Thursday, April 30, 2020

कहानी  (अनंत यात्रा)

दादा जी रोज की तरह मोहल्ले की सैर करने के बाद आज रात घर लौटे। लेकिन फर्क इतना था कि अन्य दिनों वे जल्दी शाम को घर आ जाते थे, पर वे आज घर देर से लौटे। पोती ने दादाजी को प्यार से चुलबुली लहजे में फटकार लगाते हुए कहा-क्या, दादाजी आप कहां रूक गए थे? हम आपका इंतजार करते रहे। दादाजी ने रोज की तरह मुस्कुराते हुए कहा कि-बेटा, मेरा एक ही तो मित्र है-चंदन, और तो कोई इस दुनिया में रहे नहीं। वह काफी दिनों से अस्वस्थ चल रहे हैं, मुझे पता चला तो वहीं मिलने चला गया था। पोती ने अपने को संभालते हुए कहा-कैसी है अभी उनकी तबियत? यही पहले बता देते तो क्या होता! दादाजी ने जवाब में कहा कि-बेटा मुझे भी शाम को घर से निकलने के बाद ही पता चला, और रही बात तबियत की तो, बेटा उम्र ही ऐसी है उंच-नीच लगा रहना तो स्वाभाविक है। मुझसे उन्होंने अपने साथ बिताए पल को ताजा कर लिया, उसमें कुछ ऐसे क्षण थे कि हम जिंदगी रहते तक भूल ही नहीं सकते।


पोती ने दादा को पुचकारते हुए खाना खाने हेतु बिठाकर भोजन परोसा। पोती को यह पल इतना सुखद लग रहा था कि इस तरह का पल सदा ही मिलता रहे। खाना खाने के बाद सभी लोग सो गए। इधर दादाजी अपने छोटे से खाट पर लेटे अपने मित्र के साथ कुछ समय बिताए पल की मानों समीक्षा कर रहे थे। पोती भी लेटे सोच रही थी कि पता नहीं क्यों? लोगों ने अन्य दिनों से कुछ ज्यादा ही आज दादाजी से लगाव रखा, क्योंकि दादाजी भी कुछ थे ही इस तरह के। वे किसी के सुख के समय भले ही न मिलें हो, पर लोगों के पास दुख में बिना बुलाए खबर लगते ही दौड़ जाते थे। वे अपने उम्र में किसी का दिल कभी नहीं दुखाया। उसने अपने कंधों से न जाने कितनों को अंतिम बिदाई दी। वे इसे एक सुखद अनुभव के रूप में देखते थे। उन्हें मालूम है सबको एक दिन यहां से जाना है। चाहे जीव-जंतु हो या पेड़-पौधे, कोई यहां अमर नहीं है सभी चलायाम हंै, इसलिए किसी की शव यात्रा में शामिल होकर कंधा देने को अपना सौभाग्य समझते थे।


दादाजी अपने पोती को बताते हैं कि हमारे गांव में पहले सभी परिवार की तरह रहते लोग एक दूसरे के दुख-सुख में शामिल होते थे। हम जब छोटे थे तो गांव की अब बड़ी बस्ती पचीस-पचास घरों से अधिक नहीं होती थी। छोटी बस्ती तो दस बीस घरों तक ही सीमित होती थी। यदि किसी के घर मंगल कार्य होता तो ऐसा लगता मानों हमारे ही घर में कुछ हो रहा हो। यदि किसी घर में दुखद या कोई घटना होती तो सारा गांव सिहर उठता था। दादाजी इस बात को लेकर आज भी चिंतित हो उठते हैं कि हर गांव की जनसंख्या बढ़ रही है, लोग बढ़ रहे हैं, सारा गांव तरक्की कर रहा है ऐसे में मानवता की मिसाल घटते जा रही है यह भी बढ़ते रहता तो कितना अच्छा होता। क्या लोग इतने बड़े हो गए कि उसके पड़ोस में अगर कोई इस दुनिया को छोड़कर चला गया, तो उनके अंतिम दर्शन के लिए भी लोगों के पास वक्त नहीं! वे इसी अपने मन की बात को जिज्ञासा लिए हर एक व्यक्ति के पास उत्तर मांगते।  इस बात का संतुष्टि पूर्ण जवाब किसी के पास नहीं मिलता था, इसलिए वे कभी-कभी और भी ज्यादा दुखी हो जाते थे। दूसरे दिन दादाजी फिर रोज की तरह सबेरे चार बजे ही निकल गए। वे टहलकर आते हैं, अपने नित्य कर्म कर पूजा-पाठ में लग जाते हैं तब कहीं जाकर अन्य लोगों की सुबह होती है। उम्र भी लगभग सौ के आसपास हो चुकी है पर उनके क्रियाकलाप तो अच्छे-अच्छे जवानों को भी थका देती है। 


आज सबेरे से निकले हैं अभी तक घर नहीं लौटे। राम भरोसा यह दादाजी का नाम है वे मुझे बहुत प्यार करते हैं सुबह शाम मुझे याद करते हैं उनकी प्यारी दमयंती जो हूं। वह मेरे बिना नहीं रह सकते मैं उनके बिना नहीं। इसलिए दादाजी नहीं दिखे, तो घर में बिना बताए मैं उन्हें खोजने निकल गई।  बाद में याद आया कि बाबूजी को इत्तिला कर देना था, क्योंकि बाबूजी भी मुझे अपने नजरों से ओझल नहीं होने देते थे। पोती खोजते इतना दूर निकल चुकी थी कि अब वापस आना भी संभव नहीं हो पा रहा था। पैदल चलते थकान भी होने लगी थी। दादाजी का कुछ पता नहीं चल पाने के कारण उसे कुछ सूझ भी नहीं रहा था। लोग अपने-अपने काम के लिए निकल पड़े थे। चौक चौराहों पर रोज की तरह शोरगुल का वातावरण शुरू हो चुका था।


एकाएक बाबूजी के किसी मित्र की नजर पोती पर पड़ी। वे काफी दूर निकल चुके थे फिर भी लौटकर आए और बिना किसी रोक-टोक के बेधड़क  सवालों की बौछार लगा दी। उनका यह लहजा भी जायज था। सबेरे-सबेरे अकेले, वह भी काफी दूर पैदल...। पोती ने सांसे थामते हुए कहा-चाचाजी, दादाजी सबेरे से निकले हैं लेकिन वे घर नहीं पहुंचे, इसलिए मैं उन्हें खोजते हुए यहां तक आ  गई। चाचा ने बताया कि तुम्हारे दादाजी के पुराने मित्र चंदन का रात को इंतकाल हो गया है उनके मित्रों में वे ही इकलौते इस दुनिया में थे वे नहीं रहे, हो सकता है वे उनके यहां गए हों ! इतना सुनते ही पोती दमयंती बिना वक्त गंवाए अपने दादा के मित्र चंदन के यहां पहुंच गई। वहां का वातावरण ऐसा था कि किसी को कुछ पूछने की जरूरत भी नहीं पड़ी। लाश के समीप लोगों की कुछ लोगों की भीड़ जरूर थी, पर दादाजी कहीं नजर नहीं आए। इसी बीच घर में दमयंती के बाबूजी को भी दादाजी के मित्र की न रहने की खबर मिल गई। वे भी चंदन के शव यात्रा में जाने की तैयारी कर रहे थे। इधर दमयंती की बेचैनी बढ़ती गई। रास्ते में बाबूजी से दमयंती की मुलाकात हो गई। दोनों के मिलने पर चेहरे के भाव एक दूसरे के मन में चिंता की लकीर स्पष्ट बयां कर रहे थे। फिर भी सहमते हुए दमयंती ने कहा-बाबूजी मुझे माफ कर दीजिए। मैं बिना इत्तला किए बाबूजी को खोजने घर से निकल पड़ी पर वे कहीं दिखाई नहीं दिए।


बाबूजी ने दमयंती को सांत्वना देते हुए ईश्वर की कृपा से सब कुछ ठीक होने की बात कहकर बेटी को घर जाने कहा। इधर रामभरोसा को घर लौटते वक्त खबर लग गई कि उसका इकलौता मित्र भी अब उसका साथ छोड़ दिया है। दादाजी से लगभग कुछ फलांग की दूरी पर उसका मित्र का घर था। उन्होंने उल्टे पांव अपने मित्र के घर चलने की सोचने लगे। जैसे ही मुड़े, चौक में बाजे की दुकान में इस तरह गीत बज रहे थे, कि मानों कोई जश्न का माहौल बनने वाला है। कुछ ही कदम के बाद उन्होंने देखा कि चंद रूपयों के लिए कुछ लोग खून खराबा में उतर आए हैं। फिर कदम बढ़ाए ही थे कि उनकी नजरों के सामने किसी तेज रफ्तार वाले मोटर ने किसी बेकसूर को लहूलुहान कर दिया। चंद मिनटों में इतना कुछ देखने के बाद जिंदगी में कभी न टूटने वाले इस बूढ़े शरीर को अब लगने लगा कि एक कदम चलना भी एक युग के समान हो गया है। वह इतने थके से लगने लगे कि एक शव जो इस दुनिया को सदा के लिए छोड़ चुका है उसे देखने या उनके परिवार के पास सांत्वना देने के लिए भी लोगों के पास वक्त कम पड़ रहा है। यहां तो इस हालात में लोगों का लहू इस कदर बह रहा है कि जीते जी उनकी कोई कीमत नहीं। फिर मृत शरीर का क्या मोल? इसी कारण लगता है कि कोई किसी की परवाह नहीं कर रहा है। यह सोचते एक मंदिर की सीढ़ियों पर जाकर कुछ देर आराम करने की सोची। इस बीच उनके शरीर का एक-एक अंग मानों थमता सा जा रहा था। अब मंदिर के आंगन में लेटे वे भगवान को इस तरह निहार रहे थे कि शायद भगवान ही अब सारे प्रश्नों का उत्तर दें। इसी सोच के उतार-चढ़ाव में मानों भगवान के चरणों में अपने शरीर को समर्पित कर निकल पड़े उस अनंत यात्रा की ओर जिसका कहीं अंत ही नहीं...।


लेखक


डा. दीनदयाल साहू


पता-प्लाट न. 429, सड़क न.-07


माडल टाऊन, नेहरू नगर भिलाई



लघुकथा - कोरोना का ख़ौफ़

         पिछले कुछ दिनों से हर जगह कोरोना के बारे में लगातार खबरे चल रही है।अनिल इन बातों से काफी परेशान है।हर समय मन मे एक व्याकुलता बनी हुई है।अनिल एक पचास वर्षीय व्यक्ति है और एक हार्ट पेशेंट भी है।लगातार इन खबरों से एक घबराहट सी उसके मन मे बन गयी हैं।

 

          21 दिन के लॉक डाउन के कारण वो घर से भी कहीं नही निकल पा रहा था।लेकिन उसके इर्द गिर्द ये खबरे लगातार चल रही थी। एक ह्रदय रोगी होने के कारण उसे इन बातों से काफी डर लग रहा था।घर के अंदर भी हर स्थिति में उसे इन बातों को सुनना ही पड़ रहा था।

 

          श्याम को अपने मन को खुश करने के लिए वह पार्क में जाकर बैठा। घर के पास ही पार्क था इसलिए उसे इसमें बैठे में कोई आपत्ति नहीं लगी। लेकिन वहाँ भी जितने भी लोग उसके आसपास में बैठे हुए थे।वो सब भी कोरोना से मरने वाले लोगों के बारे में ही बातें कर रहे थे यहां आकर भी उसका मन काफी व्याकुल रहा।

 

           सारी बातों से थक कर दोबारा वो अपने घर चला गया।घर पर आने के बाद अपने मन से एक मूवी लगाई। तभी उसके बेटे ने बोला पापा कहीं समाचार लगा लो।समाचार लगाने के बाद फिर से वही खबरें उसे परेशान करने लगी।परेशान होकर अनिल अपने कमरे में पहुंचा और कमरे में जाने के बाद सो गया उसका मन काफी परेशान था।

 

          अनिल के मन मे कोरोना का ख़ौफ़ कुछ इस कदर हो गया था कि उसे बहुत देर तक तो नींद ही नही आई और ना जाने कब उस की आँख लग गयी और वो सो गया।सुबह जब अनिल के बेटे ने उसे काफी देर से उठाया और अनिल नही उठा।तब अनिल के बेटे को पता चला कि अनिल अपनी जीवन खो चुका था।

 

         कोरोना से जो होना था वह तो बाद की बात है लेकिन बार-बार उन्हीं बातों को सुनते-सुनते अनिल के दिल पर इतना जोर पड़ा कि शायद रात को ही उसने अपने प्राण त्याग दिए।

 

           *कहानी का सार सिर्फ इतना है कि लोगों को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इस तरीके के रोगियों के सामने कोरोना वायरस से होने वाली परेशानियों के बारे में हर समय जिक्र नहीं करते रहना चाहिए। कहीं ऐसा ना हो कि लोगों की बातें किसी के लिए खतरनाक बन जाए। कृपया ऐसे रोगियों से इस तरीके की बातें लगातार ना करें और उन्हें इन बातों से दूर रखे।*

 

 

नीरज त्यागी

ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश ).

Tuesday, April 28, 2020

उभरेगा कवि सम्मेलनों का डिजिटल स्वरूप






 



















 



















संसार का सार्वभौमिक नियम है परिवर्तन और इसी परिवर्तन के कारण ही संसार संचालित भी है। दशकों पहले जब मनोरंजन के संसाधन सीमित थे तब न तो टेलीविज़न था न ही अन्य कोई संसाधन, तब नुक्कड़ नाटकों, मैदानों में होने वाली रामलीला, मेले, हास्य मंच व कवि सम्मेलनों की दुनिया भी जीवित और स्वीकार्य थी।धीरे-धीरे बदलाव आते गए, सिनेमा और टेलीविज़न का दौर आया, फिर छोटे पर्दे की धमक हुई। इसी से मनोरंजन के साधनों में बदलाव आने लगे। गोष्ठियों और सम्मेलनों की हिस्सेदारी फिर भी बनी रही, और यशस्वी भी हुई। किन्तु वर्तमान युग अब इंटरनेट युगीन हो रहा है। समय की अपनी मर्यादाएँ भी हैं और पसंद-नापसंद का अपना चक्कर। ऐसे दौर में नए ज़माने ने फिल्मों और शॉर्ट फिल्मों ने भी वेब सीरीज़ में अपना अस्तिव बनाना आरम्भ कर लिया है।

 

वर्तमान में कोरोना संकट से समूची मानवजाति संकट में है, और अर्थव्यवस्था की तो बात ही करना खतरा है।  ऐसे दौर में मनोरंजन, राष्ट्र जागरण, गीत-संगीत और हास्य के लिए आयोजित होने वाले कवि सम्मलेनों पर भी संकट आना स्वाभाविक है। क्योंकि यह व्यवस्थाएँ प्रायोजक आदि पर निर्भर करती हैं और अभी देशबन्दी के बाद प्रायोजकों का मुख्य ध्यान तो स्वयं की आर्थिक कमर मज़बूत करने पर होगा, विज्ञापन आदि के खर्चों में कटौती होना स्वाभाविक है। तब ऐसे समय में वो क्या करेंगे जो केवल कविता या कवि सम्मेलनों पर ही आश्रित होकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं! कविता और कवि सम्मेलन या छोटे स्वरूप में कहें तो काव्य गोष्ठियाँ ये न तो मिटेंगी न ही कमज़ोर होंगी। सच तो यह है कि कवि सम्मेलन का अपना स्तर होता है और वह प्रायोजक पर निर्भर करता है। संकट और देशबन्दी के हालात में निश्चित तौर पर अभी कुछ माह तो संकट रहेगा।फिर बाज़ार के स्वस्थ और सुचारू होते वह भी पटरी पर आ जायेगा।

 

इसी बीच कवियों को यूट्यूब, फेसबुक एवं स्वयं की वेबसाइट के माध्यम से ऑनलाइन काव्य रसिक श्रोताओं तक अपनी ऊर्जावान रचनाएँ उपलब्ध करवानी चाहिए। इससे दो फ़ायदे होंगे, एक तो यूट्यूब, गूगल इत्यादि से विज्ञापन प्राप्त होंगे और आय का स्त्रोत बनेगा, दूसरा प्रसिद्धि मिलेगी, नए श्रोता मिलेंगे, जो निश्चित तौर पर हालात सामान्य होने पर और आपको पसंद करने के चलते कवि सम्मेलन में सुनना चाहेंगे। यह भी व्यावसायिक दृष्टिकोण से लाभकारी है।

साथ ही निकट भविष्य में छोटे पर्दे के साथ-साथ वेब सीरीज़ जैसे  नेटफ्लिक्स, हेशफ्लिक्स, अल्ट बालाजी, अमेज़ॉन प्राइम जैसे अनेकोनेक प्लेटफॉर्म पर भी कवियों के लिए विशेष कार्यक्रम बनेंगे जो आय के स्त्रोत के रूप में उभरेंगे।

वैसे वेब सीरीज़ का भी अपना अलग मिजाज़ है, उस पर व्यक्तिशः पसंद-नापसंद के मापदंडों और घटकों-सामग्रियों (कंटेंट) की गुणवत्ता के आधार पर आर्थिक लाभ में कम-ज़्यादा होना चलता रहता है।

निकट भविष्य में वेब सीरीज़ का दौर आने वाला है। लोग 250 से 300 रुपये महीना केबल ऑपरेटर को देने की बजाए ओटीटी (ओवर दी टॉप) ऑनलाइन स्ट्रीमिंग वेबसाइट्स प्लेटफार्म वालों को सालाना सब्सक्रिप्शन ख़र्च देना पसंद कर रहे हैं और यह लोगों की पहली पसंद बन भी गई है।

ऐसे नए दौर में कवि सम्मेलनों को भी ओटीटी प्लेटफार्म पर आने में देर नहीं लगेगी। यह भी कवि सम्मेलनों का भविष्य कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं है।

