Sunday, April 4, 2021

 




गुलाम और गुलामी

 गुलाम और गुलामी


हम जल रहे थे, तो कोई बचाने न आया |
अपने महल और मकान से |
उस वक़्त, वक़्त ने परिचय करा दिया हमारा...
एक इंसान को इंसान से |

सबके सब गुलाम हैं,
सफेद पोषाक चोरों की |
जिनके वस्त्र के नीचे काला धब्बा है,
वे क्या सुनेंगे औरों की |

सब गुलाम हैं, पर उन्हें यह एहसास नहीं है |
परिवर्तन की हवा, क्रांति लाने को तत्पर |
लापरवाहों को इस बात का,
फिर भी कोई परवाह नहीं है |

शासकों, अधिनायकों और तानाशाहों !
उन्हें गुलामी का एहसास इस कदर करा दो,
जिससे वे एक दिन स्वयं बोलें --
हमें स्वतंत्र होना है |


स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित रचना
~ महेन्द्र कुमार मध्देशिया
छात्र; दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर

विविध आयामी , ऐतिहासिक 21वीं सदी का उद्घोषक भाव चित्र" अंतर्राष्ट्रीय काव्य संकलन "आरंभ उद्घोष 21वीं सदी का' विमोचन।

 विविध आयामी , ऐतिहासिक 21वीं सदी का उद्घोषक भाव चित्र" अंतर्राष्ट्रीय काव्य संकलन "आरंभ उद्घोष 21वीं सदी का' विमोचन।

(देश- विदेश के 51 रचनाकार शामिल)



इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में शैल कला भवन में 2 अप्रैल 2021 को किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता की वरिष्ठ साहित्यकार, चिंतक ,व्याकरण विद डॉ प्रेम भारती जी ने की । अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा- इसमें एक चीज ऐड कर लेना


 कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ प्रेम भारती जी ने कहा -कविता में सकारात्मक चिंतन के साथ सामाजिक सरोकार होना चाहिए जो कि इस संकलन में सभी कविताओं में दिखाई पड़ता है। सभी कविताएं 21वीं सदी में परिलक्षित होने वाले विविध विषयों पर लिखी गई है और सकारात्मक दृष्टिकोण है। समस्याओं के उद्घाटन के साथ-साथ  समाधान का उद्घोष भी करती हैं।

