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। इस देश के जन समुदाय ने उसे संपर्क भाषा के रूप में स्वतः स्वीकारा है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब  संविधान निर्माताओं ने देश की राजभाषा के रूप में हिंदी का सर्वसम्मति से   चयन किया था तो उन्होंने स्वेच्छा से देश हित में बोलियों का बलिदान करवाया था। यह कुछ वैसा ही कार्य था जैसे देवासुर संग्राम के समय सारे देवताओं ने अपनी- अपनी विशेष शक्तियाँ दुर्गा को सौंप दी थी ।फलतः शक्ति समुच्चय के कारण दुर्गा  असुरों के संहार में समर्थ हुईं ।हिंदी को इसी तरह के दायित्व का निर्वहन विश्व भाषाओं के समक्ष प्रतिस्पर्धी के रूप में करना है ।लेकिन कुछ ऐसी ताकतें जो हिन्द और हिंदी की शुभचिंतक नहीं है वे हिंदी की उन्हीं बोलियों को उसकी प्रतिस्पर्धी बना रही हैं ।यह सारा देश जानता है कि हिंदी  अपने संख्याबल के कारण भारत की राजभाषा है और इसी ताकत के बल पर संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल कर सकती है। लोकतंत्र में संख्या बल के महत्व से सभी परिचित हैं ।यदि भोजपुरी राजस्थानी समेत हिंदी की किसी भी बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची मे शामिल किया जाता है तो हिंदी चिंदी-चिंदी होकर बिखर जाएगी और संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने का लक्ष्य ध्वस्त हो जाएगा । इससे हिन्द और हिंदी के सांस्कृतिक- भाषिक बिखराव की अंतहीन प्रक्रिया आरंभ हो जाएगी जिसे कोई भी सरकार संभाल नहीं पाएगी ।यहां तक कि गांधी, सुभाष विनोबा भावे समेत तमाम विभूतियो का संघर्ष और स्वप्न मिट्टी में मिल जाएगा ।जो कार्य अंग्रेज दो सौ वर्षों के शासन के द्वारा नहीं कर सके वह हमारे बीच के कतिपय स्वार्थी तत्त्व साकार कर देंगे अर्थात 2050तक अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या हिंदी बोलने वालों की संख्या से ज्यादा हो जाएगी और हिंदी को बेदखल करके अंग्रेजी को सदा सर्वदा के लिए प्रतिष्ठित कर दिया जाएगा ।हमारी हजारों वर्षों की सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता  अपनी पहचान खो देंगी । इसलिए देश वासियो को जागने और तत्पर होने की जरूरत है ।हिंदी के संयुक्त परिवार के टूटने से देश की सांस्कृतिक व्यवस्था भी बिखर जाएगी जिसकी फलश्रुति देश की बौद्धिक परतंत्रता में होगी ।जिस तरह गंगा  अनेक सहायक नदियों से मिलकर ही सागर तक की यात्रा करती हैं और  अपने साथ उन नदियों को भी सागर तक पहुंचाती है उसी तरह हिंदी से अलग होते ही बोलियों का अस्तित्व भी संकट में  आ जाएगा। हिंदी हमारी राष्ट्रीय अस्मिता की संवाहक है।वह राष्ट्रीय संपर्क और संवाद का एकमात्र माध्यम है ।यदि हम इस माध्यम अथवा आधार को ही कमजोर कर देंगे तो देश अपने आप कमजोर हो जाएगा ।हमारी भारतीयता कमजोर हो जाएगी । 


अतः मैं देशवासियों से अपील करता हूँ कि यदि हमें भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता को अक्षुण्ण रखना है तो हिंदी के संयुक्त परिवार को टूटने से बचाना होगा और कोई दूसरा विकल्प नहीं है। हिंदी के संयुक्त परिवार को तोड़ने वाले अपने स्वार्थवश आगामी संकट को समझ नहीं पा रहे हैं।इतिहास हमें तटस्थ रहने की छूट नहीं देगा।इस समय जो हिंदी का पक्ष नहीं लेगा उसे भावी पीढियां क्षमा नहीं करेंगी। हम बोलियों के नाम पर आंदोलन करने वाालों से पुनः अपील करता हूँ कि हिंदी को बोलियों से मत लड़ाइए।जिस तरह किसी कद्रीय सत्ता के टूटने के बाद छोटी ताकतें   बाहरी आक्रमण का सामना नहीं कर सकतीं उसी तरह हिंदी के बिखरते ही अंग्रेजी उसकी बोलियों के साथ-साथ समस्त भारतीय भाषाओं के अस्तित्व के समक्ष भयावह चुनौती बन जाएगी।अतः जिस हिंदी की प्राचीर के भीतर बोलियां सुरक्षित हैं उसे टूटने न दें।हमें भारत सरकार से माँग करनी चाहिए कि वह हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं की समस्त बोलियों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए एक स्वतंत्र अकादमी का गठन करे।