भारत में ओटीटी प्लेटफॉर्म की दस्तक के साथ ही भारत की वीडियो स्ट्रीमिंग इंडस्ट्री इस दौर में अब तेज़ रफ़्तार के साथ आगे बढ़ रही है। यानी दर्शकों की पहुँच में सुलभ मनोरंजन का माध्यम है ओटीटी प्लेटफॉर्म ।

 

"ओवर-द-टॉप" (ओटीटी) मीडिया सेवाएँ मूल रूप से ऑनलाइन सामग्री प्रदाता हैं जो स्ट्रीमिंग मीडिया को केवल उत्पाद के रूप में वितरित करती हैं। इसे वीडियो-ऑन-डिमांड प्लेटफॉर्म के रूप में भी समझा जा सकता है। भारत समेत दुनिया भर में ओटीटी (ओवर द टॉप) प्लेटफॉर्म दर्शकों के बीच अपनी ख़ा जगह बना रहे हैं, लेकिन यही प्लेटफॉर्म मीडिया के पारंपरिक माध्यमों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। भारत में ओटीटी प्लेटफॉर्म के पास बड़ा यूज़र बेस है और इन प्लेटफॉर्म पर किसी भी समय अपना मन-पसंद कंटेन्ट देख पाना ही दर्शकों को और करीब लेकर आ रहा है।

 

भारत में नेटफ्लिक्स और वाल्ट डिज़्नी (हॉटस्टार)अपने कंटेन्ट विस्तार के लिए कई मिलियन डॉलर का निवेश कर रहे हैं। इन सभी ओटीटी दिग्गज भारत जैसे बड़े बाज़ार में अपनी जगह सुनिश्चित करना चाहते हैं। इनके अलावा ज़ी5, ऑल्ट बालाजी, अमेज़न प्राइम, टीवीएफ़ जैसे घरेलू प्लेटफॉर्म भी घरेलू दर्शकों को रिझाने के लिए रणनीति के साथ आगे बढ़ रहे हैं। ये सभी प्लेटफॉर्म क्षेत्रीय भाषाओं में कटेंट का निर्माण कर रहे हैं और घरेलू प्लेटफॉर्म पर सब्स्क्रिप्शन भी औसतन सस्ता है।

भारत की वीडियो स्ट्रीमिंग इंडस्ट्री अब तेज़ रफ़्तार  के साथ आगे बढ़ने के लिए तैयार है। बीते साल प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में वीडियो स्ट्रीमिंग इंडस्ट्री 21.82 प्रतिशत की रफ़्तार के साथ साल 2023 तक 11 हज़ार 977 करोड़ रुपये की इंडस्ट्री बन जाएगी। आज उपभोक्ता स्मार्ट उपकरणों की एक विस्तृत श्रृंखला के माध्यम से अपने स्वयं के मीडिया की खपत को नियंत्रित कर सकते हैं और ओटीटी सेवाओं का उपयोग करके चैनलों को लेकर अपने व्यक्तिगत चयन को सुनियोजित कर सकते हैं।

 

ऐसे दौर में कवियों को भी अपने घटकों (कंटेंट) की गुणवत्ता को निखार कर इस दिशा में आगे आना चाहिए, ताकि इस अवसर का लाभ उठाने में कवियों की यह तकनीकी समृद्ध पीढ़ी पीछे क्यों रहें।

 

*डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'*

हिन्दीग्राम, इन्दौर






ये भारत है

ये भारत है

सीधा है सच्चा है कुछ कर गुजरने का जज्बा है

जितना है वो काफी है,जो है वो ही पर्याप्त है

संकट कोई भी या वक्त कैसा भी जब सामने आए

हमारे जज्बे से न लड़ पाए

ये भारत है

जिसके लिए ह्रदय भावनाओं से ओतप्रोत हो जाता है लेकिन

जिसकी व्याख्या के लिए शब्दकोष के शब्द कम पड़ जाते हैं

परिभाषाएँ संकीर्ण प्रतीत होने लगती हैं लेकिन

संभावनाएं असीमित दिखने लगती हैं

ये भारत है

अनेकों उम्मीदों को जगाता 

असंख्य आशा की किरणें दिखाता

ये भारत है

 

ग़ज़ल

जिसने हर कष्ट से उभारा है
सुख में तू उसको भूल जाता है


इश्क की इंतहा बताएगी
कौन राधा है कौन मीरा है


भूल जाओ मुझे सितमगर तुम
अब यही वक़्त का तक़ाज़ा है


डूब के मर गए कई इसमें
तब से सागर का पानी खारा है



Saturday, April 25, 2020

स्वप्न - बेटी का बाप

1-----स्वप्न - बेटी का बाप (Poem)-----


वो दरवाजे पे खड़ी मुस्कुरा रही थी
चिड़ियों को देख खिलखिला रही थी
तभी मां ने पीछे से उसको गोद में उठाया
और वह जोर से चिल्लाई "पापा ओ पापा"
"देखो ना! माँ मुझे खेलने नहीं दे रही"
और अचानक से मेरी नींद खुल गई
घडी में सुबह के 9 बज रहे हैं
अरे! मुझे तो देर हो गई.. आज तो बॉस पक्का काम से निकलेगा
मेरा ये रोज का सपना मुझे देश से निकलेगा
कल मन की बात उसको बोलूंगा
मुझे अब बेटी का बाप बनना है
उसकी तोतली आवाजों से मुझे पापा सुनना है
हर रोज सोचता हूँ आज बोलूंगा और हर रोज डर जाता हूँ
क्या करूँ, अजीब उलझन है.. दोनों की!
उसे एक ही बच्चा रखना है और मुझे अपना सपना सच करना है और उसे अपना करना है
ये कैसी औरत है भगवान! जिसे सिर्फ बेटा ही रखना है
तभी पीछे से आवाज आई, क्या बात है.. आज आपने चश्मा नहीं पहना..
अरे नही! देदो! देर हो रही है ऑफिस के लिए..
सुनो..मुझे कुछ कहना था..
जानती हो आज फिर वही सपना मुझे आया
खुद को बेटी का बाप बना पाया|
रोज रोज बोलती हूँ बेटी नही बेटा चाहिए
और तुमको बेटी ही क्यू चाहिए??
अब उसको क्या बोलू
बेटी के सारे त्याग कैसे तोलु
कैसे कहूं कि वो बेटी ही है जो हर रिस्तो के ताने बाने को बूना है
माँ बाप की खुशियों के लिए हर दर्द सहा है
बेटों का क्या आज मेरे कल बीबी के होंगे
उनके लिए सब रिस्ते भरम होंगे
जिसको हम आज चलना सिखाएंगे
वही कल हमको अनाथश्रम छोड़ आएंगे
थोड़ी देर बाद उस आश्रम में बेटी आएगी
और रोते हुए बोलेगी पापा हम आपको घर ले जायेंगे....

 


2 ----- मां------------

मां यदि तुम होती,,
सारे सपने मेरे होते..इन सपनों का मै होता।
घर का आंगन.. घर में झूला,
इन झूलों पर मै होता।
मां यदि तुम होती,,
सारे सपने मेरे होते..
ना होती कोई कविता, कहानी,
ना ही अब मैं रोता हूं,
तेरे बिन ना जाने कैसे
इतनी राते सोता हूं।
सिर पर आंचल, होठ पर लोरी,
इन लोरी में मैं होता,
मेरी मुट्ठी मे आंचल ,
इन आंचल का मैं होता,
मां होती यदि पास मेरे तुम
रात चैन की मैं सोता।
मां यदि तुम होती,,, सारे सपने मेरे होते इन सपनों
का मै होता...
बड़ा हुआ हूं अब मैं,
पर याद तुम्हारी आती हैं,
घर से ऑफिस, ऑफिस से घर
बिना टिफिन के जाता हूं,
भूखे आता भूखे रहता
भूखे ही सो जाता हूं।
मेरे टिफिन में भी रस मलाई,
इन रस मलाई का मैं होता
मां यदि तुम होती
बिन खाए मैं ना सोता
मां यदि तुम होती... सारे सपने मेरे होते,,,,
इन सपनों का मैं होता।।।


 

3------------कोरोना-------
हर घर में यहीं नारा है,
कोरोना को हराना है।
इसने कैसा चक्कर चलाया,
बड़े बड़ों को घर में बैठाया,
अब इसको भी भागना है,
फिर से घूमने जाना है।
थाली से सब्जी गायब ,
मुंह से पान और मावा गायब,
महंगा दौर जमाना हैं,
फिर से पनीर पापड़ खाना है।
कोरोना को हराना है।।

 

 

4---------कोरोना------

ऐ कोरोना हमसे तुम डरो ना,
हम चीन नहीं हम पाक नही,
हम भारत के नवाब है।
मेरा कुछ नहीं जायेगा,
तेरा काम तमाम हैं।
जहां मोदी  जैसे मंत्री,
और डाक्टर मेरे भगवान हैं,
वहां तू क्या कर पायेगा,
जहां २४ घण्टे  पुलिस तैयार है।
ऐ कोरोना हमसे तुम डरो ना।।


 


नाम: ऋचा पांडे


पुस्तक विमर्शर (ष्आश) की आस निरास न भई

आम तौर पर अपने दैनंदिन जीवन की यादों को सहेजने के लिए लोग डायरी लिखते हैण् इस अच्छी आदत का लाभ तब सामने आता है जब पकी उम्र में याददाश्त कमजोर पड़ने से इंसान को अतीत में झाँकने में कठिनाई होने लगती हैण् फ़्लैश बैक में अपनी ही तस्वीर धुंधली नज़र आने पर दशकों पूर्व लिखे डायरी के पन्ने समय की गर्द साफ़ करने का काम करते हैंण् लेकिन डायरी के पन्नों में लिखी विगत को जस का तस छाप देने भर से प्रकाशित पुस्तक आत्मकथा की श्रेणी में नहीं आ जातीण् इन्दौर की श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति के साहित्य मंत्री हरेराम वाजपेयी ष्आशष् की सद्य प्रकाशित आत्मकथा ष्पांच से पचहत्तर तकष् को पढ़ते हुए इसी विडम्बना की अनुभूति होती हैण् 
चूँकि वे समिति की प्रतिष्ठित पत्रिका ष्वीणाष् के प्रबंध संपादक भी हैंण् ऐसे में एक वरिष्ठ साहित्यकार की आत्मकथा के पुस्तक रूप में प्रकाशित होने पर जिस सुगढ़ भाषा शैलीए लेखकीय प्रवाह और संपादन कौशल की सहज अपेक्षा पाठकों को होती हैए उसका यहाँ घोर अभाव हैण् ख़ास तौर पर जब यह आत्म कथा समूचे मालवांचल की शीर्ष साहित्य संस्था श्री मध्य भारत हिन्दी साहित्य संस्था के पदाधिकारी और जीवन भर हिन्दी के लिए तनए मन धन से समर्पित बिरले हिन्दी सेवी की आत्मकथा के रूप में आपके हाथों में पहुंची होण् पुस्तक पढ़ते समय रोचक प्रसंगों का तारतम्य बार बार टूटता हैण् बीच बीच में अतिरिक्त पृष्ठों पर दिए गए तीस.चालीस रंगीन छायाचित्र लेखक के शब्द चित्रों का रसभंग कर पुस्तक को आत्मकथा के बजाय  स्मारिकाध् अभिनन्दन ग्रन्थ का रूप देते नज़र आते हैंण्  
करीब दो सौ पृष्ठों की इस राम कहानी में बहुतेरी घटनाएँ ऐसी हैं जो समय सापेक्ष होने से प्रायः उस ज़माने के हर व्यक्ति के जीवन संघर्ष में घटी हैंण् वाजपेयीजी की बुलंद आवाजए जुझारू प्रवृत्ति  और दबंग स्वभाव से उनके संपर्क में आने वाला हर व्यक्ति अच्छी तरह परिचित हैण् इसकी मिसाल उनके बचपन की उस घटना में मिलती है जिसका उल्लेख ष्आत्मकथाष् में हुआ है. श्स्कूल के शहरी लड़कों ने जब शहर में उठना बैठना सीख रहे अपने नए गंवई सहपाठी को ष्हरे रामण्ण् हरे रामष् कहकर चिढाना शुरू किया तो दबंगई प्रकट होना ही थीण् एक दिन इसी बात से खफा हरेराम ने एक नामाकूल की जमीन पर पटक कर वो धुनाई कीए कि मजमा ख़त्म होते ही बाकी लड़कों ने उन्हें क्लास का मॉनीटर चुन लियाण् पर स्कूल प्रबंधन को दादागिरी की यह हरकत नागवार गुजरीण् परिणाम स्वरुप नूतन का विज्ञान संकाय छोड़कर पास ही के महाराजा शिवाजी राव हायर सेकेंडरी स्कूल में भूगोल विषय लेना पड़ाण्श्  
अपनी आत्मकथा में वाजपेयीजी ने रचनाए सम्मानए पुरस्कारए यात्रा वृत्तान्तए विदेश यात्राएंए हवाई यात्राएंए पर्यटनए तीर्थाटन आदि से लेकर हर उस शख्स का नामोल्लेख किया है जिनसे वे जीवन में एकाधिक बार मिले अथवा जिनका सान्निध्यध् सहयोग उन्हें मिलाण् यहाँ तक कि जिन दिवंगत लोगों की अंतिम यात्रा में वे व्यथित ह्रदय से सम्मिलित हुएए डायरी में लिखा वह ब्यौरा भी उन्होंने पुस्तक में साझा किया हैण् आत्मकथा में उन्होंने गाँधी हॉल से अकस्मात स्कूटर चोरी जाने का वाकयाण्ण् बेटे की शादी के रिसेप्शन में आज की मशहूर गायिका और तब की बेबी पलक मुछाल द्वारा गीत गाने तक का जिक्र किया हैण् पुस्तक में उनके अखिल भारतीय बैंक अधिकारी महासंघ के अध्यक्ष पद तक पहुँचने का रोचक वर्णन हैण् इसके अलावा यूको बैंक के मंडल कार्यालय में हिन्दी अधिकारी के बतौर हासिल उपलब्धियों का जिक्र भी है और मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति से जुड़कर संस्था में साहित्य मंत्री के पद तक पहुँचने की दास्तान भीण् 
हिन्दी में पिछले पांच दशकों से गद्य एवं पद्य दोनों विधाओं में निरंतर लेखन कर रहे वाजपेयीजी की रचनाएँ नईदुनियाए दैनिक भास्करए पत्रिकाए स्वदेशए हितवाद के अलावा वीणाए समावर्तनए समीराए मालविकाए गन्धर्वए मरू गुलशनए गोलकुंडा दर्पणए अर्पण समर्पणए मानस संगमए राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना आदि में छपती रही हैंण् पिछले बाईस सालों में उनके तीन काव्य संग्रह. ष्बिना किसी फर्क केष् ;1998) ष्ताना बानाष् ;2012) और ष्कोपल वाणीष् ;2014द्ध प्रकाशित हुए हैंण् हिन्दी के शलाका पुरुषए शब्द शिरोमणिए देव भारतीए जन काव्य भारतीए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति सहित मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का जहूरबख्श सम्मान भी उन्हें राज्यपाल के हाथों मिल चुका हैण् देवआनंद की तरह पचहत्तर साल से ऊपर के इस ष्चिर युवाष् हिन्दी सेवी की फिटनेस का अंदाजा उनसे मिलने वालों को हर मुलाकात मेंसहज ही हो जाता है        ;लेखक वरिष्ठ पत्रकारए समीक्षक और स्तंभकार हैं



लेखकर: हरेराम वाजपेयी (ष्आशष)
प्रकाशकरू हिन्दी परिवार' इन्दौर 



Friday, April 24, 2020

 मां सुखदायिनी (कविता)   


हे जननी तू बड़ी सुखदायिनी जीवनदायिनी।

जीवन के सफर गाऊं तेरे उपकार की रागिनी।।

 

जादू की छड़ी है बिन बोले तूने मेरी हरेक बात जानी। 

बीमारी ठीक होने के लिए तूने परमेश्वर से लडाई की ठानी।।

 

खोली संस्कारी पाठशाला तुझ सा नहीं कोई सानी। 

खुद मुसीबत थी तूने अपने लला की मुसीबत जानी।। 

 

कुकृत्य से रोकती तूने हर रग रग लला की पहचानी। 

ऋणी हूं ऋणी रहूंगा उऋण हूंगा तब तक बात ठानी।।

 

सुकृत्य करुं तेरी परवरिश झलके कर्मों हो यही निशानी।

परमेश्वर का रूप ही तेरा बात में मैंने मन ली यही ठानी।।


 

 

हीरा सिंह कौशल गांव व डा महादेव सुंदरनगर मंडी


Tuesday, April 21, 2020

कहानी ‘‘ग्राहक देवता’’