 वही सारस्वत अतिथि एवं मुख्य वक्ता के रूप में महर्षि अगस्त्य संस्थान के निदेशक डॉ प्रभु दयाल मिश्रा रहे । अपना वक्तव्य देते हुए उन्होंने कहा - "21वीं सदी का ‘आरंभ उद्घोष’ करने वाले 51 रचनाकारों के साझा काव्य संकलन का सम्पादन करते हुये  कवयित्री अनुपमा अनुश्री यह पड़ताल करती चली हैं कि कृत्रिम बुद्धि विकास के इस काल खंड में कवियों की संवेदना कहीं मर तो नहीं गई ! उन्होने सारी दुनिया से समेटे अधिकांशत: युवा कवियों की तह में जाकर यह पूरा आश्वासन प्राप्त किया है कि कविता वेद की घोषणा के अनुसार ‘न ममार न जीर्यति’ – न तो मर सकती है और न ही क्षीण हो सकती है । संग्रह के अनेक वरिष्ठ कवि जैसे प्रेम भारती की रचनाओं में  'जीवन और प्रकृति', 'समाज और साहित्य' तथा बिम्ब और प्रतीक’  ऐसे अनेक प्रस्थान बिन्दु हैं जिनमें जहाँ इनकी काव्यशास्त्रीय पड़ताल है वहीं कवि की साधना तप्त वय के प्रकाश में हुई सत्य की कौंध की झलक भी विद्यमान है । अपनी बात रखते हुए कार्यक्रम के विशिष्ट अध्यक्ष ममता श्रीवास्तव ने कहा कि संकलन में रचनाकारों की सुंदर , स्तरीय रचनाएं हैं जो विभिन्न भावों में रंगी हुई इंद्रधनुषी छटा बिखेर रही हैं। इस संकलन को पढ़ना शुरू करते हैं तो रचनाओं के भाव रस में डूबते चले जाते हैं। एक अद्भुत संग्रहणीय और अनिवार्यतः पठनीय संग्रह है।
संस्था अध्यक्ष और इस साझा संकलन की संपादक अनुपमा अनुश्री ने कहा नैसर्गिक मौलिक और भाव प्रवण रचनाओं का चयन हुआ है। रचनाकार नहीं रचनाएं चयनित हुईं हैं। रचना खुद-ब-खुद संवाद करती है, परिचय देती है आपका।संकलन में इक्यावन रचनाकारों में  देश विदेश के ख्याति लब्ध, प्रतिष्ठित रचनाकारों के साथ साथ नवांकुरों की उत्कृष्ट ,नैसर्गिक रचनाएं शामिल हुई हैं।
 कई मायनों में अनूठे ऐतिहासिक साझा संकलन में शब्द, भावों  और संवेदनाओं की त्रिवेणी में आचमन है । कहीं भविष्य की आहटें, आशाओं की पदचाप तो कहीं व्यवस्थाओं की विसंगतियां दिखाई पड़ती हैं  वहीं क्रांति का शंखनाद है और राष्ट्रभाषा हिंदी  न बन पाने का विक्षोम  , सत्य का उद्घाटन है,  प्रेम का उद्घोष भी है। समाज को आईना दिखाती कहीं कोई भाव कृति ,तंज- कटाक्ष के कांटे हैं ,तो कहीं प्रकृति का मखमली संस्पर्श है , रिश्ते नातों की नाजुक डोर, सकारात्मकता के परवाज लेते हुए  विहग और अधुनातन समकालीन रचनाकारों की दृष्टि बिंब में नई सदी की अनुगूंज सुनाई पड़ती है। समस्याओं को महिमामंडित करती हुई दृष्टि  नहीं बल्कि समाधान परक दृष्टिकोण और नूतन सृष्टि है  अंतर्राष्ट्रीय साझा काव्य  संकलन "आरंभ उद्घोष 21वीं सदी का"  में। 21वीं सदी का उद्घोष करते तमाम विषय, मुद्दे संकलित हैं।

"आरंभ- उद्घोष 21वीं सदी का" एक झलक 

   संकलन में रचनाओं का आगाज ही डॉ उर्मिला मिश्र की रचना" उद्घोष" के साथ हुआ है। कोई मानसिक वृत्तचित्र नहीं, न कोई अवधारणा, केवल देह भी नहीं मैं... नारी उद्घोष करती हुई कहती है। वहीं समाज में बढ़ती विसंगतियां , अंधकार देख कह उठती हैं "चाहती हूं युद्ध"।

