Saturday, February 29, 2020

नफ़रत के बीज

नफ़रत के बीज


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पत्थर जो चला रहे हो


शायद किसी आशियाँ का है


रहते थे सब सुकून से जिसमें 


वो घर अब खंडहर सा है


 


सीना छलनी किया जिसका


वो सीना किसी रखवाले का था


तुम चैन से सोते थे जब


वो रात भर जागता रहता था


 


नफ़रतों के बीज अंकुरित हो रहे


विशाल वृक्ष न बन जाए


उखाड़ फेंको उसे 


कीड़े कही न लग जाए


 


क्यों हिंसा के नशे में डूबे हो


धरना ,प्रदर्शन के नींद से जागो


खुमारी बदले की त्यागो..


निर्दोष न कोई बे मौत मरे


दोषियों को धर पकड़ो |


 


सेवक हो हम सबकी


उलझन सबकी सुलझावों 


सत्ता के खुमारी से उठकर


विश्वास का दर्पण दिखलाओ|


 


          सविता गुप्ता 


      राँची (झारखंड)


रंगरेजन फ़ातिमा

रंगरेजन फ़ातिमा


.............


कपड़े तो कितने ही


रंगती थी वो


किन्तु उसके हाथ


नहीं होते थे रंगों से सने हुए


 


रंगों की संलिप्तता से


एकदम असंपृक्त और धवल


होती थीं उसकी नरम हथेलियाँ


 


किसी भी कपड़े पर


पक्का रंग चढ़ाने का मर्दानी दावा करती थी वो


रंग उतरने पर पैसे वापस लौटाने के वायदे के साथ


 


दुकान के बाहर ही भट्टी पर खौलते रंगीन पानी में


डंडी के सहारे कपड़ों को उलटती.पलटती वह


परिवार के दर्जन भर पेटों के लिए


जुटाया करती थी दो वक्त की रोटी


 


वहीं पगडंडी पर चहलकदमी करते हुए


तरा&ऊपर के दो तीन बच्चों में से


किसी के द्वारा शरारत करने पर


गाल पर तमाचे के स्मृतिचिन्ह के साथ


वह बाँट दिया करती थी ukसपीटेष् की उपाधि


 


काम के वक्त न उसके बदन पर होता था


हिजाब और न चेहरे पर बुर्का


ढीले कुर्ते सलवार और चुन्नी रहित


उसकी छाती भी रहती थी


रंग आकांक्षितों की दृष्टि से बेखबर


 


काम के तगादों के कारण


कहाँ मिल पाता था उसे


इस सब के लिए सोचने का अवसर


 


उस समय जब किसी को


रंगवाने होते थे मूँगिया रंग में


रजाई के खोले तो लोग


बताया करते थे उसका पता .


Qkतिमा रंगरेजन सरगासूली के नीचे


000


ओ रुकमा !


 


वह बैठी


घम.&छांव में


ठंडी yw पर पीठ टेक


श्लथ थकी.&मांदी


नहाई स्वेद धारा से


 


खोल पोटली करभ.&सी मोटी रोटी की


छील.छील कांदे के छोडे़ करती दोपहरी


 


गोद में किलबिलाते


नन्हे f’k’kq को


ढंकती जर्जर पल्लू से


खोल वक्ष भर देती


रिरियाते मुंह में गोली अरीठे की


 


निहारती जब इक&टक


वात्सल्य&सिक्त आंखों से


तो लगती बरसने


ज्यों पय&धारा अमृत सी रीते घन से


 


अलसाये बेटे को


सुला चूनर के झूले में


लग जाती बच रही


आधे दिन की दिहाड़ी की चिन्ता में


झुला कर आते&जाते


बच्चे को वह करती निर्विघ्न अपने


dÙkZO;&पथ को


 


तू मां है ! तू श्रम देवी है !


तू ही है सृजन ! ओ रुकमा !


000


खींप के फूल


 


पत्थर हंसते हैं


जब मैं ठोकर खा कर


गिरता हूं सड़क पर


 


सम्हल कर उठते हुए


पड़ौस से नज़रें चुराते हुए


मैं ढूंढ़ने लगता हूं


शरीर में कहीं आईं हुईं


खरोंचो को


 


अफ़सोस है


कि पास ही पौधों पर


खिले हुए ये फूल भी


कितने बेपरवाह हैं


बहती तीखी हवाओं से


 


मेरे ठीक से चलते हुए भी


pलना सीखने कks कह रहh हैं


बाजार की ऊबड़&खाबड़ पगड़डियां


और गांव की सरहद पर लगे


बेतरतीब झाड़ियों के कांटे


 


इस बीच


Hkभूल्यों में उड़ते हुए


[khaप के सफेद रे’kमी फूल


तला’k रहे हैं दि’kkएं


 


वहीं एक पुरानी जर्जर


बावड़ी पर लगी


;हां नहाना मना है] की


चेतावनी को पढ़ कर


मैं चलने लगता हूं


अपने गन्तव्य की ओर


लंगड़ाते हुए


000


 


अचेतन में स्मृतियां


 


स्मृतियों के अरण्य में


अटके कोई विस्मृत संदर्भ


लौटते हैं स्वप्न में


जब&तब


 


स्वप्न में यों मूतZ हुए


वे अfuf’pत व अवि’oसनीय संदर्भ


स्प’kZ को तत्पर


अंगुलियों की आंखों में


सदा रहते हैं अदृष्य


 


लगता है कभी नहीं


गुजरे थे ये मेरे साथ


 


मुंदी हुई उनींदी आंखों


के बाहर फैले हुए


घोर अंधेरे में उभरते ये रंगीन चित्र


आखि़र चाहते हैं कुछ कहना


कुरेद कर स्मृति&अरण्य के कोनों को


 


जागता हूं या


खोलता हूं जब आंखें


तो सामने विस्तृत


सफेद रो’kनी के पर्दे पर


लिखी नहीं होती है


कोई भी इबारत


 


सही है यह कि


अनुभूतियों से ही जन्मती हैं स्मृतियां


किन्तु चेतन में ये


कुछ और होती हैं


व अचेतन में कुछ और


000


 


ईश्वर की आवाज (कविता)

ईश्वर की आवाज


जो आया मेरे दर पर
बस कुछ न कुछ
मांगने आया।
पर कभी मांगा न मुझे
न मांगा मेरा
प्रेम तत्व मुझसे।
बस हताश रहा
मुक्ति के लिए,
और परेशान रहा
अपनी इच्छाओं के लिए।
बस ढूंढता रहा
लोगों में कमियां
न तलाशा की उनकी
आत्मा में मेरी अभिव्यक्ति।
अपनी घर की
चारदीवारी की तरह
मुझे भी बांटता रहा,
कभी मंदिर,कभी मस्जिद
कभी गिरजाघर के रूप में।


राजीव डोगरा 'विमल'
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश (युवा कवि लेखक)
(भाषा अध्यापक)
गवर्नमेंट हाई स्कूल,ठाकुरद्वारा।


अपनेपन की पिचकारी..........

1-अपनेपन की पिचकारी

 

 

अपनेपन के रंगों से मन की पिचकारी भर दो।

अबके होली में तुम सबको एक रंग में भर दो।।

 

ना हिन्दू हो,ना कोई मुस्लिम,एक रंग में सबको रंग दो।

इस  होली  में  तुम  सबको  एक ही मजहब में रंग दो।।

 

एक बच्चे सा मन हो सबका,ना मन मे कोई भेदभाव हो।

इस होली में सबको सबसे गले लगाने का एक भाव हो।।

 

ना नीला,ना हरा गुलाबी प्यार भरे शब्दो का रंग बनाओ।

मिट्ठी बातों से फिर एक दूजे के गमो को अपना बनाओ।।

 

आओ इस होली पर पूरे भारत को एक रंग से भर दे।

प्रण करे हम सब ऐसा,सबका मजहब भारतवासी कर दे।।

 

 

2-संभल कर चल

 

 

है दूर तक अँधेरा और कोहरा भी गहरा।

संभल कर चल , रोशनी पर भी है पहरा।।

 

कोहरे को जरा ओस की बूंदों में बदलने दे।

राह में फैले घनघोर अँधेरो को छटने तो दे।।

 

माना उजाले के सहारे बहुत नही है पास तेरे,

बस जुगनू के उजाले पर खुद को चलने दे।

 

मंजिल की डगर मे बहकावे बहुत से है लेकिन,

कुछ मील के पत्थर के सहारे खुद को चलने दे।

 

कोई सिरा मंजिल का कभी तो दिख जायेगा।

अपनी पलकों को पल भर भी ना झपकने दे।।

 

 

3-उसकी आश

 

 

आसमां से चाँद उठाकर जमी पर रखा है।

आशाओं का एक बांध बनाकर रखा है।।

 

उसका आना मेरे जीवन में नामुमकिन है। 

हमने ना जाने क्यों हाथ बढ़ाकर रखा है।।

 

उसने   मुझको   कभी   भी   पलट  कर  ना  देखा।

हमने ना जाने क्यों उसका अरमान बनाकर रखा है।।

 

ना जाने अब भी कौन सी आश बाकी है।

इंतजार मे दरवाजो पर आँख लगाये रखा है।।

 

उम्मीदों  के  सारे  दरख़्त जमीनोंदोज हुए है।

फिर भी एक छोटा सा पौधा बचाकर रखा है।।

 

उसके जीवन मे आने की आश अब भी बाकी है।

दिल मे उम्मीदों का आखिरी दिया जलाकर रखा है।।

          

         

 

4-*ऐसा ना हो अकेले रह जाओ*

 

 

माना जीवन मे खुशियो को तुम पाओगे,

क्या करोगे उन खुशियो का जब उन्हें

बिना परिवार खुद अकेले ही मनाओगे।

 

माना सारी सुख सुविधा को तुम पाओगे,

क्या  करोगे  सुख  सुविधा  का  जब उन्हें

औरो  का  हक  मार कर तुम कमाओगे।

 

माना जीवन मे तुम आगे बढ़ते जाओगे,

क्या   करोगे   मंजिलो   पर   पहुँचकर,

जब वहाँ खुद को अकेला तुम पाओगे।

 

शिखर पर पहुँच क्या अकेले मुस्करा पाओगे,

कोई भी ना होगा जब पास तेरे,बताओ मुझे,

फिर गीत खुशियो के किस तरह गुनगुनाओगे।

 

कभी उठा , कभी गिरा , इंसान यूँ ही आगे चला,

दिन-रात की भाग दौड़ में ईमान से ना गिरना कभी,

ऐसा ना हो बईमानी अपनो से करते करते हुए,

तुझे पता भी ना चले और तू अकेला रह जायेगा।

 

जीवन हर पल घटता जैसे पर्वत पल पल गिरता है।

तू क्यों ना मिलजुलकर सबसे हिम पर्वत सा ढलता है।।

चाहे कोई बड़ा या छोटा हो,ले चल साथ सभी को,

जैसे नदियों का पानी मिलकर एक समंदर बनता है।।

 

 

 

5-. लघुकथा ---- *आज का श्रवण कुमार*      

 

 

          पापा मैं ये बीस कम्बल पुल के नीचे सो रहे गरीब लोगो को बाट कर आता हूँ।इस बार बहुत सर्दी पड़ रही है।श्रवण अपने पिता से ये कहकर घर से निकल गया।

 

          इस बार की सर्दी हर साल से वाकई कुछ ज्यादा ही थी।श्रवण उन कंबलों को लेकर पुल के नीचे सो रहे लोगो के पास पहुँचा।वहाँ सभी लोगो को उसने अपने हाथों से कम्बल उढा दिया।

 

          हर साल की तरह इस बार भी एक आदर्श व्यक्ति की तरह कम्बल बाटकर वह अपने घर वापस आया और बिना अपने पिता की और ध्यान दिये अपने कमरे में घुस गया।

 

         श्रवण के पिता 70 साल के एक बुजुर्ग व्यक्ति है और अपने शरीर के दर्द के कारण उन्हें चलने फिरने में बहुत दर्द होता है।बेटे के वापस आने के बाद पिता ने उसे अपने पास बुलाया।

 

          किन्तु रोज की तरह श्रवण अपने पिता को बोला।आप बस बिस्तर पर पड़े पड़े कुछ ना कुछ काम बताते ही रहते है।बस परेशान कर रखा है और अपने कमरे में चला गया।

 

          रोज की तरह अपने पैर के दर्द से परेशान श्रवण के पिता ने जैसे तैसे दूसरे कमरे से अपने लिए कम्बल लिया और रोज की तरह ही नम आँखों के साथ अपने दुखों को कम्बल में ढक कर सो गए।

 

          *_कहानी का सार_ ----आजकल लोगो की मनोस्थिति कुछ ऐसी हो गयी है कि वो बहुत से काम तो लोगो की देखा देखी ही करने लगे है।अपने आप को अत्यधिक सामाजिक दिखाने की जिज्ञासा की होड़ में दिन - रात लगे रहना और अपने ही घर मे बात-बात पर अपने बड़े बुजुर्गों को अपमानित करना एक आम बात हो गयी है।आजकल गरीब लोगो की सहायता करना लोगो के लिये एक दिखावे का सामान हो गया है।थोड़ी बहुत सहायता करने के उपरांत उसका अत्यधिक बखान करना एक आम बात है।* 

 


 

नीरज त्यागी

ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश ).

मोबाइल 09582488698

65/5 लाल क्वार्टर राणा प्रताप स्कूल के सामने ग़ाज़ियाबाद उत्तर प्रदेश 201001

Friday, February 28, 2020

फागुन के रंग





हर इंसान अपने रंग में रंगा है,
तो समझ लो फागुन की होली है।
हर रंग कुछ कहता ही है,
हर रंग मे हंसी ठिठोली है।
जीवन रंग को महकाती आनंद उल्लास से,
जीवन महक उठता है एक-दूसरे के विश्वास से।
प्रकृति की हरियाली मधुमास की राग है,
नव कोपलों से लगता कोई लिया वैराग है।
हर गले शिकवे को भूला दो,
फैलाओं प्रेम रूपी झोली है।
हर इंसान अपने रंग में रंगा है,
तो समझ लो फागुन की होली है।
आग से राग तक राग से वैराग्य तक,
चलता रहे यूँ ही परम्परा ये फ़ाग तक।
होलिका दहन की आस्था,
युगों-युगों से चली आ रही है।
आग मे चलना राग मे गाना,
प्रेम की गंगा जो बही है।
परम्परा ये अनूठी होती है,
कितनी हंसी ठिठोली है।
हर इंसान अपने रंग में रंगा है,
तो समझ लो फागुन की होली है।
सपनों के रंग मे रंगा ये संसार सारा,
सतरंगी लगता इंद्रधनुष सबको है प्यारा।
बैगनी रंग शान महत्व और
राजसी प्रभाव का प्रतीक।
जामुनी रंग दृढ़ता नीला विस्तार
और गहराई का स्वरूप।
हरा रंग प्रकृति शीतलता,
स्फूर्ति और शुध्दता लाये।
पीला रंग प्रसन्नता आनंद से घर द्वार महकाये।
रंग नारंगी आध्यात्मिक सहन शक्ति सिखाये।
लाल रंग उत्साह साहस,
जीवन के खतरे से बचाये।
रंग सात ये जीवन मे रंग ही रंग घोली है।
हर इंसान अपने रंग में रंगा है,
तो समझ लो फागुन की होली है।


  नाम- परमानंद निषाद
ग्राम- निठोरा, पोस्ट- थरगांव
तहसील-कसडोल, जिला-बलौदा बाजार(छग)
ईमेल- sarasach777@gmail.com
मोबाइल- 7974389033


 

 



 



Tuesday, February 25, 2020

भारत के रत्न साहित्य सम्मान 2020 से झाँसी मे सम्मानित हुए गुजरात के डॉ गुलाब चंद पटेल

इमेजिन ग्रुप ऑफ कंपनीज झाँसी के द्वारा दिनांक 22 - 23 फरवरी को होटल ' एम बीन्स झाँसी मे आयोजित राष्ट्रीय साहित्य सम्मेलन 2020 मे गांधीनगर गुजरात के हिन्दी गुजराती कवि लेखक अनुवादक और नशा मुक्ति अभियान प्रणेता ब्रेस्ट कैंसर अवेर्नेस प्रोग्राम आयोजक, इंडियन लायंस गांधी नगर तथा भूत पूर्व ऑफिस सुपरिटेंडेंट जिला शिक्षा अधिकारी माध्यमिक ऑफिस अहमदाबाद को संस्था के अध्यक्ष श्री दिल शेर दिल और संयोजक सीमा सिंह के द्वारा पुष्प गुच्छ, शाल, मोमेंटो और प्रमाण पत्र के साथ "भारत के साहित्य रत्न सम्मान" से सम्मानित किया गया है,

इस कार्य क्रम में आयोजित कवि सम्मेलन में डॉ पटेल ने अपनी रचना 'तुम बिन सुनी सुनी ये गलियाँ कान्हा' प्रस्तुत किया गया था, और हिंदी मे "सोशल मीडिया पर हिन्दी का प्रभाव" आलेख भी प्रस्तुत किया गया था,

इस कार्य क्रम में गांधीनगर के हिन्दी प्रेमी एडवोकेट श्री कांति भाई पटेल भी उपस्थिति रहे थे, उनका भी सम्मान संस्था के द्वारा किया गया था!

डॉ गुलाब चंद पटेल को भारत वर्ष से आए हुए साहित्यकारों ने अभिनंदन दिया था

Sunday, February 23, 2020

कहानी : नदी किनारे कुछ पल

आज का दिन बहूत ही अच्छा था ,क्यों कि आज सुबह से रिम-झिम बारिश हो रही थी | कभी-कभी थोड़ासा विश्राम लेती और फिर नयी उत्साह से शुरू हो जाती | पता नही क्यों पर अपनी गति वही रखती ऐसे मौसम मे कही घूम 

कर आने का मन कर रहा था | तो मैं उत्साह से घर से बाहर निकल आया और नांदेड शहर में गोदावरी नदी के तट पर विराजमान हुजूर साहिब गुरुद्वारा हैं | तो मैने वहाँ जाने का सोच लिया और चला गया क्यों कि यह रिम-झिम बारिश और वहाँ की बहती नदी और दौड़नेवाली हवा लाजबाब..! ऐसा मन मे उत्साह भर देती की यूँ हि इच्छा ना होकर भी होटो पर पंक्तियाँ अपने आप उभर कर आ ही जाती सच्च कहूँ तो मुझे ऐसा मौसम बहुत ही अच्छा लगता हैं | इसीलिए मैं घूमने आया था,वहाँ पहुँच कर सीढ़ियों से नीचे उतर रहाँ था | वह बहते जल की ध्वनि और दौडनेवाली हवा जबरदस्ती से गालो को चूम रही थी | बारिश के कारण भीड़ कम थीं जो भी थे वह कॉलेज के प्रेमी युगल  और नयी शादी के बंधन में बंधे हुऐ जोड़े रिम-झिम बारिश का मजा ले रहे थे | इसके बीच मैं अकेला छाते के साथ था | फिर भी मैं खुश था क्यों कि मेरी वाली मेरे साथ नही थी , मगर दिल के पास थी, जो कि ओरो की साथ थी मगर दिल के दूर थी |

         अचानक बारिश बंद हो गयी और हवा  का उत्साह बढ़ गया वह पागल सी दौड़ रही थी | तभी एक महिला मेरे पास आयी और कहने लगी, " कहाँ के हों..."