         
‘ग्राहक देवता’,
          पता नहीं मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है, जब भी किसी दुकान पर कोई सौदा-सुलुफ आदि खरीदने जाता हंूॅ, उस समय तो कोई ग्राहक नहीं दिखेगा। अमूमन...दुकानदार मक्खी मारता ही नजर आयेगा, लेकिन मेरे वहांॅ पहुंॅचते ही अगले चार-पांॅच मिनट में पता नहीं कहांॅ से ग्राहकों का ऐसा रेला सा उमड़ पड़ता है कि मुझे अपना सामान आदि खरीदने में दिक्कत तो होती ही है, दुकानदार भी मुझे छोड़कर अन्य ग्राहकों से निबटने में लग जाता है, जिससे कभी-कभी तो मिनटों के काम में घण्टों लग जाते हैं।
          भले ही मुझे आधा-आधा किलो ही फल खरीदना था, पर त्यौहारी पूजा-पाठ की वजह से पत्नी की तरफ से पांॅच प्रकार के फल खरीदने की हिदायत दी गयी थी। झोला मैं घर से ही लेकर चला था। खरीदारी की लिस्ट निकालकर याद करते हुए ‘शकूर भाई फल वाले’ की दुकान पर जब मैं पहुंॅचा तो वहांॅ कोई ग्राहक नहीं था। बताता चलंूॅ...शकूर भाई पूर्व में फलों के थोक व्यापारी थे, पर इधर कुछ वर्षों से स्वास्थ्य कारणों से, हमारी कालोनी से आगे चैराहे पर, फलों की ये छोटी सी दुकान ही चलाते हैं। हांॅ, मिजाज से थोड़ा अक्खड़ भी हैं। शायद उम्र का असर हो। शकूर भाई अपनी दुकान में फलों के अलावा टाफियांॅ, बिस्किट, ब्रेड, मक्खन और दूध आदि भी रखते हैं, जिससे उनकी दुकान पर लगभग हरवक्त खरीदारों की खासी भींड़ रहती है। परन्तु आज दुकान में कोई ग्राहक न देखकर इत्मिनान हुआ कि चलो...आराम से एक-एक फल छांॅट-छांॅट कर निकाल लंूॅगा, ताकि हड़बड़ी में वो कोई सड़ा-गला फल आदि न तौल दें, या मुझसे ही कोई सड़ा-गला फल आदि देखने में चूक न हो जाये।
         शकूर भाई, जिनकी उम्र लगभग सत्तर साल के आसपास होगी, के साथ आज उनकी बेगम भी दुकान में बैठी दिखीं। मैंने अन्दाजा लगाया, शायद त्यौहारी सीजन होने के कारण वो उनकी मदद के लिए आयी होंगी। दुकान में उनकी बेगम का काम अमूमन ये होता है कि खाली समय में वो अलग-अलग टोकरियों में अलग-अलग फलों, जैसे...किन्नू, बेर, शरीफा, सन्तरे, मौसम्मी, नाशपाती, सेव, अनार और कुछ अन्य विदेशी फलों आदि को करीने से सजाकर लगाती रहतीं हैं। जिस कारण दुकान में फलों की सजावट देखते ही बनती है। शकूर भाई का मानना है कि टोकरे में रखे सजे-धजे फलों को देखकर ग्राहक आकर्षित होते हैं। शायद...इसी कारण वो बाजदफे फलों से सजे-धजे टोकरों को हाथ लगाने पर ग्राहकों को रोकते-टोकते भी रहते हैं। कहते हैं...‘ज्यादातर ग्राहकों के छांॅटने-बीनने से फलों की ढ़ेरी तो खराब होती ही है, उन्हें दुबारा से लगाने में वक्त भी जाया होता है।’ 
          बहरहाल...मेरी उपरोक्त मान्यता कि किसी भी दुकान पर जाते ही ग्राहकों का तांता सा लग जाता है, यहांॅ भी भंग नहीं हुई। शकूर भाई से मैं अभी आधा किलो सन्तरों के बाद, आधा किलो सेव तौलवा ही रहा था कि दो मोटर-साइकिलें उनकी दुकान के सामने आकर रूकीं।
          ‘‘हांॅ, भई! अनार कैसे दिये?’’ बिलकुल दुकान से सटकर अपनी मोटर-साइकिल लगाते, सीट पर बैठे-बैठे ही उस मोटर-साइकिल सवार युवक ने शकूर भाई से अनार के भाव पूछे।
          ‘‘अरे, चाचा! ये सन्तरे कैसे दिये?’’ शकूर भाई पहले वाले ग्राहक को कुछ बताते, कि उसी मध्य दूसरा मोटर-साइकिल सवार, जिसने अपनी मोटर-साइकिल, दुकान से थोड़ा हटकर खड़ी की थी, ने उनसे सन्तरों के भाव पूछे।
          ‘‘मुझे आधा-आधा किलो नाशपाती और अनार भी दे दीजिएगा। क्या भाव दिये हैं?’’ उन ग्राहकों द्वारा अनार और सन्तरों की मांॅग करते सुन, जैसे मुझे भी बाकी फलों की याद आयी। 
          ‘‘क्यों, मियां! ये पपीते कैसे दिये?’’ शकूर भाई मेरे लिए अनार तौल ही रहे थे कि तभी दुकान के सामने एक सफेद रंग की कार आकर रूकी। उसमें से दो औरतें और एक अधेड़ सज्जन बाहर निकले। अधेड़ सज्जन ने दुकान के सामने आकर, शकूर भाई से पपीतों के भाव पूछे।
          ‘‘चालीस रूपये किलो।’’ शकूर भाई ने उन्हें पपीतों के भाव बताये।
          ‘‘ठीक है, दो किलो दे दीजिए।’’ कहते वो अधेड़ सज्जन सामने की टोकरी से पपीते छांॅटने लगे। कार से उतरी दोनों महिलाओं में से एक, कार से पीठ टिकाए अपने मोबाॅयल पर बतियाने में मशगूल हो गयी, और दूसरी महिला शकूर भाई की दुकान के बगल स्थित स्टेशनरी की दुकान पर चली गयी। 
          ‘‘अरे चाचा! हम तो इनसे पहले आये हैं। पहले हमें अनार दे दो, देर हो रही है।’’ सामने खड़े मोटर-साइकिल पर आये युवक ने कुछ-कुछ शिकायती लहजे में कहा।
          ‘‘हांॅ-हांॅ, आप ही को पहले दंूॅगा भाई साहब। लेकिन ये भी तो बताइये, कितना तौलना है? आपने तो पिछले पांॅच मिनट में लगभग तीन किलो अनार छांॅट लिये हैं। चाहिए कितना, ये तो बताइये? और हांॅ, मिले-जुले साइज के अनार लेने होंगे। हम इस तरह छांॅट-छांॅट कर अनार नहीं बेच पायेंगे।’’ शकूर भाई ने उस ग्राहक से तनिक तल्ख स्वर में कहा।
          ‘‘मुझे बस्स...एक किलो ही तो लेना है।’’ उस ग्राहक ने इत्मिनान से कहा। 
          ‘‘वाह! भाई साहब। लेना एक किलो है, और आपने छांॅट लिये लगभग तीन किलो। आप जैसे दो-चार ग्राहक और आ जायें, तब तो हो गयी हमारी दुकानदारी। ऊपर से टोकरी में रखी अनार की मेरी सारी ढ़ेरी भी खराब कर दी आपने।’’
          ‘‘तो क्या हुआ? इसमें से एक किलो दे दीजिए। ढे़रियांॅ फिर से बना लीजियेगा।’’ इस बार उस ग्राहक ने अपने दोनों कण्धे उचकाते हुए अत्यन्त लापरवाही से जवाब दिया। 
          ‘‘अच्छा, आप अपना झोला लेकर इधर आइये। मैं आपके लिए एक किलो अनार तौल रहा हंूॅ।’’ शकूर भाई ने उस युवक से तनिक नाराजगी भरे स्वर में, अनार की टोकरी के सामने से हटकर अपने बगल में आने के लिए कहा।
          ‘‘अरे मियां, हमें टेªन पकड़ना है, प्लीज जरा हमारे लिये ये दो किलो पपीते तौल दीजिए। हमें बस्स...ये पपीते ही खरीदने हैं।’’ कार से उतरे उस अधेड़ सज्जन ने अनुनयपूर्वक कहा।
          ‘‘अरे चाचा! तो हम्मैं कउन सी दुकान खरीदनी है?’’ युवा ग्राहक, उन अधेड़ सज्जन से लगभग उलझने की मुद्रा में मुखातिब हुआ। 
          ‘‘ठीक है भाई, आप ही पहले ले लीजिए। अरे मियां! पहले इन्हीं सज्जन को दे दीजिए।’’ अधेड़ सज्जन ने मानो असमय का बवाल टालने की गरजवश, समस्या का समाधान किया हो।
          ‘‘अरे, चाचा! आपने हमें अभी सिर्फ दो फल ही दिये हैं। हमें तीन फल और चाहिए।’’ मैंने उसी बीच हस्तक्षेप किया।
          ‘‘बाउ जी, आप तो रोज वाले हैं, इसी कालोनी में रहते हैं। थोड़ा इत्मिनान रखिये। अभी सबको सौदा मिला जाता है। पहले इन सज्जन को पपीते तौल दंूॅ। इन्हें टेªन पकड़नी है।’’ शकूर भाई ने मुझसे निवेदन किया।
         ‘‘और हांॅ, मुझे इस केले की घौद में से एक-एक दर्जन केले भी दो जगह दे दीजिएगा।’’ अब उस  मोटर-साइकिल सवार युवक ने अपनी नई मांॅग बतायी।
         ‘‘देता हंूॅ भाई जरा इत्मिनान रखिये। केला देने में कुछ समस्या है। मेरा चाकू नहीं मिल रहा। अब इन बूढ़ी हड्डियों में इतनी जान नहीं है, जो केले को घौद हाथों से तोड़ सकंूॅं। इन्हें काटना पड़ेगा।’’  शकूर भाई ने उससे यंूॅ अनुरोध किया।
         ‘‘चाचा, हमें भी इसी घौद से एक दर्जन केला दे दीजिए।’’ इस बार मोटर-साइकिल सवार दूसरे युवक ने फरमाइश की।
         ‘‘अरे भाई, तुम तो घर के आदमी हो। तुम्हें काहे की जल्दी पड़ी है? देता हंूॅ। थोड़ा सबर करो। यहीं तो...मेरा चाकू रखा था। बेगम जरा देखो तो...चाकू कहांॅ रख दिया? केले की घौद से एक-एक दर्जन केले काटने हैं।’’ शकूर भाई ने उस युवक को धैर्य रखने का आश्वासन देते, दुकान में अन्दर टोकरियों में फलों की ढ़ेरी सजाती हुई, अपनी बेगम से कहा। 
         ‘‘चाकू आपने हमें दिये थे, जो हमसे पूछ रहे हैं? हांॅ, नही ंतो...?’’ फलों की ढ़ेरी सजाना छोड़ते, उनकी बेगम ने लगभग झल्लाते हुए उत्तर दिया।
          ‘‘अरी बेगम, तुम भी गजब बतियाती हो। तुम्हें नहीं दिये थे। यहीं रखा था। मिल नहीं रहा। जरा चाकू ढंूॅ़ढ़ने में मेरी मदद कर दो। तब-तक मैं इन भाई साहब लोगों को अनार, सेव और पपीते आदि तौल देता हंूॅ।’’ शकूर भाई ने अपनी बेगम को लगभग समझाते हुए अनुनयपूर्वक कहा। 
          ‘‘चाचा, मुझे सेव, संतरा, अनार और नाशपाती के अलावा केले भी चाहिए।’’ मैंने फिर हस्तक्षेप करना चाहा।
          ‘‘अरे बाउ जी, आप तो आधा-आधा किलो वाले हैं न? हें-हें-हें...फिर काहे माठा किये हैं? ये एक-एक, दो-दो किलो वालों को निबट तो जाने दीजिए।’’ शकूर भाई ने मुझसे ये जुमले ऐसे मुस्कुराते हुए कहे, मानो प्यार से डांॅटा हो। 
          ‘‘वहांॅ अन्दर कहांॅ ढंूॅ़ढ़ रही हो? यहीं रखा था। अभी कुछ देर पहले एक साहब को इसी घौद से आधा-दर्जन केले काटकर दिया है, फिर यहीं रख दिया था। वहांॅ बैठी खींसे मत निपोरो। जरा ठीक से देखो।’’ मैंने ध्यान दिया इस बीच शकूर भाई, उस चाकू को लेकर कुछ परेशान से भी दिखे। दो-तीन बार अपनी बेगम को डांॅटा भी। उनकी बेगम भी गजब थीं। इधर शकूर भाई परेशान से दिख रहे थे, और उधर उनकी बेगम के चेहरे पर शिकन तक न था। बल्कि वो तो मन्द-मन्द मुस्कुराते चाकू खोजने में मगन थीं।
          ‘‘चाचा, ये सेव कैसे दिये?’’ तभी एक यू. वी. गाड़ी उनकी दुकान के सामने आकर खड़ी हुई। उसमें से ड्राइविंग-सीट पर बैठा, दाढ़ी-मंूॅछों वाला एक युवक उतरा और गाड़ी को स्टाॅर्ट अवस्था में ही छोड़कर, दुकान पर आकर सेव के भाव पूछे।
          ‘‘एक सौ चालीस रूपये किलो।’’ शकूर भाई ने उसे अनमने से जवाब दिया।
          ‘‘अच्छा, आधा किलो दे दीजिए। लेकिन जल्दी। मैंने गाड़ी स्टाॅर्ट ही रखी है। बन्द कर दंूॅगा तो दोबारा बिना धक्के के स्टाॅर्ट नहीं होगी।’’ उस युवक ने अपनी मजबूरी बतायी।
          ‘‘भई, यहांॅ सब जल्दी वाले ही हैं। आपको थोड़ा सबर करना होगा। बस्स...ये जो लोग पहले से खड़े हैं, इन्हें निबटा दंूॅ, फिर आपके सेव भी तौल देता हंूॅू।’’ शकूर भाई ने जीप वाले युवक से अपनी समस्या बतानी चाही।
          ‘‘फिर तो आपको देर लगेगी, मैं चलता हंूॅ।’’ कहते, बिना शकूर भाई के अगले उत्तर की प्रतीक्षा किये वो युवक ड्राइविंग-सीट पर जा बैठा, और गाड़ी आगे बढ़ा दी।
          ‘‘किसी को भी एक मिनट का सबर नहीं। जिसको देखो, वही जल्दी में है। अरे! क्या हुआ चाकू मिला...? जरा ठीक से देखो। उधर पीछे खलवतखाने में बैठी क्या कर रही हो? उस अदने से चाकू की वजह से ग्राहक निकले जा रहे हैं।’’ इस बार तनिक जोर से चिल्लाते हुए शकूर भाई ने अपनी बेगम से पूछा, जो चाकू खोजते हुए दुकान के पिछले हिस्से में चली गयीं थीं।
          ‘‘खोज तो रही हंूॅ। आगे-पीछे, कहीं भी तो नहीं मिल रहा, आपका चाकू।’’ बेगम ने लगभग नाराजगी भरे स्वर में कहा।
          ‘‘खोज क्या खाक रही हो? वहांॅ बैठे-बैठे इल्हाम हो जायेगा कि चाकू कहांॅ है? तुम्हीं ने कहीं इधर-उधर कर दिया होगा। तुमसे जब कुछ सधता नहीं, तो दुकान पर आती ही क्यों हो? तुम्हारे, दुकान में आने से कहांॅ तो मदद मिलनी चाहिए, मेरी मुसीबत और भी बढ़ जाती है।’’ शकूर भाई ने लगभग खींझते हुए गुस्से में अपनी बेगम से कहा।
          ‘‘मेरी दवाइयांॅ खत्म हो गयी थीं, इसीलिए दुकान पर चली आयी कि आपका हाथ बंटा दंूॅगी, और शाम को लौटते वक्त अपनी दवाइयांॅ भी लेती आऊॅगी। पर आप तो मुझे ही कोसने लगे। अगर ज्यादा गुस्सा दिखायेंगे, तो जाइये मैं नहीं खोजती।’’ उनकी बेगम ने भी लगभग तुनकते हुए कहा।
          ‘‘ओफ्फो...खुदा के लिए मुझ पर रहम करो। मैं तुम्हें कोस नहीं रहा। अभी तो तुम उस चाकू को जल्दी से ढंूॅढ़ो, नही ंतो ये केले की घौद बिना बिके ही रह जायेंगी। दो ग्राहक पहले ही लौट चुके हैं।’’ मैंने ध्यान दिया...अपनी देह-भाषा से तो इस बार शकूर भाई लगभग बैक-फुट पर ही आ गये थे।
          ‘‘ठीक है, मैं कोशिश करती हंूॅ।’’ मैंने कनखियों देखा कि ये कहते, उनकी बेगम के चेहरे पर हल्की मुस्कान बिखर गयी थी।
           ‘‘अच्छा, अब तुम चाकू खोजने के लिए रहने दो। देखो एक किलो का बाट किधर चला गया है? उसे खोजो। पता नहीं आज क्या हो रहा है? यहीं सामने रखा सामान, गुम हुआ जा रहा है।’’ शकूर भाई अजीब पशोपेश में थे।
          ‘‘ये लीजिए। आप किसी ग्राहक के लिए फल निकालने आये होंगे, तभी इस टोकरी के पीछे रख दिया होगा।’’ उनकी बेगम ने फलों की टोकरी के पीछे से एक किलो का बाट ढंूॅ़ढ़कर निकालते, शकूर भाई को पकड़ाते हुए कहा।
           ‘‘अच्छा थोड़ी और मेहनत कर लो। वो चाकू ढंूॅढ़ दो। केले की घौद मुझसे टूटेगी नहीं। चाकू न होने से बिना केला खरीदे, ग्राहक लोग लौटे जा रहे हैं।’’ शकूर भाई ने अपना रूख तनिक नरम रखते हुए बेगम से इल्तिजा की।
          ‘‘चाचा, तब तक मेरे अनार ही तौल दीजिए। केले बाद में दे दीजियेगा’’ मैंने कहना चाहा।
          ‘‘मियां, मेरे पपीते का हिसाब कर दीजिए। मेरी टेªन छूट जायेगी।’’ उस अधेड़ सज्जन ने पांॅच सौ का एक नोट, शकूर भाई की तरफ बढ़ाते हुए कहा।
          ‘‘अजीब मुसीबत है। किसी को भी दो मिनट धैर्य नहीं है। भाई जी, आप के पास अगर छुट्टे पैसे हों तो दे दीजिए। मेरे गल्ले में सौ-सौ के सिर्फ दो नोट ही हैं।’’
          ‘‘चाचा, अभी कितनी देर लगेगी...केले में?’’ तभी उस युवा ग्राहक ने तनिक तल्ख लहजे में शकूर भाई से पूछा।
          ‘‘भाई, बिना चाकू मिले तो नहीं दे पाऊंॅगा। अगर आपसे ये केले की घौद टूट सके तो छः केले तोड़ लीजिए। मुझसे तो टूटने से रहा।’’ शकूर भाई ने उन्हें सीधा-सपाट सा जवाब दे दिया।
          ‘‘अरे चाचा, आप भी अजीब बात कह रहे हैं। छोड़िये रहने दीजिए। आप मेरे सेव का ही हिसाब कर दीजिए।’’ उस युवा ग्राहक ने नाक-भौं सिकोड़ते हुए कहा।
          ‘‘अंकल जी, वो ऊपर से दो चाकलेट दे दीजिए। एक छोटा वाला और एक बड़ा वाला।’’ उसी बीच वहांॅ लगभग दस से बारह वर्ष की उम्र के दो बच्चे आये, और दुकान में फ्रिज के ऊपरी खाने में रखे चाकलेट के पैकेट्स की ओर इशारा करते चाकलेट की मांॅग की।
          ‘‘बच्चों, अभी चलो। अभी टाइम नहीं है। एक घण्टे बाद आना।’’ शकूर भाई ने बिना एक पल भी गंवाये, उन बच्चों को वहांॅ से चलता करना चाहा।
         ‘‘अंकल जी, हमारे पास छुट्टे पैसे हैं। चाकलेट दे दीजिए न...।’’ उन बच्चों ने मानो शकूर भाई की समस्या को समझते, दस और बीस के दो नोट उनकी ओर बढ़ाये।
         ‘‘अच्छा, ले आओ। ये लो तुम्हारे चाकलेट।’’ शकूर भाई ने उन बच्चों से पैसे लेकर उन्हें चाकलेट देकर चलता किया। उसी बीच एक और ग्राहक ने संतरे खरीदने के उपरान्त उन्हें पैसे दिये। जिससे शकूर भाई के गल्ले में पर्याप्त फुटकर रूपये हो गये।
         खैर...अन्ततः मैं भी बिना केला लिए ही, खरीदे गये चारों फलों के पैसे चुकाते, अपना झोला उठाये जैसे ही वहांॅ से चलने को हुआ, पीछे से शकूर भाई की आवाज कानों में पड़ी।
        ‘‘ये लो देखो। केले काटने वाला चाकू, इन बाउ जी के झोले के नीचे ही दबा था। मैंने जब उन्हें सेव और सन्तरे दिये थे, तभी उन्होंने अपना झोला यहांॅ रख दिया था। अब चाकू इसी के नीचे दबा रह गया, और हमने पूरी दुकान छान मारी। इस चाकू की वजह से तीन ग्राहक बिना केले खरीदे ही चले गये। न मुझे ध्यान रहा, न ये बाउ जी ही देख पाये, और मैं तुम पर खामखाह ही नाराज हो रहा था।’’ शकूर भाई अपनी बेगम से कह रहे थे।
         ‘‘ओ...हो...माफी चाहंूॅगा शकूर भाई, मैंने भी ध्यान नहीं दिया।’’ मेरे कानों में जैसे ही उनकी ये बातें पड़ीं, मैंने पलट कर अफसोस जताना चाहा।
         ‘‘छोड़िये जाने दीजिए बाउ जी, लेकिन आपकी वजह से मेरे तीन ग्राहक बिना केले खरीदे ही चले गये।’’ शकूर भाई के चेहरे पर ग्राहकों के लौटने की टीस साफ-साफ महसूस की जा सकती थी।
         ‘‘लेकिन मैंने ऐसा जानबूझ कर नहीं किया। ऐसा अनजाने में ही हो गया।’’ मैंने अपना पक्ष रखना चाहा।
         ‘‘अरे! आप इन जनाब पर खामखाह ही बिगड़ रहे हैं। तीन ग्राहक चले गये तो क्या हुआ? ये जनाब तो इसी कालोनी में रहते हैं। रोज वाले ग्राहक हैं। आप ऐसी बातें करके इनकी ग्राहकी से भी हाथ धो बैठेंगे। आखिर, ग्राहक देवता होता है, क्यों नहीं समझते?’’ शकूर भाई की बेगम ने उन्हें समझाते, तत्काल हस्तक्षेप किया।
         ‘‘बाउ जी, अब आप तो केले लेते जाइये।’’ मैं शकूर भाई के बेगम की बातों को सुनी-अनसुनी करते, अफसुर्दगी भरा चेहरा लिये वहांॅ से लौटने को हुआ कि शकूर भाई ने मुझे ये कहते रोका।
         ‘‘जी बिलकुल, दे दीजिए।’’ मानो मेरी जान में जान आयी।
          ‘‘कितने दे दंूॅ?’’ शकूर भाई ने मुझसे जानना चाहा।
          ‘‘दो दर्जन दे दीजिए। अभी ये काफी सख्त हैं। हफ्ते-भर तो रखे ही जा सकते हैं।’’ मैं, शायद शकूर भाई के बिना केले खरीदे लौट चुके ग्राहकों से हुए नुकसान की भरपाई करना चाह रहा था।
          ‘‘लेकिन...आपको तो आधा दर्जन ही चाहिए थे न? फिर इतना क्या करेंगे?’’ शकूर भाई ने तनिक आश्चर्य से पूछा।
          ‘‘तो क्या हुआ? घर में रखे रहेंगे। कल की पूजा-पाठ के अलावा, खाने के भी काम आ जायेंगे...हें-हें-हें।’’ मैंने चेहरे पर बनावटी हंॅसी लाते हुए कहा था। 
         ‘‘अरे बाउ जी! न आप कहीं गये हैं, न मैं। जितनी जरूरत हो उतनी ही ले जाइये। खामखाह ही ये केले रखे-रखे गलकर खराब हो जायेंगे।’’ शकूर भाई ने मानो मेरे चेहरे पर छाये अफसुर्दगी के भाव को पढ़ लिया हो। ग्लानिबोध से उबरने की मेरी कोशिश को वो साफ-साफ समझ रहे थे।
          ‘‘ठीक है फिर...एक दर्जन ही दे दीजिए। पर अब और जिद मत करियेगा।’’ मैंने भी अपना पक्ष रखते फैसला सुनाया।
          ‘‘जैसी आपकी मर्जी...हें-हें-हें।’’ जाहिर है...हमने अपने-अपने हिसाब से माहौल को भरसक खुशगवार बनाने की कोशिश की थी।