संकलन में शामिल हुए हैं भोपाल से वरिष्ठ साहित्यकार डॉ प्रेम भारती जी ने अपनी रचनाओं,  इच्छाधारी रावण, " वृद्धावस्था "और और जहन को आंदोलित करती "कुछ" के साथ वर्तमान सामाजिक परिदृश्य का बखूबी चिंतन और विश्लेषण किया वहीं डॉ .वीणा सिन्हा" फिर भी जीना लड़की", भ्रूण हत्या की कड़वी सच्चाई जताई वहीं  "जानना कि प्रेम सदाशिव है" और " मंगलकामनाएं मात्र शब्द नहीं "के माध्यम से अपनी प्रेम और, अध्यात्मिकता से परिपूर्ण अभिव्यक्ति कर रही हैं। बॉलीवुड केस५ प्रसिद्ध गीतकार कवि  जयपुर से इकराम राजस्थानी ,"मजदूर का लॉकडाउन",' बेटी हमारी बेटी", से अपनी अभिव्यक्ति को आवाज़ दे रहे हैं। 
 इस साझा काव्य संकलन की संपादक एवं  संस्था अध्यक्ष  अनुपमा अनुश्री ने "युवा शक्ति" द्वारा युवाओं  का आवाहन किया है , वहीं अपनी नारी अस्मिता पर केंद्रित रचना "पुरुषों की सोच पर विमर्श जरूरी" में पुरुषों की  अहंवादी सोच पर प्रहार किया है। "अनिंद्य सुंदरी "में इस  चारु ब्रह्मांड का  मायारूप  परिलक्षित हो रहा है वरिष्ठ साहित्यकार ममता श्रीवास्तव ने "अपना देश" में रा नेताओं के रंग दर्शाए हैं और आवाहन किया है जनता का "आओ! कुछ गीत नए गाओ" के साथ । मॉरीशस से डॉ. हेमराज सुंदर प्रतिरोध करते हैं- नहीं बनना मुझे आकाश, सागर ,पर्वत और हैदराबाद से संपत देवी मुरारका कहती हैं जो " जितना देता है जग में उतना ही पाता है।"कनाडा से सरन घई  कोरोना की दास्तान बखान करते हैं। भोपाल की वरिष्ठ साहित्यकार कोलतार कुमार कक्कड़ अपने काव्य में प्रिय और मन को संजोए हुए हैं " मन विहग "और "प्रिय तुमको पुकारूं" के माध्यम से।
कनाडा से सविता अग्रवाल प्रकृति की सुंदरता का "आभास" कर रही हैैं और पर्यावरण के लिए चिंतित होते हुए "पेड़ की आत्मकथा" कह रही हैं। उनकी प्रवास कविता में प्रवासी भारतीयों के दर्द का वर्णन है। मुंबई से कृष्ण गोपाल मानते हैं कि " पुरुष एक अधूरी कविता है" वही बांसुरी वाला में बांसुरी का  अध्यात्मिक विश्लेषण है जीवन के साथ। मुंबई से ही संगीता तिवारी 'आसमा' चुनौतियों के आगे हार नहीं मानूंगी का उद्घोष कर रही  हैं अपनी काव्य रचना "चुनौती" में और "बचपन" कविता में चित्रण है, बचपन के उम्र से पहले ही वयस्क हो जाने का, जिम्मेदारियों से ,परेशानियों, गरीबी और शोषण से।
 मुंबई से ही डॉ जितेंद्र पांडे सकारात्मकता का संचार करते हैं अपनी कविता के माध्यम से " उदास न हो साथी "और "मिट्टी" का महत्व बताते हैं ।
दिल्ली से डॉ. राजेश कुमार मांझी आधुनिक परिवारों के विघटन ,भटकन  को "दरार "कविता में अभिव्यक्त करते हैं वही भोपाल से उषा सोनी शब्द कितने अपने हैं  "शब्द" कविता में चित्रण करती हैं।
दिल्ली से हिरण विजयराव दुष्कर्म से पीड़ित "निकिता" पर  क्षुब्ध हो अपनी कविता कहते हैं वहीं नए दौर की स्त्री के तेवर, कलेवर और आकांक्षाओं को समेटा है अपनी कविता" नए दौर की स्त्री में "। डबलिन, अमेरिका से मनीष कुमार श्रीवास्तव "मानव आचार मेरा प्रमाण "और" दंभ कभी न आने देना" के साथ-साथ "धरती" कविता में पर्यावरण के लिए चिंतित हैं। इंदौर से डॉ शोभा जैन को "खोज आदमी की है " इस मशीनी  आधुनिक युग में । वही "स्त्री प्रश्न" में उन्होंने प्राचीन से अधुनातन अब तक स्त्रियों के प्रश्नों पर  जवाब मांगे हैं। डॉ माया दुबे गिरगिट की तरह बदलते चेहरों पर "मेरा चेहरा" द्वारा तंज कर रही हैं।
भोपाल से शालिनी बड़ोले "मेरी हिंदी" की महिमा गाते हुए उसे  ब्रज धाम की गोधुरि सी, मीरा के गिरधर की मिश्री सी , तुलसी की चौपाइयों सी बताती हैं और देती हैं " दोस्ती" की परिभाषा भी।
शोभा ठाकुर लॉक डाउन और पर्यावरण को चित्रित कर रही हैं। कैलाश अग्रवाल बेगाना  मुंबई से" इंसान" और "इस दुनिया में मेरा क्या है " देवार्चन" के माध्यम से इंसानियत और अध्यात्म को अभिव्यक्ति दे रहे हैं।  डॉ. ओरिना अदा "शक्ति स्वरूपा नारी" के रूपों को चित्रित कर रही हैं।