    " जी मैं यहाँ का ही हूँ, और आप कहाँ से...", "...मैं पंजाब अमृतसर से इधर गुरुजी के सेवा में आयी हूँ , सभी जोड़ियाँ है मगर तुम अकेले क्यों ?"

     महिला की बाते सुनकर मैं बिल्कुल अकेला हो गया, क्यों कि मैं यहाँ... फिर मैने कहाँ, " मैं अकेला कहाँ मेरे साथ मेरा छाता हैं, और साथ रहने वाली दिल मे है, तो मैं अकेला कैसा देखो हवा भी हैं ,अब तो आप भी हों... देखो मैं अकेला नही यहाँ की सभी प्रकृति मेरे साथ हैं ...|"

     महिला ने सभी गंभीरता से सुन लिया और कहने लगी ,

   "अच्छा हैं... अकेले हो मगर खुश हो...मुझे अच्छा लगा तुमसे मिलके और हाँ तुम्हारा बोलने का ढंग एकदम नाटकीय , क्यों क्या करते हो तुम |" इतना कहकर वह एकदम शांत हो गयी जैसे लगा कि उसने कुछ कहाँ  ही नही | "मैं हिंदी एम .ए प्रथम वर्ष में हूँ ,यहाँ के पिपल्स कॉलेज में युही घूमने आया था मैं यहाँ, आप क्यों आयी हो यहाँ...क्या आप अकेली हो या हैं कोयी साथ मे...|"

     उसने मेरी बातो को रोकते हुए कहाँ ," तुम्हारी तरहाँ ही घूमने आयी हूँ... न कोयी मेरे साथ है और नाही तुम्हारी तरहाँ दिल मे... बिल्कुल अकेली सिर्फ ईश्वर मेरे साथ है |"

 इतना कहकर वह उदास हो गयी फिर रुककर कहने लगी , " जो अकेले रहने में खुशी है...वह किसीके साथ... पता नही किसीसे जुदा होकर जीना मुश्किल है ... छोड़ो मैं भी ना देखो कितनी अच्छि हवा चल रही है | नदी का जल भी देखो मस्ती में

बहता हुआँ दिखाई दे रहा है| और ऐसे मोहल मे किसी अपने का हाथ, अपने हाथ मे हो और बहुत सी बातें हो...यहाँ घूमते-घूमते... चलो तुम्हरा नाम तो बताओ , मेरा भी एक बेटा हैं तुम्हारी तरहाँ अमृतसर में पढाई करता है...|"

        मैंने डरते हुऐ स्वर में कहाँ ,"मेरा नाम मारोती है और आपका " उसने मेरा नाम सुन लिया और मन ही मन मुस्कायी

मेरी तरफ देखकर कहाँ, "मैं बताती हूँ चलो घूमते- घूमते बाते करते है|" इतना कहकर मेरा हाथ पकड़कर मेरे साथ चलने लगी मैं भी उसके साथ घूम रहाँ था | क्यों कि वह मेरे माँ  के उर्म की थी | और उसने भी कहाँ था कि मेरा भी एक बेटा है | तो उसने भी बेटा समझकर मेरा हाथ पकड़ा हो... हम चलने लगे तो एकदम सी हवा रुक गयी और धूप चमक उठी यह देखकर मुझे ऐसा लगा कि यह प्रकृति मुझपर नाराज हो गयी | चलते-चलते उसने कहाँ कि , " मेरे पास सबकुछ था, अब भी है मगर मन में बेचैनी... क्यों कि मेरे पास मेरा पति नही, इसलिए मैंने संसार का त्याग कियाँ और गुरुजी की सेवा में आ गयी | मगर अब तो यहाँ पर भी मन लगता नही , मैं यहाँ से भी बाहर निकलना चाहती हूँ ,पर कैसे ... कहाँ जाऊँ , जहाँ से आयी हूँ वहाँ जाके क्या करूँ...क्यों कि मेरा सबकुछ खत्म हो गया है |"

वह बोलती रही और मैं सोचता रहाँ कि ऐसा क्यों कह रही है यह, कि मेरा पति नही और माथे पर तो भारतीय संस्कृति के नुसार बिंदी चमक रही हैं | इसे पुछू तो कैसे कही इसे बुरा तो नही लगेगा ? पता नही मेरा मन इसको यह सवाल पूछने को क्यों...|"तभी उसने कहाँ,

      "किस सोच में खो गए तुम, मैं बोलती रही और तुमने सुना भी या कुछ नही |" तो मैने भी धीमे स्वर में कहाँ,

      " तो क्यों छोड़कर आयी तुम यहाँ...इतना सबकुछ अच्छा तो था...मैं सुन रहाँ था ना... तुम्हारी बाते , यहाँ आना ही था तो ऐसे ही आसकती थी तुम सबकुछ त्यागकर आनेकी आवश्यकता क्या थी |"

      "क्या बताऊँ कुछ - कुछ परेशानियाँ रहती है...वह जीने भी नही देती और मरने भी नही देती चैन से इसीलिए मैने मेरा घर, खेत सबकुछ छोडा और यहाँ आयी... कुछ महीने अच्छा लगा मुझे पर अब... फिर वही बेचैनी दिन तो ढलता है, किसी तरहाँ मगर ... रात कैसे काटु यही सवाल हर पल सताता है , उधर मेरा बेटा जो कि इंटर पास हो चूँका वही अच्छे अंको से मैं उसे फोन पर बात करती हूँ...वहाँ का सभी खेत मेरे देवर देखते है | मेरा बेटा उनिके पास हैं... खैर छोड़ो मैं मेरा ही बता रही हूँ  तुम्हारा ही कुछ सुनाओ ना...|"

    " मेरा क्या..! बताना जो कुछ भी हूँ आपके साथ हूँ , मगर बताओ ना...की तुमने ऐसा क्यों किया...|" वे फिर से बोलने लगी,

     "तुम नही समझोगे हमारी बाते क्यों कि अभी तक तुम संसार से दूर ही हो इसीलिए मैं बताऊँ तो भी तुम्हें झूठ लगेगा और तुम मुझे गलत समझोगे फिर भी जो  है ईश्वर की कृपा अच्छा है, तुम्हारी भी कोई होगी ना...GF है तभी तो बिना ओठ खोले हँस रहाँ है चलो बताओ...|"

      उसका मुड़ अब एकदम फ्रेश हो चूँका का था| उसकी उदासी उससे दूर हो रही थी और वह खुशी की तरफ कदम बढ़ा रही थी | ऐसा उसकी बातों से और मेरी बातें सुनने के उत्साह से 

पता चल रहाँ था | तभी मैने चौक कर कहाँ , " क्या ? आपको तो अंग्रेजी भी आती हैं...फिर भी ऐसी हालत क्यों बनाई इसी कारण से हमारे देश की नारी आज भी...जितनी चाहें उतनी सफल नही ,ऐसी शिक्षा का क्या फायदा जो जिंदगी जीने के काम ना आऐं छोड़ो मुझे क्या मगर मेरी कोई अब GF नही... होती तो मैं यहाँ तुम्हारे साथ नही उसके साथ होता ,पर लगता है  यहाँ का मौसम देखकर की उसे फिर से मनाऊँ और पुराना रिश्ता नयी तरहाँ से आरंभ करूँ..."

       इतना कहकर मैं भावूक हो गया और कुछ बोल ना पाया... तो उसने कहाँ ," माँ से क्या छुपाना मान जाऐगी वह...अरे रुठ ही गयी है , जमाना तो नही छोड़ा उसने...सब्र कर, खुद पर विश्वास रख, वह मुझे कितना प्यार करती हैं यह मत देख , तू उसे कितना चाहता है,यह देख क्यों कि जिसका मन शांत हो ... उसके पास स्थिरता आती हैं, और स्थिरता जिसके पास उसीके निरंतरता , अखंडता रहती हैं | और यही चीजे रिश्तें निभाने में काम आती है इंनमेसे एक भी गुण कम हो गयाँ तो सभी रिश्ते बिखरते है , मगर मन की चंचलता पर जीत हासिल करो तो सबकुछ आसान होता है | चाहें वह कौनसा ही रिश्ता क्यों न हो वह प्यार का हो,या पति-पत्नि का हो...बस! इंसान के पास सब्र होना चाहिए , क्यों कि खुशी किसीकी मौजूदगी हासिल करने से ज्यादा उसका साथ महेसुस करने में है , मेरे पास सबकुछ था मगर मैं एक ही बात से चली आयी क्यों कि मेरे पास तभी यह गुण नही थे... अब आऐ...क्या फायदा... कुछ भी नही...| "

       इतना कहकर वह व्याकुल सी हो  गयी तभी मैने उसकी तरफ देखा तो, रंग गोरा , काले बाल और लम्बा सा नाक , हाथ मे चूडियाँ और मन मे अंधेरा ही अंधेरा था | अब मैं क्या बोलू कुछ मैने मुख से शब्द निकालने का प्रयास कियाँ मगर वह भी  असफल रहाँ | फिर भी मन मे उसका पति कहाँ चला गया यह जानने की उत्सुकता थी | मगर यह कैसे जानु..? अचानक धूप कम हो गयी और काले बादलों की काली सी छाया चहू ओर छाँ  गयी फिर से बारिश आने की संभावना दिखाई दे रही थी | लेकिन उस बारिश से जादा इसके आँखों मे पानी दिखाई दे रहाँ था | तब उसने कहाँ ,

       " लगता है बारिश आने वाली है, तुम भिग जाओगे चलो अंदर मंदिर में चलते हैं...अरे सुनो बातो-बातो में मैं तो मेरा नाम बताना भूल ही गयी चलो कुछ तो है मेरा नाम मगर तुम मुझे माँ समझ सकते हो |" 

     ऐसा कहकर उसने अपनी गर्दन निचे झुका ली और मंदिर की ओर कदम बढ़ाने लगी तभी बिजलियों कि चमक और मेघो की गर्जना बढ़ गयी सारा नदी का किनारा सुनसान हो गया सभी आस पास के  दुकानों में या इधर- उधर बारिश से बचने के लिए भाग गऐ बारिश धीरे-धीरे रौद्र रूप धारण कर रही थी | बहते जल की ध्वनि भी गुस्से में चिल्ला रही थी | और चमक ने वाली बिजली नदी के पानी में शितल हो रही थी और हम दोनों पता नही क्यों भिग रहे थे |

 नदी किनारे कुछ पल                           

‘चन्द्रकान्त देवताले के काव्य में जनजातीय संस्कृति तथा विविध आयाम“

‘चन्द्रकान्त देवताले के काव्य में जनजातीय संस्कृति तथा विविध आयाम“


          डाॅ. मुक¢श भार्गव     
                (संविदा सहायक प्राध्यापक) 
तुलनात्मक भाषा एवं संस्कृति अध्ययनषाला 
देवी अहिल्या विष्वविद्यालय, इन्दौर (म.प्र.)



 कवि चन्द्रकान्त देवताले की कई रचनाअ¨ं में स्वातंत्रेŸार भारत की समाज विर¨धी तत्व¨ं, गरीबी, बेर¨जगारी, महंगाई, व्यक्तिगत स्वार्थ परकता, ईश्वरी तत्व¨ं क¢ प्रति नकारवादी दृष्टिक¨ण, धार्मिक मतभेद, साम्प्रदाकि भेदभाव, आदि की ह्रासमान स्थितिय¨ं का प्रभावी चित्रण दिखाई देता है। 


 सन् 1960 क¢ दशक क¢ बाद समकालीन काव्यधारा में अर्थ बढता कर्ज, पेट्र¨लियम पदाथर्¨ं में बढ़ती कीमतें, आदि क¢ कारण जनमानस में जटिल समस्याएं पैदा हुई जिनका जिक्र‘ बड़ी उग्रता क¢ साथ व्यक्त किया गया।


 दुष्यंत कुमार ने अपनी एक गजल में इस स्थितिय¨ं का बड़ा मार्मिक उल्लेख किया है। वे कहते हैं-
   ‘हां तक आते-आते सूख जाती है कई नदियां।
                      हमें मालूम है कि पानी कहां ठहरा हुआ है।’


  स्वतंत्र निर्णय कभी नहीं कर पाता। ताकतवर ल¨ग सरकार बनाते हैं। गरीब¨ं के क¢न्द्र पर वे व¨ट हासिल कर जनता पर ही शासन करते हैं। कवि चन्द्रकान्त देवताले कहते है-
   ‘सरकार भी सरकार बनने क¢ लिए
     झाँकती है द¨न¨ं की दुनियां में
                      फिर मुुðी भर दाने छितरा कर
                      लड़वा देती है आपस में
                      और एक नाजूक ’म©का देख मांगती हैं ताकत
                      उन कर¨ड़¨ं कमज¨र ल¨ग¨ं से
                      जिनकी आँख¨ं में जलता हुआ जंगल।’
                      सारी दुनिया क¨ देकर अपनी ताकत
                      वे नहीं जानते ताकत कहां हैं
                      खड़ी करक¢ सरकार पूछते हैं सरकार कहाँ है।
  कवि ने स्वातंत्र्तयोत्तर, सामाजिक स्थिति पर काफी कुछ लिखा है। झूठे फरेबी नेता, काला बाजारी करनेे वाले और मुनाफाख¨र¨ं क¢ षडयंत्र, खून चूसने वाले पूंजीपति खटमल और इस बीच भूख, बेबसी, बीमारी क¢ शिकार ह¨कर चूह¨ं की तरह दम त¨ड़ते ल¨ग, और उन्हीं पर रिश्वतख¨र, न©करशाह¨ं द्वारा सŸााये जाने वाले आम जन।
    ‘वह एक आदमी
                      नंगी सड़क पर, खेत क¢ किनारे या जंगल में
                      भूख से दम’ त¨ड़ देता है
                      कत्लेआम की तरह नहीं ह¨ता कुछ भी
                      हजार¨ं मरे हुए चूह¨ं की दुर्गन्ध क¢ विस्फ¨ट में
                      तड़फड़ाती तितलिय¨ं की तरह दम घुटता रहता है
                      रिश्वतख¨र न©कर शाह¨ं द्वारा सताये जाने वाले
                      अब¨ध¨ं की गिनती करते-करते
                      बचपन से उमर बीत जाने तक थक जायेगंे।’
  आदिवासी और दलित¨ं क¨ लिए भी कवि ने अपनी सहानुभूति व्यक्त की है। आधुनिक जीवन से कटे, एकान्त जंगल¨ं में अपने अभावगग्रस्त कष्ट भरे जीवन बीताने वाले बस्तर क¢ आदिवासी, जिन्हें विकास क¢ नाम पर न©करशाह¨ं और राजनेताअ¨ं ने भी उन्हें जी भर कर लूटा है, आज भी वे ल¨ग खुशहाली का जीवन जीने क¢ लिए तरस रहे है।


 कवि चन्द्रकान्त देवताले ने उनकी घुटनभरी जिंदगी का मर्म भेदी किन्तु यथार्थ चित्रण किया है।-
   ‘पर मैं देख रहा हूँ
                     बस्तर क¢ जंगल में जन्मान्ध अंधेरे का दमा
                     पेट भर टंगे घ¨सल¨ं में कैद
                     चिन्ताअ¨ं क¢ छिन्न-भिन्न क¢ंचुल
                     कहां हैं हमारा गाढा खून
                     हमार पैतृक मस्तक
                     स्वाभिमान से दमकता हुआ
                     पसीन¨ं क¨ पीता
                     आदमी का ल¨हा
                     अब क¢ फिर मुर्गे पक¢ंगे
                     मंद और सल्फी की हांडी फूटेगी
                     माद्री का थाप थिरक¢गी बस्तर की लड़किांया
                     ब्लाउज नहीं पहनेगी क¨ई भी लड़की
                     चाहे ज¨ भी ह¨ं उनक¢ पास
                     मांस क¢ जंगल में घँसते
                     त¨ड़ी की हुकुमत क¢ साथ
                     नाचेगी लड़किाँ सारी रात
                     जुल्म की आरी क¢ नीचे छिरता हुआ
                      उसका पूरा दिन
                      दुबक कर रह ह¨गा ’धुए की छाह क¢ पीछे।’


  धूरे क¢ दिन भी कभी पलट जाते हैं। बुरे दिन टल जाते हैं। खुशहाली फिर ल©ट आती है, लेकिन बस्तर क¢ इन जनजाती ल¨ग¨ं की दशा में क¨ई बदलाव आज भी नजर नहीं आता। कवि ने इसी प्रसंग पर कहा है-
   ‘दस बरस में चमक जाती है
      धूरे की किस्मत भी
                      पर तीस बरस से यहाँ त¨
                      वैसा का वैसा ही अन्धेरा है
     बस्तर त¨ घूरा नहीं
                      पिंजरा है म¨हने वाली मैना का
                      बस्तर त¨ मादल हैं
                      हवा की पीठ पर बजता हुआ।’


  कुल मिलाकर सीदे साधे, भ¨ले भाले आदिवासी ल¨ग सभ्य कहे जाने वाले बनिय¨ं, अफसर¨ं तथा अन्य लुटेर¨ं क¢ द्वारा कि¢ जाने वाले अन्याय और अत्चार¨ं से त्रस्त हैं, पीड़ित है। किन्तु जुल्म का यह सिलसिला अनवरत बढता ही रहा है। एक अत्याचार क¢ बाद दूसरा अत्याचार तत्पर है। जुल्म की चक्की मे बेचारे अब¨ध आदिवासी आज भी पिस रहे है।
 चन्द्रकान्त देवताले ने अपनी रचना ‘आग हर चीज में बताई गई थी’ में बाहर क¢ जनजीवन की व्यथा का चित्रण इस प्रकार किया है-
   ‘कब तक देखते रह सक¢ंगे वे
     उनकी ही हड्डिय¨ं पर खड़े किए हैं
      आलीशान ’हल डंडी मार बनिय¨ं ने
                      कर¨ंड़¨ं का हिसाब चुकता करना हैं, उन्हें
                      शताब्दिय¨ं का, पेड़¨ं का असंख्य‘
                      पीठ पर पड़े चाबुक क¢ निशान¨ं का
                       ग¨श्त का हिसाब, खून का 
                      साँवली वन कन्याअ¨ं की चीख और सिसकिय¨ं का,
                      भंग-धड़ंग बच्च¨ं क¢ फूले हुए पेट
                      और बूढी नंगी देह¨ं की 
                      आत्मा की झुरिय¨ं का हिसाब।’
  बस्तर में जनजीवन में आज भी विकास का मुँह नहीं देखा है। बचपन से ही आदिवासी बच्च¨ं क¨ पेट भरने क¢ लिए दिन रात कष्ट उठाना पड़ता है।