                   राम नगीना मौर्य,
                    5/348, विराज खण्ड, गोमती नगर
               लखनऊ - 226010, उत्तर प्रदेश, 
       
 
    


 


 


 


 


 


लघुकथा - कोरोना से क्या डरना 

लघुकथा - कोरोना से क्या डरना 

 

 

          राम और अमर बचपन के बहुत अच्छे मित्र हैं।दोनों इस वक्त दसवीं कक्षा के विद्यार्थी है।एक दूसरे से हर बात शेयर करते हैं।कोरोनावायरस संकट के समय जहां हर आदमी अपने-अपने घरों में रुका हुआ है और सिर्फ जरूरत के कामों से ही घर से बाहर जा रहा है।ऐसे दौर में भी अक्सर राम ने देखा कि अमर बिना मास्क लगाए घर से बाहर घूमता रहता है।

 

          सब पाबन्दियों को नकारता हुआ वह अक्सर पार्क में सुबह और शाम घूमता नजर आता है।यहां तक कि अपनी रोज सुबह रनिंग करने की आदत के कारण पार्क में रोज रनिंग करने और योगा करने से भी बाज नही आ रहा है।

 

           राम ने उसे बातों ही बातों में कई बार समझाया यार रनिंग और योगा का टाइम तो आगे बहुत मिलेगा। लेकिन इस समय थोड़ी सावधानी रखनी चाहिए और अपने घर में ही रहने की कोशिश करनी चाहिए और हो सके तो घर मे रहकर ही योगा करो।

 

          राम ने उसे समझाया कि केवल जरूरी काम से ही बाहर निकलो।अमर बचपन से बड़बोला किस्म का लड़का है।उसने बड़े ही लापरवाही से राम को जवाब दिया और कहाँ "अरे यार कुछ नहीं होता मैं किसी से नहीं डरता। कोरोनावायरस मेरा कुछ नहीं बिगड़ने वाला,तुम बहुत ज्यादा डरते हो।

 

           धीरे-धीरे जब लॉक डाउन का समय समाप्त होने का समय आया तो अचानक शहर के कुछ हॉट स्पॉट जगह को सील करने की खबर आई।राम ने अब भी अमर को समझाया,यार अब तो बहुत ही सावधानी रखने की जरूरत है।माना कि हमारा एरिया सील नहीं हो रहा लेकिन हमारी कोशिश ऐसी होनी चाहिए कि उसको सील करने की नौबत ही ना आए।

 

               फिर भी अमर ने राम की बात नही मानी उसका जवाब फिर वही था।अरे यार कुछ नहीं होता तू डरता बहुत है,जो होगा देखा जाएगा।अमर की लगातार इस तरीके की बातो से राम का भी मन को भटकने लगा।वह काफी समय से घर में पड़े-पड़े बहुत परेशान हो गया था।

 

          उसने विचार बनाया कि वह भी अमर की तरह सुबह-सुबह घूमने जाएगा और कुछ रनिंग करने की भी कोशिश करेगा।अमर भी राम की इस बात से बहुत खुश था और शाम को दोनों ने पार्क में घूमने का विचार बनाया।सब लोग अंदर थे लेकिन दोनों पार्क में घूमने लगे।

 

          आमतौर पर राम को घूमने फिरने और रनिंग की आदत नही थी।वह अपने शरीर पर ज्यादा ध्यान नही देता था।उसे लगा इस लॉक डाउन के समय मे वह भी अपने शरीर को काफी हद तक घूमने का आदि बना लेगा।खैर अमर पार्क में रनिंग करने लगा लेकिन क्योंकि राम को रनिंग करने की आदत नहीं थी तो उसने पार्क में धीरे धीरे चलना शुरू कर दिया।

 

           कुछ देर बाद राम को पुलिस के गाड़ी की हॉर्न की आवाज जोर-जोर से सुनाई पड़ने लगी।राम बिना अमर की तरफ ध्यान दिए अपना धीरे-धीरे पार्क में घूम रहा था।अचानक पार्क के अंदर पुलिस वाले आ गए और ठीक राम के सामने खड़े हो गए।

 

          राम ने चारों तरफ अमर को देखा तो उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।उसने देखा कि अमर बहुत तेजी से भागता हुआ पार्क के बाहर निकल गया और अपने घर की तरफ भाग गया।वह अब समझ गया कि एक शेखचिल्ली की बातों में आकर आज वह फस गया है।राम खुले पार्क में पुलिस वालों के हाथों दंड स्वरूप अपनी गलती पर उठक-बैठक लगा रहा था।उसने अपने कान पकड़े और पुलिस वालों से माफी मांग कर अपने घर की तरफ चल पड़ा।

 

           *कहानी का सार सिर्फ इतना है कि हर समय लोगों की बातों पर ध्यान नही देना चाहिए और अपना दिमाग भी लगाना चाहिए।क्योंकि कुछ लोग अगर बातों को गलत तरीके से बता रहे हैं तो जरूरी नहीं है संकट पड़ने पर वह आपका साथ देंगे।ऐसे मित्रों से कान पकड़िए और इनकी बातों में ना आने का प्रयास करें।अक्सर ऐसे शेखचिल्ली आपको अपने इर्द गिर्द काफी दिखाई देते हैं।इनसे बचने का प्रयास करें।*

 

 

नीरज त्यागी

ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश ).

Monday, April 20, 2020

हमारी प्रकृति

  ▪   ▪▪कविता▪▪    ▪
      °°°°°°°°°°°°°°°°°° 
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धूप है कहीं पर  कहीं पर छांव है 
कहीं हैं शहर तो कहीं पर गांव है
आदमी है इस जहां में,
चरिंदे और परिंदे 
शजर ,फूल , फल और 
बदलते मौसम के दाव है


आफताब की किरण ,
जो इशारा है सहर का 
बारिश से रूप निखरे,
सागर ,नदी ,नहर का 
सब जरूरत है सभी की 
जिसमें समर्पण का भाव है


चांद,चांदनी है ,
फिजा में रागिनी है 
पर्वत ,पहाड़ ,पानी ,
हवा प्राण दायिनी है 
पथरीली वादियों में 
जिसका दिखता जमाव है


इंसान की छेड़खानी
सोची-समझी नादानी 
बना रही प्रकृति के 
चेहरे पर बदनिशानी 
हर चीज में मिलावट 
इसे कुरेदते घाव हैं


बाढ़,अकाल,महामारी 
भूकंप और बलाएं 
मंदिर,मस्जिद ,गुरुद्वारे 
व पूजा,अरदास,दुआएं 
इन इंद्रधनुषी तस्वीरों से 
इसका गहरा जुड़ाव है


आदमी जिसे लूटता,
लोभ,मोह ,स्वार्थ से 
यह धर्म का पर्याय ,
है सिर्फ पुरुषार्थ से 
करना सदुपयोग ही ,
बस इसका बचाव है


       अनवर हुसैन 
  सरवाड़ जिला अजमेर 


गांधी की विचारधारा और महिला सशक्तिकरण

गांधी की विचारधारा और महिला सशक्तिकरण


किसी भी समाज के सांस्कृतिक उत्कर्ष का मूल्यांकन उस समाज में स्त्रियों को दिए जाने वाले सम्मान पर ही आधारित रहता है ।इस दृष्टि से स्त्रियों को बहुत अधिक सम्मान दिया जाना भारतीय संस्कृति की समृद्धि को स्पष्ट करता है। जैसा कि मनु ने भी लिखा है जहां स्त्रियों की पूजा होती है वहां देवता वास करते हैं। सभ्यता के आदिम युग से ही नारी का स्थान परिवार में महत्वपूर्ण था। इस काल में अनियंत्रित योन संबंध एक आम प्रचलन था।परिवार असंगठित थे और अपने स्वरूप में सामुदायिक थे। इन परिवारों में नारी की सत्ता को स्वीकार किया गया।


वैदिक युग में स्त्रियों की स्थिति बहुत ऊंची थी। ऐसा कहा जा सकता है कि भारतीयों के सभी आदर्श स्त्री रूप में पाए जाते थे। विद्या का आदर्श सरस्वती में धन का आदर्श लक्ष्मी में शक्ति का दुर्गा में सौंदर्य का रति मेंपवित्रता का गंगा में इतना ही नहीं सर्वव्यापी ईश्वर कोली जगत जननी के नाम से सुशोभित किया गया है। इस युग में चाहे घर हो या परिवार हर जगह नारी की स्थिति बहुत अच्छी थी। 1सूत्रों और स्मृतियों के कार्य में स्त्रियों की दशा दयनीय हो गई पूर्णविराम तथा परिवार में उन्हें सम्मानित स्थान प्राप्त था। बहु विवाह का प्रचलन था। सती प्रथा का प्रचलन नहीं था। विधवा का अपनी पति के संपत्ति पर अधिकार माना गया। विवाह एक पवित्र बंधन माना जाता था। स्त्री स्वतंत्रता के योग्य नहीं है बाल्यकाल मेंपिता इसकी रक्षा करता है यवन में पति रक्षा करता है तथा वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करते हैं इसी बात को मनु ने भी स्वीकार किया है।


 


ईशा पूर्वदूसरी शताब्दी से लेकर तीसरी शताब्दी तक का समय उत्तरी भारत में विदेशी आक्रमणों का काल रहा जिससे समाज में भारी अव्यवस्था फैल गई। इसने स्त्रियों की स्थिति को प्रभावित किया। पुनर्विवाह की प्रथाएं बंद हो गई। स्त्रियों के लिए पुनर्विवाह के स्थान पर सन्यास द्वारा मोक्ष प्राप्त करने के सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया।समाज में सती प्रथा का प्रचलन हो गया और इसे एक महान धार्मिक यज्ञ बताया गया।इससे स्त्रियों की दशा और खराब हो गई किंतु एक दिशा में स्त्री की दशा में सुधार हुआ।पुनर्विवाह क्या भाव में विधवा एवं पुत्र ही स्त्रियों की संख्या में वृद्धि हुई। अतः उनके पूर्व पोषण  एवं विवाह के निमित्तव्यवस्था कारों उनके धन संबंधी अधिकारों को मान्यता देना प्रारंभ किया। क्रम से उनका अधिकार मानने योग्य। 12 वीं सदी तक आते-आते संपूर्ण देश में विधवा के मृत पति का उत्तराधिकारी होने का सिद्धांत व्यावहारिक रूप से स्वीकार कर लिया गया।गया। स्त्री की स्वयं की संपत्ति जिसके ऊपर उसका पूरा अधिकार होना था स्त्री धन कहा गया।। 2इस काल में स्त्री धन का क्षेत्र व्यापक करके उसमें उत्तराधिकार एवं विभाजन की संपत्ति को भी सम्मिलित कर लिया गया। मिताक्षरा तथा बाएं भाग में स्त्री को मृत पति की संपत्ति का पूर्ण अधिकारी घोषित किया गया। उपनयन की समाप्ति एवं बाल विवाह के प्रचलन ने उसे समाज में अत्यंत निम्न स्थिति में ला दिया। उसकी स्थिति शुद्र जैसी हो गई राम विवाह बंद हो गया विवाह के लिए 8 से 10 वर्ष उपयुक्त मानी गई है।सती प्रथा का राजपूतों फूलों में विशेष प्रचलन हो गया तथा कन्याओं का विवाह 14 या 15 वर्ष की आयु में होता था।3कई कन्याओं को संरक्षिका के रूप में शासन भार भी ग्रहण करना पड़ता था अतः उन्हें प्रशासनिक एवं सैनिक विषयों की शिक्षा दी जाती थी पूर्णविराम इससे उनके विवाह की आयु में कुछ वृद्धि हुई। किंतु आकाश की परिवारों की कन्याओं का विवाह अल्पायु में ही होता था।4