भोपाल से चरणजीत सिंह कुकरेजा "बेटियां होती है शिव के मोतियों सी" में बेटी के सुंदर रूप को और " बादलों की ओट से रिमझिम" में मां को मर्मस्पर्शी  कविता समर्पित कर रहे हैं।
साथ ही "शोहरत के लिए सजगता जरूरी" का संदेश भी दे रहे हैं। 

उन्नाव से जयप्रभा यादव ने "मैं अकिंचन सर्वहारा " में श्रम के महत्व को दर्शाया है और सुंदर , भावपूर्ण प्राकृतिक चित्रण है "तेरा ही वैभव ऋतुमाली "।
भोपाल से बिंदु त्रिपाठी नारी शक्ति के सर्वोपरि महत्व को स्वीकारते हुए नारियों का आवाहन कर रही  है" एक दीप अपने लिए भी जलाना " । नरसिंहपुर से इंदू सिंह इंदुश्री अपने दिल को आज के जमाने को देखते हुए हिदायत दे रही है कि " ए मेरे दिल"  दिमाग बन जा , वहीं खुशियां कितनी मुश्किल से मिलती है और समय कितनी तेजी से बीतता है " खुशियों का इश्तहार" ," और जीवन बीत गया " से अभिव्यक्त कर रही हैैं। मुंबई से सेवा सदन प्रसाद आक्रोशित हो कह उठे हैं, कब तक लड़ते रहोगे धर्म के नाम पर अपनी " देश "कविता में ।
भोपाल से कुमकुम गुप्ता अपनी बेटी को सिर्फ कल्पना में रहना  नहीं बल्कि हकीकत का आईना भी दिखाना चाहती हैं "चाहती हूं" कविता से । कैलिफोर्निया अमेरिका से डॉक्टर अनीता कपूर पत्र लिख रही हैैं  "स्वार्थी औलाद के नाम"  मां -बाप तुम्हारी छत हैं, न  भेजो उन्हें हाशिए पर! वही बीकानेर से रामचंद्र स्वामी " लॉकडाउन"  और" किसान की व्यथा " पर अपनी अभिव्यक्ति कर रहे हैं। 
भोपाल से श्यामा गुप्ता दर्शना प्राकृतिक सौंदर्य का दर्शन करा रही है "कल कल करती नदियां बहती" से। साथ ही "मैं पुस्तक हूं" पुस्तकों के महत्व को प्रदर्शित कर रही हैं। मधुलिका सक्सेना बसंत रंग में रंगी हुई सृष्टि देख रही हैैं अपनी कविता "प्रेम रंग" के द्वारा। जयपुर से फिरोज खान "आज के दौर" पर और मां की उजड़ी कौख पर "प्रश्न" पूछ रहे हैं।
नम्रता  सरन 'सोना' सूर्य का संदेश अपनी कविता "नियति' में दे रही हैं वही सामाजिकता के महत्व को दर्शाया है "सामूहिक तालमेल" में इश्क की अमरता "इश्क है जिंदा आज भी" 

दक्षिण अफ्रीका, तंजानिया के सूर्यकांत सुतार किस तरह सांप्रदायिकता की आग जलाकर "खैर मनाते हैं लोग"धार्मिक उन्माद पर और मधुर संवाद सखी का बांसुरी से "कान्हा की बांसुरी" में अभिव्यक्त कर रहे हैं। मर्मस्पर्शी काव्य रचना है" शहीद का अंतिम पत्र"