 आदिवासी लड़कियाँ चकाच©ंध वाले शहर में भयभीत चिड़ियां की तरह लगती है-
   ‘फकत भयभीत चिड़िय¨-सी
      देखती रहती है लड़कियां सात
                      बड़ी फजर से आकर बैठी गई है
                      पत्थर क¢ घ¨ड़े क¢ पास।’
                      ‘ह¨ंगी अंधेरे क¢ कई-कई म¨ड़ पर
                      इस वक्त मेरे देश की कितनी ही आदिवासी बेटियाँ।’
  आदिवासिय¨ं का जीवन अभावग्रस्त रहा है। जंगल¨ं में और पहाड़¨ं में रहकर पेट भरना बहुत मुश्किल ह¨ रहा है। आदिवासी ल¨ग हर बार ’मौसम पर अन्यत्र मजदूरी क¢ लिए अन्यत्र पलान करते हैं।
 
 यूं त¨ पुरुष प्रधान समाज में नारी की स्थिति में क¨ई खास परिवर्तन नहीं आया है। नारी अपना सब कुछ अपने परिवार क¢ लिए समर्पित कर देती है। इसक¢ बावजूद भी अपनी क¨ई निजी पहचान नारी क¢ पास अब भी शेष नहीं है। इसी बात क¨ कवि चन्द्रकान्त देवताले ने निम्नांकित शब्द¨ं में व्यक्त किया है-
   ‘एक औरत का धड़
     भीड़ में भटक रहा है
      उसक¢ हाथ अपना चेहरा ढूंढ रहे है
      उसक¢ पाँव
     जाने कब से
     सबसे 
                      अपना पता पूछ रहे हैं।’
 प्रस्तुत पंक्तिय¨ं में प्रतीक क¢ रूप में कवि कहता है कि एक औरत का धड़ भीड़ में भटक रहा है याने स्त्री का आज भी अपना क¨ई अस्तित्व नहीं है। वह अपने चेहरे क¨ ढूंढ रही हैं। अपनी पहचान आज भी नारी अस्तित्वहीन नहीं बनी रहती है।


   ‘ब्लाउज बदलती, साड़ी पछीटती
                     कंघी करती हुई औरतें
                     सड़क क¨ एक साथ हर’ औरत हमाम’ की
                     तरह वापरती औरतें।’
  जनता की य¨जनाअ¨ं क¨ हड़प कर धनिक बनते सŸााधारी अपने गुंडे पालते हैं। प्रजातंत्र की यह निकृष्टत’ स्थिति कवि ने बेलाग तरीक¢ से व्यक्त की है।
   ‘प्रजातंत्र की रथ-यात्रा निकल रही है
     औरत¨ं और बच्चें र¨ंदा जा रहा है
                     गुंडे और न¨ट¨ं की ताकत से हतप्रभ ल¨ग
                     खाम¨श खड़े है।’
  सŸाा पर बैठे ल¨ग संवेदनशील नहीं रहते। सŸाा पाने क¢ लिए गुंड¨ं का सहारा लेते है। औरत¨ं और बच्चे पर जुल्म’ करते हैं। हमेशा सŸााधारी ल¨ग आम जनता पर अनुचित दबाव डालते रहते हैं।


निष्कर्ष क¢ रूप में कहा जा सकता है कि समकालीन कविता में दलित¨ं, आदिवासिय¨ं और आम जनता क¢ प्रति सहानुभूति का स्वर कवि ने मुखर किया है। समकालीन कविता पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से संघर्ष करती है और कवि ने श¨षित¨ं क¢ हक में अपनी बात स्पष्ट रूप से व्यक्त की गई है।
 सŸाा पाने तक सŸााधारिय¨ं ने आम ल¨ग¨ं क¨ भारी प्रल¨भन दिये है। लेकिन सŸाा पाने पर सŸााधारी ल¨ग¨ं ने जनता से ’मुँह म¨ड़ लिया। वे भ्रष्टाचार में ही लिप्त रहे हैं। कवि ने उनकी भरपूर भत्र्सना की है। कवि का समूचा काव्य लेखन आम जनता क¢ प्रति सह्रदता और समाज विर¨धिय¨ं क¢ प्रति उग्र‘ आक्र¨श व्यक्त किया है।


संदर्भ
1. दुष्यंत कुमार-साए में धूप, पृ.15
2. चन्द्रकांत देवताले, भूखण्ड तप रहा है, पृ. 34
3. चन्द्रकांत देवताले, पत्थर की बेंच, पृ.90
4. चन्द्रकांत देवताले, आग हर चीज में बताई गई थी, पृ.106
5. चन्द्रकांत देवताले, आग हर चीज में बताई गई थी, पृ.109
6. चन्द्रकांत देवताले, आग हर चीज में बताई गई थी, पृ.111
7. चन्द्रकांत देवताले, उसके सपने, रोषनी मैदान की तरफ, पृ. 104
8. चन्द्रकांत देवताले, उजाड़ में संग्रहालय, पृ.82
9. चन्द्रकांत देवतालंे, आग हर चीज में बताई गई थी, पृ.35
  
  
  


  
  


 


भीष्म साहनी के उपन्यासों में सामाजिक चेतना

भीष्म साहनी के उपन्यासों में सामाजिक चेतना
         - किरन यादव
       हिन्दी विभाग (शोध छात्रा)
   राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गाजीपुर (उ0प्र0)
(वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर)
मो0नं0: 6386445718


शोध संक्षेप
  भीष्म साहनी जी हिन्दी कथा साहित्य की प्रगतिशील परंपरा के शक्तिशाली हस्ताक्षर हैं। भीष्म साहनी जी की लम्बी साहित्यिक रचना यात्रा में उपन्यास विधा को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। उपन्यासकार के रूप में उनका साहित्यिक योगदान न केवल हिन्दी में अपितु भारतीय भाषाओं के साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। भीष्म साहनी उन विरले लेखकों में से है, जिन्होंने जिस उत्सुकता के साथ कहानी, नाटक और निबंध विधा में अपनी लेखनी चलायी है, उसी गति से उन्होंने उपन्यास विधा पर भी अपनी कलम का प्रयोग किया है। भीष्म जी ने कुल सात उपन्यास लिखे। प्रस्तुत शोध-पत्र में भीष्म साहनी के उपन्यासों में चित्रित सामाजिक चेतना पर विचार किया गया है।


प्रस्तावना
  भीष्म साहनी जी के उपन्यासों में सामाजिक चेतना से हमारा तात्पर्य किसी देश एवं काल से संबंधित मानव समाज में परिवर्तनशील जागृति ले आना। साहित्य मानव संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। अतः साहित्य सामाजिक चेतना का भी एक अनिवार्य तत्व है। भीष्म साहनी के उपन्यासों में ‘सामाजिक चेतना’ शब्द समाविष्ट है, इसलिए हमें सर्वप्रथम ‘समाज’ और ‘चेतना’ शब्द समझना चाहिए। समाज को हम सभा, संघ, समूह, दल आदि का पर्याय कहते हैं तथा अंग्रेजी में सोसायटी नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। ‘चेतना’ शब्द बड़ा ही प्रसिद्ध है। चेतना शब्द का अर्थ होता है, ज्ञानमूलक मनोवृत्ति, वृद्धि, समझ। भीष्म साहनी के उपन्यासों में सामाजिक चेतना जब एक विशेष आदर्शों से प्रभावित होती है और उनके उपन्यासों के द्वारा लोगों में उस आदर्श के कारण एक नवजागरण पैदा होता है, तभी सामाजिक जागरूकता संभव है।
  भीष्म साहनी के साहित्यिक क्षेत्र को प्रगतिशील लेखन परंपरा से जोड़कर देखा जा सकता है। जिस प्रकार का उनका साहित्यिक क्षेत्र है, उससे यह साफतौर पर प्रतीत होता है कि वह प्रेमचंद और यशपाल की तरह प्रगतिशील परंपरा के उत्तराधिकारी के रूप में देखे जा सकते हैं। भीष्म साहनी के साहित्य में सामाजिक चेतना सिर्फ उतना नहीं आयी है, जितना समाज की तल पर उतरी हुयी, समस्यायों के रूप में सामने आता है, बल्कि उसका वह संघर्ष कहीं अधिक समाज में सत्य के रूप में ऊपर उठा है।
  निःसन्देह साहित्यकार परिस्थिति एवं परिवेश की उपज होता है। भीष्म साहनी जी इसी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे। अपने लेखन के द्वारा उन्होंने समाज में व्याप्त सामाजिक विषमताएँ, सांस्कृतिक विभेद, साम्प्रदायिकता, धर्माडम्बर आदि पर अपनी पैनी दृष्टि डाली है। ”भीष्म साहनी ने साम्प्रदायिक उन्माद का सजीव चित्रण करने के साथ-साथ उन स्थितियों और कारणों के विश्लेषण तथा अंकन का अधिक प्रयत्न किया है, जो देश-विभाजन और साम्प्रदायिकता के मूल में थे।“1
  भीष्म साहनी जी समाज में विद्यमान अशिक्षा, नारी की असहाय स्थिति साम्प्रदायिकता एक विकार, वासनात्मकता, विद्रोह का भाव, जनसंख्या विस्फोट, स्त्री-पुरुष असमानता, शोषण के खिलाफ आवाज उठाई तथा समाज में साम्प्रदायिकता और विभाजन की मार्मिक घटना को समाज के सामने रखा। अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने के अपने रास्ते से कभी हटे नहीं, चाहे वह उनके घर का आर्य समाजी वातावरण रहा हो या देश-विभाजन की पीड़ा। भीष्म साहनी इन सभी को अपने कथा साहित्य में उकेरा है। इसके साथ ही अपने समय के महत्त्वपूर्ण मुद्दों को पृथ्वीतल पर देखने समझने का कार्य भी किया।
  हिन्दी उपन्यासकारों में प्रेमचंद के बाद गहरी सामाजिक चेतना से युक्त उपन्यासकारों में भीष्म साहनी का नाम अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, भीष्म साहनी जी अपने उपन्यासों में भारतीय समाज में स्त्री की पराधीनता जैसी समस्या का चित्रण किया है। उपन्यास के बारे में प्रेमचन्द ने भी अपना मत व्यक्त किया है- ”मैं उपन्यास को मानव-जीवन का चित्र मात्र समझता हँू, मानव जीवन पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्व माना है।“2
  उपन्यास लेखन के क्षेत्र में भीष्म साहनी जी का अद्वितीय स्थान है। भीष्म साहनी जी ने कुल सात उपन्यासों को लिखे हैं, जो इस प्रकार है:- ‘झरोखे’ (1967), ‘कड़ियां’ (1970), ‘तमस’ (1973), ‘बसंती’ (1980), ‘मय्यादास की माड़ी’ (1988), ‘कुंतो’ (1993), ‘नीलू, नीलिमा, नीलोफर’ (2000) आदि उपन्यासों के माध्यम से भीष्म साहनी जी भारतीय समाज में व्याप्त विभिन्न प्रकार की समस्याओं को उठाया है। ‘झरोखे’ उपन्यास भीष्म साहनी जी का पहला उपन्यास है। इस उपन्यास के माध्यम से उन्होंने एक छोटे से बालक की आँखों से एक परिवार में घटने वाली छोटी-छोटी घटनाओं को देखने और उनका उल्लेख करने की कथा इस उपन्यास में प्रस्तुत की है। एक-एक घटना एक-एक प्रबल संस्कार बनकर आती है और परिवार के बच्चों के भावी चरित्र की रूप-रेखा गढ़ती चली जाती है। पारिवारिक जीवन में घटने वाली घटनाएँ आम तौर पर अल्प और साधारण होती है, पर संस्कारों के रूप से उनका महत्तव प्रचंड होता है। इन्हीं अल्प और साधारण लगने वाली घटनाओं के नीचे जिंदगी करवट लेती रहती है, यही छोटी-छोटी घटनायें पात्रों के जीवन में निर्णायक साबित होती है। एक छत के नीचे रहते हुये भी सभी पात्रों की राहे अलग-अलग है। इस उपन्यास की कथा में जहाँ एक ओर जीवन के उल्लसित क्षणों का चित्रण है, वहीं हमारे आज के मध्यवर्गीय जीवन के दुःख-दर्द और उसकी निर्मम गति का भी अविस्मरणीय अंकन हुआ है। इस उपन्यास में खास बात तो धर्मान्धता को लेकर चलती है। व्यापारिक वर्ग का धर्म हिन्दू और मुसलमान दोनों से भिन्न है। व्यापार की न कोई जाति होती है न धर्म। हिन्दू परिवार के लोग मुसलमान के बच्चों से अपने बच्चों को दूर रखते हैं, क्योंकि उन्हें मुसलमान म्लेच्छ लगते हैं। साहनी जी ने बहुत बारीकी से संवेदना के सत्तर पर तथ्य को पकड़ा है।
  ”पढ़ लिख जायेगा, तो क्या करेगा, क्या बैंक का मैनेजर बन जाएगा? यह बरतन ही माँजेगा और क्या करेगा? इसे जैसा है वैसा ही रहने दो।“3
  साहनी के इस उपन्यास के द्वारा जागरूकता का यह पुट देखने को मिलता है।
  भीष्म साहनी के उपन्यासों में ‘कड़ियाँ’ दूसरे क्रम का सामाजिक और पारिवारिक उपन्यास है। यह उपन्यास पति, पत्नी और प्रेमिका के अंतःसम्बन्धों को लेकर लिखा गया है। हमारे समाज में मानवीय संबंधों के रिश्तों में जागरूकता के अभाव में किस प्रकार से दरार पैदा होती है, यह इस उपन्यास के दृष्टिकोण से भीष्म साहनी जी ने समाज के सम्मुख प्रकट किया है। भीष्म साहनी जी अपने उपन्यास में सामाजिक नैतिक विसंगतियों, मध्यवर्ग के दोहरे मानदंडो, परिवार व विवाह संस्थाओं के विरोधाभासों को निशाना बनाया है। कड़ियाँ भीष्म साहनी जी का महत्तवपूर्ण उपन्यास है। इसकी कथा एक मध्यवर्गीय परिवार से सम्बन्ध रखती है, जो हमारे परंपरागत संस्कारों से जकड़ा हुआ है। लेकिन इसकी मुख्य कथा दाम्पत्य जीवन की कड़वाहट और स्त्री की असहाय स्थिति से सम्बन्धित है, एक तरफ रूढ़ नैतिक मान्यताएँ हैं, जो पति-पत्नी के सम्बन्धों में दरार पैदा करती हैं और दूसरी तरफ पत्नी की आर्थिक स्थिति पर निर्भरता है, जिसके कारण उसे अनेक मानसिक यंत्रणाओं से गुजरना पड़ता है। पुरुष प्रधान समाज में स्त्री के हिस्से आने वाली पीड़ाओं और अत्याचारों का अंकन इस उपन्यास में बहुत बारीकी से किया गया है, तनाव और विघटन के क्षणों का चित्रण लेखक ने बड़ी सावधानी पूर्वक किया है।
  ‘तमस’ उपन्यास भीष्म साहनी जी का चर्चित उपन्यास की शृंखला में अग्रगण्य है। ‘तमस’ उपन्यास पर 1975 में ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ मिला है। इस उपन्यास में आजादी के ठीक पहले का पंजाब और साम्प्रदायिकता के भय से अंधेरे में डूबे वे चंद दिन धार्मिक जड़ता को इस्तेमाल करती पूंजीपरस्त राजनीति और उससे रक्त-रंजित हजारों बेकसूर लोग सूअर और गाय बचा लेने का पुष्प और उसी के लिये होती हुयी मनुष्य की हत्याएँ इस दंगे फसाद के पीछे खतरनाक मस्तिष्क यह एक वातावरण है, जिसे भीष्म साहनी के ‘तमस’ में इतिहास बोध के साथ प्रस्तुत किया है। ‘तमस’ उपन्यास में भीष्म साहनी जी ने साम्प्रदायिकता की समस्या को उठाया है। सांप्रदायिकता उस राजनीति को कहा जाता है, जो धार्मिक समुदाय के बीच विरोध और झगड़े पैदा करती है। आपसी मत को सम्मान देने के बजाय विरोधाभास का उत्पन्न होना अथवा ऐसी समस्या का उत्पन्न होना, जिससे व्यक्ति किसी दूसरे धर्म के विरोध में अपना वक्तव्य प्रस्तुत कर सके। तमस उपन्यास के माध्यम से भारतीय समाज के मनोजगत् में व्याप्त धार्मिक रूढ़ता और उसकी जड़ता की कलई बड़े धैर्य और तटस्थता के साथ उकेरी गयी है। राजेश्वर सक्सेना के शब्दों में- ”तमस में राजनीति और धर्म के अंतर्विरोध को स्पष्ट किया गया है। धर्म स्वतः स्फूर्त उन्माद में फलता-फूलता है। राजनीति सामाजिक चेतना के विकास से पैदा होती है, यह चेतना परिस्थिति और परिवेश सापेक्ष होती है।“4 सामाजिक न्याय का ज्ञान कराते हुये ये उपन्यास नव-निर्माण की प्रेरणा पाकर ही पूँजीवादी व्यवस्था और सामाजिक असंगतियों के विरूद्ध क्रांति का आह्वान करते हैं।
  भीष्म साहनी की उपन्याय यात्रा में ‘बसंती’ का क्रम चैथा है। बसंती पिछले तीन उपन्यासों से भिन्न है। अपितु यह कहा जाये कि इन उपन्यासों की विकास की अगली कड़ी है। बसंती उपन्यास के माध्यम से भीष्म जी अपने दृष्टिकोण और कलात्मक कौशल के प्रति एक नया विश्वास पैदा किया है। बसंती भीष्म साहनी जी का एक सामाजिक उपन्यास है। जो मानवीय संबंधों के जुड़ते-टूटते रिश्तों का सूक्ष्म अंकन करता है। बंसती उपन्यास की मुख्य नायिका उस वर्ग की प्रतीक है, जो गाँव में पैदा होकर रोजगार की तलाश में निकले माँ-बाप के साथ महानगरों के फुटपाथों, पार्कों, खोलियों और झुग्गी-झोपड़ियों में पलकर बड़ी होती है। राजनीति इस उपन्यास का विषय नहीं, लेकिन जन-जीवन पर पड़ने वाले उसके प्रभावों को इसमें गहराई तक महसूस किया गया है और यह इसकी एक बहुत सृजनात्मक उपलब्धि है। भीष्म साहनी के उपन्यास में सामाजिक जागरूकता ‘बंसती’ उपन्यास की नायिका के द्वारा यहाँ द्रष्टव्य है- ”भीष्म जी की नारी पात्र बसंती भी दीनू का गर्भ नहीं गिराती। परिवार और समाज दोनों के विरोध को झेलती है।“5 अतः कहा जा सकता है कि उसके अन्दर सामाजिक चेतना का विकास हो चुका है।
  ‘मय्यादास की माड़ी’ उपन्यास के लिए भीष्म साहनी को 1990 में हिन्दी अकादमी दिल्ली से पुरस्कार प्राप्त हुआ है। यह भीष्म साहनी की एक सफल कृति है। इस उपन्यास में पंजाब की धरती पर जब खालसा दरबार के पाँव उखड़ चुके थे और अंग्रेजों की शक्ति अपना पाँव जमाने में ताबड़-तोड़ कोशिश कर रही थी, का वातावरण पूरी तरह से मुखरित हो उठता है, भारतीय इतिहास के इस अहम बदलाव को भीष्म जी ने एक कस्बाई कथा भूमि पर चित्रित किया है और कुछ इस कौशल से कि हम जन-जीवन के ठीक बीचों-बीच जा पहँुचते हैं। झरते हुये पुरातन के बीच लोग एक नये युग की आहट सुनते हैं, उस पर बहस-मुबाहसा करते हैं और चाहे-अनचाहे बदलते चले जाते हैं, उनकी अपनी निष्ठाओं, कद्रों, कीमतों और परंपराओं पर एक नया रंग चढ़ने लगता है। इस सबके केन्द्र में है दीवान मैय्यादास की माड़ी, जो हमारे समाने एक शताब्दी पहले की सामन्ती अमलदारी उसके सड़े-गले जीवन मूल्य और हास्यस्पद हो गये, ठाट-बाट के एक अविस्मरणीय ऐतिहासिक प्रतीक में बदल जाती है, इस माड़ी के साथ दीवानों की अनेक पीढ़ियाँ और अनेक ऐसे चरित्र जुड़े हुये हैं, जो अपने-अपने सीमित दायरों में घूमते हुये भी विशेष अर्थ रखते हैं। वस्तुतः भीष्म साहनी जी का यह उपन्यास एक हवेली अथवा एक कस्बे की कहानी होकर भी बहते काल प्रवाह और बदलते परिवेश की दृष्टि से समूचे युग को समेटे हुये हैं और रचनात्मकता में एक नयी ऊँचाई देता है।
  ‘कुंतो’ भीष्म साहनी का यह उपन्यास एक ऐसे कालखंड की कहानी कहता है, जब लगने लगा था कि हम इतिहास के किसी निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं, जब करवटें लेती जिंदगी एक दिशा विशेष की ओर बढ़ती जान पड़ने लगी थी। आपसी रिश्ते, सामाजिक सरोकार, घटना प्रवाह के उतार-चढ़ाव उपन्यास के विस्तृत फलक पर उसी कालखंड के जीवन का चित्र प्रस्तुत करते हैं। केन्द्र में जयदेव-कुंतो, सुषमा-गिरीश के आपसी संबंध हैं- अपनी उत्कट भावनाओं और आशाओं, अपेक्षाओं को लिये हुये, लेकिन कुंतो-जयदेव और सुषमा-गिरीश के अंतर्संबंधों के आस-पास जीवन के अनेक अन्य प्रसंग और पात्र उभरकर आते हैं। इनमें हैं एक प्रोफेसर साहब जो एक संतुलित जीवन को आदर्श मानते हैं और इसी ‘सुनहरी’ के अनुरूप जीवन ढालने की सीख देते हैं।
  नीलू, नीलिमा, नीलोफर उपन्यास में लेखक ने मजहब के नाम पर मानवीय प्रेम के दमन की कहानी को प्रस्तुत किया है। इस उपन्यास के माध्यम से भीष्म साहनी जी समाज में धर्म के नाम पर जागरूकता लाने का जो प्रयास किये है, वह अत्यन्त सराहनीय कार्य है। इस उपन्यास में मजहबी उन्माद इतना ज्यादा है की व्यक्ति इसके पीछे अपनी बेटी की जिन्दगी को दांव पर लगाने से भी पीछे नहीं हटता।
  उपर्युक्त विवेचन से यह बात सामने आती है कि भीष्म जी ने अपने उपन्यास के माध्यम से सामाजिक चेतना को पूरी विश्वसनीयता के साथ सकारात्मक रूप दिया है। उन्होंने समाज में अशिक्षा-परिणाम और निदान, प्रेम-वैध और अवैध, नारी की असहाय स्थिति, राष्ट्रीय स्वाधीनता के बनते-बिगड़ते चेहरे आदि में जागरूकता लाने का प्रयास किया है। अपने समय को वे अपने कथा साहित्य में बखूबी अभिव्यक्त करने में वे सफल रहे हैं। यही उनके उपन्यासकार होने की महत्वपूर्ण सफलता है।