Wednesday, November 13, 2019

भूमंडलीकरण औरसमकालीन स्त्री कविता

शोध संक्षेप 
भूमंडलीकरण का प्रभाव बहुत ही व्यापक होता है स यह हम सबको किसी न किसी रूप में प्रभावित करता है स समाज के विभिन्न हिस्सों में इसका प्रभाव बहुत ही भिन्न दृ भिन्न तरह का होता है स कुछ लोग इसे नये अवसर के रूप में देखते है तो कई  लोगो की अजीविका के लिए यह हानि का कारण होता है स भूमंडलीकरण का प्रभाव अर्थव्यवस्था के अतिरिक्त हमारे खान.पानए बोलचाल की भाषाए मनोरंजनए ज्ञान विज्ञान के साथ ही साहित्य पर भी देखने को मिलता है स प्रस्तुत शोध पत्र में भूमंडलीकरण के प्रभावों को स्त्री कविता के माध्यम से रेखांकित किया गया है स भूमंडलीकरण का ही प्रभाव है कि स्त्री रचनाकारो ने गुलामी और यातनाए शारीरिक और मानसिक पीड़ाए आह ! वेदना मिली विदाई से आगे बढ़कर गाँवएसमाजए राष्ट्र और सम्पूर्ण संसार के साथ.साथ राजनीतिक और सामाजिक समस्यायों को भी अपने लेखन का विषय बनाया है स
प्रतावना 
भूमंडलीकरण एक विस्तृत संकल्पना हेतु प्रयुक्त एक शब्द हैए इस शब्द के अनेक पर्याय प्रचलित है यथा. वैश्वीकरणए विश्वग्रामए संसारीकरणए जगतीकरणए सर्वव्यापीकरणए खगोलीकरण इत्यादि स परन्तु सर्वाधिक प्रचलित शब्द भूमंडलीकरण है स व्याकरणिक  पक्ष से इसका अर्थ हुआ कि जो भूमंडल नहीं है उसे भूमंडल बनाना है विभिन्न अकादमिक शास्त्र भूमण्डलीकरण केविभिन्न निहितार्थ रखते है यथा अर्थशास्त्र में यह आर्थिक आयामोंए पूंजीए निजीकरणए उदारीकरणए बाजारवाद एप्रतियोगी परिवेश निर्माण तथा प्रौद्योगिकी परिवर्तन  आदि की विवेचना का संदर्भ है स राजनीतिशास्त्र में सरकारों कि बदलती भूमिकाए नए एवम् जन कल्याणकारी प्रशासनिक  तरीको से संदर्भित होता है स समाजशास्त्रियों के लिए यह सामाजिक एवम् सांस्कृतिक प्रभावो एवम् दुष्प्रभावों के अध्ययन का विषय है ससाहित्य में भूमंडलीकरण भाषाए घटनाए विषय चयन आदि को प्रभावित करता है स वर्तमान में मानव जीवन के हर क्षेत्र में यह अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है स यह राष्ट्र संवाद की परिधि को लाँघकर जनसंवाद के चौराहे तक पहुँच गया है स  जहाँ हर ओर से वस्तुओ के साथ दृ साथ विचार भी आयात एवम् निर्यात किये जा रहे है स भूमंडलीकरण ने साहित्य के विषय क्षेत्र में सर्वाधिक घुसपैठ की है स अब साहित्य में राजाओए शासको की प्रसंशा भरे गीतों से ऊपर उठकर  सीधे तथा तीखे कटाक्ष प्रश्नों का दौर आ गया है 


इतिहास के कुछेक पंक्तियों पर उँगलियाँ फेरो 
          देखोए उस निरंकुश सत्ता को हमने 
          कब का ठुकरा दिया 
                               ;श्मायालोक से बाहरएश्आरतीद्ध 


भूमण्डलीकरण ने बाजारवाद को बढ़ावा दिया है आज हर वस्तु का बाजारीकरण होता जा रहा है स बाजार होते समाज में नारी शोषण का एक अलग ही रूप हमारे सामने आ रहा है एक समय था जब स्त्रियाँ घरो के अंदर यातना भोगती थी परन्तु भूमंडलीकरण के दौर में मीडियाए इंटरनेट के प्रयोग ने स्त्री को समस्त भूपटल पर शोषण का शिकार बना दिया है स मनीषा जैन ष्बाजारष् कविता में स्त्री शोषण का चित्र इस प्रकार प्रस्तुत किया है दृ



चेचक के दानो सा 
                       फ़ैल रहा है 
                       स्त्री के सारे शरीर पर 
                       बाजार 


 मीडिया पर बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव के कारण स्त्री अपनी भाव भंगिमा और अंगो का प्रदर्शन कर रही हैए इसके पीछे मज़बूरी यह है कि   बाजार की माँग अधिक है क्यूंकि उपभोक्ता को आकर्षित करने का यही तरीका रह गया है स बीसवीं सदी में ग्राहक शब्द उपभोक्ता में बदल गया है स  हर व्यक्ति उपभोक्तावादी संस्कृति में मशीन बनकर रह गया है जो महिलायें पहले घर पर ही रहकर सिलाईए कढ़ाई एवम् खाना पकाने कि कला तक ही सीमित थी आज वे भी कारखानों में नौकरी पर जाती हुई मिल रही है दृ
अब हर लड़की भेजी जा रही है 
          शिक्षा के कारखाने में 
          सीखने के लिए कमाने का हुनर 
          अर्थ युग में बढ़ रही है 
कमाऊ औरतो की माँग  
 ये औरते चलता.फिरता.बोलता 
कारखाना बन चुकी हैं 
 एक साथ कई उत्पाद पैदा करती 
एक बड़ी आर्थिक इकाई में बदल चुकी औरतें 
                        ;श्नौकरी पर जाती हुई औरतेश्सोनी पाण्डेयद्ध