हमने मकान खरीदा है चलो इसे घर बनाते हैं" हमारा घर" कविता में शेफालिका श्रीवास्तव कहती हैं ,आवाहन करती हैं "उठो भारत के अमर सपूतों" नागपुर से जयप्रकाश सूर्यवंशी 'किरण' योग के महत्व को बताते हैं सबसे प्यारा- योग हमारा और शोर, आक्रोश, हिंसा, उपद्रव देखकर कहते हैं" मैं मौन हूं"
भोपाल से हेमंत देवलेकर कई बिंब  शोषण के अपनी कविता में देते हैं" माल गाड़ियों का नेपथ्य "से । भोपाल से कमल चंद्रा मथुरा के स्टेशन पर बेटे द्वारा छोड़ दी गई एक बूढ़ी मां की दर्द भरी दास्तान सुनाती है "स्टेशन पर बूढ़ी मां " के द्वारा।
लखनऊ से साधना मिश्रा नए जमाने की बेटियों को पर देने और  उड़ाने भरने की प्रेरणा देने हेतु सभी को उत्प्रेरित करती हैं "बेटियां" कविता में।वही गुरुग्राम हरियाणा से अंजनी शर्मा आज के दौर के इंसान को देखते हुए दुख मिश्रित आश्चर्य से रचती हैं "हाय! इंसान तू पाषाण हो गया!"।
 गया बिहार से राहुल आदर्श जिंदगी का फलसफा समझाते हैं "जिंदगी है क्या" में और गांव की सुंदर गोधूलि बेला का चित्रण "गोधूलि बेला गांव की"
वही आत्मविश्वास को आवाज देते हैं "हारा नहीं हूं मैं " के साथ । जबलपुर से रचना श्रीवास्तव समाज पर  कटाक्ष करती हैं कि बंदिशे कैसी कैसी !ऐतराज़ कैसे-कैसे ! सकारात्मक सोच के साथ" नयी सुबह" का इंतजार करती हैं। कासगंज उत्तर प्रदेश से पारुल बंसल एक" कविता- कवि संवाद" में सिखाती है कि कविता किस तरह से बोझिल हो गई है, पक गई है ,अशुद्ध, व्याकरण सम्मत न लिखने वाले अनगढ़ कवि से। वहीं रिश्ते नातों का महत्व बताती है "अपने तो अपने होते हैं "द्वारा। 

नागपुर से आरती सिंह एकता "मणिकर्णिका" घाट का सुंदर वर्णन करती हैं अपनी कविता में ,वहीं मनीषा व्यास इंदौर से अपनी कविता में कलयुग के दुष्प्रभाव को देखती हुई
 कहती हैं सृष्टि के रचनाधार " चुप न बैठो "और "गुरु की गरिमा" का बयां करती हैं। जिंदगी को हौसलों से आगे बढ़ाती हुई कहती हैं "आगे बढ़ती हूं" । लखनऊ से अलका निगम" घर एक सपना" में ईटों से बनी इमारत नहीं, बल्कि प्रेम और 
 अपनेपन से बनी हुई दीवारें देखती हैं जहां उनका भी नाम लिखा हो। मुंबई से अलका अग्रवाल सिगतिया "नहीं देखती वे सपने" में आजकल के दोगले व्यवहार पर पंच- कटाक्ष करती हैं। दिखावा और बनावट पर तंज कसती हैं। पुरुष सत्ता के दोगले व्यवहार और शोषण  घुटन से नारी को मुक्ति की प्रेरणा देते हुए वे  खोल रही हैं "खिड़की एक नयी सी ", वहीं मां की स्मृति में 'वादा करो न मां' एक हृदयस्पर्शी रचना। इसी तरह विभा रानी श्रीवास्तव स्वाभिमान में सचेत कर रही हैं समाज को  अन्याय और शोषण के विरुद्ध।
 इसी तरह की भाव भूमि पर रचित उत्कृष्ट,सुंदर, नैसर्गिक ,भाव प्रवण और प्रेरक रचनाओं का यह एक अत्यंत विलक्षण, संग्रहणीय और पठनीय  संकलन बन पड़ा है। कार्यक्रम का संचालन बिंदु त्रिपाठी द्वारा और आभार प्रदर्शन शालिनी बडोले द्वारा किया गया।

कविताएं

 ( १ )     हमारे वर्तमान की त्रासदी..