संदर्भ
1- गोपाल राय: हिन्दी उपन्यास का इतिहास, प्रथम आवृत्ति 2009, 
   राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ सं0 303.
2- प्रेमचन्द: कुछ विचार, विशिष्ट सं0 संस्करण, 1982, सरस्वती प्रेस, 
   इलाहाबाद, पृष्ठ 47.
3- भीष्म साहनी: झरोखे, सातवाँ संस्करण 2016, राजकमल पेपर बैक्स, 
   नई दिल्ली, पृष्ठ सं0 46.
4- विवेक द्विवेदी: भीष्म साहनी उपन्यास साहित्य, द्वितीय संस्करण 2009, 
   वाणी प्रकाश, नयी दिल्ली, पृ0सं0 353.
5- विवेक द्विवेदी: भीष्म साहनी उपन्यास साहित्य, द्वितीय सं0 2009, 
   वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ0सं0 333.


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सामाजिक परिवर्तन एवं पत्रकारिता: अन्तःसंबंध

 मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह जिस समाज में रहता है, उसके साथ उसकी अन्तःक्रिया का होना स्वाभाविक है। पत्रकारिता की कल्पना समाज से अलग करके नहीं की जा सकती है। पत्रकारिता ही है जिसके माध्यम से समाज में नवसंचार, जागरण, सजीवता तथा नवस्फूर्ति का संचार होता है। महात्मा गाँधी ने पत्रकारिता के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किए थे- ‘‘पत्रकारिता का पहला उद्देश्य जनता की इच्छाओं और विचारों को समझना तथा उन्हें व्यक्त करना है। दूसरा उद्देश्य जनता में वांछनीय भावनाओं को जाग्रत करना तथा तीसरा उद्देश्य सार्वजनिक दोषों को निर्भीकतापूर्वक प्रकट करना है।’’  इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन करना पत्रकारिता का मूल कार्य है। पत्रकारिता की उपयोगिता को स्पष्ट करते हुए महादेवी वर्मा ने कहा है कि, ‘‘पत्रकारिता एक रचनाशील विधा है। इसके बगैर समाज को बदलना असम्भव है अतः पत्रकारों को अपने दायित्व और कत्र्तव्यों का निर्वाह निष्ठापूर्वक करना चाहिए, क्योंकि उन्हीं के पैरों के छालों से इतिहास लिखा जाएगा।’’ 
समाज में जो कुछ घटित हो रहा है, जो होगा अथवा जो हो चुका है, इन सभी का ब्यौरा पत्र-पत्रिकाओं में अंकित होता है। इस महत्वपूर्ण कार्य को करने का पूरा श्रेय पत्रकार को जाता है। इस प्रकार पत्रकारिता के माध्यम से समाज के प्रतिबिम्ब को देखा जा सकता है। समाज को प्रभावित करने की जो क्षमता पत्र-पत्रिकाओं में है, उसके मूल में भी पत्रकार ही है। पत्रकार को समाज के सजग प्रहरी के रूप में देखा जाता है। एक पत्रकार सामाजिक परिवर्तन के लिए जो त्याग करता है उसका वह त्याग ही समाज को गति प्रदान करता है। समाज के प्रत्येक वर्ग की आवाज पत्रकार होता है। वर्तमान समाज में पत्रकारिता के प्रति लोगों का आग्रह बढ़ा है। व्यक्ति सुबह उठते ही समाचार-पत्र खोजने लगता है, यदि उस समय समाचार-पत्र नहीं मिलता तो उसे बेचैनी होने लगती है। इस प्रकार समाचार-पत्र सामाजिक जीवन का एक हिस्सा बन गया है। इसके बिना दिन कीे शुरुआत की कल्पना करना मुश्किल हो जाता है। समाचार-पत्र आते ही व्यक्ति जिस क्षेत्र से जुड़ा है, उसकी खबरों को पहले देखना पसन्द करता है।
समाचार-पत्र आज के जागरूक नागरिक का अभिन्न अंग हो गया है। पत्र आते ही शिक्षित नागरिक राजनीति, नौकरी, सिनेमा, खेलकूद, खाद्य वस्तुओं का भाव, विवाह हेतु वर की तलाश, धर्म की चर्चा, पुस्तक समीक्षा, नये फैशन आदि विषयों पर अपनी दृष्टि दौड़ाता है। ये तमाम सूचनाएँ समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य संसाधन बन गई हैं। पुराने समय में जहाँ हुक्का होता था वहाँ दो चार व्यक्ति इकट्ठे हो जाते थे, ठीक उसी प्रकार आजकल समाचार-पत्र शिक्षित वर्ग के लिए आकर्षण बिन्दु बन गया है। इसी संदर्भ में कमलापति त्रिपाठी लिखते हैं ‘‘संवाद-पत्र आज की जनता का ऐसा साथी और मित्र हो गया है जिससे यह जीवन के प्रत्येक पहलू में सहायता की अपेक्षा करते हैं। जीवन का कोई अंग नहीं, कोई समस्या नहीं है जिस विषय में जानने की बातें जनता उसके द्वारा उपस्थित किए जाने की आशा न करती हो।’’ पत्रकारिता का अस्तित्व समाज सापेक्ष होता है। इसलिए पत्रकारिता का प्रमुख दायित्व समाज को सच्चाई का बोध कराना है। हमारे समाज में कब, क्या परिवर्तन हो रहा है, इसे जानने की जिज्ञासा प्रत्येक व्यक्ति को होती है। इस प्रकार पत्रकारिता के उत्तरदायित्व को निम्नलिखित रूपों में देखा जा सकता है।
 समाज को सही दिशा प्रदान करना पत्रकारिता का कार्य है।
 समाज में जनजागरूकता पैदा करना पत्रकारिता का कार्य है।
 समाज में मानवीय मूल्यों का विकास करना पत्रकारिता का कार्य है।
 समाज में सत्यं, शिवं, सुन्दरं की स्थापना करना पत्रकारिता का कार्य है।
 सामाजिक कत्र्तव्य बोध विकसित करना पत्रकारिता का कार्य है।
 सामाजिक समस्याओं को उजागर करना एवं हल खोजना पत्रकारिता का कार्य है।
 समाज को सक्रिय बनाना पत्रकारिता का कार्य है।
 भ्रष्टाचार को उजागर करना पत्रकारिता का कार्य है।
 लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना में समाज की निष्ठा उत्पन्न करना पत्रकारिता का कार्य है।
 महिला सशक्तिकरण करना पत्रकारिता का कार्य है।
 समाजिक कुरीतियों को सामने लाना एवं उनका विश्लेषण करना पत्रकारिता का कार्य है।
 समाज में राजनीतिक चेतना विकसित करना पत्रकारिता का कार्य है।
 संस्कृति का संरक्षण एवं प्रसार करना पत्रकारिता का कार्य है।
 नागरिकों को दायित्वबोध के प्रति जागरूक करना पत्रकारिता का कार्य है।
 नागरिकों को उनके अधिकार एवं कत्र्तव्यों के प्रति सचेत करना पत्रकारिता का कार्य है।
 नई-नई सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक आदि योजनाओं को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य पत्रकारिता का है।
 दलित उत्थान की भावना विकसित करना पत्रकारिता का कार्य है।
 विज्ञान व नव तकनीक की नवीनतम उपलब्धियों को समाज तक पहुँचाना तथा समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना पत्रकारिता का कार्य है।
 राष्ट्रीय अखण्डता की भावना का प्रसार करना पत्रकारिता का कार्य है।
 बाल कल्याण एवं परिवार नियोजन आदि समाजोपयोगी कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार करना पत्रकारिता का कार्य है।
इस प्रकार पत्रकारिता की उपादेयता तथा कार्य दायित्वों की फेयरिस्त काफी लंबी है। पत्रकारिता का क्षेत्र इतना व्यापक है कि वह मानव समस्याओं एवं उपलब्धियों से लेकर संपूर्ण तथ्यों की सूचनाएँ स्वयं में समेटता है। पत्रकार का सच्चा धर्म सामाजिक दायित्व को निभाना होता है।
वर्तमान सदी में सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम पत्रकारिता को ही स्वीकार किया गया है। अक्सर यह प्रश्न उठता है कि पत्रकारिता ने समाज में क्या परिवर्तन किया है? इसका उत्तर इस प्रश्न से ही स्पष्ट हो जाता है कि आधुनिक समाज की विकास यात्रा में सबसे अधिक परिवर्तनकारी और अहम् भूमिका पत्रकारिता की है। आज समाज के अनेक मुद्दे हैं जिसे पत्रकारिता जगत ने अपने प्रयास से चुनौती देने का कार्य किया है। समाज में फैले अंधविश्वास को काफी हद तक दूर करने में पत्रकारिता की अहम् भूमिका रही है। प्राचीन परम्पराओं, रूढ़ियों अंधविश्वासों के मूल में निहित कारणों का विश्लेषण करते हुए पत्रकारिता जगत ने वैज्ञानिक सोच पैदा करने की सफल कोशिश की है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण यह है कि जहाँ-जहाँ समाचार-पत्र पहुँच रहे हैं वहाँ के लोगों के सोचने का ढं़ग एवं नजरिया उनसे बिल्कुल अलग है, जहाँ पर समाचार पत्रों की पहुँच नहीं है। इसलिए सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से पत्रकारिता के योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। इस संदर्भ में महात्मा गाँधी का यह कथन विचारणाीय है- ‘‘ऐसी कोई भी लड़ाई जिसका आधार आत्मबल हो, अखबार की सहायता के बिना नहीं चलाई जा सकती।’’ 
किसी भी परिवर्तन के लिए विचार अत्यन्त महत्वपूर्ण होते हैं। विशेष रूप से सामाजिक परिवर्तन का मुख्य आधार विचार ही है। वैचारिक शक्ति बड़े-बड़े हथियारों को परास्त करने की ताकत रखती है। समाज को कुरीतियों से लड़ने की शक्ति प्रदान करना पत्रकारिता का ही उत्तरदायित्व है। राजाराम मोहन राय ने पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन की मूल दृष्टि को स्पष्ट करते हुए बहुत ही सार गर्भित बात कही थी, ‘‘मेरा उद्देश्य मात्र इतना ही है कि जनता के सामने ऐसे बौद्धिक निबंध उपस्थित करूँ जो उनके अनुभव को बढ़ाएँ और सामाजिक प्रगति में सहायक सिद्ध हो, मैं अपनी शक्ति पर शासकों को उनकी प्रजा की परिस्थितियों का सही-सही परिचय देना चाहता हूँ और प्रजा को उनके शासकों द्वारा स्थापित विधि-व्यवस्था से परिचित कराना चाहता हूँ ताकि शासक जनता को अधिक से अधिक सुविधा देने का अवसर पा सकें और जनता उन उपायों से अवगत हो सके, जिनके द्वारा शासकों से सुरक्षा पायी जा सके और अपनी उचित मांगे पूरी कराई जा सकें।’’  राजा राममोहन राय का यह विचार न केवल समाचार-पत्रों के लिए बल्कि सम्पूर्ण पत्रकारिता जगत के लिए एक विचारणीय है।  आज जहाँ तक पत्रकारिता की पहुँच है वहाँ समाज के तमाम अंधविश्वासों पर आधारित मान्यताओं को समाप्त किया गया। एक समय ऐसा था, जब चेचक को शीतला माता का प्रकोप माना जाता था, लेकिन अब लगभग यह मान्यता समाप्त हो गयी है। इसी प्रकार कुष्ट रोग को पूर्व जन्मों के पापों से जोड़ा जाता था लेकिन अब उसे जीवन में लगने वाला एक रोग माना जाता है। आज जहाँ तक पत्रकारिता की पहुँच है वहाँ ‘दूधो नहाओ, पूतो फलो’ जैसे आशीर्वाद देने और लेने वालों की कमी नजर आती है, लेकिन यह सब अभी भी कुछ मात्रा में चल रहा है। इसका उदाहरण सारथी बाबा, आशाराम बापू, रामपाल बाबा, निर्मल बाबा, राधे माँ जैसे ढोंगी संतों के प्रति जनमानस का झुकाव है।
इस प्रकार वर्तमान दौर में विकास की जो आंधी चल रही है उसमें यह देखना होगा कि परिवर्तन की दिशा और दशा क्या है। शिक्षा ही एक ऐसा माध्यम है जो सभी समस्याओं के निदान की ताकत रखता है। इसलिए पत्रकारिता के माध्यम से समाज को जागरूक किया जा सकता है। पत्रकारिता और सामाजिक परिवर्तन दोनों को अलग-अलग चश्में से नहीं देखा जा सकता है, क्योंकि इन दोनों का अन्यान्योश्रित संबंध है। इस संबंध के निर्धारण में पत्रकारिता जगत को स्वमूल्यांकन की आवश्यकता है।
 समग्र आकलन एवं निष्कर्ष 
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि पत्रकारिता का उदय ही सामाजिक अन्याय के प्रति न्याय स्थापित करने, सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने एवं सामाजिक जागरूकता लाने के लिए हुआ। आज समाज में पत्रकारिता के प्रति इतनी रुचि पैदा हो गयी है कि व्यक्ति के दिन की शुरुआत पत्रों से होती है। वर्तमान सदी में पत्रकारिता के सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक एवं राजनीतिक क्षेत्रों तक की व्यापकता को नकारा नहीे जा सकता है। आज की पत्रकारिता छोटे-छोटे गाँव तक प्रवेश कर गई है। यही कारण है कि ग्रामीण पत्रकारिता को महत्व दिया जा रहा है क्योंकि पत्रकारिता का उद्देश्य ही जनसामान्य के विचारों को समझना एवं उसे व्यक्त करना है। किसी सामाजिक परिवर्तन के लिए शिक्षा की भूमिका अहम् होती है। शिक्षा के अभाव के बिना सामाजिक परिवर्तन की कल्पना अधूरी है। पत्रकारिता व्यक्ति एवं समाज को शिक्षित करने का एक सशक्त माध्यम है।
 पत्रकारिता को मूल रूप से देखा जाए तो यह एक तरह से ‘दैनिक इतिहास‘ लेखन है। पत्रकार अपनी कार्य कुशलता से प्रतिदिन का इतिहास अखबार के पन्नों में दर्ज करता चलता है। पूर्ण रूप से स्वतंत्र होने के बावजूद भी पत्रकारिता सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों से जुड़ी रहती है। उदाहरण के लिए सांप्रदायिक दंगों का समाचार लिखते समय पत्रकार को यह ध्यान रखना होता है कि उसके समाचार से आग न भड़के। बलात्कार के मामलों में वह महिला का नाम या चित्र नहीं प्रकाशित करता ताकि पीड़िता की सामाजिक प्रतिष्ठा को धक्का न पहुँचे। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चैथा स्तंभ  कहा जाता है। पत्रकारिता ने लोकतंत्र में यह महत्वपूर्ण स्थान सहज ही हासिल नहीं किया है। सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति पत्रकारिता के दायित्वों के महत्व को देखते हुए समाज ने ही यह दर्जा दिया है। लोकतंत्र तभी सार्थक और सशक्त होगा जब पत्रकारिता सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति अपनी सकारात्मक सार्थक भूमिका का निर्वाह करे। समय परिवर्तन के साथ पत्रकारिता का कार्य भी बदल गया हैंै। प्रारंभिक काल में इसका मुख्य कार्य नए विचार का प्रचार करना रहा था। तकनीकी विकास, सूचना व संचार क्रांति, उद्योग एवं वाणिज्य के प्रसार के कारण आज पत्रकारिता एक उद्योग बन चुका है। पत्रकारिता का इतिहास चाहे कितना पुराना हो या नया लेकिन इक्कीसवीं सदी में यह एक  सशक्त विषय के रूप में उभरा है, जिसकी पहुँच अति व्यापक बन गई है।
 आज पत्रकारिता के प्रति लोगों का इतना विश्वास बढ़ा है कि जीवन की वे छोटी-बड़ी समस्या का हल समाचार-पत्र, पत्रिकाओं में खोजने लगते हैं। सुबह समाचार-पत्र आते ही हर वर्ग के पाठक राजनीति, नौकरी, सिनेमा, खेलकूद, खाद्य वस्तुओं का भाव, नए फैशन एवं यहाँ तक कि विवाह हेतु वर कन्या की तलाश आदि विषयों पर आवश्यकतानुसार दृष्टि डालकर आवश्यक जानकारी जुटाने लगते हैं। यह सामाजिक जागरूकता को दर्शाता है। आज पत्रकारिता का क्षेत्र इतना व्यापक हो गया है कि क्षेत्रीय भाषाओं के समाचार-पत्रों की संख्या भी दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है, यह इस बात को सिद्ध करता है कि पत्रकारिता का भविष्य उज्ज्वल है लेकिन आज पत्रकारिता पर औद्योगीकरण जिस तरह से हावी हो रहा है, इस पर भी विचार करने की आवश्यकता है। सामाजिक परिवर्तन जरूरी तो है, लेकिन वह परिवर्तन उसी सीमा तक पहुँचाना चाहिए जिससे देश और समाज की संस्कृति पर आँच न आए। पत्रकारों को इस बात का खास तौर पर ध्यान रखना जरूरी है। यह ध्यान देना होगा कि परिवर्तन में भी अपनेपन की पहचान आवश्यक है। परिवर्तन में संस्कृति का मूल स्वर रहना आवश्यक है। इस प्रकार पत्रकारिता ही वह माध्यम है जिसके द्वारा समाज को उचित और सही दिशा का ज्ञान होता है।
सन्दर्भ-ग्रन्थ सूची 
1. पन्त, एन.सी., ‘हिन्दी पत्रकारिता का विकास’, राधा पब्लिेकशन, नई दिल्ली 
2. त्रिपाठी, डाॅ. रमेशचन्द, ‘पत्रकारिता के सिद्धान्त’, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, 2005 
3. डाॅ. हरिमोहन, ‘समाचार, फीचर-लेखन एवं संपादक कला’, श्री टी.एस. बिष्ट, नई दिल्ली, 2003 
4. मंत्री, गणेश, ‘पत्रकारिता की चुनौतियाँ’, सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली, 2004
5. चतुर्वेदी, जगदीश प्रसाद, ‘पत्रकारिता के छह दशक’, साहित्य संगम, इलाहाबाद, 1997
6.  डाॅ. डी.डी. शर्मा, गुप्ता, समाजशास्त्र का परिचय, साहित्य भवन पब्लिकेशंस, आगरा, 2015 
7. अहिरवार, अशोक कुमार, डाॅ. राममनोहर लोहिया के विचार, मध्यभारती-55, वि.वि. मुद्रणालय, सागर, 2005 
8. तिवारी, डाॅ. अर्जुन, ‘आधुनिक पत्रकारिता- संपूर्ण पत्रकारिता’, विश्व विद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 2004 
9. शर्मा, डाॅ. विनय मोहन, ‘शोध प्रविधि’, मयूर पेपर बैक्स प्रकाशन, नोएडा, 2003 
10. गुप्ता, आर.के., ‘हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास और विकास’, दया प्रकाशन, दिल्ली, 2008