18वीं शताब्दी में स्त्रियों की हालत इतनी खराब थी उनमें 19 में सभी में कुछ सुधार आया। आरती का गम भरी गगरी का परंपरागत सामाजिक संस्कार सभी ने मिलाकर अंधकार का ऐसा परिवेश भारतीय जीवन के चारों तरफ निर्मित कर दिया था कि उसे तोड़ सकना संभव नहीं था।इस बर्बर युग के प्रति प्रतिक्रिया स्वरुप राजा राममोहन राय खुलकर सामने आए जो नारी जाति की वकालत लगातार करते रहे। नारी पर होने वाले अनेकों सामाजिक अत्याचारों को उन्होंने खत्म किया और स्त्री शिक्षा का प्रबंध किया लेकिन यह शिक्षा पाश्चात्य प्रणाली पर आधारित थी। वास्तव में संकटकालीन कट्टरता के फलस्वरूप जीवन की गति समाप्त हो गई थी पूर्णविराम इसके विपरीत स्त्री रूप में नित नवीन परिवर्तन होने लगे। परिवर्तन की प्रक्रिया में नारी आंदोलन का सूत्रपात हुआ।


नारी सशक्तिकरण में गांधीजी का योगदान_महिलाओं की उन्नति और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए राष्ट्रीय आंदोलन में महात्मा गांधी का विशेष योगदान रहा विषय में उनका दृष्टिकोण बड़ा उदार एवं व्यापक था। उन्होंने स्त्रियों के स्तर को ऊंचा उठाने के लिए रचनात्मक सामाजिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए पूर्णविराम समकालीन भारत में नारी की दयनीय दशा के लिए गांधीजी हिंदू संस्कृति के प्रभाव को जिम्मेदार मानते हैं जिनमें जो अधिनस्थ का दर्जा प्रदान किया गया है। उन्होंने पुरुषों के समान स्त्रियों को विभिन्न सामाजिक आर्थिक तथा राजनीतिक क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए आमंत्रित किया भारत की सामाजिक स्थिति के लिए जिम्मेदार मानते हैं उन्होंने कहा कि देश की प्रगति के लिए सामाजिक और आर्थिक आंदोलन सफल नहीं होंगे जब तक की उम्र में स्त्रियों का सहयोग नहीं होगा परिणाम स्वरूप स्त्रियां असहयोग आंदोलन में शामिल हुए। स्त्रियों ने धरना दिया विदेशी वस्तुओं एवं वस्तुओं का बहिष्कार किया तथा जेलों में गई। उनके आश्रम में स्त्रियों को पुरुषों के समान सम्मान मिला। स्त्री शिक्षा और समानता के लिए गांधीजी ने निरंतर प्रयास किया। भारतीय नारी के पतन के लिए गांधीजी शिक्षा को ही जिम्मेदार मानते हैं। उनकी मान्यता है कि शिक्षा के अभाव में नारी को स्वयं की चेतना नहीं आ पाए। यदि आएगी तो केवल 15% स्त्रियों में जो नगरों में रहती थी।


 स्त्री और पुरुष समाज के महत्वपूर्णघटक है। स्त्रियां अर्धांगिनी होने के साथ ही समाज का आधा अंग है। गांधीजी ने स्त्रियों के उत्थान पर विशेष ध्यान दिया खासकर नारी के अधिकारों के प्रति विशेष बल देते हैं। गांधीजी पुरुष द्वारा नारी का दुरुपयोग किए जाने के संदर्भ में विशेष दुखी थे। उन्हीं के शब्दों में आदमी जितनी बुराइयों के लिए जिम्मेदार है उसमें सबसे विभक्त और पासवर्ड बुराई है मानवता के अर्धांग नारी जाति का दुरुपयोग है। 5गांधीजी का प्रयास था कि स्त्रियां शारीरिक दृष्टि से पुरुषों से निर्मल होते हुए भी बौद्धिक क्षमता का विकास करके सबका बन सकें पूर्णविराम उन्होंने बाल विवाह का तीव्र विरोध तथा विधवा विवाह का समर्थन किया। किंतु व्यस्त विधवाओं के जिनके बाल बच्चे थे पुनर्विवाह के पक्ष में नहीं थे किंतु वक्त विधुर भी पुनर्विवाह ना करें।वे पर्दा प्रथा के विरोधी थे। चाहे स्त्रियां हिंदू हों अथवा मुसलमान स्त्री स्वतंत्रता उतना ही आवश्यक था जितना कि पुरुष स्वतंत्रता। वह दहेज प्रथा के आलोचक थे।उन्होंने विवाह की रस्मों को सरल बनाने तथा जाति भूत पर होने वाले अपव्यय को रोकने का आग्रह किया। वे कई मामलों में स्त्रियों को पुरुषों से अधिक श्रेष्ठ समझते थे। स्त्रियों में विशेषता सत्याग्रह आंदोलन के दौरान धैर्य सहिष्णुता एवं कष्ट सहने के प्रशंसक थे। माता के रूप में संतान उत्पत्ति तथा इसके बाद के बच्चों को लालन-पालन के योगदान को अतुलनीय मानते थे। उन्होंने स्त्रियों को बहुमूल्य आभूषण तड़क-भड़क दार वस्त्र श्रृंगार एवं


प्रसाधन से दूर रहने की सलाह दी ताकि स्त्रियां पुरुषों के हाथ का खिलौना अथवा मनोरंजन का साधन मात्र ना बनी रहे।6गांधीजी नारी और पुरुष के पूर्णता समान अधिकारों में विश्वास करते हैं। इस दृष्टि से स्त्री और पुरुष एक दूसरे से पृथक ना होकर परस्पर पूरक है। वे एक दूसरे के सक्रिय सहयोग के बिना नहीं रह सकते।7गांधी प्रवृत्ति मार्गी होने के कारण नारी की पद मर्यादाओं में वृद्धि करना चाहते थे वह स्त्रियों को पुरुषों के समकक्ष लाने के पक्षधर थे प्रत्येक नर के अर्धनारीश्वर प्रत्येक नारी को अर्धनरेश्वरी बनाना चाहते थे।8गांधीजी का पुरुषों को यह सुझाव था कि वह स्त्री को सिर्फ उपभोग की वस्तु ना समझे उन्हीं के शब्दों में भौतिक वस्तुओं की भांति स्त्री को उसने अपने संपत्ति मान लिया है जिसका वह अपने सुख के लिए इच्छा अनुसार उपभोग कर सकते हैं। पुरुष के स्वार्थ पूर्ण दृष्टिकोण को स्वीकार कर लेने के कारण स्वयं स्त्री में भी आत्महीनता की भावना उत्पन्न हो गई है और वह अपने आपको इसकी अपेक्षा ही समझने लगी है। 9स्त्री पुरुष की सभा गिनी है और वह इस क्षमताओं से उत्पन्न है।उसे मनुष्य के सभी कार्य व्यापार में भाग लेने का अधिकार है। वह स्वतंत्रता के अधिकार हनी है जो पुरुष को प्राप्त है स्त्री पुरुष सभ्यता को स्पष्ट करते हुए वह कहते हैं कि स्त्री पुरुष समानता का अर्थ यह नहीं है कि काम धंधे भी समान हो यह सही है कि स्त्री के आखेट करने अथवा भाला लेकर चलने का कोई कानूनी बंदिश नहीं होनी चाहिए। लेकिन जो काम पुरुष का है उसे करने में वह स्वभाव दया झिझक थी।प्रकृति नहीं स्त्री और पुरुष को एक दूसरे का पूरक बनाया है।10


गांधी जी ने नारी को चरित्र की दृष्टि से उच्च माना कथा नारी को तपस्या श्रद्धा और ज्ञान की प्रतिमा कहा। उन्होंने कहा कि स्त्री क्याहै? साक्षात न्यायमूर्ति है जब कोई स्त्री जी जान से काम लग जाती है तो वह पहाड़ को भी हिला देती है।11गांधीजी ने कहा कि नारी अहिंसा का अवतार है अहिंसा का अर्थ है असीम प्रेम और असीम प्रेम का अर्थ है कष्ट सहने की शक्ति स्त्री जो पुरुष की माता है कि अतिरिक्त अधिकतम मात्रा में यह महान शक्ति किसमें है उसे या प्रेम संपूर्ण मानवजाति को प्रदान करना चाहिए उसे यह भूल जाना चाहिए कि वह कभी पुरुष की वासना कृति की वस्तु की अथवा हो सकती है। तभी वह पुरुष की माता और उसके भाग्य का निर्माण तथा उसका नेतृत्व करने वाली शक्ति के रूप में उसके समक्ष अपना गौरव स्थान प्राप्त कर सकती है। वही युद्ध और संगठन शक्ति की कला सिखा सकती है।12गांधीजी का मत था कि स्त्री को अबला कहना उसका अपमान करना है। उसे अबला कहकर पुरुष उसके साथ अन्याय करता है। अगर ताकत से मतलब पास हुई ताकत से है तो निसंदेह पुरुष की अपेक्षा स्त्री में कम पर सोता है पर अगर इसका मतलब नैतिक शक्ति से हैं तो अवश्य ही पुरुष की अपेक्षा स्त्री कहीं अधिक शक्तिशाली है।13गांधीजी की मान्यता है कि स्त्री जाति की जो समाज में स्थिति है उसका उत्तरदायित्व पुरुष वर्ग का ही है क्योंकि समाज रखना मैं उसे गण स्थान दिया गया है और उसकी कठिनाइयों को भी पुरुष ने ना तो समझने की चेष्टा की और ना हल करने की कोशिश की। वह कहते हैं कि जिस रुई और कानून के बनाने में स्त्री का कोई हाथ नहीं था और जिसके लिए सिर्फ पुरुष ही जिम्मेदार है उस कानून और रुणिचे जुल्मों ने स्त्री को लगातार पुतला है अहिंसा की न्यू पर रचे गए जीवन की योजना में जितना और जैसा अधिकार पुरुष को अपने भविष्य की रचना का है उतना और वैसा ही अधिकारी स्त्री को भी अपना भविष्य तय करने का अधिकार है।


 


गांधीजी स्त्रियों को आर्थिक अधिकार दिए जाने की भी वकालत करते हैं गांधीजी के सम्मुख स्त्री को आर्थिक स्वतंत्रता दिए जाने का विरोध इस आधार पर किया जाता कि उससे स्त्रियों में दुराचार फैल जाएगा और घरेलू जीवन बिखर जाएगा। किंतु गांधी जी को ऐसे तर्क अच्छे नहीं लगे पूर्णविराम वह उन्हें संपत्ति संबंधी अधिकार दिए जाने की मांग का समर्थन नैतिक और सामाजिक दोनों ही आधारों पर करते हैं। संपत्ति अधिकार को दिए जाने से यह कल्पना करना उपयुक्त अनुभव नहीं होता कि इससे उसमें दूर आचरण आएगा। वास्तव में ऐसी कल्पना भी नहीं स्वार्थ वाले ही करते हैं। गांधीजी स्त्री को रोटी की चिंता से मुक्त देखना चाहते हैं कि उन्होंने फिर भी स्त्री को सेवा बनाने के लिए कभी नहीं या। करोड़ों स्त्रियों को घर छोड़कर रोजी कमाने पड़ी तो बुरी बात क्या है।


सामाजिक जागरूकता आग स्त्रियों के जीवन में देखने को मिलता है कोलेबिरा आज स्त्रियां परिवारों में भी खुली हवा में सांस ले रही है कोलेबिरा आज वह अपने रूढ़ियों के प्रति उदासीन हैं और अब उनके जीवन का आदर्श नहीं रहा। स्त्रियां आज के उनके प्रगतिशील संघों का निर्माण कर रही हैं और ऐसे संगठनों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। परंतु यह सभी परिवर्तन प्रमुख रूप से नगर की स्त्रियों में ही संबंधित है। ग्रामीण स्त्रियों के जीवन में कुछ सुधार आवश्यक हुआ है परंतु अभी उनमें शिक्षा का अभाव होने के कारण वे परंपरागत रूढ़ियों को तोड़ने में अधिक सफल नहीं हो सकती हैं। परंतु नगरीकरण की प्रक्रिया में वृद्धि होने से उनके विचारों में भी परिवर्तन होना प्रारंभ हो गया है। वर्तमान समय में स्त्रियों द्वारा हिंदू जीवन के सिद्धांतों का पुनरीक्षण हिंदू समाज के लिए सबसे बड़ी चुनौती है पूरा समाज में बढ़ती अवश्य कथाओं के प्रति उनकी जागरूकता धर्म की आड़ में उन्हें समस्त अधिकारों से वंचित कर देने वाले संतोषजनक आदर्शों के प्रति शिक्षा उसे होने वाली मात्राएं राष्ट्रीय संघर्ष के समय विकसित होने वाले अनुभव में उन्हें ह्यूमन के आदर्शों का पूजन करने की प्रेरणा दी है । भारत में स्वतंत्रता के पश्चात स्त्रियों की स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। स्त्रियों की सामाजिक आर्थिक स्थिति में जो परिवर्तन हुआ उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती है विराम श्रीनिवासने पश्चिमीकरण लौकी की करण और जाति गतिशीलता को इन परिवर्तनों का प्रमुख कारण माना है। इसके अतिरिक्त स्त्रियों में शिक्षा का प्रसार होने पर औद्योगिकरण के फल स्वरुप भी उन्हें आर्थिक जीवन में प्रवेश करने के अवसर प्राप्त हुए हैं। स्त्रियों की पुरुषों पर आर्थिक निर्भरता कम होने लगी और स्वतंत्र रूप से अपने व्यक्तित्व विकास करने के अवसर मिले। संचार के साधनों समाचारपत्रों और पत्रिकाओं का विकास होने से स्त्रियों ने अपने विचारों को अभिव्यक्त करना आरंभ किया। सामाजिक अधिनियम के प्रभाव इसके अतिरिक्त स्त्रियों में शिक्षा का प्रसार होने पर औद्योगिकरण के फल स्वरुप भी उन्हें आर्थिक जीवन में प्रवेश करने के अवसर प्राप्त हुए हैं। स्त्रियों की पुरुषों पर आर्थिक निर्भरता कम होने लगी और स्वतंत्र रूप से अपने व्यक्तित्व विकास करने के अवसर मिले। संचार के साधनों समाचारपत्रों और पत्रिकाओं का विकास होने से स्त्रियों ने अपने विचारों को अभिव्यक्त करना आरंभ किया। सामाजिक अधिनियम के प्रभाव में से कैसे सामाजिक वातावरण का निर्माण हुआ जिससे बाल विवाह दहेज प्रथा औरअंतर जाति विवाह की समस्याओं से निदान पाना सुलभ हो गया।13स्वतंत्रता के पश्चात शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक प्रगति हुई 1971 ईस्वी की जनगणना के समय तक शिक्षित स्त्रियों की संख्या बढ़कर चार करोड़ 9300000 से भी अधिक हो गई जबकि 18 से 82 ईसवी में भारत में ऐसी केवल कुछ स्त्रियां थी जो कुछ लिख पढ़ सकती थी पूर्णविराम आज लड़कियों के लिए कला और विज्ञान के अतिथि गृह विज्ञान हस्तशिल्प कला और संगीत की शिक्षा प्राप्त करने की सुविधाएं हैं। मेडिकल कॉलेज में लड़कियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है आर्थिक जीवन के क्षेत्र में स्वतंत्रता और स्त्रियों की पुरुषों पर आर्थिक निर्भरता निरंतर कम होती जा रही है। स्वतंत्रता के पश्चात एक बड़ी संख्या में मध्यम वर्ग की शिक्षा प्राप्त कर क्षेत्र में बढ़ रही हैं। 8 शिक्षा स्वास्थ्य चिकित्सा समाज कल्याण मनोरंजन उद्योग और कार्यालयों में स्त्री कर्मचारियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है इस आर्थिक स्वतंत्रता मिलने से उनके आत्मविश्वास कार्य क्षमता और मानसिक स्तर में विशेष प्रगति हुई है। पारिवारिक अधिकारों में भी वृद्धि हुई है। आज की स्त्री पुरुष की दासी नहीं बल्कि उसकी सहयोगी और मित्र है। परिवार उसकी स्थिति एक याचिका की ना होकर बल्कि प्रबंधक की है। आज व परिवार में अपने अधिकारों को पूर्ण उपयोग करने को तैयार है। बच्चों की शिक्षा पर वृक्ष के उपयोग संस्कारों का प्रबंधन और पारिवारिक योजनाओं के रूप का निर्माण करने में स्त्री की इच्छा का महत्व निरंतर बढ़ता जा रहा है।


संदर्भ ग्रंथ सूची____



  1. शुक्ला डॉक्टर उमा भारतीय नारी की अस्मिता की पहचान पृष्ठ 13 लोकभारती प्रशासन 1994

  2. प्रसाद रामलोचन बापू के सपने पृष्ठ 27 नियोजन स्वाध्याय मंडल इलाहाबाद 1999

  3. प्रसाद डॉ ईश्वरी प्रसाद एवं शैलेंद्र वर्मा प्राचीन संस्कृति कला राजनीति धर्म दर्शन पृष्ठ 303

  4. श्रीवास्तव डॉ केसी प्राचीन भारत का इतिहास एवं संस्कृति पृष्ठ 197

  5. यंग इंडिया 15 नौ 1921 पृष्ठ 292

  6. शर्मा डॉ एस एल एवं डॉ मधु महात्मा गांधी एवं धर्मनिरपेक्षता पृष्ठ 178 राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी 1999

  7. सिलेक्शन फ्रॉम गांधी पृष्ठ 271 निर्मल कुमार बोस

  8. दिनकर रामधारी सिंह संस्कृति के चार अध्याय पृष्ठ 634 लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद 2000

  9. सिलेक्शन फॉर्म गांधी 271 निर्मल कुमार बोस

  10. हरिजन 2 दिसंबर 1939 पृष्ठ 359

  11. हिंदी नवजीवन 25 दिसंबर 1921

  12. बॉस निर्मल कुमार पृष्ठ 272 273 यंग इंडिया 22 अक्टूबर 1929

  13. हरिजन सेवक 24 फरवरी 1940


 