भूमंडलीकरण के दौर में भारतीय संस्कृति पर एक भयावह बादल मंडरा रहा है स इसका प्रमुख कारण है  पश्चिमी सभ्यता का अंधाधुंध अनुकरण स इस पश्चिमीकरण में भारतीय लोगों के खानपानए भाषाए घरों की सजावटए पहनावे आदि में परिवर्तन देखने को मिलते है परन्तु आतंरिक रूप से वे अभी भी परम्परागत . रुढ़िवादी सोच से बंधे हुए दिखते है स इसका ज्वलंत उदहारण है कन्या भ्रूणहत्या एवम् महिलाओं के प्रति संकीर्ण विचार स       
मेरा होना बहुमंजिली भवनों के 
       किसी फ़्लैट में सहमी.सी
       प्रताड़ना सहने वाली 
       अंततः जला देने वाली 
                ;श्आत्मसाक्षात्कार सा.कुछएश् नीरजा हेमेंद्रद्ध
अतरू देखा जाये तो लोगों ने बाहरी तौर पर पश्चिम की संस्कृति को अपना लिया है परन्तु आतंरिक रूप से नही स भूमंडलीकरण सम्पूर्ण मानव जन के सुख एवम् हित के प्रयोजन को सामने रखता हैएपरन्तु यह कैसा सुख एवम् हित है जहाँ लोग अपनों के  ही हित से दुखी होते है स  लोगो के बीच संवेदनाएं मरती जा रही है स जहाँ पहले एक व्यक्ति के दुःख में सम्पूर्ण गाँव शामिल हो जाता था वहां अब बहुमंजिला इमारतों में रहने वाले पड़ोसी के बारे में भी जानना उचित नहीं लगता स भूमंडलीकरण की निजीकरण कि नीति ने व्यवसाय तथा उद्यम के साथ दृ साथ परिवारों में भी निजीपन ला दिया है एक ही परिवार के सदस्य अपने दृअपने आप में सीमित होते जा रहे  है स  उनकी जीवन शैली में भी भिन्नता दिखाई देती हैए लोगो के बीच आँसूए अवसादए जज्बातए प्रेम की भावनाएं छल होती जा रही है दृ
अँधेरे के साथ रोशनी का छल 
            झूठी मुस्कान के साथ व्यवहार का छल 
            छुटपन को बडप्पन मानने का छल 
            खुद को प्रतिपल मारते सजाते सँवरते  
            जीने का छल 
                             ;श्रोशनी का छलश्एयशस्विनीद्ध
 भूमंडलीकरण ने कृषि को सबसे अधिक प्रभावित करते हुए इसे विस्तृत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सम्मिलित किये जाने के संकेत दिए है जिसका सीधा प्रभाव किसानो और ग्रामीण समाज पर पड़ा है स कृषि मदों जैसे. बीजए कीटनाशक तथा खाद के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनिया विक्रेता के रूप में प्रवेश कर रही है स नवीन कृषि पद्धतियों के प्रयोग के लिए किसानो को बीजएखाद और कीटनाशकों कि आवश्यकता होती है परन्तु यह बहुत महंगे होते हैए जिसके कारण किसानों पर भारी कर्ज हो जाता है इस कर्ज को चुकाने के लिए किसान अपने बच्चो को कमाने के लिए शहर भेज देते है स गाँव का आदमी गाँव को एक बाधा के रूप में देखने लगता है स डॉ अमरनाथ लिखते है दृश्दूर.दराज के उन क्षेत्रो में जहाँ  लोगो को साफ पेय जल या सड़कें व अन्य मौलिक सुविधायें उपलब्ध नहीं है टीण्वीण् कि पहुँच के कारण लोग काल्पनिक दुनिया व यथार्थ में फर्क करना भूल चुके है सश्
गाँव में हर गाँववासी बनना चाहता था 
      बड़ा आदमी 
      और बड़ा आदमी बनने के इस सपने में 
      गाँव एक बाधा कि तरह आता
      हर ऱोज 
 ;श्जब गाँव में थेश्ए नेहा नरुकाद्ध
वैश्वीकरण के दौर में स्त्री.पुरुष के संबंधो में बहुत परिवर्तन हुआ है जिसे ष्लिव इन रिलेशनशिपष् के नाम से जाना जाता है स भारत जैसे देश में इस तरह के रिश्ते भारतीय परम्परा पर करारा प्रहार हैए भारत में वैवाहिक  सम्बंध दो व्यक्तियों का ही नहीं अपितु दो परिवारों का मिलन   होता है स लिव इन रिलेशनशिप स्त्रियों के लिए अच्छा है या बुरा इसका पता आने वाला वक्त ही बताएगाए ऐसे देश में जहाँ स्त्री और पुरुष की  मित्रता भी संदिग्ध दृष्टी से देखी जाती है ऐसे देश में यह परिवर्तन किस प्रकार स्वीकार्य होगा स ऐसा समाज जो आज भी पुत्र कि कामना में बेटियों की गर्भमें ही हत्या कर देता है वह स्त्री को इतनी बड़ी आजादी कैसे दे पायेगा स श्अनब्याही औरतेश् कविता में ष्अनामिकाष् लिखती है दृ
ऐसो से क्या खाकर हम करते है प्यार 
       सो अपनी वरमाला 
       अपनी ही चोटी में गुंथी 
       और कहा खुद से 
       एकोअहम बहुस्याम 