 


शोधार्थी
हृदय नारायण तिवारी
हिन्दी अध्ययनशाला
विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन (म.प्र.)
मो 9203104739


सहरिया जनजाति विविध परिदृश्य

  देष के प्रमुख आदिवासियों में ष्सहरियाष् भी प्रमुख आदिवासी के रूप में जाने गये हैं। इन्हें ष्अनुसूचित जनजातिष् की श्रेणी में रखा गया है। राजस्थान के हाड़ौती अंचल के बारां जिले की शाहबाद व किषनगंज तहसील के गाँवों तथा जंगलों में सहरिया जनजाति के लोग निवास करते हैं जो राज्य का एकमात्र ष्आदिम जनजाति समूहष् है। इसके अतिरिक्त ष्मध्यप्रदेषष् के उत्तर-पष्चिम भाग में षिवपुरी, गुना, दतिया, मुरैना जिलों में भी यह जनजाति निवास करती है। सहरिया जनजाति के लोग डामोर के समान ही प्रवासी है। सहरिया मूलतः मध्यप्रदेष राज्य के निवासी हैं, जो मध्यप्रदेष राज्य के ष्गुनाष् जिले की सीमा से लगे हुए ष्बारांष् जिले की शाहबाद एवं किषनगंज तहसील में निवास करते हैं। यहाँ पर सहरियों का बाहुल्य है। इसके अतिरिक्त चित्तौड़गढ़, झालावाड़, सिरोही व बून्दी जिले में भी ये लोग निवास करते हैं। 
    निरक्षर एवं सीधे होने के कारण सहरिया सबसे पिछड़ी हुई जनजाति मानी गई है जिसका आसानी से शोषण किया जा सकता है। प्राचीन समय में सहरिया जंगल में ही रहते थे तथा किसी भी सभ्य व्यक्ति को देखकर वे भाग जाते थे। यह कहा जाता था कि सहरिया जंगली भयानक जानवरों से इतना नहीं डरते थे जितना कि एक सभ्य व्यक्ति से डरते थे। साहूकारों से कर्ज लेकर वे अपनी जमीन खो चुके हैं और आकंठ कर्ज में डूबे हुए हैं। षिकार करके, मछली पकड़कर व जंगलों में कुछ उपजाकर ये लोग अपना पेट भरते हैं जबकि कुछ सहरिया मकान बनाने, छप्परखाने, डलिया व टोकरी बुनने तथा अनाज पिसने आदि का कार्य मजदूरी पर किया करते हैं। 


सहरिया का ऐतिहासिक परिदृष्य: 
   सहरिया एक ऐसी आदिम जनजाति है जिसे सहर, सीरो, सवर, सौर, सहरिया, सेरिया, सेहरिया आदि विभिन्न नामों से जाना जाता है। इस जनजाति के लोग ऐतिहासिक परिदृष्य के बारे में बिल्कुल अनभिज्ञ है। केवल वृद्ध व जानकार लोगों की जानकारियों व कथाओं के माध्यम से ही इनके जीवन की कुछ धुंधली यादों को एकत्रित करने का प्रयास किया गया है। कुछ साहित्यकार यह मानते हैं कि सहरिया लोग डकैती का कार्य करते थे एवं चम्बल के विहड़ों में शरण लेते थे परन्तु उनकी इस बात का कुछ अन्य इतिहासकारों ने विरोध किया है। उनका मानना है कि यदि सहरिया लोग डकैती करते थे तो उनकी आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर कैसे थी। वह भूखे क्यों मरते थे ? क्यों दर-दर की ठोकर खाने को मजबूर थे ? बल्कि वे तो डकैतों के यहाँ मजदूरी का काम किया करते थे। ये लोग तो हमेषा से ही उपेक्षित रहे हैं और पूर्णतया आदिवासी ही बने रहे। ये हमेषा अपनी स्थिति को सुधारने में असमर्थ रहे हैं। सहरियों के संबंध में यह मान्यता है कि ये अपने पास सदैव कुल्हाड़ी रखते हैं। आर्य इतिहास के अनुसार सहरिया भारत के पहले कृषि सम्पन्न समूहों में से है। शब्द व्युत्पत्ति के आधार पर इनका अर्थ शेर का साथी होने से भी लगाया जाता है। ये शेर से कभी नहीं डरते बल्कि स्वयं को शेर या सेर कहलाने में बड़ा गर्व महसूस करते हैं। ये लोग स्वयं को आदिवासी व आर्य का सम्मिश्रण मानते हैं, ऐसा भी माना जाता है कि सेहरा शब्द से सेह तथा आर्यों के सम्पूर्ण आर्य शब्द को मिलाकर सेहरया शब्द बनता है जिसका अर्थ आर्यों के सहयोगी हुआ और यही सेहरया शब्द कालान्तर में स्थानभेदी के साथ सहरिया, सेहरिया अथवा सहरिया नाम से जाने जाना लगा। इस जनजाति का प्राचीनकाल से ही अत्यधिक शोषण हुआ है। इन्हें अपने इतिहास की जानकारी विरासत में मिली। उसी के अनुसार इनका स्वयं के प्रति हीन दृष्टिकोण है अन्य सभी जातियों ने इनका घोर अपमान किया है और इतना सब कुछ हो जाने के बावजूद भी ये अब तक चुपचाप बैठे हुए हैं और शोषित जीवन को बड़ी तत्लीनता के साथ हँसते-हँसते झेल रहे हैं। 


सहरिया का राजनीतिक परिदृष्य: 
   सहरिया जनजाति में भी अन्य आदिवासी समुदायों के समान ही परम्परागत राजनीतिक संगठनात्मक स्वरूप पाया जाता है जिसकी समाज में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इन लोगों की बस्ती गाँव का सहराना कहलाती है। सहरियों में सहराना के आधार पर ही पंचायत का गठन किया जाता है। इनका प्रमुख ष्पटेलष् होता है, जो वंषानुगत होता है। पटेल के अत्यधिक वृद्ध होने पर उनके बड़े भाई या बड़े पुत्र को उसके उत्तराधिकारों का वहन करना पड़ता है, सहराना पंचायत द्वारा सभी जातिगत विवादों को सम्पत्ति के विकास, वैवाहिक व अन्य झगड़ों को आपसी समझौते के साथ बीच बचाव कर तय करवाया जाता है। पंचायत द्वारा सामान्तया आर्थिक एवं समाज से बहिष्कृत करने का दण्ड भी दिया जाता है। सहरिया पंचायत के प्रमुख तीन स्वरूप माने गये हैं:- 
पंचताई:  यह पंचायत सहराना स्तर पर होती है एवं इसका प्रमुख सहराना का पटेल होता है।
एकादसिया पंच:  यह ग्यारह सहरनाओं की एक सम्मिलित पंचायत होती है। इसमें सभी सहरनाओं के पटेल सम्मिलित होते हैं। इनमें सामान्य सहमति से निर्णय लिये जाते हैं।
चैरासिया पंच:  इस पंचायत में सभी सहनाओं के पंच पटेल को शामिल किया जाता है। अतः चैरासिया पंचायत सहरियाओं का सर्वोच्च संगठन माना गया है। यह पंचायत विषेष मामलों के निर्णय करने हेतु बुलायी जाती है। इस पंचायत में निर्णय सर्वसम्मति के आधार पर लिये जाते हैं। 
  सहराना के बीच में एक छतरीनुमा मकान होता है। इसे ही पंचायती बंगला कहा जाता है। इसी बंगले पर बैठकर सहरिया आपस में होने वाले झगड़ों का फैसला किया करते हैं। 


सहरिया का भौगोलिक परिदृष्य: 
    सहरिया जनजाति राजस्थान और मध्यप्रदेष की अत्यन्त पिछड़ी हुई जनजाति है। राजस्थान के बारां जिले की शाहबाद व किषनगंज तहसीलों में सहरिया निवास करते हैं। यह क्षेत्र लगभग 150 किलोमीटर में स्थित है और इसी भूभाग पर सहरियाओं का निवास है। इसके अतिरिक्त मध्यप्रदेष के उत्तर में मुरैना व ग्वालियर के पूर्व में षिवपुरी तथा दक्षिण में गुना जिले में सहरियों का निवास है। भौगोलिक दृष्टि से देखा जाये तो भारतीय प्रायद्वीप के लघु हिस्से पर सहरियाओं का निवास था तथा उस क्षेत्र के बाहर सहरिया अत्यन्त कम संख्या में पाये जाते थे। यह सम्पूर्ण बसाव वाला क्षेत्र राजस्थान व मध्यप्रदेष राज्यों में स्थित है। इस प्रकार भौगोलिक दृष्टिकोण से सहरिया जनजाति अत्यन्त लघु पर्वतीय क्षेत्रों में निवास करती है। 


सहरिया का सामाजिक परिदृष्य: 
    संस्कृति के धनी सहरिया लोगों का अपना सामाजिक संगठन है जिसे जाति पंचायत कहते हैं। जातियाँ पंचायतें एक प्रकार से उनकी अपनी सरकारें होती है जो कि उनके पूरे समुदाय को बांधकर रखती है। इस पंचायत के अपने नियम व कानून होते हैं जिनकी पालना हेतु प्रत्येक सहरिया को बाध्य होना पड़ता है। विभिन्न मामलों पर निर्णय लेने तथा सजा देने के इनके अपने तरीके हैं। इनकी यह व्यवस्था सहरिया समुदाय को एक संगठन और व्यवस्थित समूह के रूप में समेकता प्रदान करती है। सहरिया जनजाति के रहन सहन का तरीका अन्य जनजातियों से बिल्कुल अलग है। इस जनजाति के लोग प्रत्येक गाँव में सामान्य लोगों से अलग जंगल से लगे हुए क्षेत्रों में घर बनाकर रहते हैं। सहरिया जनजाति की अपनी कोई उपभाषा नहीं होती है। यह जनजाति सामान्य क्षेत्रीय भाषा बोलती है। इस जनजाति के स्त्री एवं पुरूष गुदना गुदवाते हैं। इनकी स्त्रियाँ शरीर के किसी-न-किसी भाग पर गुदना गुदवाती है। स्त्रियों के साथ-साथ पुरूष भी अपने शरीर के हाथ, पैर, जांघ, पीठ, सीना, गर्दन एवं पंजा आदि स्थानों पर गुदना गुदवाते हैं। 
    सहरिया में अधिकांषतः लघु परिवार ही पसंद किये जाते हैं। साधारण रूप से यह रिवाज है कि विवाह के उपरान्त पुत्र को एक अलग झोपड़ी बना दी जाती है और वह उसमें अलग रहने लगता है। भरण-पोषण करने के लिए पति-पत्नी मजदूरी करने में जुट जाते हैं किन्तु परिवारों के प्रति मूल रूप से संयुक्त परिवार को आदर्ष माना जाता है जिनमें सबसे बड़े पुत्र की जिम्मेदारी होती है वही सहरिया परिवार का वहन करता है। माता-पिता की मृत्यु होने के बाद बड़ा पुत्र ही मृत्यु संस्कार करता है परन्तु विधवा माँ या बाप जो भी हो उनकी सार संभाल की जिम्मेदारी सबसे छोटे पुत्र की होती है तथा स्वभावतः माता-पिता का पैतृक मकान आदि सम्पत्ति कनिष्ठ पुत्र को मिलती है। अविवाहित भाई-बहिनों की जिम्मेदारी भी उसी की मानी जाती है। अन्य भाईयों से यह आषा की जाती है कि इस प्रकार की पारिवारिक जिम्मेदारियों में वे हाथ बंटायें, क्योंकि ज्येष्ठ भाईयों की यह भावना ही होगी कत्र्तव्य नहीं। 
    सहरिया समाज की सार्वजनिक समस्या के समाधान के लिए जो सामूहिक बैठक होती है, उस बैठक में प्रत्येक गाँव के मुखिया का शामिल होना जरूरी होता है। क्योंकि इस बैठक में मुखिया के शामिल होने को उस गाँव की सहमति माना जाता है तथा इस प्रकार की बैठकों के निर्णय सम्पूर्ण समाज के लिए मान्य एवं बाध्यकारी होते हैं। सहरियाओं का सामूहिक जीवन इनकी आदिमता की पहचान है। स्वभाव के अनुसार सहरियालोग आम आदमी से घुलना-मिलना पसन्द नहीं करते हैं। सहरिये बाहर अनजान व भोले दिखाई देते हैं। स्त्रियाँ अधिकांषतः घूंघट में रहती है व मर्यादाओं को निभाने वाली होती है परन्तु समय पड़ने पर वह अमर्यादित भी हो जाती है। 