श्रीमती आशा रानी पटनायक


शोधार्थी


बस्तर विश्वविद्यालय जगदलपुरजिला बस्तर


छत्तीसगढ़ 494001


पता


श्रीमती आशा रानी पटनायक


स्टेट बैंक कॉलोनी क्वार्टर नंबर 13


लाल बाग आमागुड़ा जगदलपुर


जिला बस्तर छत्तीसगढ़494001


मोबाइल नंबर 7000392649;9406238107


 


 


 


 


कविता         भूख          (स्वरचित) 

कविता         भूख          (स्वरचित) 


महज फकत एक रोटी लगती मिटाने पेट की भूख। 

हजार कोशिश करने पर नहीं मिटती मृगतृष्णा की भूख।। 

घर रहने की ताकीद में बन रह रही बाहर घूमने की भूख। 

संग रहने की सौगात में क्यों नहीं बढ़ती परिवार

संग की भूख।।

मजदूर सर्वहारा वर्ग था प्यारा आज क्यों सताती उसे भूख।

सहारा न मिलता देख बढ गयी है उनको अपने घर जाने की भूख।। 

जमाखोरी काला बाजारी मुसीबत में दुगने दाम बसूलने की भूख। 

क्यों न बढाते धर्म कर्म समाज सेवा से दूसरों को खुश करने की भूख।। 

 

हीरा सिंह कौशल

गाँव व डा महादेव तहसील सुंदर नगर जिला मंडी हि प्र 



अपना अपना सच

अपना अपना सच

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सुबह के नौ बज चुके थे।मुनिया के जागने की हल्की सी आहट हुई तो तुरंत उसके बिछौने की ओर दौड़ पड़ी कमला।उसके कान तो उधर ही लगे हुए थे  कि जाने कब उठ जायेगी मुनिया। मुनिया को गोद में लेकर कमला कुछ देर तक बड़े प्यार से उसके बालों में ऊँगलियों से कंघी करती रही और फिर प्यार से बोली -  -  'अरे रानी बिटिया को तो आज भी बहुत देर तक नींद आई, दो तीन दिन से खूब सो रही है बिटिया।'

       चुलबुली और नटखट मुनिया थी तो केवल छैः साल की लेकिन बातों में बड़ो-बड़ो के कान काटती थी। मुनिया ने एक नजर बाजू की खटिया में सोये हुए अपने पिता नोहर की ओर देखा और कहा कि -- 'सुबह - सुबह बाबू के गाली गलौच,चिल्लाने की आवाज नहीं आ रही है ना इन दो तीन दिन में इसीलिए, वर्ना मैं कहाँ इतनी देर तक सोती हूँ।' फिर मुनिया ने  एक नजर घर के चारों तरफ देखा। माँ ने झाड़ू-पोंछा कर लिया था,आँगन और परछी में गोबर भी लीपा जा चुका था,उधर चौके के पास पानी रखने की जगह में पीने के पानी की मटकी और कुछ छोट-मोटे बर्तन भी ताजा पानी से भरे हुए रखे थे।चूल्हे पर चढ़े बर्तन से खद -खद की आवाज के साथ भात पकने की महक भी आ रही थी। यानी माँ रोज की तरह ही सुबह चार बजे उठ गई थी, लेकिन बाबू क्यों नहीं उठा है? मुनिया ने सोचा , क्या आज भी काम पर नहीं जायेगा बाबू?रोज तो पाँच -छैः बजे तक उठ जाता था लेकिन पिछले तीन दिनों से बाबू ना तो जल्दी उठता था और ना ही  घर से निकलता था। दिन भर घर में ही बैठा रहता था काम पर भी नहीं जा रहा था। मुनिया ने सोचा कि मेरी तो स्कूल में गर्मी की छुट्टियाँ हैं लेकिन बाबू को क्या हुआ है? ना तो काम पर जाता है और ना ही  कहीं और। दिन भर या तो सोया रहता है या  बाहर परछी में  बैठे बीड़ी पीते हुए जाने क्या सोचता रहता है?माँ को बात बेबात गाली देना भी बंद कर दिया है बाबू ने इन दिनों। जाने क्या हो गया है बाबू को कि अब तो मेरे से भी खूब बतियाता है,प्यार भी करता है बल्कि तरह- तरह के खेल भी मेरे साथ खेलता है। कल तो जमीन पर खड़िया से जाने कैसी आड़ी सीधी लाईनें बनाकर और ईमली के बीजों से कौन सा खेल खेलना सिखा रहा था।  वो खेल मेरे पल्ले ज्यादा तो नहीं पड़ा लेकिन मजा बहुत आया क्योंकि बाबू बता रहा था कि उस खेल में मैं ही बार-बार जीत रही थी।

        मुनिया फिर सोचने लगी कि इन दिनों शाम को वो जोहन और बुधराम काका भी नहीं दिख रहे हैं जो बाबू को साथ में लेकर कहीं जाते थे  और जब बाबू वापस लौटता तो माँ से खूब गाली-गलौच करता कभी कभी तो मुझसे भी गाली गलौच करता बल्कि मेरे से और  माँ से तो मार पीट भी कर देता था। बड़े अचरज में है मुनिया। इस बदलाव के बारे में पूछना तो चाहती है पर पूछे किससे। डर भी लगता है कि यदि बाबू से यह सब पूछा तो ऐसा न हो कि बाबू नाराज हो जाए और ये सब बदल जाए और कल से फिर वही पुराना ढ़र्रा शुरु हो जाए। फिर भी आज अपनी उत्सुकता नहीं रोक पाई थी मुनिया। बाबू से पूछने की हिम्मत तो फिर भी नहीं हुई लेकिन बड़ी हिम्मत से माँ के पास पहुँच गई और फुसफुसा कर पूछने लगी 'माँ,बाबू तीन दिनों से काम पर क्यों नहीं जा रहा है? तुमसे गाली-गलौच भी नहीं करता?  जोहन और बुधराम काका के साथ जहाँ जाता था वहाँ भी  नही जा रहा है? और तो और मेरे साथ प्यार से बातें करता है,मेरे साथ खेलता भी है। ऐसा अचानक क्या जादू हो गया माँ?

           एक साँस में इतने सवालों को सुनकर कमला के होठों पर एक गहरी हँसी तैरने लगी फिर बोली---' ज्यादा तो कुछ मुझे भी नहीं मालूम बिटिया लेकिन सुनती हूँ कि कोई 'कोरोना' आया है,जिसने सबको काम पर जाने से मना कर दिया है। सब काम धंधे बंद।  वो बुधराम काका के साथ जाने वाली दारू दूकान भी। जो भी बाहर निकलता है ये 'कोरोना' उसको पकड़ लेता है, सुना है पुलिस वाले डण्डा भी मारते हैं।कहते हैं 'कोरोना' है,सबको अपने -अपने घर में ही रहना है।

              मुनिया को खुशी भी हो रही थी और अचरज भी। उसने फिर पूछा 'लेकिन ये 'कोरोना'आखिर है क्या माँ?' इस बार कमला के पास कोई सही सही उत्तर नहीं था। वह भी 'कोरोना' के बारे में सुनी सुनाई ही जानती थी वह भी बहुत कम। उसने कहा  --'ठीक ठीक तो पता नहीं बिटिया लेकिन कोई बता रहा था कि ये  चीन देश से आया है कोई कहता है ये बिमारी है,कोई कहता है कि राक्षस है जिसके सिर पर  बहुत सारे सिंग हैं लेकिन मेरे को तो लगता है कि कोई बड़ा साहब  ही है क्योंकि उसकी बात सरपंच,कोटवार भी मान रहे हैं बल्कि अपने पटवारी साहब भी उसीकी बात मान रहे हैं, मेरे को तो पक्का भरोसा है कि ये 'कोरोना'कोई बहुत बड़ा साहब ही है। सबके सब उससे डर रहे है, सुना है कि ये सबके सब बोल रहें हैं कि 'कोरोना' है,कोई घर से न निकले,हम भी नहीं निकल रहे है, सबकी जरूरत का सामान ,खाने पीने का सामान घर में ही पहुँच जायेगा घर से बाहर मत निकलना।  और क्या बताऊँ कल सुबह तो वाकई में  घर के बाहर कोई खाने पीने का बहुत सारा सामान एक झोले में छोड़ गया है और तो और झोले में कुछ रूपये भी थे।बिटिया  मेरे को तो लगा कि जैसे रामराज्य ही आ गया है।'

            अब तो मुनिया को भी विश्वास हो चला था कि ये 'कोरोना' वाकई कोई बड़ा साहब ही है जिसके कहने से ये सब हो रहा है।अजीब सी खुशी हो रही थी मुनिया को,लेकिन उसे फिर कुछ सवाल सूझे -  ' माँ ये 'कोरोना' साहब हमारे गाँव में पहली बार ही आये हैं ना? जल्दी तो नहीं चले जायेंगे? कुछ दिन तो और ठहरेंगे ना? कमला सवाल सुन तो रही थी लेकिन इनके जवाब उसके पास नहीं थे उसने पास ही बैठै नोहर की ओर देखा शायद वो इन सवालों के जवाब दे सके लेकिन नोहर की नजरें भी बता रही थी कि उसके पास भी इन सवालों का कोई जवाब नहीं था। सवालों को अनसुना करते हुए कमला फिर मुनिया के बाल सहलाने लगी। मन ही मन तमाम भगवानों देवी -देवताओं को भी याद  कर रही थी और मना रही थी  - हे भोले बाबा,हे बूढ़ी माई, हे पीपल वाले बड़े देव, हे पीर बाबा,हे चिन्दी दाई बहुत दिनों बाद घर में इतनी सुख,शाँति,खुशी आई है,और कुछ दिन रोक ले 'कोरोना' को। उसको और थोड़ा  रूकने को बोलना,रोक लेना 'कोरोना साहब को, रोक लेना थोड़ा और 'कोरोना बाबा' को अपने  ही गाँव में,बड़ा उपकार होगा।

                अब कमला को कोई कैसे बताये कि वो जिस 'कोरोना' के रूकने की मन्नत मना रही है वो 'कोरोना'  आखिर है क्या?  अजब था यह 'कोरोना' जिसको लेकर सबके अपने अपने डर थे, अपनी अपनी खुशी थी और अपने अपने सच भी।

--अशोक शर्मा,

'सोहन -स्नेह' , कॉलेज रोड,

महासमुंद 493445

छत्तीसगढ़,

बालगीत.       नन्हें नन्हें कदम  (स्वरचित)

बालगीत.       नन्हें नन्हें कदम  (स्वरचित)



नन्हें नन्हें कदम चलते रहे यूंही तुम्हारे। 

लम्बी उम्र हो जीते रहे हम तुम्हारे सहारे।।

 

देते रहें खेलने के लिए सब खिलौने सारे।

चांदनी हो दिखाये चांद में बुढिया नानी तारे।।

 

मुस्कान ऐसी है खिलखिलाये हो फूल सारे।

भोलापन मुस्कान में हमेशा सबको सुहाये।।

 

 रहे सारी बलाये हमेशा दूर सर से तुम्हारे।

खिलखिलाहट से घर वाले सारे मुस्कराये।।

 

मम्मी पापा सभी का लाडला हो राजदुलारे। 

मुस्काये ऐसा तू ऐसा करें प्यार दुलार करे सारे।

 

हीरा सिंह कौशल 

गांव व डा महादेव सुंदरनगर मंडी


लघुकथा - मैं किसी से नहीं डरता 

3-लघुकथा - मैं किसी से नहीं डरता 

 

 

 

          राम और अमर बचपन के बहुत अच्छे मित्र हैं।दोनों इस वक्त दसवीं कक्षा के विद्यार्थी है।एक दूसरे से हर बात शेयर करते हैं।कोरोनावायरस संकट के समय जहां हर आदमी अपने-अपने घरों में रुका हुआ है और सिर्फ जरूरत के कामों से ही घर से बाहर जा रहा है।ऐसे दौर में भी अक्सर राम ने देखा कि अमर बिना मास्क लगाए घर से बाहर घूमता रहता है।

 

          सब पाबन्दियों को नकारता हुआ वह अक्सर पार्क में सुबह और शाम घूमता नजर आता है।यहां तक कि अपनी रोज सुबह रनिंग करने की आदत के कारण पार्क में रोज रनिंग करने और योगा करने से भी बाज नही आ रहा है।

 

           राम ने उसे बातों ही बातों में कई बार समझाया यार रनिंग और योगा का टाइम तो आगे बहुत मिलेगा। लेकिन इस समय थोड़ी सावधानी रखनी चाहिए और अपने घर में ही रहने की कोशिश करनी चाहिए और हो सके तो घर मे रहकर ही योगा करो।

 

          राम ने उसे समझाया कि केवल जरूरी काम से ही बाहर निकलो।अमर बचपन से बड़बोला किस्म का लड़का है।उसने बड़े ही लापरवाही से राम को जवाब दिया और कहाँ "अरे यार कुछ नहीं होता मैं किसी से नहीं डरता। कोरोनावायरस मेरा कुछ नहीं बिगड़ने वाला,तुम बहुत ज्यादा डरते हो।

 

           धीरे-धीरे जब लॉक डाउन का समय समाप्त होने का समय आया तो अचानक शहर के कुछ हॉट स्पॉट जगह को सील करने की खबर आई।राम ने अब भी अमर को समझाया,यार अब तो बहुत ही सावधानी रखने की जरूरत है।माना कि हमारा एरिया सील नहीं हो रहा लेकिन हमारी कोशिश ऐसी होनी चाहिए कि उसको सील करने की नौबत ही ना आए।

 

               फिर भी अमर ने राम की बात नही मानी उसका जवाब फिर वही था।अरे यार कुछ नहीं होता तू डरता बहुत है,जो होगा देखा जाएगा।अमर की लगातार इस तरीके की बातो से राम का भी मन को भटकने लगा।वह काफी समय से घर में पड़े-पड़े बहुत परेशान हो गया था।

 

          उसने विचार बनाया कि वह भी अमर की तरह सुबह-सुबह घूमने जाएगा और कुछ रनिंग करने की भी कोशिश करेगा।अमर भी राम की इस बात से बहुत खुश था और शाम को दोनों ने पार्क में घूमने का विचार बनाया।सब लोग अंदर थे लेकिन दोनों पार्क में घूमने लगे।

 

          आमतौर पर राम को घूमने फिरने और रनिंग की आदत नही थी।वह अपने शरीर पर ज्यादा ध्यान नही देता था।उसे लगा इस लॉक डाउन के समय मे वह भी अपने शरीर को काफी हद तक घूमने का आदि बना लेगा।खैर अमर पार्क में रनिंग करने लगा लेकिन क्योंकि राम को रनिंग करने की आदत नहीं थी तो उसने पार्क में धीरे धीरे चलना शुरू कर दिया।

 

           कुछ देर बाद राम को पुलिस के गाड़ी की हॉर्न की आवाज जोर-जोर से सुनाई पड़ने लगी।राम बिना अमर की तरफ ध्यान दिए अपना धीरे-धीरे पार्क में घूम रहा था।अचानक पार्क के अंदर पुलिस वाले आ गए और ठीक राम के सामने खड़े हो गए।

 

          राम ने चारों तरफ अमर को देखा तो उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।उसने देखा कि अमर बहुत तेजी से भागता हुआ पार्क के बाहर निकल गया और अपने घर की तरफ भाग गया।वह अब समझ गया कि एक शेखचिल्ली की बातों में आकर आज वह फस गया है।राम खुले पार्क में पुलिस वालों के हाथों दंड स्वरूप अपनी गलती पर उठक-बैठक लगा रहा था।उसने अपने कान पकड़े और पुलिस वालों से माफी मांग कर अपने घर की तरफ चल पड़ा।

 

           *कहानी का सार सिर्फ इतना है कि हर समय लोगों की बातों पर ध्यान नही देना चाहिए और अपना दिमाग भी लगाना चाहिए।क्योंकि कुछ लोग अगर बातों को गलत तरीके से बता रहे हैं तो जरूरी नहीं है संकट पड़ने पर वह आपका साथ देंगे।ऐसे मित्रों से कान पकड़िए और इनकी बातों में ना आने का प्रयास करें।अक्सर ऐसे शेखचिल्ली आपको अपने इर्द गिर्द काफी दिखाई देते हैं।इनसे बचने का प्रयास करें।*

 

 

 

 

4-कोरोना को हराना है

 

चाहे छाये हर और सूनापन,मिलना हो जाये एक दूजे से कम।

कितना भी मन घबराए,चाहे कितनी भी दहशत बढ़ती जाए।

 *करना है एक ही प्रण,किसी भी तरह कोरोना को हराया जाए।* 

 

व्यवसाय कैसे चल पाएंगे और अब कैसे बच्चे पढ़ पाएंगे।

चाहे कितनी भी विपदाएं आये,घर मे मन कितना भी घबराए।

 *करना है एक ही प्रण,किसी भी तरह कोरोना को हराया जाए।*

 

देश की लड़ाई लड़ते जाए,किसी तरह कोरोना को मार भगाए।

अंधकार से लड़ते जाए,नए उजाले की और बस बढ़ते जाए।

 *करना है एक ही प्रण,किसी भी तरह कोरोना को हराया जाए।*

 

जब अकेले कुछ ना हो पाए,एक दूजे से क्यों ना मिल जाए।

एक दूजे हम समझाए,कोई भी बस घर से बाहर जाने ना पाए।

 *करना है एक ही प्रण,किसी भी तरह कोरोना को हराया जाए।*

 

 

 

5-कोरोना

 

 

कोरोना ने आज करा दिया सबको ये एहसास।

धन दौलत सब मिथ्या,ना रहेगा कुछ भी पास।।

 

जीवन मे सब कर लो , अब प्रभु से ये अरदास।

सबको रखना सुरक्षित,सबको अपनो के पास।।

 

सबकुछ अब तुम त्याग दो,करो घर मे निवास।

कोरोना अगर हो गया , कोई ना आयेगा पास।।

 

आपस की दूरी बढ़ी , जब बढ़ी दौलत की प्यास।

मौत के एक एहसास ने किया सबको पास-पास।।

 

 

 

6-कोरोना का कहर

 

 

 

कोरोना के कहर से कांप उठा संसार।

अब भी संभल जाओ दुनिया के लोगो,

वर्ना चारो और मच जाएगा हाहाकार।।

 

देशभक्ति की बाते करते - करते जो कभी नही थकते।

वही किसी के समझाने पर अपने घर क्यों नही रुकते।।

 

प्रशासन को सख्ती करने पर क्यों करते हो मजबूर।

कुछ दिन की बात है प्यारो,रह लो एक दूसरे से दूर।।

 

विकट विपदाओं के घेरे में भारत माता आज घिरी है।

संकट की घड़ी में एक - दूजे से दूरी ही आज भली है।।

 

आओ मिलकर पूरे विश्व को ऐसा कुछ कर दिखलाये।

पूरे  विश्व  मे  भारत  माता की जय जयकार हो जाये।।

 

बस  कुछ दिन घर रहकर अपने देश के काम आ जाओ।

दुनिया भर को गर्व तुम पर हो,ऐसा कुछ कर दिखलाओ।।

 

 

7-मरुस्थल सा मैं

 

 

मरुस्थल  सा  जीवन  है मेरा,पूर्णतया  निराशा  भरा,

फिर भी कभी-कभी कुछ ओश की बूंदों से मिलता हूँ।

 

सोचता  हूँ  ,  समेट  लू  सबको  अपनी  आगोश  में,

मेरे गर्म एहसास से मिलकर बूंदे भाँप बन उड़ जाती है।

 

गर्म रेतीले मरुस्थल सा मौन जीवन के साथ चल रहा है।

कभी-कभी शाम की ठंडी हवा के मुखर झोंके से मिलता हूँ।

 

अक्सर सोचता हूँ,तोड़ दू सारी बंदिशे अपने मरुस्थल होने की,

बस इन गुदगुदाती ठंडी मुखर हवाओ में अविरल बहता जाओं।

 

 

 

नीरज त्यागी

ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश ).