 


निष्कर्ष दृ
   भूमंडलीकरण कि व्याख्या जितनी जटिल है उतना ही इसके प्रभाव एवम् दुष्प्रभाव का आकलन स कुछ इसे संस्कृति एवम् परम्पराओ का विनाशक मानते है कुछ संस्कृतियों के इस मिलन को मानव सौहार्द के लिए उत्तम मानते है स एक ओर ये विश्व ग्राम कि कल्पना को साकार कर  ष्वसुधैव कुटुम्बकम्ष् की भारतीय  परम्परा को बल देता है दूसरी ओर यह भारतीय परम्पराओं रीति रिवाजों पर कुठाराघात भी करता है स यह संकल्पना विदेशी सरकारों से संबंध तो सुदृढ़ करती है किन्तु बहुदेशीय संकायों के शासन में दखल से ईस्ट इंडिया कम्पनी कि पुनरावृत्ति का भय भी दिखाती है स  
स्त्री कविता अनुपात में तो बहुत कम है परन्तु रचनाकारों की रचनाओ में भूमंडलीकरण के आने से कुछ तो बदलाव आया है अब स्त्री लेखक घर कि चारदिवारी से  राजनीति  के आखाड़े तक में अपनी प्रतिभा दिखा रही है स यह देखा जाता है कि आत्म निर्भर स्त्रियों पर  आरोप लगता है कि उसने पश्चिमी सभ्यता के अनुपालन में भारतीय परंपरा एवम् मूल्यों को ताक पर रख दिया है और इसी तराजू पर तौली जाती है उनकी रचनाधर्मिता स भूमंडलीकरण के इस दौर ने स्त्री को नया पाठक वर्ग दिया है जो कम से कम रचना का तो लिंग भेद नहीं करता स उपसंहारात्मक रूप में ये कहा जा सकता है कि भूमंडलीकरण एक वास्तविकता है जिसे बदला नहीं जा सकता स जरुरत तो इस बात की  है कि उपभोक्तावादीए बाजारवादीए निजीकरणए उदारीकरण सबके प्रभावों से सचेत रहते हुए अपनी लेखनी की उपयोगिता को बचाना होगा तभी साहित्य और भाषा प्रवाहमान रहेंगे अन्यथा लगातार ठहरा हुआ जल भी अपना अस्तित्व खो देता है स      


सन्दर्भ ग्रंथ सूची -
ऽ प्रभा खेतान ए बाजार के बीच रू बाजार के खिलाफ ए वाणी प्रकाशन ए21.ए  दरियागंज ए नई दिल्ली .110002
ऽ पुष्पपाल सिंह ए भूमंडलीकरण और हिंदी ए राधाकृष्ण प्रकाशनए प्राण्लिण् 7ध्31 एअंसारी रोड ए दरियागंज  नई दिल्ली .110002
ऽ पुष्पपाल सिंह ए21वीं शती का हिंदी उपन्यास ए राधाकृष्ण प्रकाशनए प्राण्लिण् 7ध्31 एअंसारी रोड ए दरियागंज  नई दिल्ली .110002
ऽ डॉण् अमरनाथ ए हिंदी आलोचना की परिभाषिक शब्दावली ए राजकमल प्रकाशन नई प्राण् लिण्ए1.बीए नेताजी सुभाष मार्गए नई दिल्ली .110002
ऽ श्यामाचरण दुबे ए मानव और संस्कृति ए राजकमल प्रकाशन नई प्राण् लिण्ए1.बीए नेताजी सुभाष मार्गए नई दिल्ली .110002
ऽ डॉण् माणिक मृगेश ए भूमंडलीकरणएनिजीकरण व हिंदी ए  वाणी प्रकाशन ए21.ए  दरियागंज ए नई दिल्ली .110002
ऽ मधु धवन ए बोलचाल की हिंदी और संचार ए वाणी प्रकाशन ए21.ए  दरियागंज ए नई दिल्ली .110002
ऽ ीजजचेरूध्ध्ूूूण्ीपदकपेंउंलण्बवउध्बवदजमदजण्ंेचगघ्पकत्र3


 