एक दिन थकी-हारी सी मैं
लौट रही थी
धीरे-धीरे
अपनी "कविताओं" में ,
सहसा, 
लगा कि कुछ तो है
जो छूट गया है
पीछे ही ,

फिर महसूस हुआ
"शब्द" थे तुम्हारे
..संग चल रहे थे
न जाने कब से !!

याद है न..
हम मिले थे
उस दिन
सदियों बाद 
प्रतीक्षारत.. भाव-विह्वल
पर, रहे निशब्द ही ,
कहते कुछ कैसे 
विवशताएं मेरी भी थीं
असमंजस में तुम भी थे !!

सुनों..
चलना होगा इसी अधूरेपन के साथ
और शायद, यही त्रासदी है हमारे वर्तमान की !!

( २ ) प्रतीक्षाएं खत्म कहां होती हैं..


दूर .. रेगिस्तान के ऊंचे टीले पर
आकाशोन्मुख
मुझे दिख जाती है
अक्सर
एक कविता
पानी का गीत गाते हुए !!

उसके गीतों में
ज़िक्र नहीं है कहीं भी
बादलों का ,
वह याद नहीं करती रह-रहकर
बारिशों को ,
भरी दोपहरी में भी
नहीं कोसा कभी उसने 
धूप को ,

उसे नहीं होता भ्रम
नदियों का
मृग मरीचिका की तरह ,

उसने कभी दोषी नहीं ठहराया
पृथ्वी को 
उसकी परिक्रमाओं के लिए ,

वह तो
भोली , अबोध बालिका सी
थामें है कसकर "प्रेम बीज"
मुट्ठी में ,
वह आलाप रही है
प्रेमाख्यान
कि प्रेम रहा तो
छाई रहेंगी हरियाली पृथ्वी पर !!

हांलांकि
प्रतीक्षाएं खत्म कहां होती हैं
वरन् बढ़ती रहती हैं वक्त के साथ-साथ ही !!


( ३ )     मैं फिर लौट आऊंगी..

मैं फिर लौट आऊंगी
धूप के उजास सी
कि करूंगी ढेरों मन भर बातें
उस जाती हुई ओस से भी
जिसके हिस्से में आती हैं सिर्फ रातें ही !!

मैं फिर लौट आऊंगी
पहली बारिश सी
कि सिमट जाऊंगी मिट्टी में
और होती रहूंगी तृप्त
उसकी सोंधी-सोंधी सी महक में !!

मैं फिर लौट आऊंगी
टूटे हुए तारे सी
कि सुन लूंगी हर एक दुआ
हर उस प्रेम-पथिक की
जिए जा रहा है जो "इंतज़ार" में ही !!

मैं फिर लौट आऊंगी
एक लाडली कविता सी
"खुशनुमा मौसम" की ही तरह
बस, बची रह सकूं इस बार
किसी तरह इस प्रलयकारी तूफान से !!


( ४ ) तुम भी बचाए रखना..

इतना कुछ तो "कहा"
पर, जैसे बाकी है अभी 
कहना बहुत कुछ ,
इस संक्षिप्त होते समय में
हर सांस
जैसे जोड़नी हों अभी 
कितनी ही बातों की कतरनें !!