सहरिया का धार्मिक एवं सांस्कृतिक परिदृष्य: 
    सहरिया जनजाति के लोग धार्मिक प्रकृति के होते हैं। धर्म के प्रति इन लोगों का अटूट विष्वास पाया जाता है। सहरिया हिन्दू देवती-देवताओं को मानते हैं। प्रमुख देवी देवताओं में भगवान हनुमान, शीतला माता, शारदा भाई, ठाकुर देव, रामदेव, नामदेव आदि है साथ ही राम, कृष्ण, गणेष, षिवजी, सत्यनारायण, गंगाजी, सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, अग्नि, वायु, जलदेव के साथ सीता माता व काली माता की भी पूजा करते हैं। देवी-देवताओं की पूजा संस्कारों व त्यौहारों के अवसर पर की जाती है। इनके प्रमुख त्यौहार दषहरा, होली, दीपावली, हरियाली, रक्षाबंधन आदि है। तेजाजी सहरियाओं के प्रचलित लोक देवता के रूप में माने जाते हैं। सहरिया काली दुर्गा एवं अन्य देवी-देवताओं की उपासना करते हैं जिनमें शबरी या सौरी माता, पूर्वक या कुल देवता, दाने बाबा, भूमानी देवी, ग्राम देवता, वन देवता, दूल्हा देव, केवलया बब्बा एवं मेहरवाली शारदा माता प्रमुख है। सहरिया लोगों का आत्मा, जादू, भूत प्रेत, टोना टूटका, चूड़ैल आदि के प्रति दृढ़ विष्वास होता है। रोग, टोना, जाूद एवं अकाल मृत्यु के समय पूजा व उपचार का कार्य जंतर लोग ही किया करते हैं। सहरिया लोग बड़े अंधविष्वासी होते हैं तथा इनके समाज में अनेक कुप्रथायें जिनमें भूत-प्रेत, डाकिन इत्यादि प्रमुख है। ये लोग जिन्नू देवता की भी पूजा व उपासना किया करते हैं। 
    सहरिया राजस्थान की ऐसी आदिम जनजाति है जिसमें स्वतंत्र विवाह को निषिद्ध माना जाता है। स्त्री-पुरूष अपने गौत्र के अतिरिक्त दो और गौत्र माँ और पिताजी के गौत्र को भी छोड़ते हैं। पुजारी के कार्य को गाँव का सरपंच सम्पन्न करा लेता है। विवाह की रस्में भी पंच द्वारा ही सम्पन्न की जाती है। विवाह के पश्चात् लड़का अपने माता-पिता के पास से अलग मकान बनाकर रहने लगता है। सहरिया समाज के व्यक्ति विभिन्न उत्सवों व त्यौहारों पर नाचगान करते हैं। सामान्यतः स्त्री-पुरूष एक साथ नहीं नाचते हैं। होली के अवसर पर फाग और राई नृत्य होता है और दीपावली के अवसर पर हीड़ा गाने का प्रचलन है। ढोलक, मंजीरा, नगाड़ा, झांझ, तूमड़ी आदि इनके प्रमुख वाद्य यंत्र हैं। इस क्षेत्र में लगने वाला सीताबाड़ी व तेजाजी का मेला इनमें बहुत लोकप्रिय है। सहरियाओं में एक खास बात यह है कि ये लोग कभी भीख नहीं माँगते हैं, भले ही वह दो दिन से भूखे क्यों न हो मगर वह यह कभी नहीं कहते कि मैं भूखा हूँ या मेरे घर रोटी नहीं बनी, इतने यह संतोषी होते हैं। 


सहरिया का आर्थिक परिदृष्य: 
  सहरिया जनजाति आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त पिछड़ी हुई जनजाति कही जा सकती है। ये प्रारम्भ से ही बहुत गरीब है। इनकी गरीबी के दो प्रमुख कारण हैं:-
1. सामन्त और उच्च जातियों जैसे ब्राह्मण, किराड़ एवं बनिया इत्यादि द्वारा इनका शोषण।  
2. सरकारी मषीनरी तंत्र द्वारा इस शोषण का समर्थन।
    स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व सहरियाओं के रोजगार के दो ही साधन थे-प्रथम कृषि तथा खेतीहर मजदूरी और दूसरा जंगल से प्राप्त होने वाली उपज को संग्रहित कर बेचना। इसके अलावा धनी, व्यापारी, जमींदार, राजा महाराजा इनसे अक्सर काम करवाते रहते थे। इस तरह से इनकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब रहती थी। अतः इनका आर्थिक जीवन अत्यन्त सरल माना गया है जो कि मुख्यत खेती, मजदूरी या जंगली उपज संग्रह पर आधारित है। आर्थिक दृष्टि से कमजोर सहरिया कृषि व्यवसाय, मजदूरी व वनोपज के साथ-साथ बीड़ी बनाकर तथा चरवार वाले क्षेत्रों में चरवाहे का काम अपनाकर जीवन-यापन करते हैं। इनकी आय कम होने के कारण ये हमेषा कर्ज में डूबे हुए रहते हैं। इसका मुख्य कारण कार्य का न मिलना या मिला हुआ कार्य का स्थायी न होना है। अषिक्षा, गरीबी एवं पर्याप्त अनुकूल कार्य न मिलने के कारण ये लोग अनेक दुव्र्यसनों के षिकार होते हैं। 
    सहरियाओं की दो-तिहाई आमदनी खेती तथा मजदूरी से ही होती है और शेष उन्हें वनोपज से प्राप्त होती है। मुख्यतः ये लोग अपने परिवार के साथ आसपास के क्षेत्रों में फसल पकने के बाद मजदूरी करने चले जाते हैं जहाँ ये फसल को काटने व साफ करने का कार्य करते हैं जिसके बदले इन्हें अनाज, नकद राषि व खाना दिया जाता है। इसके अतिरिक्त अकाल राहत कार्य में विभिन्न प्रकार के सड़क व भवन निर्माण संबंधित के कार्य सरकार करवाती है। उनमें सहरियाओं को काम के बदले निर्धारित मजदूरी के साथ गेहूँ का भुगतान किया जाता है। 
    अपने जीविकोपार्जन के लिए वनोपज पर निर्भर रहने वाली यह जनजाति जंगल से महुआ, अचार, गुली, गोंद, मूसली, कत्था, खैर, आंवला, तेंदूपत्ता, हर्र, बहेरा, लाख शहद, कंजी घास एवं अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियाँ लाते हैं साथ ही मधुमक्खियों के छत्ते से शहद निकालने का कार्य भी करते हैं। इस कार्य में परिवार के सभी व्यक्ति सम्मिलित होते हैं। 
    सहरियों के बारे में एक कहावत है कि वे कभी नहीं सुधरेंगे जिसे अन्य जातियों के अतिरिक्त स्वयं सहरिया ने भी आत्मसात कर लिया है। 


सहरिया का शैक्षणिक परिदृष्य: 
    सहरिया एक ऐसी जनजाति है जिसमें षिक्षा का स्तर शून्य मात्र ही रहा है। इस प्रकार अन्य आदिवासी समुदायों की अपेक्षा सहरिया सबसे कम मात्रा में साक्षर है। सहरियाओं का केवल 4.72 प्रतिषत भाग ही साक्षर है। शेष 95.28 प्रतिषत सहरिया लोग अषिक्षित है। षिक्षा से ये हमेषा से ही दूर रहे। सहरिया जनजाति बाहुल्य गाँव में एक स्नातक, 5 हायर सेकण्डरी, 2 सेकण्डरी एवं 44 आठवीं कक्षा में उत्तीर्ण पाये गये और इसी प्रकार की स्थिति अन्य समुदायों में भी है। 
    सहरियों की वर्तमान शैक्षिक प्रणाली में उनके बच्चों, उनकी अधिक मेहनत करने की दक्षता पर प्रतिकूल असर डालती है। सहरियाओं का वर्तमान शैक्षिक प्रणाली में कोई विष्वास नहीं है। रोटी तो हमें मेहनत करने से ही मिलती है, षिक्षा हमें रोटी नहीं देती बल्कि हमसे मेहनत करने की आदत और छीन लेती है अतः यह पूरी तरह से समय की बर्बादी है। सामाजिक स्थिति महिलाओं को षिक्षा से दूर करती है। विद्यालय का वातावरण बच्चों के लिए आकर्षक नहीं है। औपचारिक शहरी षिक्षकों के लिए फटे हाल, नंगे एवं मेले सहरिया बच्चों के प्रति घृणा का भाव होता है। सामान्तवादी एवं जातिगत भेद सहरियाओं को षिक्षा से दूर रखता है। वर्तमान की षिक्षा प्रणाली एवं वातावरण उन्हें विरासत में मिली हुई प्राचीन समृद्धि को भुलाता है। सहरियाओं में पलायन की प्रवृत्ति अधिक रहती है। यह लोग रोजगार की तलाष में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते हैं एवं इन जनजातियों का शैक्षणिक स्तर निरन्तर गिरता जा रहा है। सहरिया जाति के लोग जो कि अन्य जातियों की अपेक्षा शैक्षिक जीवन में काफी पिछड़े हुए हैं। 


संदर्भ ग्रन्थ सूची: 
1. सहरिया, बसंत निरगुणे, मध्यप्रदेष आदिवासी लोककला मंडल, भोपाल (मध्यप्रदेष), 1990
2. सहरिया, असेफा प्रोफाइल, एस.एम.वी.टी. सनसेज माॅनीटरिंग, जिला बारां (राजस्थान), 2000
3. द सहरिया, डाॅ. टी.बी. नायक, ट्राइबल रिसर्च एण्ड ट्रेनिंग इन्स्टीट्यूट, अहमदाबाद (गुजरात), 1994 
4. ट्राइबल कल्चर, शषि बैराठी, रावत पब्लिषर्स, जयपुर (राजस्थान), 1991
5. सहरिया जनजाति की आर्थिक, शैक्षणिक स्थिति पर नोट, अतिरिक्त कलक्टर शाहबाद, बारां (राजस्थान), 2006
6. भारत की जनजातियाँ, षिवकुमार तिवारी, नार्दन बुक सेन्टर (नई दिल्ली), 1992
7. सहरिया प्राचीन इतिव्रत (लेख ट्राइब), डाॅ. बृजमोहन जावलिया, माणिक्य लाल वर्मा आदिम जाति शोध एवं प्रषिक्षण संस्थान, उदयपुर (राजस्थान), 2001
8. सहरिया एक अध्ययन, श्री घनष्याम गुप्त का निजी संग्रह
9. द सहरिया, पी.सी. दवे, भारतीय आदिम जाति सेवक संघ
10. सहरिया ए लिटिल नाॅन ट्रांस आॅफ, राजस्थान
11. भारतीय समाज, वीरेन्द्र प्रकाष शर्मा
12. भारतीय जनजातियाँ उनकी संरचना एवं विकास, डाॅ. हरिषचन्द उत्प्रेती


 दलित साहित्य: सामूहिक विष्वास की वृहत्तर संवाद भूमि 

         ’’ जाति-पात पूछे नहि कोऊ, हरि को भजे सो हरि का होऊ’’- जैसी बातें बड़े उद्देष्य को साधने के लिए छेड़ी गयीं। विविधताओं के बीच सामूहिक एकता की अद्भुत क्षमता से ओत-प्रोत भारत सारे संसार की विषिष्ट भूमि है। लेकिन बहुधर्मी भारत के सामाजिक आधार को धार्मिक सामन्तों ने तार-तार कर दिया, जिसका कारण हुआ कि ’दलित वर्ग’ उपेक्षित और अपमानित हो गया। सदियों लगे उपेक्षा और अपमान से उबरने में। ऐसा नही कि केवल शोषण ही चला, सहानुभूति का, शोषण के खिलाफ संघर्ष का, सामंतषाही पाखंडी तत्वों के विरोध का भी लम्बा इतिहास है। बहुत बड़े-बड़े नाम सामने आते है, जिन्होंने इस तरह के अराजक तत्वों पर तीखे प्रहार कर आन्दोलन खड़ा किया और उन्हें धूल चटाई। दरअसल शोषक, शोषित पीड़क-पीड़ित वर्ग सदैव रहे है और रहेंगे, समयानुसार आनुपातिक रूप से कम-ज्यादा की अंकगणित चलती रहेगी। हिन्दी के स्वर्ण युग के नायकों (सूर, तुलसी, जायसी, कबीर) ने तो अखिल भारत को एकता के सूत्र में पिरोने का मानों संकल्प ले रखा था, पूरब से पष्चिम, उत्तर से दक्षिण तक समन्वय की विराट चेष्टा से भरपूर लेखनी चलाई। सारा राष्ट्र तुलसी और विषेष रूप से कबीर का सदैव ऋणी रहेगा। आधुनिक भारत में बाबा साहब के राजनीति एवं लेखन में प्रवेष के साथ ही दलित साहित्यान्दोलन खुलकर सामने आया, जिसने सन्तुलन-समन्वय से भरपूर अखिल भारत के सामूहिक विकास की वृहत्तर संवाद-भूमि तैयार की, जिस पर बैठकर सहिष्णुता सद्भावना और संवेदनापूर्ण समाज का निर्माण हो रहा है। वर्गवादी सोच प्रतिभा को, अन्वेषण क्षमता, संवेदना एवं मौलिकता को रूग्ण करता है। इसके लिए जरूरी है कि 
(2)
दलित-विमर्षकारों-साहित्यकारों को आक्रोष-प्रतिषोध जैसी निषेधात्मक ऊर्जा का एवं गैर-दलित साहित्यकारों को संकीर्ण-रूढ़िवादी स्थापनाओं का त्याग करना पड़ेगा। सृजनात्मकता के स्तर पर संवेदना के साथ मौलिकता एवं कथ्यगत नवता का ही अभिवन्दन होता है। कालजयी रचनाधर्मिता के लिए तटस्थ रहना आवष्यक है। ऐसे ही समावेषी और सहिष्णु रचनाकारों में कबीर, रैदास, प्रेमचन्द, निराला, यषपाल, अज्ञेय, मुक्तिबोध, वाल्मीकि, माता-प्रसाद, हीरा डोम, षिवमूर्ति, एस.आर. हरनोट आदि हैं, जिनकी रचनाओं को (विचार को) भारत के बुद्धिधर्मी समाज में सार्वभौम स्वीकृति मिलती है।
  समय बदला है, देष को छिन्न-भिन्न होने से बचाने के लिए एक विषद समन्वित निरापद, सामुदायिक एवं जातिमुक्त समाज का निर्माण करना होगा। डाॅ0 अम्बेडकर ने भी बौद्ध धर्म स्वीकारते हुए यह माना कि बौद्ध धर्म भारतीय सभ्यता का ही अनिवार्य अंग है, जहाॅ की परम्परा अवर्ण है और यह इस युग का एकमात्र राष्ट्रीय विकल्प भी है, ’’ मैं वही रास्ता चुनॅूगा जिससे देष की न्यूनतम क्षति हो, और बौद्ध धर्म अपनाकर मैं देष को अधिकतम लाभ पहुॅचा रहा हॅू क्योंकि बौद्ध धर्म भारतीय सभ्यता का अनिवार्य अंग है। मैंने यह सावधानी बरती है कि मेरा धर्मान्तरण इस भूमि की परम्परा, संस्कृति एवं इतिहास को क्षतिग्रस्त नहीं करेगा। ’’1 इस बात को बहुत पहले ही संत रैदास, नानक, संत कबीर आदि ने समझ लिया था कि वर्ण-सम्प्रदाय भेद के कारण समाज टूटेगा और टकराव विद्वेषपूर्ण-माहौल पनपेगा। इसलिए उन लोगों ने एक दूसरे से भेद-भाव करने पर खुब फटकार लगाई है। कबीर का स्पष्ट मानना है कि वेद-कतेब, स्त्री-पुरूष, दीन-दुनिया, ब्राम्हण-सूद्र में कोई अन्तर नहीं है .....
  


(3)
  
  ऐसा वेद बिगूचन भारी।
  वेद कतेब दीन अरू दुनिया कौन पुरूष को नारी।
  एक रूधिर एकै मल मूतर, एक चाम एक गूदा।
  एक बॅूद तै सृष्टि रची है, कौन बाभन को सूदा।
     -(कबीर ग्रन्थावली-सं0डाॅ0 हजारी प्रसाद द्विवेदी)
 नीहित स्वार्थो के चलते सामन्ती-जातिवादी वर्चस्व बनाये रखने के लिए पुरोहितवादी संस्कृति के दंभी ठेकेदारों ने व्यवस्था को अपने हाथों का खिलौना बनाये रखा और दलित अस्मिता को आहत करते रहे-
  चूल्हा मिट्टी का, मिट्टी तालाब का
  तालाब ठाकुर का,
  भूख रोटी की, रोटी बाजरे की,
  बाजरा खेत का, खेत ठाकुर का,
  हल के मूठ पर रखी हथेली अपनी
  फल ठाकुर का, कुॅआ ठाकुर का।
  पानी ठाकुर का, खेत-खलिहान ठाकुर के
  गली-मुहल्ले ठाकुर के
  फिर अपना क्या ? गाॅव ? शहर ? देष ?’’ 2
यह वर्गबोध-जातिबोध ऐसे ही नहीं पनपा। सदियों से पीड़ित-षोषित, वंचित, अपमानित जातियों के लोग अभावग्रस्त-अमानवीय जीवन जीये जा रहे थे, लेकिन दलित बुद्धिजीवियों एवं विमर्षकारों के आगमन से यह जातिबोध अपने प्राकृतिक अधिकारों के प्रति सजग 