रामचरित मानस में ‘किन्नर’ शब्द

प्रकृति ने नर और नारी का सृजन किया जो समाज का आधार स्तम्भ बने। जो प्रकृति निर्माण में सहयोगी हुए। इन दोनों लिंगों के अलावा तीसरा स्तम्भ भी है। उन्हें कोई खास दर्जा नहीं मिला, उन्हें 'किन्नर' अथवा 'तृतीय लिंगी' नाम से सम्बोधित किया जाता है। किन्नर भी सभ्य समाज का एक अंग है जो सभ्य समाज से ही पैदा हुआ है। माँ के गर्भ की खराबी के कारण 'किन्नर' रूप में उत्पन्न हुआ है, वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार। लेकिन सभ्य समाज के लोग इन्हें हेय या अजीबोगरीब दृष्टि से देखते हैं। हमेशा सभी के जेहन में यह प्रश्न जरूर उठता है 'किन्नर' कहाँ से आये हैं। ये बात अलग है समय और अनुभव के साथ समाज में पता चलता है कि ये नर और नारी से उत्पन्न ही है। फिर भी साहित्य की दृष्टि में इसके भी विभिन्न सर्वनाम मिलते हैं जैसे-पौराणिक ग्रन्थों, वेदों, पुराणों और साहित्य में किन्नरों को हिमालय क्षेत्र में बसने वाली अति प्रतिष्ठित व सम्पूर्ण आदिम जाति माना गया है। इनके वंशज हिमालय क्षेत्र किन्नौर के निवासी माने जाते हैं। महापंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा 'किन्नर देश और हिमालय' पुस्तक के अनुसार 'यह किन्नर देश है। जो हिमालय में किन्नर या किंपुरुष देवताओं की एक योनि मानी जाती थी। इस क्षेत्र को आजकल किन्नौर या किन्नौरा कहते हैं। अतएव चनाव नदी के तट पर आज भी किन्नौरी भाषा बोली जाती है। सप्तपटिक के 'विमानवत्थु (ईसा पूर्व द्वितीय तृतीय सदी) में लिखा है-'चन्द्रभागा नदी तीरे अहोसिं किन्नर तदा'- जिससे स्पष्ट है कि पर्वतीय भाग के चनाव तट पर उस समय भी किन्नर रहा करते थे। महाकवि भारवि ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'किरातार्जुनीय' महाकाव्य के हिमालय वर्णन खण्ड (पाँचवाँ सर्ग, श्लोक-17) में किन्नर, गन्धर्व, यक्ष तथा अप्सरा आदि देव-योनियों के किन्नर देश में निवास होने का वर्णन किया वायुपुराण में महानील पर्वत पर किन्नरों का निवास बताया गया है।
साहित्य में किन्नरों की उत्पत्ति के मिथक सत्य बहुत हैं जो तथ्यों के आधार पर प्रमाणिक भी हैं और मिथक अवधारणाएँ भी हैं। किन्नरों सम्बन्धी एक धारणा यह भी है कि ब्रह्मा जी की छाया से किन्नरों की उत्पत्ति हुई है इसके अतिरिक्त अरिष्टा और कश्यप ऋषि से भी किन्नरों की उत्पत्ति मानी जाती है। वात्स्यायन कृत 'कामसूत्र' में किन्नरों को तृतीय प्रकृति कहा गया है जिसके नवम अध्याय में किंपुरुष एवं किंपुरुष इसका उल्लेख मिलता है-द्विविधा तृतीयाप्रकृतिः स्त्रीरूपिणी पुरुषरूपिणी च। अर्थात् तृतीय प्रकृति दो प्रकार की होती है। एक स्त्री रूप में दूसरी पुरुष रूप में।
भारतीय समाज में प्राचीनकाल से ही किन्नरों की भूमिका रही है। इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। भरतमुनि ने ब्रह्माजी द्वारा नाट्यवेद को जानकर प्रथमतः अपने जिन सौ पुत्रों (105 की कुल संख्या) अथवा शिष्यों को नाट्यकला का अध्ययन कराया तथा अभिनय में पारंगत किया उनमें एक नाम 'रश्ण्ड' भी है। यह शण्ड नामधारी नर्तक व व्यक्ति विशेष नहीं, प्रत्युत तृतीयलिंगी हो सकती है।
किन्नर समाज को भले ही आधुनिक युग में हेय और अपमानजनक दृष्टि से देखा जाता हो। आदिकाल, मध्यकाल और भक्तिकाल में इनका स्थान विशेष रहा है। इनकी बुद्धि और शक्ति को दर्शाया गया है। महाभारत में किन्नर रूप में शिखंडी और ब्रह्नल्ला का स्थान विशेष है। शिखंडी एक किन्नर थी, जो विद्या, बुद्धि और बल में अपराजिता थी उसके जन्म के बारे में महाभारत में लिखा है-
शिखंडिनं तमासाद्य भरतानां पितामह।
अवर्यतज्ज संग्राम स्त्रीत्वं तस्यसात्रुसंस्मरन्।।
महाभारत महाकाव्य में भीष्म ने स्वयं कहा है कि मुझे शिखंडी ही हरा सकता है-
'शिखंडी समरारामर्षी सूरश्व स्रमितिअजयः।
यथा भवत्स्त्री पूर्व पश्चात् पुंस्तवं समागत।।'
शिखंडी रूपी किन्नर को भीष्म ने बार-बार प्रणाम किया।