साझा करनी है अभी
अनगिनत सिक्कों की कहानियां
जो छिपाकर रखी थी तुमसे
उस गुल्लक में ,
सुनों..
ये गुल्लक तो तुमको ही फोड़नी है ,

इस आंगन जितने आकाश में
जैसे बाकी हो अभी
बहुत कुछ देखना ,
सुनों..
हम-तुम संग देखेंगे वो टूटा हुआ तारा भी ,

सुनों..
मैं बचाए रखूंगी
थोड़ी सी धूप
वहां उस मुंडेर पर ,
तुम भी बचाए रखना
थोड़ी सी चांदनी
आकाश के उस कोने में !!


( ५ )     सफर है ये, कुछ तो छूटना ही था..


अलग फलसफे हैं हमेशा ही तेरे, सुन ऐ जिन्दगी ,
बटोरकर डिग्रियां भी यूं लगे कि कुछ पढ़ा ही नहीं !!

ये पता कि सफ़र है ये, कुछ तो‌ छूटना ही था कहीं ,
पर, "वही" क्यों छूटा, अब तक जो मिला ही नहीं !!

ये बात और है कि समझा ही लेंगे खुद को कैसे भी ,
मैं उसकी राह भी तकूं कैसे जिसको आना ही नहीं !!

अक्सर गुज़र जाती है जिंदगी रास्ते तय करने में ही ,
वो जो मिले हैं पहली दफा, लगे आखिरी भी नहीं !!

दोस्तों, कश्मकश का दौर ये बहुत लंबा है शायद ,
हक जताऊं कैसे, न वो पराया है, हमारा भी नहीं !!