(4)
हुआ। हीनताबोध से उबरे इस समाज ने अपनी बात स्वयं कह लेने की ताकत पैदा की है जो स्वागत योग्य है-
  ’’ साहित्य हम भी सृजित करेंगे 
  नहीं होंगे जिसमें छंद, नहीं होंगे कोई बंध
  नहीं होगी इसमें मेरी अपनी वेदना
  मेरा अपना दर्द। ’’3 
महाभारत के यक्ष-प्रष्न का उत्तर भी यही रहा कि कोई व्यक्ति जन्म से ब्राह्मण-सूद्र नहीं होता। सामंती क्रूरता के षिकार लोगों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हुआ। वर्णवादियों के चेहरे पर अब कालिख पुत गयी है। यह बड़ा अच्छा होगा कि आत्मविष्लेषण किया जाय और एक साक्षी संस्कृति का निर्माण किया जाय। जन्म और कर्म में अन्तर होता है, यही सत्य है। इन्हीं बातों की ओर इस काव्य खण्ड में इषारा है -
  ’’वह दिन कब आयेगा
  जब बाभनी नहीं जनेगी बाभन
  चमारी नहीं जनेगी चमार
  भंगिन भी नहीं जनेगी भंगी।
  तब नहीं चुभेगे
  जातीय हीनता के दंष
  नहीं मारा जायेगा, तपस्वी शंबूक
  नहीं कटेगा अंगूठा एकलव्य का 
  कर्ण होगा नायक
  राम सत्ता लोलुप हत्यारा।’’ 4
 (5)
 ’’साहित्य समाज का दर्पण है, किसी वर्ग की जागीर या धरोहर नहीं। हिन्दी साहित्य को और अधिक ऊर्जावान, वैचारिक विस्तार देने एवं मूल्यवान बनाने के लिए समूचे साहित्य में दलितों द्वारा लिखा गया साहित्य भी शामिल हो।’’5दलित वर्ग को उसके प्राकृतिक अधिकारों के साथ खड़े होने की हिम्मत वास्तव में दलित साहित्य ने प्रदान की है, ’’ दलित साहित्य केवल दलितों द्वारा लिखा गया साहित्य नहीं है बल्कि वह साहित्य है जो दलित चेतना को अभिव्यक्त करता है।’’6 यहाँ मात्र साहित्य रचना उद्देष्य नहीं बल्कि उस समूह या वर्ग को न्याय दिलाला भी है, जो उपेक्षा के षिकार हैं, पीड़ित और शोषित है, ’’ शोषण -दमन के विरूद्ध जुझारू या क्रान्तिकारी साहित्य की एक लम्बी परम्परा है- जनवादी साहित्य, माक्र्सवादी साहित्य, काले लोगों का साहित्य और अब दलित साहित्य।’’7 निष्चित रूप से वह वर्ग जिसने अपने खून-पसीने से आराम की व्यवस्था दी, वहीं अत्याचार सहता रहा, जिसके बारे में चर्चा जितनी होनी चाहिए- जिस तरह से होनी चाहिए थी नहीं हुई। लेकिन दलित साहित्य ने दरवाजे खोले है और एक बदलाव का साहित्यिक प्रांगण तैयार किया है ’’ (दलित साहित्य) नवयुग का एक वैज्ञानिक व यथार्थपरक संवेदनषील साहित्यिक हस्तक्षेप है ........सामाजिक बदलाव का दस्तावेज है। ’’8 और इसी बदलाव से हम साहित्य में जहाँ सर्जना और समीक्षा दोनों ही स्तर पर नवीन मानक की स्थापना की ओर बढ़ रहे हैं, वही एक नये वर्ग विहीन समाज की संरचना भी करने की ओर बढ़ रहे है।
  वस्तुतः साहित्य में दलित साहित्य का अवदान धरोहर के रूप में स्वीकार किया जाना समयानुकूल और प्रासंगिक है। हमें एक दूसरे के अनुभवों और संवेदनाओं को बाँटने में कोई गुरेज नहीं करना चाहिए और दलित-गैर दलित यथार्थ को पहचानने का प्रयास करना चाहिए। व्यापक रूप से पिछड़े व सांस्कृतिक-साहित्यिक राजनीतिक- 
(6)
सामाजिक-आर्थिक रूप से दबाये गये समाज की पीड़ा को अभिव्यक्ति देने में पूरी ईमानदारी प्रदर्षित करनी चाहिए। आक्रोष और विरोध में प्रतिभाओं का उभार नही हो पाता है। बात यह भी जरूरी है कि नव्यता, मौलिकता, गुणवत्ता और अर्थवत्ता को लेखन के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण सामग्री मानकर ही साहितय रचना संभव है। इस सम्बन्ध में डाॅ0 नामवर सिंह का कथन उचित ही है कि, ’’ साहित्य में आरक्षण नहीं हो सकता और न हो सकेगा। साहित्य का एक सिद्धान्त रहा है कि रचना को देखों, रचनाकर को मत देखो। कबीर ने कहा था कि जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान.......देखो यह कि रचना क्या कहती है। साहित्य का यह सिद्धान्त रहा है और इसे मैं मानता हँू।’’ 9 कुल मिलाकर हिन्दी में समकालीन दलित साहित्य नयी चेतना, संवेदना, नयी ऊर्जा, नये संस्कार और विचार के साथ वर्णवादी जड़ता को समाप्त करने के लिए तेवर और साहस से पदार्पण कर चुका है, साहित्य मनीषा ने इसका स्वागत भी भरपूर किया है। स्वागत इसलिए भी कि इससे पाखंडी समाज तार-तार होगा, सहिष्णु एवं सद्भावी भारत का निर्माण होगा। सामूहिक विकास की इस वृहत्तर संवाद-भूमि पर बैठकर ही हम समतामूलक-समरस समाज गढ़ पायेंगे- आवष्यकता है वर्गभेद से ऊपर उठकर अवदान के लिए संकल्पित होने की।
संदर्भ-
1- बाबा साहेब अम्बेडकर जीवन चरितः धनन्जय वीर: पू0 498
2- ओमप्रकाष वाल्मीकि की कविता, ठाकुर का कुआँ ज्ञंअपजंावेीण् 0तहण्
3- डाॅ0 सी0बी0 भारती की कविता ’साहित्य सृजन’ ज्ञंअपजंावेीण् 0तहण्
4- सदियों का संताप: ओमप्रकाष वाल्मीकि ज्ञंअपजंावेीण् 0तहण् 
5- दलित साहित्य की अवधारणा और प्रेमचन्द-प्रेमचन्द साहित्य संस्थान-ष्योराज सिंह  बेचैन। शुक्रवार 29 जुलाई 2005, पी0बी0सी0 हिन्दी
7- डाॅ0 तुलसी राम, 1936 में उरई में दलित जागरण गोष्ठी में दिया गया वक्तव्य’
7- हिन्दी में दलित साहित्य आलोचनाओं के उत्तर’- मणिषेखर-दलित लिबरेषन टुडे  (अप्रैल 96) पृ0 26-29
8- दलित साहित्य का सौन्दर्यषास्त्र डाॅ0 सी0बी0 भारती, हंस (अगस्त-1996)  पृ0-70-71
9- ’कथन’ डाॅ0 नामवर सिंह अक्टूबर-दिसम्बर-1998 पृ0 65,


                                                 डा0 शषिकला जासवाल 
           असि0 प्रोफेसर-हिन्दी
       राजकीय महिला पी0जी0 काॅ0, गाजीपुर
       म्उंपस ेींेपीपेीेीतंककीं/हउंपसण्बवउण्
        


 