वाल्मीकि कृत रामायण के उत्तरकांड में वर्णित किन्नरों की प्रत्यक्ष उपस्थिति मिलती है। इसमें राजा प्रजापति वर्दभ के पुत्र इल की कथा के माध्यम से किन्नरों की उत्पत्ति के मिथकीय प्रमाण मिलते हैं और किन्नरों को देव की सन्तान कहा है-
'अत्र किंपुरुषीभूत्वा शैलीरोधसी वत्स्यथ आवामस्तु
गिरावस्मिन मीनाक्षी शीघ्रमेव विधीयताम्।'
भीष्म ने स्वयं पांडव सेना को कहा है कि तुम्हारी सेना में जो महारथी द्रुपद पुत्र प्रायः शत्रुओं को जीता करता है, वह पहले स्त्री था और पीछे से पुरुष हो गया। 
किन्नरों का वर्णन बुद्धि, विद्या और बल में सामथ्र्य रखते हुए चित्रित किया है। आदिकवि वाल्मीकि जी रामायण के सृजनकर्ता हैं। मध्यकाल में रामचरित मानस के सृजनकर्ता के रूप में गोस्वामी तुलसीदास जी धरा पर प्रकट हुये। जिन्होंने राम के शील, सौन्दर्य और शक्ति रूप को जन-जन के आगे रखा। रामचरित मानस में तुलसी के राम का शान्तिमय और सुखमय राम को चित्रित किया है जो रामचरितमानस में राम का आदर करते हैं, राज का सम्मान करते हैं, राम के मित्र हैं, राम के जो आस-पास भी हैं उनहें भी राम की तरह रामचरित मानस में आदर और सम्मान मिला है। राम की भक्ति में जो किसी न किसी तरह से लीन है, राम का सूक्ष्म से सूक्ष्म सहयोगी भी है।  गोस्वामी तुलसीदास के लिए वो आदर और सम्मान का अधिकारी है। तभी तो तुलसीदास कृत रामचरित मानस में किन्नर शब्द का छब्बीस बार प्रयोग हुआ है। किन्नरों की भक्ति को दर्शाया है। इस प्रसंग का उल्लेख मानस में तुलसी करते हैं-
'जथा जोगु करि विनय प्रणाम।
विदा किए तब सानुज रामा।
नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे,
सब सनमामि कृपानिधि फेरे।।'
उत्तरकाण्ड में तुलसीदास जी कहते हैं कि मेरे रघुनाथ की भक्ति में लीन नारी निस्वार्थ और निश्चल भक्ति देख मेरे अन्दर भी भाव विभोर हो गये। करुणासागर के मन में तरंगें उठने लगी। तब श्रीराम ने उनको वरदान किया कि कलयुग में तुम्हारा राज्य होगा और तुम लोग जिसको भी आशीर्वाद दोगे उसका कभी अनिष्ट नहीं होगा। रामचरित मानस में ही राम की भक्ति के सम्बन्ध में कहा गया है कि-
पुरुष नपुंसक नारि वा, जीव चराचर कोई
सर्व भाव नाज कपट तजि, मोहि परम प्रिय सोई।
(उत्तरकाण्ड, 87 (क))
रामचरित मानस में किन्नरों द्वारा कुम्भ में स्नान की परंपरा के सूत्र मिलते हैं जिसमें माघ मास में जब सूर्य का स्थान मकर राशि में होता है तब एक तीर्थराग प्रयाग को आते हैं। देवता, दैत्य, किन्नर और मनुष्य के समूह सब त्रिवेणी में स्नान करते हैं।
माघ मकरगति रवि जब होई,
तीरथपति आव सब कोई।
देव, दनुज, किन्नर, नर, श्रेणी,
सादरमज्जहिं सकल त्रिवेणी।।
रामचरित मानस एक वृहद महाकाव्य है। गोस्वामी जी द्वारा रचित रामचरित मानस भारतीय संस्कृति के अधिकांश पक्षों को समाहित किया हुआ महाग्रन्थ है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, ''गोस्वामी जी की रामचरित मानस वह दिव्य कृति है जिससे जीवन में शक्ति, सरसता, प्रफुल्लता, पवित्रता सब कुछ प्राप्त हो सकता है।''
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, ''तुलसीदास का सारा काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है। लोक और शास्त्र का समन्वय, गार्हस्थ्य और वैराग्य का समन्वय, भक्ति और ज्ञान का समन्वय, भाषा और संस्कृत का समन्वय, निर्गुण और सगुण का समन्वय, पांडित्य और अपांडित्य का समन्वय, 'रामचरित मानस' शुरू से आखिर तक समन्वय का काव्य है।''
प्रेमशंकर तुलसी और रामचरित मानस से प्रभावित होकर लिखते हैं कि 'राम तो मूल्यों का महापुंज है ही, पर तुलसी की राम कथा के सभी पात्र स्वयं को प्रमाणित करते हैं। भरत की भक्ति, लक्ष्मण की सेवा, हनुमान का समर्पण अन्य सभी पात्रों का विवेकपूर्ण निष्ठा, उनकी कार्य प्रक्रिया में चरितार्थ होती है।''
