बाल कविता      *बचपन* 
बाल कविता        *बचपन*  बचपन के दिन  कितने है हसीन ।  मजा नहीं आएं  दोस्तों के बिन ।।  नीर में ढूंढे रेत  खेलते ऐसे खेल ।  कभी मिट्टी आएं  कभी आएं रेत ।।  नीर में देख छवि  भरें किलकारी ।  घर बनाने की कर  रहें नन्हे तैयारी ।।       ✍️ गोपाल कौशल  नागदा जिला धार मध्यप्रदेश
लघुकथा शीर्षक-छठ व्रत
लघुकथा   शीर्षक-छठ व्रत ——————-   पूरा बाज़ार   छठमय  लग रहा  था | सूप  , फल  ,छठ  पूजा   के   सामान   से   गुलज़ार   था  |’ लौकी   कैसे   दिए   बाबू ? मलकिनी  ,’ अस्सी   रूपया  ‘ पीस | क्या ? तारा   जी   चौंक   गई | कुछ   कम   करो  , आदतन   तारा   जी   ने  , कम   कराना   चाहा  | छोड़ो   …
लोकोपकार मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य होना चाहिए – प्रो शर्मा  राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी में हुआ हमारे समय, साहित्य और संस्कृति के सरोकारों पर मंथन   
देश की प्रतिष्ठित संस्था राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना द्वारा नवरात्रि पर्व के समापन अवसर पर राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें देश के विभिन्न क्षेत्रों के विद्वान वक्ताओं ने भाग लिया। यह संगोष्ठी हमारा समय, साहित्य और संस्कृति के सरोकार पर केंद्रित थी। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि शिक्षाविद श…
Image
पहचान (कहानी)
उस रोज़ भी मैं बाकी दिनों की तरह वहाँ से गुज़र रहा था।पर आज वहाँ कुछ भीड़ लगी थी।मैंने एक दफा चलते-चलते ही झाँक के देखा पर रुका नहीं। आगे बढ़ा तो कानों में किसी की आवाज़ आयी, “बेचारा जवानी में ही बेमौत मारा गया।लगता है कोई अपनानहीं है इस बेचारे का। अब तक कोई लेने भी नहीं आया।दो घंटे से यहाँ लाश पड़ी है। …