वैश्विक परिप्रेक्ष्य में रामकाव्य और राम का स्वरूप

‘रामकथा और राम’ भारतीय संस्कृति और सभ्यता का बहुत सुन्दर पुंज है। रामकाव्य विश्व को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की प्रेरणा देता है और राम का व्यक्तित्व और उनकी कथा इतनी सघन और व्यापक है कि उसमें सम्पूर्ण जीवन की गहराई और सूक्ष्मता, विस्तार और सौन्दर्य, संघर्ष और सत्य, यथार्थ और आदर्श विधि-विश्वास और प्रज्ञा आदि स्थितियों, चित्तवृत्तियों और भावभूमियों की अभिव्यक्ति के लिए विपुल आकाश है। आधुनिक युग में रामकथा विश्व के सभी प्राणियों के लिए ज्ञान और मूल्य का स्रोत रहेगी क्योंकि रामकाव्य में सभी प्राणियों के हित की बात है, जीवन-मूल्यों का सार है, राष्ट्र के प्रति प्रेम-भावना और त्याग है। पूरे संसार का सुख और खुशी की भावना है। रामकथा ‘मानवमन और मानवप्रज्ञा’ का प्रतिनिधित्व करती है। इसलिए यदि रामकथा को जीवन का महाकाव्य कहा जाये तो यह अतिश्योक्ति न होगी। रामकाव्य का प्रभाव भारत के जनमानस के साथ विश्व के सभी देशों पर पड़ा है। विदेशी भाषाओं में रामकथा और राम के स्वरूप की व्याख्या हुई है। रामकाव्य को विश्व के समग्र साहित्य में विशेष स्थान प्राप्त है और जनमानस के हृदय में राम का मर्यादा पुरुषोत्तम रूप और स्वरूप भी अमिट है। एशिया में रामकथा में राम का स्वरूप में सभी रचनाकारों ने अपनी-अपनी लेखनी और भावों की अपार आस्था से अभिव्यक्त कर शब्दों में लिखा है।
श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है क्योंकि राम में कहीं भी मर्यादा का उल्लंघन हुआ नहीं मिलता। संपूर्ण भारतीय समाज में राम का आदर्श रूप उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम के सभी भागों में स्वीकार किया गया है। भारत की हर एक भाषा की अपनी रामकथाएँ हैं। इसके उपरांत भारत के बाहर के देशों-फिलीपाइंस, थाईलैंड, लाओस, मंगोलिया, साईबेरिया, मलेशिया, बर्मा अब म्यांमार, स्याम, इंडोनेशिया, जावा, सुमात्रा, कम्बोडिया, चीन, जापान, श्रीलंका, वियतनाम आदि में भी रामकथा प्रचलित है। बौद्ध, जैन और इस्लामी रामायण भी हैं। मैक्समूलर, जोंस, कीथ, ग्रीफिथ, बारान्निकोव जैसे विद्वान राम के त्यागमय, सत्यनिष्ठ जीवन से आकर्षित थे। किसी भी काल्पनिक पात्र का अन्य देशों, अन्य धर्मों में हजारों वर्षों से ऐसे प्रभाव का टिका रहना संभव नहीं। भारतीय मानस को तो राम कभी काल्पनिक लगे ही नहीं। वे घर -घर में इष्ट की तरह पूजे जाते हैं. राम ने अपने युग में एकता का महान कार्य किया था। आर्य, निषाद, भील, वानर, राक्षस आदि भिन्न संस्कृतियों के बीच सुमेल साधने का काम राम ने किया। रावण की मृत्यु के बाद राम के मन में रावण के प्रति कोई द्वेष नहीं।
राम शब्द का अर्थ है- ‘रा’ शब्द परिपूर्णता का बोधक है और ‘म’ परमेश्वर वाचक है। अर्थात् रमंति इति रामः जो रोम-रोम में रहता है, जो समूचे ब्रह्मांड में रमण करता है वही राम हैं। भारतीय लोक-जीवन में राम-नाम की प्रभुसत्ता का विस्तार सहज देखा जा सकता हैं। बच्चों के नाम में राम का सर्वाधिक प्रयोग इस तथ्य का अकाट्य प्रमाण है। अभिवादन के आदान-प्रदान में ‘राम-राम’, ‘जै रामजी की’, ‘जै सियाराम, ‘जै राम’ का उपयोग वास्तव में राम नाम के प्रति गहन लोकनिष्ठा और श्रद्धा के प्रकटीकरण का माध्यम शताब्दियों से बना हुआ है। भारत में तो किसान हल चलाने से पहले बैलों को कहता ले राम का नाम और शुरू करे काम। 
लोक-जीवन में रामलीलाओं का युग-युगांतरों से समावेश किया गया है। लोकप्रियता और व्यापकता की दृष्टि से रामलीला का हमारे जनजीवन में विशिष्ट स्थान है। इस रचना में एक समूचे समुदाय की धार्मिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक एवं कलात्मक अभिव्यक्ति होती है। रामलीला में दर्शकों का जितना सहज एवं संपूर्ण सहयोग होता है उतना किसी और नाट्य में असंभव-सा है। रामचरितमानस में रामलीला की ऐतिहासिकता के स्पष्ट संकेत हैं। उत्तरकांड में काक भुशुंडजी कहते हैं-
‘चरम देह द्विज के मैं पायी। सुर दुर्लभ पुराण श्रुति गायी।
खेलऊँ तहूँ बालकन्ह मीला। करऊँ सकल रघुनायक लीला।’
मनुष्य साँसारिक होते हुए भी राम नाम के सहारे यह संसार पार पा सकता है।
‘राम नाम कहि राम कहि राम राम कहि राम। 
इंडोनेशिया में अधिकतर मुस्लमानों का निवास होने पर भी उनकी संस्कृति पर रामायण की गहरी छाप है। रामकथा पर आधारित जावा की प्राचीनतम कृति ‘रामायण काकावीन’ जो कावी भाषा में है। यह जावा की प्राचीन शास्त्रीय भाषा है। काकावीन का अर्थ महाकाव्य है योगीश्वर द्वारा रचित यह नौवीं शताब्दी की रचना है। रामायण काकावीन का स्थान सर्वोपरि है। यह छब्बीस अध्यायों में विभक्त एक विशाल ग्रंथ है, जिसमें महाराज दशरथ को विश्वरंजन की संज्ञा से विभूषित किया गया है। इस रचना का आरंभ रामजन्म से होता है। कावी भाषा में कई महाकाव्यों का सृजन हुआ है- ‘उत्तरकांड’ गद्य, चरित रामायण अथवा कवि जानकी, बाली द्वीप व परवर्ती रचनाओं में ‘सेरतकांड’, ‘रामकेलिंग’ और ‘सेरी राम’ का नाम उल्लेखनीय है। इनके अतिरिक्त ग्यारहवीं शताब्दी की रचना-‘सुमनसांतक’ में इंदुमती का जन्म, अज का विवाह और दशरथ की जन्मकथा का वर्णन हुआ है। चैदहवीं शताब्दी की रचना अर्जुन विजय की कथावस्तु का आधार अर्जुन सहस्रबाहु द्वारा रावण की पराजय है।
महाकवि रामकथा के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं-राम चरित्र जीवन की संपूर्णता का प्रतीक है। राम के महान आदर्श का अनुकरण जनजीवन में हो, इसी उद्देश्य से इस महाकाव्य की रचना की गई है। यह कथा संसार की महानतम पवित्र कथाओं में एक है। रचना के अंत में महाकवि योगीश्वर उत्तम विचारवाले सभी विद्वानों से क्षमा याचना करते हैं। 
कंपूचिया की रामायण ख्मेर लिपी में है। एस. कार्पेल्स द्वारा लिखित रामकेर्ति के सोलह सर्गों (1-10 तथा 76-80) का प्रकाशन अलग-अलग पुस्तिकाओं में हुआ था। इसकी प्रत्येक पुस्तिका पर रामायण के किसी-न-किसी आख्यान का चित्र है।2 कंपूचिया की रामायण को वहाँ के लोग ‘रिआमकेर’ के नाम से जानते हैं, किंतु साहित्य में यह ‘रामकेर्ति’ के नाम से विख्यात है।
‘रामकेर्ति’ ख्मेर साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कृति है। ‘ख्मेर’ कंपूचिया की भाषा का नाम है। ‘रामकेर्ति’ और वाल्मीकि रामायण में अत्यधिक समानता है।
दक्षिण-पूर्व एशिया की रामकथाओं में सीता त्याग की घटना के साथ एक नया आयाम जुड़़ गया है, अतुल्य के आग्रह पर सीता द्वारा रावण का चित्र बनाना। अतुल्य का उस चित्र में प्रवेश कर जाना। सीता द्वारा उस चित्र मिट नहीं पाना और उसे पलँग के नीचे छिपा देना। राम का पलँग पर लेटते ही तीव्र ज्वर से पीड़ित हो जाना। इस यथार्थ से अवगत होने पर वे लक्ष्मण से वन में ले जाकर सीता का वध करने का आदेश देते हैं और मृत सीता का कलेजा लाने के लिए कहते हैं। वन पहुँचकर लक्ष्मण जब सीता पर तलवार प्रहार करते हैं, तब वह पुष्पहार बन जाता है। 
लक्ष्मण से सीता त्याग के यथार्थ को जानकर राम उनके पास गए। उन्होंने सीता से क्षमा-याचना की, किंतु वे द्रवित नहीं हुईं। उन्होंने अपने दोनों पुत्रों को राम के साथ जाने दिया और स्वयं पृथ्वी में प्रवेश कर गई। हनुमान ने पाताल जाकर सीता से लौटने का अनुरोध किया। उन्होंने उस आग्रह को भी ठुकरा दिया। रामकेर्ति की खंडित प्रति की कथा यहीं पर आकर रुक जाती है। 
1238 ई. में स्वतंत्र थाई राष्ट्र की स्थापना हुई थी परंतु पहले से ही इस क्षेत्र में रामायणीय संस्कृति विकसित हो गई थी। थाईवासी परंपरागत रूप से रामकथा से परिचित थे। उस समय उसका नाम स्याम था। तेरहवीं शताब्दी में राम वहाँ की जनता के नायक के रूप में प्रतिष्ठित हो गए थे,3 किंतु रामकथा पर आधारित सुविकसित साहित्य अठारहवीं शताब्दी में ही उपलब्ध होती है।
राजा बोरोमकोत (1732-58 ई.) की समकालीन रचनाओं में रामकथा के पात्रों तथा घटनाओं का उल्लेख हुआ है। उन्होंने थाई भाषा में रामायण को छंदोबद्ध किया जिसके चार खंडों में 2012 पद हैं। पुनः सम्राट राम प्रथम (1782-1809 ई.) ने कवियों के सहयोग से रामायण की रचना करवाई उसमें 50177 पद हैं। यही थाई भाषा का पूर्ण रामायण है। 4 राम द्वितीय (1809-24 ई.) ने एक संक्षिप्त रामायण की रचना की जिसमें 14300 पद हैं। तदुपरांत राम चतुर्थ ने स्वयं पद्य में रामायण की रचना की जिसमें 1664 पद हैं। 5 इसके अतिरिक्त थाईलैंड में रामकथा पर आधारित अनेक कृतियाँ हैं। थाई रामायण में शिव की कृपा से सीता और राम का पुनर्मिलन दिखाया गया है।
लाओस की संस्कति चाहे जितनी पुरानी हो, राजनीतिक मानचित्र पर वह मध्यकाल में ही अस्तित्व में आया। लाओस राज्य की स्थापना चैदहवीं शताब्दी के मध्य हुई है। लाओस के निवासी और इनकी भाषा को ‘लाओ’ कहा जाता है जिसका अर्थ है ‘विशाल’ अथवा ‘भव्य’। 1 लाओ जाति के लोग स्वयं को भारतवंशी मानते हैं। लाओ साहित्य के अनुसार अशोक (273-237 ई.पू.) द्वारा कलिंग पर आक्रमण करने पर दक्षिण भारत के बहुत सारे लोग असम-मणिपुर मार्ग से हिंद चीन चले गए। 2 लाओस के निवासी अपने को उन्हीं लोगों के वंशज मानते हैं। रमेश चंद्र मजूमदार के अनुसार थाईलैंड और लाओस में भारतीय संस्कृति का प्रवेश ईसा-पूर्व दूसरी शताब्दी में हुआ था। उस समय चीन के दक्षिण भाग की उस घाटी का नाम ‘गांधार’ था।3
लाओस में रामकथा पर आधारित कई रचनाएँ हैं जिनमें मुख्य रूप से फ्रलक-फ्रलाम (रामजातक), ख्वाय थोरफी, पोम्मचक (ब्रह्म चक्र) और लंका नाई के नाम उल्लेखनीय हैं। ‘राम जातक’ के नाम से विख्यात ‘फ्रलक फ्रलाम’ की लोकप्रियता का रहस्य उसके नाम के अर्थ ‘प्रिय लक्ष्मण प्रिय राम’ में समाहित है। ‘रामजातक’ लाओस के आचार-विचार, रीति-रिवाज, स्वभाव, विश्वास, वनस्पति, जीव-जंतु, इतिहास और भूगोल का विश्वकोश है।5 राम जातक दो भागों में विभक्त है। इसके प्रथम भाग में दशरथ पुत्री चंदा और दूसरे भाग में रावण तनया सीता के अपहरण और उद्धार की कथा है। राम जातक के प्रथम खंड में लाओस के भौगोलिक स्वरूप और सामाजिक परंपराओं का विस्तृत वर्णन है।राम जातक के द्वितीय खंड में सीता-हरण से उनके निर्वासन और पुनर्मिलन की सारी घटनाओं का वर्णन हुआ है, किंतु सब कुछ लाओस की शैली में हुआ है। अन्य जातक कथाओं की तरह इसके अंत में भी बुद्ध कहते हैं कि पूर्व जन्म में वे ही राम थे, यशोधरा सीता थी और देवदत्त रावण था। 
बर्मावासियों के प्राचीन काल से ही रामायण की जानकारी थी। ऐतिहासिक तथ्यों से ज्ञात होता है कि ग्यारहवीं सदी के पहले से ही वह अनेक रूपों में वहाँ के जनजीवन को प्रभावित कर रही थी। ऐसी संभावना है कि लोकाख्यानों और लोकगीतों के रूप में रामकथा की परंपरा वहाँ पहले से विद्यमान थी, किंतु बर्मा की भाषा में रामकथा साहित्य का उदय अठारहवीं शताब्दी में ही दृष्टिगत होता है। यू-टिन हट्वे ने बर्मा की भाषा में रामकथा साहित्य की सोलह रचनाओं का उल्लेख किया है-1 (1) रामवत्थु (1775 ई. के पूर्व), (2) राम सा-ख्यान (1775 ई.), (3) सीता रा-कान, (4) राम रा-कान (1784 ई.), (5) राम प्रजात (1789 ई.), (6) का-ले रामवत्थु (7) महारामवत्थु, (8) सीरीराम (1849 ई.), (9) पुंटो राम प्रजात (1830 ई.), (10) रम्मासुङ्मुई (1904 ई.), (11) पुंटो रालक्खन (1935 ई.), (12) टा राम-सा-ख्यान (1906 ई.), (13) राम रुई (1907 ई.), (14) रामवत्थु (1935 ई.), (15) राम सुमरू मुइ (1936 ई.) और (16) रामवत्थु आ-ख्यान (1957 ई.)।
रामकथा पर आधारित बर्मा की प्राचीनतम गद्यकृति ‘रामवत्थु’ है। इसकी तिथि अठारहवीं शताब्दी निर्धारित की गई है। इसमें अयोध्या कांड तक की कथा का छह अध्यायों में वर्णन हुआ है और इसके बाद उत्तर कांड तक की कथा का समावेश चार अध्यायों में ही हो गया है। रामवत्थु में जटायु, संपाति, गरुड़, कबंध आदि प्रकरण का अभाव है।
रामवत्थु की कथा बौद्ध मान्यताओं पर आधारित है, किंतु इसके पात्रों का चरित्र चित्रण वाल्मीकीय आदर्शों के अनुरूप हुआ है। कथाकार ने इस कृति में बर्मा के सांस्कृतिक मूल्यों को इस प्रकार समाविष्ट कर दिया है कि वहाँ के समाज में यह अत्यधिक लोकप्रिय हो गया है। यह बर्मा की परवर्ती कृतियों का भी उपजीव्य बन गया है।
रामवत्थु का आरंभ दशगिरि (दशग्रीव) तथा उसके भाइयों की जन्म कथा से होता है। कथा की समाप्ति अपने दोनों पुत्रों के साथ सीता की अयोध्या वापसी से होती है।
मलेशिया का इस्लामीकरण तेरहवीं शताब्दी के आस-पास हुआ। मलय रामायण की प्राचीनतम पांडुलिपि बोडलियन पुस्तकालय में 1633 ई. में जमा की गई थी।1 इससे ज्ञात होता है कि मलयवासियों पर रामायण का इतना प्रभाव था कि इस्लामीकरण के बाद भी लोग उसके परित्याग नहीं कर सके। मलेशिया में रामकथा पर आधारित एक रचना ‘हिकायत सेरीराम’ तेरहवीं से सत्रहवीं शताब्दी के बीच लिखी गई थी। इसके अतिरिक्त यहाँ के लोकाख्यानों में उपलब्ध रामकथाएँ भी प्रकाशित हुई हैं। इस संदर्भ में मैक्सवेल द्वारा संपादित ‘सेरीराम’, विंसटेड द्वारा प्रकाशित ‘पातानी रामकथा’ और ओवरवेक द्वारा प्रस्तुत हिकायत महाराज रावण के नाम उल्लेखनीय हैं।
हिकायत सेरीराम विचित्रताओं का अजायब घर है। इसका आरंभ रावण की जन्म कथा से हुआ है। ‘हिकायत सेरी राम’ इसी प्रकार की विचित्रताओं कथाओं से परिपूर्ण है। यद्यपि इसमें वाल्मीकीय परंपरा का बहुत हद तक निर्वाह हुआ है, तथापि इसमें सीता के निर्वासन और पुनर्मिलन की कथा में भी विचित्रता है। सेरी राम से विलग होने पर सीता देवी ने कहा कि यदि वह निर्दोष होंगी, तो सभी पशु-पक्षी मूक हो जाएँगे। उनके पुनर्मिलन के बाद पशु-पक्षी बोलने लगते हैं। इस रचना में अयोध्या नगर का निर्माण भी राम और सीता के पुनर्मिलन के बाद ही होता है। फिलिपींस में रामकथा को नये रूप-रंग में प्रस्तुत की गई है। फिलिपींस की मानव भाषा में संकलित इक विकृत रामकथा की खोज की है जिसका नाम मसलादिया लाबन है। इसकी कथावस्तु पर सीता के स्वयंवर, विवाह, अपहरण, अन्वेषण और उद्धार की छाप स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होता है।
तिब्बत के लोग प्राचीन काल से वाल्मीकि रामायण की मुख्यकथा से परिचित थे। तिब्बती रामायण की छह प्रतियाँ तुन-हुआंग नामक स्थल से प्राप्त हुई है। उत्तर-पश्चिम चीन स्थित तुन-हुआंग पर 787 से 848 ई. तक तिब्बतियों का आधिपत्य था। ऐसा अनुमान किया जाता है कि उसी अवधि में इन गैर-बौद्ध परंपरावादी रामकथाओं का सृजन हुआ। तिब्ब्त की सबसे प्रामाणिक रामकथा किंरस-पुंस-पा की है।
किंरस-पुंस-पा की रामकथा का आरंभ शिव को प्रसन्न करने के लिए रावण द्वारा दसों सिर अर्पित करने के बाद उसकी दश गर्दनें शेष रह जाती हैं। इसी कारण उसे दशग्रीव कहा जाता है से होता है। यहाँ पर सीता रावण की पुत्री कही जाती है जिसका विवाह राम से होता है और अंत सीता सहित राम पुष्पक विमान से अयोध्या लौट गए जहाँ भरत ने उनका भव्य स्वागत किया। 
चीनी साहित्य में रामकथा पर आधारित कोई मौलिक रचना नहीं है। बौद्ध धर्म ग्रंथ त्रिपिटक के चीनी संस्करण में रामायण से संबद्ध दो रचनाएँ मिलती हैं। ‘अनामकं जातकम’ और ‘दशरथ कथानम’। ‘अनामकं जातकम’ का कांग-सेंग-हुई द्वारा चीनी भाषा में अनुवाद हुआ था जिसका मूल भारतीय पाठ अप्राप्य है। चीनी अनुवाद लिएऊ-तुत्सी-किंग नामक पुस्तक में सुरक्षित है।
‘अनामकं जातकम’ में किसी पात्र का नामोल्लेख नहीं हुआ है, किंतु कथा के रचनात्मक स्वरूप से ज्ञात होता है कि यह रामायण पर आधारित है, क्योंकि इसमें राम वनगमन, सीताहरण, सुग्रीव मैत्री, सेतुबंध, लंका विजय आदि प्रमुख घटनाओं का स्पष्ट संकेत मिलता है। नायिका विहीन ‘अनामकं जातकम’, जानकीहरण, वालि वध, लंका दहन, सेतुबंध, रावण वध आदि प्रमुख घटनाओं के अभाव के बावजूद वाल्मीकि रामायण के निकट जान पड़़ता है। अहिंसा की प्रमुखता के कारण चीनी रामकथाओं पर बौद्ध धर्म का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
‘दशरथ कथानम’ के अनुसार राजा दशरथ जंबू द्वीप के सम्राट बनने से कथा आरंभ होती है और कथा का अंत दशरथ के पुत्र लोमो के राजा बनने से होता है और लोमो के राजा बनते ही देश धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। कोई किसी रोग से पीड़ित नहीं रहा। जंबू द्वीप के लोगों की सुख-समृद्धि पहले से दस गुनी हो गई।
एशिया के पश्चिमोत्तर सीमा पर स्थित तुर्किस्तान के पूर्वी भाग को खोतान कहा जाता है जिसकी भाषा खोतानी है। एच.डब्लू. बेली ने पेरिस पांडुलिपि संग्रहालय से खोतानी रामायण को खोजकर प्रकाश में लाया। उनकी गणना के अनुसार इसकी तिथि नौवीं शताब्दी है। खोतानी रामायण अनेक स्थलों पर तिब्बती रामायण के समान है, किंतु इसमें अनेक ऐसे वृत्तांत हैं जो तिब्बती रामायण में नहीं हैं।
खोतानी रामायण की शुरुआत राजा दशरथ के प्रतापी पुत्र सहस्रबाहु वन में शिकार खेलने गए जहाँ से हुई और अंत लोकापवाद के कारण सीता धरती में प्रवेश कर गई। अंत में शाक्य मुनि कहते हैं कि इस कथा का नायक राम स्वयं वे ही थे।
चीन के उत्तर-पश्चिम में स्थित मंगोलिया के लोगों को रामकथा की विस्तृत जानकारी है। वहाँ के लामाओं के निवास स्थल से वानर-पूजा की अनेक पुस्तकें और प्रतिमाएँ मिली हैं। वानर पूजा का संबंध राम के प्रिय पात्र हनुमान से स्थापित किया गया है। मंगोलिया में रामकथा से संबद्ध काष्ठचित्र और पांडुलिपियाँ भी उपलब्ध हुई हैं। ऐसा अनुमान किया जाता है कि बौद्ध साहित्य के साथ संस्कृत साहित्य की भी बहुत सारी रचनाएँ वहाँ पहुँचीं। इन्हीं रचनाओं के साथ रामकथा भी वहाँ पहुँच गई। दम्दिन सुरेन ने मंगोलियाई भाषा में लिखित चार रामकथाओं की खोज की है।4 इनमें राजा जीवक की कथा विशेष रूप से उल्लेखनीय है जिसकी पांडुलिपि लेलिनगार्द में सुरक्षित है।
जीवक जातक की कथा का अठारहवीं शताब्दी में तिब्बती से मंगोलियाई भाषा में अनुवाद हुआ था। इसके तिब्बती मूल ग्रंथ की कोई जानकारी नहीं है। आठ अध्यायों में विभक्त जीवक जातक पर बौद्ध प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़़ता है। इसमें सर्वप्रथम गुरु तथा बोधिसत्त्व मंजुश्री की प्रार्थना की गई है और अंत राम दानव राज को पराजित कर अपनी पत्नी के साथ देश लौट गए, जहाँ वे सुख से जीवन व्यतीत करने लगे।
जापान के एक लोकप्रिय कथा संग्रह ‘होबुत्सुशू’ में संक्षिप्त रामकथा संकलित है। इसकी रचना तैरानो यसुयोरी ने बारहवीं शताब्दी में की थी। रचनाकार ने कथा के अंत में घोषणा की है कि इस कथा का स्रोत चीनी भाषा का ग्रंथ ‘छह परिमिता सूत्र’ है। यह कथा वस्तुतः चीनी भाषा के ‘अनामकंजातकम’ पर आधारित है, किंतु इन दोनों में अनेक अंतर भी हैं परंतु पुरी कथा लोक-जीवन मंे रची-बसी है।
श्रीलंका में भारतीय महाकाव्यों की परंपरा पर आधारित ‘जानकीहरण’ के रचनाकार कुमार दास के संबंध में कहा जाता है कि वे महाकवि कालिदास के अनन्य मित्र थे। कुमार दास (512-21 ई.) लंका के राजा थे। इतिहास में इनकी पहचान कुमार धातुसेन के रूप में की है।7 कालिदास के ‘रघुवंश’ की परंपरा में विरचित ‘जानकी हरण’ संस्कृत का एक उत्कृष्ट महाकाव्य है। इसके अनेक श्लोक काव्य शास्त्र के परवर्ती ग्रंथों से उद्धृत किए गए हैं। इसका कथ्य वाल्मीकि रामायण पर आधारित है।
सिंहली साहित्य में रामकथा पर आधारित कोई स्वतंत्र रचना नहीं है। श्रीलंका के पर्वतीय क्षेत्र में कोहंवा देवता की पूजा होती है। इस अवसर पर मलेराज कथाव (पुष्पराज की कथा) कहने का प्रचलन है।8 इस अनुष्ठान का आरंभ श्रीलंका के सिंहली सम्राट पांडुवासव देव के समय ईसा के पाँच सौ वर्ष पूर्व हुआ था।9 मलेराज की कथा के अनुसार राम विष्णु के अवतार हैं।
नेपाल में रामकथा का विकास मुख्य रूप से वाल्मिकि तथा अध्यात्म रामायण के आधार पर हुआ है। नेपाली काव्य और गद्य साहित्य में रामकथा पर बहुत सारी रचनाएँ हैं। नेपाल के राष्ट्रीय अभिलेखागार में वाल्मीकि रामायण की दो प्राचीन पांडुलिपियाँ सुरक्षित हैं। इनमें से एक पांडुलिपि के किष्किंधा कांड की पुष्पिका पर तत्कालीन नेपाल नरेश गांगेय देव और लिपिकार तीरमुक्ति निवासी कायस्थ पंडित गोपति का नाम अंकित है। इसकी तिथि सं. 1076 तदनुसार 1029 ई. है। दूसरी पांडुलिपि की तिथि नेपाली संवत् 795 तदनुसार 1674-76ई. है।10
नेपाली साहित्य में भानुभक्त कृत रामायण को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। नेपाल के लोग इसे ही अपना आदि रामायण मानते हैं। यद्यपि भानुभक्त के पूर्व भी नेपाली रामकाव्य परंपरा में गुमनी पंत और रघुनाथ का नाम उल्लेखनीय है। रघुनाथ कृत रामायण सुंदर कांड उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में लिखा गया। इसका प्रकाशन नेपाली साहित्य सम्मेलन, दार्जिलिंग द्वारा कविराज दीनानाथ सापकोरा की विस्तृत भूमिका के साथ 1932 में हुआ।
नेपाली साहित्य में प्रथम महाकाव्य रामायण के रचनाकार भानुभक्त का उदय सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटना है। पूर्व से पश्चिम तक नेपाल का कोई ऐसा गाँव अथवा कस्बा नहीं है जहाँ उनकी रामायण की पहुँच नहीं हो। भानुभक्त कृत रामायण वस्तुतः नेपाल का ‘रामचरितमानस’ है। भानुभक्त का जन्म पश्चिमी नेपाल में चुँदी-व्याँसी क्षेत्र के रम्घा ग्राम में 29 आसाढ़ संवत 1871 तदनुसार 1814 ई. में हुआ था। संवत् 1910 तदनुसार 1953 ई. में उनकी रामायण पूरी हो गई थी,11 किंतु कहा जाता है कि युद्धकांड और उत्तर कांड की रचना 1855 ई. में हुई थी।12
भानुभक्त कृत रामायण की कथा अध्यात्म रामायण पर आधारित है। इसमें उसी की तरह सात कांड हैं, बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किंधा, सुंदर, युद्ध और उत्तर। बालकांड का आरंभ शिव-पार्वती संवाद से हुआ है। युद्ध कांड में राम का अयोध्या प्रत्यागमन, भरत मिलन और राम राज्याभिषेक का चित्रण हुआ है।
जबकि उत्तरकांड में राम द्वारा लक्ष्मण के परित्याग के उपरांत उनके महाप्रस्थान के बाद कथा की समाप्ति हुई है।
इस प्रकार भानुभक्त कृत रामायण नेपाली भाषा की महान रचना है जो कालांतर में संपूर्ण नेपालवासियों का कंठहार बन गई। 
संदर्भ
1. रामकथा, पृ. 46
2ण् त्ंहीनअपत ंदक ल्ंउंउवजवए ज्ीम त्ंउंलंदं पद ब्ीपदंए च्च्ण् 27.30
3ण् ठंपसलए भ्.ॅ.ए ज्ीम त्ंउंलंदं पद ज्ञीवजंदए श्रवनतदंस व ि।उमतपबंद ैवबपमजलए टवस.59ए 1939ए च्च्.460.468
4ण् क्ंउकपद ैनतमदए ज्ण्ैण्ए ज्ीम त्ंउंलंदं पद डंदहवसपंए ज्ीम त्ंउंलंदं ज्तंकपजपवद पद ।ेपंए च्ण् 657 
5ण् त्ंहीअंदए टण्ए ज्ीम त्ंउलंदं पद ळतमंजमत प्दकपंए च्.24 
6ण् क्तण् श्रवदहए श्रण्ॅण्ए ज्ीम ेजवतल व ित्ंउं पद ज्पइमजए।ेपंद टंतपंजपवदे पद त्ंउंलंदंए च्ण् 163 
7ण् प्इपकए च्.173
8ण् त्ंहीअंदए टण्ए ज्ीम त्ंउंलंदं पद ळतमंजमत प्दकपंए च्.32
9ण् भ्ंतंए डपदवतनए त्ंउंलंदं ेजवतपमे पद ब्ीपदं ंदक श्रंचंदए ।ेपंद अंतपंजपवदे पद  त्ंउंलंदंए च्च्.347-48
10ण् भ्ंतंए डपदवतनए थ्मगजनंस जीमउम व ित्ंउंलंदं पद श्रंचंदए ज्ीम त्ंउंलंदं जतंकपजपवद पद ।ेपंए च्च्.341-45
11ण् ळवकानउइनतंए ब्ण्म्ण्ए त्ंउंलंदं पद ैतपसंदांए ज्ीम त्ंउंलंदं ज्तंकपजपवद पद ।ेपंए च्.445
12ण् प्इपकए च्.438
13ण् ज्पसंा ैपतपए श्रण्ए त्ंउंलंदं पद ैतपसंदां ंदक पजे विसा अमतेपवद
14ण् ळवकानउइनतंए ब्ण्म्ण्ए वच.बपज.ए च्.438
15ण् ठंदंतरममए छण्त्ए ज्ीम त्ंउंलंदं जीमउम पद छमचंसमम ।तजए ।ेपंद टंतपंजपवद पद त्ंउंलंदंए च्.155 
16. शर्मा, तारानाथ, नेपाली साहित्य का इतिहास, पृ. 32
17ण् ैंदातपजलंदंए ज्ञंउंसंए त्ंउंलंदं पद छमचंसपए ज्ीम त्ंउंलंदं ज्तंकपजपवद पद ।ेपंए च्ण् 368 
18ण् ैंदातपजलंदंए ज्ञंउंसंए वच.बपजए च्ण् 378


 


सुमन रानी
शोधार्थी, पी-एच.डी. हिन्दी
पंजीकृत संख्या: भ्लध्च्ीण्कण्;भ्पदकपद्धध् 15ध् 2017
शोध निर्देशक
प्रो. मन्जुनाथ एन. अंबिग
अध्यक्ष हिन्दी विभाग
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा
एरण्आकूलम (केरल)


 


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