मोबाइल 09582488698

65/5 लाल क्वार्टर राणा प्रताप स्कूल के सामने ग़ाज़ियाबाद उत्तर प्रदेश 201001

कोरोना - नया रूप लेकर 102 साल पुराना दर्द

1- कोरोना - नया रूप लेकर 102 साल पुराना दर्द

 

          आज पूरी दुनिया कोरोना वायरस से लड़ रही है।ये वायरस लगभग सभी देशों में फ़ैल चूका है।पूरे दुनिया में कोरोना से संक्रमित मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है।कोरोना वायरस कि इस महामारी ने लोगों को 1918 के स्पेनिश फ्लू की याद दिला दी है।उस दौर में जिस तेजी से ये संक्रमण फैला था और जितनी मौतें हुई थी उससे पूरे दुनिया को हिला दिया था।102 साल पहले पूरी दुनिया में स्पेनिश फ्लू के कहर से एक तिहाई आबादी इसकी चपेट में आ गयी थी।कम से कम पाँच से दस करोड़ लोगों की मौत इसकी वजह से हुई थी।रिपोर्टस के मुताबिक इस फ्लू के कारण भारत में कम से कम 1 करोड़ 55 लाख लोगों ने जान गवाईं थी।

          

          स्पेनिश फ्लू की वजह से करीब पौने दो करोड़ भारतीयों की मौत हुई है जो विश्व युद्ध में मारे गए लोगों की तुलना में ज्यादा है। उस वक्त भारत ने अपनी आबादी का छह फीसदी हिस्सा इस बीमारी में खो दिया था।मरने वालों में ज्यादातर महिलाएँ थीं।ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि महिलाएँ बड़े पैमाने पर कुपोषण का शिकार थी।वो अपेक्षाकृत अधिक अस्वास्थ्यकर माहौल में रहने को मजबूर थी।इसके अलावा नर्सिंग के काम में भी वो सक्रिय थी।

 

          ऐसा माना जाता है कि इस महामारी से दुनिया की एक तिहाई आबादी प्रभावित हुई थी और करीब पाँच से दस करोड़ लोगों की मौत हो गई थी।गांधी जी और उनके सहयोगी किस्मत के धनी थे कि वो सब बच गए। हिंदी के मशूहर लेखक और कवि सुर्यकांत त्रिपाठी निराला की बीवी और घर के कई दूसरे सदस्य इस बीमारी की भेंट चढ़ गए थे।

 

          उन्होंने बाद में इस सब घटना चक्र पर लिखा भी था *कि मेरा परिवार पलक झपकते ही मेरी आँखों से ओझल हो गया था।"* वो उस समय के हालात के बारे में वर्णन करते हुए कहते हैं कि *गंगा नदी शवों से पट गई थी. चारों तरफ इतने सारे शव थे कि उन्हें जलाने के लिए लकड़ी कम पड़ रही थी* . ये हालात तब और खराब हो गए थे जब खराब मानसून की वजह से सुखा पड़ गया और आकाल जैसी स्थिति बन गई।इसकी वजह से बहुत से लोगो की प्रतिरोधक क्षमता कम हो गई थी।शहरों में भीड़ बढ़ने लगी।इससे बीमार पड़ने वालों की संख्या और बढ़ गई।

 

          बॉम्बे शहर इस बीमारी से बुरी तरह प्रभावित हुआ था।उस वक्त मौजूद चिकित्सकीय व्यवस्थाएं आज की तुलना में और भी कम थीं।हालांकि इलाज तो आज भी कोरोना का नहीं है लेकिन वैज्ञानिक कम से कम कोरोना वायरस की जीन मैपिंग करने में कामयाब जरूर हो पाए हैं. इस आधार पर वैज्ञानिकों ने टीका बनाने का वादा भी किया है।1918 में जब फ्लू फैला था।तब एंटीबायोटिक का चलन इतने बड़े पैमाने पर नहीं शुरू हुआ था. इतने सारे मेडिकल उपकरण भी मौजूद नहीं थे जो गंभीर रूप से बीमार लोगों का इलाज कर सके. पश्चिमी दवाओं का इस्तेमाल भी भारत की एक बड़ी आबादी नही किया करती थी और ज्यादातर लोग देसी इलाज पर ही यकीन करते थे।

 

          इन दोनों ही महामारियों के फैलने के बीच भले ही एक सदी का फासला हो लेकिन इन दोनों के बीच कई समानताएं दिखती हैं। संभव है कि हम बहुत सारी जरूरी चीजें उस फ्लू के अनुभव से सीख सकते हैं।उस समय भी आज की तरह ही बार-बार हाथ धोने के लिए लोगों को समझाया गया था और एक दूसरे से उचित दूरी  बनाकर ही रहने के लिए कहा गया था।सोशल डिस्टेंसिंग को उस समय भी बहुत अहम माना गया था और आज ही की तरह लगभग लॉक डाउन की स्थिति उस समय भी थी इतने सालों बाद भी वही स्थिति वापस हो गई है।

 

        स्पेनिश फ्लू की चपेट में आए मरीजों को बुखार, हड्डियों में दर्द, आंखों में दर्द जैसी शिकायत थीं। इसकी वजह से महज कुछ दिन में मुंबई में कई लोगों की जान चली गई। एक अनुमान के मुताबिक जुलाई 1918 तक 1600 लोगों की मौत स्पैनिश फ्लू से हो चुकी थी। केवल मुंबई इससे प्रभावित नहीं हुआ था। रेलवे लाइन शुरू होने की वजह से देश के दूसरे हिस्सों में भी ये बीमारी तेजी से फैल गई। ग्रामीण इलाकों से ज्यादा शहरों में इसका प्रभाव दिखाई दिया।

 

          बॉम्बे में तेजी से फैलने के बाद इस वायरस ने उत्तर और पूर्व में सबसे ज्यादा तांडव मचाया।ऐसा माना जाता है कि दुनियाभर में इस बीमारी से मरने वालों में पांचवां हिस्सा भारत का था। बाद में असम में इस गंभीर फ्लू को लेकर एक इंजेक्शन तैयार किया गया, जिससे कथित तौर पर हजारों मरीजों का टीकाकरण किया गया। जिसकी वजह से इस बीमारी को रोकने में कुछ कामयाबी मिली।

 

          हालांकि बाद में कुछ बाते सामने आई।सन 2012 की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत के जिन हिस्सो में अंग्रेजो की ज्यादा बसावत थी।उन हिस्सों में इस बीमारी ने ज्यादा कहर मचाया था।इन हिस्सो में भारतीय इस महामारी में सबसे अधिक मारे गए थे।अब एक बार फिर से कोरोना के बढ़ते कहर की वजह से लोग बेहद आशंकित हैं। फिलहाल सरकार और दूसरी संस्थाएं लगातार लोगों को इस गंभीर वायरस से बचाव को लेकर कोशिश में जुटी हुई हैं।

 

         आखिरकार गैर सरकारी संगठनों और स्वयं सेवी समूहों ने आगे बढ़कर मोर्चा संभाला था. उन्होंने छोटे-छोटे समूहों में कैंप बना कर लोगों की सहायता करनी शुरू की. पैसे इकट्ठा किए, कपड़े और दवाइयां बांटी है।नागरिक समूहों ने मिलकर कमिटियां बनाईं।एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, "भारत के इतिहास में पहली बार शायद ऐसा हुआ था जब पढ़े-लिखे लोग और समृद्ध तबके के लोग गरीबों की मदद करने के लिए इतनी बड़ी संख्या में सामने आए थे।

 

          आज की तारीख में जब फिर एक बार ऐसी ही एक मुसीबत सामने मुंह खोले खड़ी है तब सरकार चुस्ती के साथ इसकी रोकथाम में लगी हुई है लेकिन एक सदी पहले जब ऐसी ही मुसीबत सामने आई थी तब भी नागरिक समाज ने बड़ी भूमिका निभाई थी।जैसे-जैसे कोरोना वायरस के मामले बढ़ते जा रहे हैं, इस पहलू को भी हमें ध्यान में रखना होगा और सभी लोगो को मिलकर इस बीमारी की लड़ाई में आगे बढ़ना होगा।

Sunday, April 19, 2020

लौहपुरुष पुरुष से महका हिंदुस्तान : सरदार पटेल

किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का सही तथा पूर्ण रूप से आंकलन उसकी बाहरी आकृति को देखकर नहीं किया जा सकता, बल्कि सही आंकलन हेतु आंतरिक गुणों की समुचित जानकारी होना आवश्यक है। बाहरी रूप से देखने पर उन्हें प्रतीत होता था कि सरदार पटेलह्रदय विहीनहै और मानवीय भावनाओं से उनका कोई ताल्लुक नहीं है। किंतु वे स्वभाव से निर्भय वीर और दृढ़ निश्चय थे।वे कम बोलते थे और कार्य अधिक करते थे।“पुरुषोत्तम दास टंडन के अनुसार जो उनको जानते थे बताते हैं किवह बहुत दयावान थे और मौका पड़ने पर बहुत कोमलता प्रदर्शित करते थे। उन से बढ़कर अधिक मित्र कोई नहीं है अब भरोसा करने वाला साथी पाना मुश्किल था। “1 सरदार बल्लभ भाई पटेल का व्यक्तित्व ऐसा थाजैसे गंगा नदी।जिसने जीवन भर गंगा नदी की तरह संघर्ष किया अपने उद्देश्य प्राप्ति के लिए गंगा की भांति पावन जल धारा में करुणा प्रेम कोमलता व जनकल्याण की भावना भरी हुई रहती है।जिस तरह गंगा अपने गंतव्य की दूरी को जल्द से जल्द पार करने के लिए उतावली रहती है उसका गंतव्य ही उसकी बेचैनी थी ठीक उसी तरह सरदार जी भी अपने गंतव्य की दूरी को जल्द से जल्द पार करने के लिए हमेशा उतावले रहते थे। अपने उद्देश्य की पवित्रता से परिपूर्ण सरदार पटेल का व्यक्तित्व भारत के करोड़ों दर्शकों और मजदूरों को गंगा की व धारा बना दिया जिसने अपने प्रवाहित जीवन में ना केवल उन्हें सुख संतोष और पुरस्कार दिया अपितु बंधन मुक्त का आत्म संतोष भी प्रदान किया।


व्यक्तित्व के निष्पक्ष के कारण यश और प्रसिद्धि के चरमोत्कर्ष को छूने पर भी वे लोकप्रियता के चरम बिंदु पर नहीं पहुंच सके जहां नेहरू जी पहुंचे थे।“2सरदार वल्लभभाई पटेल कृषक थेउनमें कृषक के जन्मजात गुण सहनशक्ति परिश्रम लगन सच्चाई और स्वाभिमान जैसे सभी गुण मौजूद थे। सेनापति बने।अनुशासन उनका आचरण था इसी कारण वे सरदारथे। अपने उद्देश्य के प्रति निष्ठा लगन और उन्हें मूर्त रूप देने की तत्परता उनके व्यक्तित्व का एक उज्जवल पक्ष था जो उसकी पवित्रता और प्रतिष्ठा को बनाए रखना उसके बहुमुखी व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष था।सरदार पटेल एक दूरदर्शी व्यक्ति थे तथा आशा उनकी संगिनी रही।अपने मार्ग के औरतों को हटाने में वह एक ऐसे आक्रमणकारी थे जिनके ह्रदय में लेश मात्र भी दया भाव नहीं रहता था। फिर अपने निर्णय मत के संबंध में तर्क वितर्कशंंकाऔर संदेश को को उन्होंने कभी कोई स्थान नहीं दिया।सरदार बल्लभ भाई पटेल की पूर्ण रूप से ईश्वर में आस्था थी।वे कहा करते थे”ईश्वरी नियम अपरिवर्तनीय है। मृत्यु के संबंध में उनका विश्वास था कि मृत्यु निश्चित है।  पुण्यात्मा मनुष्य कभी नहीं मरता।राम और कृष्ण के नाम उनके कार्यों से ही अमर हैं।मौततो जन्म के साथ है और मरने के बाद दुख भी क्या होगा। इसलिए मौत का भय तो छोड़ ही दीजिए। हिम्मत होगी तो भगवान ही मदद करेगा।3अशोक मेहता ने सरदार को एक ऐसा व्यक्ति बताया जिसमें चट्टान की तरह आत्मविश्वास था।4महापुरुषों का जीवन कभी समतल रास्ते की तरह सीधा नहीं होता है। अपना मार्ग प्रशस्त करने के लिए उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ता है। संघर्ष की घटनाओं में उन्होंने स्व का सर्वनाश कर दियाऔर वे सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक कल्याण की चेतना से भव्य और दिव्य बने।उन्होंने अपने निजी स्वार्थ को छोड़कर समाज देश तथा मानवता के कल्याण और सेवा के लिए लगाया।ऐसे महापुरुष पूजनीय होने के साथ-साथ जनमानस के आराध्य देवता बन जाते हैं। ऐसे महापुरुषों के सत्कर्म कभी मरते नहीं उन्हें ना कभी समय मिटा सकता है ना शस्त्र कभी काट सकता है और ना अग्नि कभी उन्हें भस्म कर सकती है।ऐसे महापुरुषों में सरदार बल्लभ भाई पटेल एवं डॉक्टर बी आर अंबेडकर अग्रणी पुरुष रहे हैं।


सरदार बल्लभ भाई पटेल देशभक्तों में एक अमूल्य रत्न थेवे भारत के अदम्य  शक्ति स्तंभ का लगातार सेवा तथा दूसरों को दिव्य शक्ति चेतना देने वाला उनका जीवन सदैव प्रकाश स्तंभ की अमर ज्योति की भांति है।उनका भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में विवादास्पद योगदान रहा है वह मितभाषी अनुशासन प्रिय और कर्मठ व्यक्ति के कठोर वस्तु में विस्तारक   जैसी संगठित कुशलता कौटिल्य की भांति राजनीतिक तथा राष्ट्रीय एकता के प्रतीक अब्राहम लिंकन जैसे अटूट निष्ठा रखते थे।इनकी तुलना मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य से की जा सकती है।इन दोनों में अंतर बस यही है कि चाणक्य ने साम्राज्य की स्थापना कीऔर पटेल ने साम्राज्यवादी सामंतवादी शासन को समाप्त कर लोक वादी बना दिया। उनके नाम से ही लोगों के मन में अनुशासन और नियंत्रण के भाव जागृत हो जाते हैं।किंतु अपने कठोर व्यक्तित्व के साथ  अपने अंतर्मन में ही कोमल भाव छुपाए हुए थे।किंतु इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को थी वह उस नारियल की तरह थे।जो ऊपर से कड़ा किंतु अंदर से नरम ।सरदार जी का व्यक्तित्व प्रेरणादायक था।वे सदा से ही चुस्त और दुरुस्त रहते तथा सूचनाओं को ग्रहण कर अपने मन में संजोकर रखते। जिस प्रकार मधुमक्खी अपने शहद को विशेष रूप से जमा करती है और तब तक जमा कर रखती है जब तक उसे उसका उपयोग करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। सरदार पटेल धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। ईश्वर के प्रति उनकी आस्था पूर्ण श्रद्धा एवं भक्ति भाव पूर्ण थी । “अशोक मेहता ने सरदार को इस बात का व्यक्ति बताया जिसमें चट्टान की तरह आत्मविश्वास था।शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता उनमें थी।कठोरता पूर्वक विधिवत उसे क्रियान्वित करने के कारण सरदार लौह पुरुष कहलाए।उनके जीवन में अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं जब छोटे थे तो उनके बगल में फोड़ा निकल गया था नाई के अलावा उसे कोई दूसरा व्यक्ति फोड़ नहीं सकता था। जब नाई सलाख को गर्म करके  फोड़े पर चीरा लगाया तो तभी सरदार बालक ने कहा देर क्यों करते होसलाख ठंडी हो रही है। उन्होंने नाई की हाथ में से सलाख  को लेकर खुद से चारों ओर घुमा कर मवाद बाहर निकाल लिया उसी समय बायोवृद ग्रामीण ने कहा अरे भाई यह कोई साधारण पुरुष नहीं यह तो विलक्षण लौह पुरुष है। 5