विश्वनाथ प्रसाद मिश्र 'मानस' के महत्व को दर्शाते हुए लिखते हैं ''रामचरित मानस वह अक्षय विभूति है, जिसके कारण भारत केवल सम्पन्न ही नहीं है, गर्व से अपना सिर भी ऊपर उठाये हुए है। इस मानस के गर्भ में छिपे मोतियों की ज्योति से कितने ही मन-मन्दिर दैदीप्यमान हुआ करते हैं, वह ज्योति दीन-हीन के झोंपड़े में ही नहीं, महाराजाओं के प्रदीप्त प्रसादों में भी अपनी हवलिया से तमराशि को धोया करती है। हम मानस की लोल-लहरियों में कितने ही हंस, बक, काक आदि अच्छे व बुरे, डुबकियाँ लगाया करते हैं। जो भले हैं, उनकी सात्विकता का विकास होता है और बुरे हैं उनका बाह्य और अभ्यन्तर दोनों का मालिन्य हट जाने से स्वच्छ हो जाते हैं।''
उपरोक्त सभी परिभाषाएँ बताती हैं कि रामचरित मानस एक ऐसा महाकाव्य है जिसमें भारत के संस्कारों और संस्कृति की गौरव-गाथा का वर्णन है। रामचरित मानस एक अथाह सागर है और विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों, प्रदेशों और राष्ट्रों ने अपनी-अपनी आवश्यकता के अनुसार उसमें से अमूल्य रत्न ग्रहण किया है और यह प्रक्रिया सदैव जारी भी रहेगी। रामचरित मानस में हर जाति, हर सम्प्रदाय, हर धर्म की बात है। संसार की हर चीज का वर्णन रामकाव्य में मिलता है। चाहे वो दलित विमर्श हो या आदिवासी विमर्श, पर्यावरण हो या सौन्दर्य वर्णन, सभ्यता हो या संस्कृति हर चीज का पुंज, महापुंज है रामकाव्य। तुलसीदास कृत रामचरित मानस में भी किन्नर विमर्श मिलता है या रामचरित मानस में 'किन्नर' शब्द का प्रयोग किया। गोस्वामी तुलसीदास ने कुल मिलाकर छब्बीस बार किन्नर-समाज को साधु हृदय से याद किया है।
सिद्ध तपोधन जोगिजन सुर किंनर मुनिवृंद।
(बा. कां.-105)
तुलसीदास जी कहते हैं कि किन्नर महादेव के भक्त हैं, किन्नर शिव की स्तुति के सबसे बड़े गायक हैं। 'किन्नरै स्तुयमान'। ग्रन्थों में किन्नर समाज को देवताओं का एक भाग माना है। किन्नर देव जाति है जिसको अंग्रेजी में 'सेमीगाॅड' कहते हैं। तो रामभक्त तुलसीदास ने भी किन्नरों की वंदना की, किन्नर शब्द का प्रयोग करके तुलसीदास जी ने समन्वय के अर्थ को पूर्ण से सम्पूर्ण कर दिया। रामचरित मानस और गोस्वामी तुलसीदास जी के बारे में 'समन्वय की विराट चेष्टा' खूब कही लेकिन सही अर्थों में रामचरित मानस के गहन अध्ययन से यह जरूर पता चलता है कि तुलसीदास जी का मन रामभक्ति में रमा हुआ था। तुलसी के राम और रामचरित मानस सम्पूर्ण लोक और प्रकृति में रचे-बसे थे। रामचरित मानस में जिस प्रकार राम वन्दनीय है उसी तरह हर पात्र को वन्दनीय बनाया हुआ है जो रामभक्त है। जो तुलसी के राम को आशीष देते हैं, तुलसी के राम को आशीर्वाद देते हैं तो तुलसी के लिए वो तुलसी हृदय वासी बन जाते हैं। इसी तरह जब सीता स्वयंवर होता है जानकी जी का विवाह रघुनाथ से होता है। जानकी ने राम के कण्ठ में जयमाला पहनायी, तब किन्नरों ने उन्हें आशीर्वाद दिया और गायन किया। राम को ब्रह्मा रूप माना है, ईश्वर माना है। तीनों लोकों के पालनकर्ता की जब पृथ्वी पर माता सीता से विवाह गठबन्धन होता है, उस समय किन्नर उन्हें आशीष देते हैं यानि देवों के देव को किन्नर आशीर्वाद देते हैं। तभी गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-
'राम ब्रह्म परमारथ रूपा।'
जयमाला के समय किन्नर राम के लिए शुभगीत गाते हैं। खूब आशीष देते हैं। इसका वर्णन रामचरित मानस की इन दो पंक्तियों में मिलता है। तुलसी जी बाल-काण्ड 71 (घ) में कहते हैं-
देव दनुज नर खग प्रेत पितर गंधर्व,
बंदउॅ किंनर रजनिचर कृपा करतु अब सर्व।।
तुलसीदास जी जब रामचरित मानस की रचना करते समय शुरुआत में भी 'बंदऊँ किंनर' कहकर किन्नर समाज की वंदना करते हैं। कहते हैं कि मैं जो रामचरित मानस लिख रहा हूँ आप मुझे अपना आशीर्वाद दो ताकि मैं अपने कार्य में सफल हो जाऊँ। गोस्वामी तुलसी दास जी ने 'किन्नर समाज' की बहुत शालीनता, मर्यादा से देवतुल्य, देव संतान मानकर 'किन्नर समाज' की वंदना की। गोस्वामी तुलसीदास जी के लिए 'किन्नर समाज' भी श्रीराम की तरह प्रिय था। क्योंकि उन्होंने भी राम वंदना की है वो भी रामभक्त थे। चित्रकूट में रामप्रसंग में 'किन्नर समाज' का वर्णन है।
भक्ति की पावनता एक कसौटी है, पवित्र कसौटी है। जब राम का वनवास हुआ था, तब राम वन में गये, तमसा नदी को पार किया, भगवान राम के वनवास से पूरी अयोध्या विकल हो उठी थी, उनके पीछे चलने लगी तो सबको प्रभु ने कहा, आप लौट जाओ। चैदह साल के बाद मैं आऊँगा। हे नर समाज! आप लौट जाओ। हे नारी समाज आप भी लौट जाओ। आप चैदह साल अवध में रहो। सबको सँभालो।