एक लौह पुरुष के रूप में प्रतिकूल परिस्थिति में भी साहस बुद्धि एवं दृढ़ निश्चय द्वारा ईमानदारी से अपने लक्ष्य को पूरा करने की अद्भुत क्षमता उनमें थी। तर्क वितर्क शंका   आदि को वह कभी अपने पास आने नहीं देते थे। उन्होंने स्वयं कहा है कि जो शूरवीर होते हैं वह ईमानदार भी बन सकते हैं कायर समझदार होने पर भी मेरे मन में उनके प्रति प्रेम प्रकट नहीं होता क्योंकि वह भरे पूरे समुद्र में जहाज डूबाने वाले होते हैं। कांग्रेस पार्टी के संगठन को शक्तिशाली बनाने व उसे बनाए रखने तथा उसकी छवि को सुधारने में सरदार पटेल ने लौह पुरुष के व्यक्तित्व का परिचय दिया अपने स्वास्थ्य की बिना चिंता किए वे जीवन पर्यंत कांग्रेस संगठन कोएक बनाए रखने का सतत प्रयास किया।पार्टी की नीति के विरुद्ध अनुशासनहीनता को कभी भी बर्दाश्त नहीं किया।इसी कारण डॉक्टर खरे नरीमन तथा सुभाष चंद्र बोस के कोप भोजन का शिकार हुए। श्रीमन नारायण अग्रवाल लिखते हैं कि”यदि वे पार्लियामेंट्री बोर्ड के चेयरमैन ना होतेतो कांग्रेस के कितने ही मिनिस्टर पथभ्रष्ट हो गए होते । सरदार का निर्णय कितना ठोस होता था इसके प्रमाण के लिए नरीमन और खरे उदाहरण स्वरूप हैं उनके जीवन मेंअनेक उदाहरण उनकी दूरदर्शिता का सजीव चित्रण प्रस्तुत करते हैं। कश्मीर में पाकिस्तान के आक्रमण से लॉर्ड माउंटबेटन चिंतित थे परंतु सरदार ने आशा भरे शब्दों में कहा कश्मीर बचकर रहेगा। उनकी राजनीति नैतिक स्तर पर आधारित थी। उनकी नैतिकता का सबसे बड़ा प्रमाण नेहरू के संबंध में गांधी जी को दिया गया वह वचन था जिसके आधार पर उन्होंने नेहरू जी को जीवन भर अपना नेता स्वीकार किया।अपना पक्ष को रखते हुए शत्रु से भी सहज काम ले लेते थे उस समय भारतीय स्वतंत्रता के साथ देशी राजाओं को दोनों भारत पाकिस्तान से अलग रखने की छूट से अनेक देसी राजा सरदार जी के शत्रु बन गए। परंतु सरदार जी उनके दिलों को जीतकर देशी राजाओं को भारतीय संघ में शामिल करके इतिहास में एक अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया। उनकी मृत्यु पर अनेक राजा अपने मित्र व रक्षक के ना होने से अत्यंत दुखी थे  सरदार पटेल की आर्थिक चिंतनजबरदस्त थी। उनका आर्थिक क्षेत्र में दृष्टिकोण उदार एवं यथार्थवादी था सरदार जी ने स्वयं कबूल किया कि मुझे सदैव बिरला जैसे पूंजी पतियों का मित्र होने का आरोप लगाया गया है लेकिन मैंने गांधीजी से सीखा है कि अमीर या गरीब बड़ा या छोटा सब के प्रति सहानुभूति रखो आज मैं श्रमिक उद्योगपति राजा किसान तथा जमींदार से मित्रता रखता हूं और उन्हें सही कार्य करने हेतु प्रेम पूर्वक प्रेरित कर सकता हूं।6  21 नवंबर सन 1949 को उद्योग एवं केंद्रीय सलाहकार परिषद को संबोधित करते हुए एक कुशल व्यवहारवादी अर्थशास्त्री के रूप में पटेल ने कहा”अर्थशास्त्र व्यावहारिक विज्ञान है अतः मैं आपसे आग्रह करता हूं कि आप समस्या के व्यवहारिक पक्ष को निकटता से देखें तथा उन उपायों की खोज करें जिनके द्वारा उपलब्ध साधनों का राष्ट्रीय विकास में उद्देश्य पूर्ण सहयोग हो सके। 7


 


सरदार जी लगभग 3 वर्षों तक औद्योगिक शांति के पक्ष में थे उन्होंने हड़ताल करने के बजाय परस्पर समझौते तथा पंच फैसले की पद्धति पर अधिक बल दिया। 1949 में पटेल ने इंडियन नेशनल यूनियन कांग्रेस को एक संदेश में कहा कि देश में जो लोग आज के संकट काल में ऐसी कार्यप्रणाली का आश्रय देते हैं जो उत्पाद को रोकते हैं वह मजदूरों और देश को हानि पहुंचाते हैं। 8


पटेल का सामाजिक न्याय संबंधी दृष्टिकोण ऐसा था कि जिन में गरीबों के रहन-सहन के स्तर को उठाने की व्यवस्था हो । इसी कारण वे भूमि सुधारों में बिनाउचित मुआवजा करने के विरुद्ध थे। सरदार पटेल को जन्मजात संगठनकर्ताकहा जा सकता है जिनका क्षेत्र सीमित था पर अपनी छोटी सी परिधि के अंदर उनकी शक्ति प्रचंड एवं व्यापक थी।उनमें हारे हुए मैदानों को विजय में परिणित करने की क्षमता थी।9अर्थात यह कहा जा सकता है कि मनुष्य उस सीमा तक शक्ति रखता है जहां तक दूसरों के व्यवहार को अपनी इच्छा अनुसार प्रभावित करने के लिए । इस प्रकार शक्तिप्रभाव का पर्यायवाची माना गया है शक्ति की पहचान के लिए हमें विशिष्ट स्थिति और उस व्यक्ति विशेष की भूमिका पर ध्यान रखना होगा शक्ति स्थिति परख होती है। सरदार पटेल का सामाजिक चिंतन गांधीवादी का पूरक है उन्होंने अस्पृश्यता को हिंदू धर्म का कलंक बताया।सरदार पटेल स्त्रियों को आत्मनिर्भर बनाने तथा पुरुषों के समान अधिकार दिलाने के पक्ष में थे। 1929 में अपनी बिहार यात्रा में किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि आपको शर्म नहीं आती आप अपनी स्त्रियों को पर्दे में रखकर खुद ही पीड़ित हैं यह स्त्रियां कौन है आपकी मां आपकी बहन और आपकी पत्नी। उन्हें पर्दे में रखकर क्या आप यह मानते हैं कि आप उसके सतीत्व की रक्षा कर सकेंगे ।उन पर इतना विश्वास क्यों आप इसलिए डरते हैं कि वह बाहर जाकर आप की गुलामी को देख लेंगे। आपने उन्हें गुलाम पशुओं की तरह ही रखा है इसलिए उनकी औलाद आज भी गुलाम पशुओं की तरह हो गए हैं मेरी माने तो मैं बहनों से कह दूं कि ऐसे डरपोक और नामर्द की स्त्रियां बनने से तो उन्हें तलाक दे देना अच्छा है10


सरदार पटेल एक धर्मनिरपेक्ष समाज के पक्षपाती थे उनका मत था कि ईश्वर एक है तथा सभी उसके हैं। धर्म ईश्वर तक पहुंचने के अलग-अलग मार्ग हैं लेकिन सबसे श्रेष्ठ मानवता है। वे अक्सर कहा करते थे कि ईश्वर ने सबको समान बनाया है तो की मालिक व दास का अंतर क्यों ? जब एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के समान हैं तो यही समानता की भावना समाज में व्याप्त होनी चाहिए इस तरह सरदार पटेल ने हिंदू-मुस्लिम को एक कोमल पौधा बताया जिससे आने वाले समय में अत्यंत सावधानी से पालना पड़ेगा।


अतः उपरोक्त कई कारणों से सरदार पटेल लौह पुरुष के रूप में जाने जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत वर्ष गुजरात के नर्मदा जिले में पटेल के स्मारक का उद्घाटन किया इसका नाम एकता की मूर्ति स्टैचू आफ यूनिटी रखा गया।मूर्ति स्टैचू आफ लिबर्टी से दोगुनी ऊंचाई यानी 182 मीटर ऊंची बनाई गई है। इस प्रतिमा को एक छोटे सेचट्टानीद्वीप पर स्थापित किया गया है। सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है। सरदार वल्लभ भाई पटेल को मुंबई में हुआ था उनकी मृत्यु के उपरांत भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न दिया गया जो उन्हें बहुत पहले मिलना चाहिए था वर्ष 2014 में केंद्र की मोदी सरकार ने सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती 30 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाना शुरू किया। वास्तव में सरदार पटेलएकता की मूर्ति थे।


संदर्भ ग्रंथ सूची



  1. सरदारपटेलकोनेहरूकेपत्र 4 नवंबर 1947 वही नंबर 75

  2. आजाद को पटेल के तार 25 अक्टूबर 1945 26 अक्टूबर 1945

  3. 26 अक्टूबर 1945 आजाद को पटेल का तार वही नंबर 30 31

  4. आजाद पटेल को पत्र 30 अक्टूबर 1945

  5. पटेल का कामराज को पत्र 26 दिसंबर 1945 पृष्ठ 204

  6. पटेल का गांधी जी को पत्र 2 जुलाई 1946 पृष्ठ पीस

  7. बैनर्जी एंड बोस द कैबिनेट मिशन इन इंडिया पृष्ठ 167

  8. आरडी शंकर दास बल्लभ भाई पटेल पृष्ठ 251

  9. डीएन पांडे मैकमिलन 1949 पृष्ठ 195

  10. मौलाना अबुल कलाम आजाद आजादी की कहानी पृष्ठ 185


श्रीमती आशा रानी पटनायक शोधार्थी


शोध निर्देशक:डॉक्टर आरके टंडन


बस्तर विश्वविद्यालय जगदलपुर जिला बस्तर छत्तीसगढ़



 


 


 


 


Saturday, April 18, 2020

बस्तर के जनजीवन में पत्तों की महत्ता

बस्तर के जनजीवन में पत्तों की महत्ता


पत्तों से ही हरियाली को अस्तित्व मिलता है। पत्तियां ही पेड़ पौधे के वस्त्र आभूषण बनते हैं। इसी कारण से यह शिरोधार्य होते हैं। पत्तों से ही कोई भी पेड़ छतनार कहलाने की क्षमता रखता है। पत्ते मिलकर ही वृक्ष के नीचे उसकी छाया बनाते हैं और वो छाया ग्रीष्म के ताप से जलते हुए राहगीर को शांति प्रदान करती है। पत्तियां हैं स्टार्च तथा कार्बोहाइड्रेट बनाती हैंऔर खाद्य पदार्थ तैयार करती हैं। पौधों को कार्बन की अत्यधिक आवश्यकता रहती है। इससे वे अपने पत्तियों द्वारा वायुमंडल से कार्बनिक एसिड गैस के रूप में ग्रहण करते हैं। कार्बनिक एसिड गैस में 2 भाग ऑक्सीजन का और एक भाग कार्बन का होता है। इसलिए पत्तियों द्वारा पौधों में न केवल कार्बन अपितु ऑक्सीजन दे पहुंचते ही रहता है। हरे पत्ते वायु को शुद्ध करते हैं कार्बन डाइऑक्साइड से कार्बन ग्रहण कर वायु में ऑक्सीजन वापस कर देते हैं।


हिंदू दर्शन के अनुसार जल प्रलय के समय जल पर बड़के  एक पत्ते पर शिशु के रूप में भगवान चित् लेटे हुए पांव का अंगूठा चूस रहे हैं। प्रस्तुत मिथक सृष्टि के नवीन शुभारंभ का संकेत देता है।भगवान बुद्ध ने दी पीपल के पत्तों की छांव में बुद्धत्व को प्राप्त किया था। पत्ते जब बाल्यावस्था में होते हैं तब भी किसलय कहलाते हैं। किसलय और कोमल व चमकदार होते हैं।शिशिर ऋतु में कई वृक्ष से पत्ते झड़ जाते हैं पतझड़ के बाद बसंत ऋतु में पेड़ पौधों की पत्तियों में निखार आ जाता है। पेड़ पौधे अत्यंत आकर्षक लगने लगते हैं।बस्तर में सरगी पलाश सिआड़ीआम और तेंदू के पत्ते विशेष उपयोगी प्रमाणित होते आ रहे हैं तेंदूपत्ता ने व्यवसाय और मजदूरी को अत्यधिक प्रभावित किया है। सरगी सीआईडी और पलाश के पत्ते इधर ग्रामीण जीवन में उपयोगी माने जाते हैं। आम के पत्ते कलश में रखने और तोरण बनाने के काम भी आते हैं।सरगीसियाड़ी और पलाश के पत्तों से दोनों और पत्थल बनाए जाते हैं। इन्हें बांसकिसीक से सिला जाताहैंसरगी की तुलना मेंसीआईडी पत्तों की उपयोगिता अधिक है। सीआईडी पत्ते छ तोड़ी में जाने के लिए लगाए जाते हैं। तीन पत्तों से अरहर मूंग उड़द सरसों आदि को साल भर सुरक्षित रखने के लिए बड़े-बड़े चिपटे भी बना लिए जातेहैं वर्तमान समय मेंचिपटे का स्थान डब्बा ने ले लिया है


दोनों कई प्रकार से बनाए जाते हैंअलग अलग नाम से जाना जाता हैबड़े दोनों कोडोबला कहा जाता हैसरगी के लगभग 20 पत्तों से यह तैयार किया जाता है जिसमें यहां के जनजातीय भात खाते हैंसब्जी खाने के लिए 2 पत्तों से बनी चौकोन बनी होती हैजिसमें 4कोनेहोते हैं।नाव के आकार का जो दो ना होता है उसे मुंडी दो ना कहते हैं 10 से 20 पत्तों को सील कर सत्ता बनाया जाता है जो थाली का काम करता है। पेज पीने के लिए तुपकी और शराब पीने के लिएचिपड़ी भी बनाई जाती है। लोक साहित्य में पत्तों को बड़ी आत्मीय अभिव्यक्ति दे रखी है


छीन के पत्ते भी इधर कम उपयोगी नहीं होतेपनारा जाति के लोगशिव के पत्तों का कलात्मक उपयोग किया करते हैं। विवाह के लिए दूल्हे और दुल्हन के लिए मुकुट बनाया जाता है पूर्णविराम सिम के पत्तों से प्रतिवर्ष जन्माष्टमी और हरितालिका व्रत की झांकियों को सजाने के लिए गोल गोल लटकते झूलते झंडू भी बनाए जाते हैं।कुछ समय पहले तक जींद के पत्ते से घर की छत भी बनाई जाती थी। पत्तों का संसार बड़ा विचित्र है छुईमुई की पत्तियों कछूने से वह इटहरी हो जाया करती हैभटकटैया के पास ही में बहुत से कांटे होते हैं जिन्हें छूने से डर लगता है परंतु यह बहुत ही अधिक गुणकारी होता है बस्तर में इसेरेंगनी भेज रही कहा जाता है। रेंगनी का अर्थ है चलना और भेज रही का अर्थ है भटाअर्थात भटकटैया कोऔषधि के रूप में उपयोग किया जाता है। बेल तुलसी दूब और नीम के पत्ती भी समय-समय पर धार्मिक व सामाजिक कार्यों में प्रयुक्त होते आए हैं। हर साल विजयदशमी के दिन लोग एक दूसरे के घर जाकर सोमपान अर्पित करके और सब भावनाएं प्रकट किया करते हैंअमलतास का पत्ता ही सोमपान कहलाता है बस्तर भूमि में अमलतास के दो स्थानीय नाम प्रचलित है पहला भालू मूसली और दूसरा सोनरली रूख ।गुच्छों में लटकते झूलते अमलतास केसुनहरे फूल इसके इस नाम को सार्थक करते हैं । पत्तों ने भाषा को भी सजाया है उसने कहावतें मुहावरे और गति भी है। हमारी भारतीय संस्कृति में आराध्य श्रद्धालु और श्रद्धालुओं द्वारा पत्र पुष्प फल तो अर्पित करने की एक शालीन परंपरा चली आ रही है जिससे बख्तर का लोग जीवन में प्राया जुड़ा हुआ हैपत्र के कई अर्थ होते हैं पत्ता समाचार पत्र चिट्ठी दस्तावेज और पुस्तक का पन्ना। छोटे पत्ते को पत्री कहते हैं।पत्री के दो प्रमुख अर्थ सामने आते हैं जन्मपत्री और लग्न पत्रीबस्तर में प्रचलित लोक भाषाओं में भी उनके अनुसार कई मुहावरे प्रचलित हैपरंतु आप दिनों दिन इधर भी पत्तों का उपयोग कम होता जा रहा है दोनों और पत्थरों की जगह अभी स्टील जर्मन और प्लास्टिक के बर्तनों का उपयोग होने लगा है मशीन द्वारा दोनों और पत्रों का निर्माण भी जोर पकड़ता जा रहा है जिससे यहां की जनजाति आर्थिक संकट का सामना कर रही है और उनका रोजगार भी कम होता जा रहा है फिर भी पत्तों की पात्रता को कोई चुनौती नहीं दे सकता सचमुच अद्भुत और उल्लेखनीय है बस्तर राज्य के यह बर्तन भांडे और लोग जीवन में पत्तों की महत्ता||


श्रीमती आशा रानी पटनायक व्याख्याता जगदलपुर जिला बस्तर छत्तीसगढ़


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