सभी लोग चले गये, चैदह साल की यात्रा पूरी कर, रघुनाथ राम आये तो तमसा के तट पर जब प्रभु राम उतरे तो एक समाज वहीं बैठा था। उन्होंने प्रभु राम के आते ही हर्ष-उल्लास से उनका स्वागत किया। तब श्रीराम ने पूछा आपको कैसे पता, हम आने वाले हैं, आप कब आये। तब किन्नर समाज ने कहा, 'प्रभु आप जब ये तट छोड़कर गये थे तो आपने नर और नारी को जाने के लिए कह दिया था। लेकिन हम न नर हैं न नारी, आपने हमें जाने के लिए नहीं कहा, इसलिए हम आपकी राह देखते थे कि आप कब आओगे। प्रभु राम का मन भावुक हो उठा। 'किन्नर समाज' ने प्रभु की राह देखने के लिए नींद भी नहीं ली। उनकी आँखें नींद से उभरी हुई और प्रभु की याद में रो-रोकर भी भरी हुई थी। चैदह साल तक 'किन्नर समाज' प्रभु राम की विरह वेदना में ऐसे ही बैठा रहा। श्रीराम ने हाथ जोड़कर उनकी वंदना कर, उन्हें गले से लगा लिया। भगवान राम ने किन्नर समाज का स्वागत किया और अपने साथ चलने का आग्रह किया। तुलसी ने रामचरित मानस में इस समाज को प्रेम दिया है। भगवान राम ने इस समाज को प्रेम किया है। रामचरित मानस ने इस समाज को स्नेह, आदर, प्रेम दिया है। तुलसी जी ने लिखा है-
पुरुष नपुंसक नारि वा, जीव चराचर कोई
सर्व भाव नाज कपट तजि, मोहि परम प्रिय सोई।
(उत्तरकाण्ड, 87 (क))
जब चित्रकूट में राम जी वनवास के समय आये तो सभी देवता, पाताल के नाग सभी स्वर्ग और पाताल के निवासी राम के दर्शन के लिए आये तब किन्नरदेव भी आये यानि 'किन्नर समाज' को (किन्नर देव) कहा गया। रघुनाथ राम ने सभी स्वर्ग, पाताल के नाग देवों, अन्य दिशाओं से आये देवताओं के साथ 'किन्नर समाज' को भी प्रणाम किया। यानि पौराणिक काल में किन्नर समाज को देवो तुल्य माना जाता था। आज समय परिवर्तन होते-होते, इस समाज की दशा और दिशा विचारणीय हो गई। जिन्हें देवों की सन्तान माना गया, जिन्हें लोकनायक राम प्रणाम कर वंदना करते हैं। आज उसी 'किन्नर समाज' को हमारे सभ्य समाज में हीन माना जाता है। गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस, पौराणिक ग्रन्थों का आधार ग्रन्थ है, जिसमें 'किन्नर समाज' का भी संवाद मिला है। तभी रामचरित मानस में बहुत सुंदरता से, वंदनीय, मर्यादा से 'किन्नर समाज' को दर्शाया है।
आज हमें अपनी पौराणिक ग्रन्थों को जानने की आवश्यकता है कि हम तकनीकी युग में तो आधुनिक हो गये लेकिन पता नहीं कि मानसिक ग्रन्थि का शिकार है जो ऐसे समाज या वर्गों की संवेदनाओं, भावनाओं को देखकर भी नहीं देख पाते। जो गोस्वामी तुलसीदास जी ने देखी। किन्नर समाज का या किंनर शब्द का जहाँ भी प्रयोग हुआ वहीं रामभक्ति और उस समाज का सुखद रूप दिखाया। ये ही गोस्वामी तुलसीदास जी की विशेषता है और रामचरित मानस की समन्वयवादी, सुखमय दृष्टि और दृष्टिकोण है। जो समाज के हर मानस का सुख चाहता है। समाज के हर मानस की उन्नति और विकास चाहता है। सच में तुलसीकृत रामचरित मानस समाज के हर मानस को सुंदर सृष्टि का अनुभव कराता हुआ, हर मानस को विकास की ओर अग्रसर होने की दशा व दिशा प्रदान करता है।


संदर्भ
1. राहुल सांकृत्यायन-किन्नर देश में, पृ. 346
2. महाभारत भीष्म पर्व (उनहत्तरवाँ सर्ग), पृ. 453, श्लोक 29 भाषानुवाद सहित, ऋषि कुमार (सनातन ध्यार्म यंत्रालय)
3. वाल्मीकि कृत रामायण, 99वाँ सर्ग, श्लोक-22
4. तुलसीदास, रामचरित मानस, अयोध्याकाण्ड-398/4
5. वही, उत्तरकाण्ड-87 (क)
6. वही, पृ. सं. 87(क)
7. तुलसीकृत रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड-134/1
8. वही, पृ. 134/2
9. मोरारी बापू कृत 'मानस किन्नर', पृ. 4, 5


Featured Post

*समीक्षा* -परंपरागत ढ़ांचे से बिल्कुल भिन्न है काव्य संकलन "आरंभ उद्घोष -21वीं सदी का" - डॉ प्रेम भारती

इस अनोखे काव्य संकलन से गुजरते हुए यह एहसास होता है कि जैसे संपादिका   अनुपमा अनुश्री ने बहुत ही कुशलता से 51 रचनाकारों ...