नमिता गुप्ता "मनसी"
उत्तर प्रदेश,मेरठ

हास्य व्यंग्य- -कोरोना है कि मानता नहीं

 हास्य व्यंग्य-

-कोरोना है कि मानता नहीं
- मदन गुप्ता सपाटू

- बुरा हो जी इस कलमुहे   कोरोना का। दो साल से होली नहीं खेलने दे रहा। होली पर दूरियां मिटाई जाती हैं इसने उल्टा बढ़वा दी।   इसकी मेहरबानी से मुंह पर मास्क और दो गज की दूरी । हाय ! हाय !ये मजबूरी! इस बार होली पर  दो गज की दूरी से ,हमने बलम  पिचकारी जो उनको मारी.....पंगा पै गया। जब हम अपनी ‘ उनको’ जल्द बाजी में रंग लगा  आए तो बाद में पता चला कि जिस मास्कधारिका को रंग आए ‘वो’ , वो नहीं , उसकी मम्मी थी। हमें तो इस कोरोना के मार्च 20 टू मार्च 21 के इनडायरेक्ट इफैक्ट का अब पता चला कि कोरोना में बाबे के  काढ़े ने कैसे काया कल्प करके 50 की मम्मी को 25 की टम्मी बना दिया।
  कभी कभी हमारे दिल में भी ये ख़्याल आता है कि यह  कोराना ही है या किसी दिलजले का  दिल जो आज भी मानता ही  नहीं । हर रोज किसी न किसी, नए रंग में रंग जाता है। कभी मन की लहर बन कर दूसरी तीसरी लहर की तरह लहराने लगता है। बड़ा बहरुपिया है। कुछ दिनों बाद अपना सर नेम ही बदल लेता है। हर  हफ्ते    टीवी पर इसका नया नाम सुनाई देता है जो अगले  हफ्ते,    पिछला वाला भूल जाता है। जनता का मूड देखकर वायरस अपना वेरियंट बदल लेता है।कभी दूसरी लहर बन जाता है तो कभी तीसरी । और चौथी बनकर चौथा करवाने पर तुल गया है।  वैसे हमारे बहुत से पंजाबी और बंगाली भाईयों का तो आज भी यही मानना है कि कोरोना हुंदा ही नहीं । ये तो सरकारी स्टंट है। चुनाव जीतने का । अगर होता तो दिल्ली बार्डर पर क्यों नहीं दिखा ?  नन्दीग्राम क्यों नहीं गया ?
    जै हो कोराना बाबा। तुसीं ग्रेट नहीं, ग्रेटेस्ट हो, इतिहास में बिल्कुल लेटेस्ट हो।
   तुम  16 कला संपूर्ण हो । कितने रंग बदलते हो ? 2019 में कुछ थे । इसीलिए तुम्हारे अभिभावकों ने तुम्हारा प्याला सा नाम कोविड- 19 रख दिया। जैसे बीमारी न हो कार का मॉडल हो। मैच की तरह तुम टवेंटी - टवेंटी कहलाने लगे। बड़े नटखट हो। 2021 में नया रुप धारण कर लिया। तारक मेहता का उल्टा चश्मा बन गए। बस चले जा रहे हो ...चले ही जा रहे हो । हर हफ्ते एपीसोड में नया टविस्ट आ जाता है। बड़ी पालिटिक्स खेल रहे हो। पंजाबी में बोले तो - साडडे् नाल वडड्ा वितकरा कर रहे हो। जहां तुम्हारी पसंद की सरकार नहीं , वहां तबाही मचा रहे हो। सरकारें कन्फयूज्ड हैं कि लॉक डाउन का पंगा दोबारा लिया जाए या नहीं। या यूं  ही धमका धुमका के काम चल जावेगा! पंजाबी    पूछ रहें है- अस्सी कोई तेरे मांह पुटटे ने ?
   जहां भीड़ भड़क्का है, रैलियां है, वहां जाने से तुम्हें डर लगता है। पिस्सू पड़ जाते हैं। जो अच्छे भले लोग सोसायटियों, साफ सुथरी जगह आराम से बैठै हैं , वहां तुम उन्हें सीधे अस्पताल पहुंचा रहे हो । वैक्सीन लगवाने के बाद भी तुम गुर्रा रहे हो। कहीं ऑड - इवन का फार्मूला अपना रहे हो । संडे को जाउंगा...मंडे को नहीं। किसान रैली और चुनाव रैलियों से डर लगता है?।
    खैर ! तुम्हारे कारण कई पुराने पंसारियों , पुराने वैद्यों , नए कैमिस्टों की बंद किस्मतों के ताले खटाक से खुल गए। कइयों के फटाक से बंद हो गए। पिक्चर हाल वाले अपनी बेहाली पर आज तक रो रहे हैं। बड़ी कंपनियों के हाथ अलादीन चिराग छोड़ कर खुद खेलने लगा है। वैक्सीन वैक्सीन खेल रहा है। जनता को वैक्सीन, कोवी शील्ड , फाईजर वाली, तेरी वैक्सीन - मेरी वाली ,भाजपा वालीसजपा वाली , त्रिमूल वाली , हरी वाली या लाल वाली , किसकी वाली  खेल रही  हैं। मल्टी नेशनल कंपनियों को वर्क फ्राम होम  का फामूर्ला हाथ लग गया है। हींग लगे न फटकड़ी रंग भी चोखा। घर ही  दफ्तर , किराया कोई नहीं ।
 यह अलग बात है कि बच्चे एंज्वाय कर रहे हैं। मां बाप खुश हैं कि बरखुरदार के पहले 33 परसेंट आते थे अब 93 परसेंट आ रहे हैं। लफंडर से लंफडर भी मेरिट में आ रहे हैं। वो तो दुआ कर रहे हैं- कोरोना बप्पा मोरया अगले बरस तू जल्दी आ। मास्क और सेनेटाइजर वाले पार्टटाइम भैया भी यही चाहते हैं कि जुगाड़ चलता रहे।
     कोरोना तुम तो बाला जी के सीरियलों से भी आगे हो गए जिसकी कहानी वही रहती हेै पर हर हफ्ते एक टविस्ट आ जाता है। हर हफ्ते तुम्हारा भी नाम बदल जाता है पर काम वही रहता है।
       हां ! तुम्हारी कृपा से हर रोज फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया, अखबारों वगैरा में  जाने अनजाने , कभी कभी पहचाने लोग वैक्सीन लगवाते हुए फोटो खिंचवाना नहीं भूलते। इतने गर्व से फोटो खिंचवाते हैं मानो राष्ट्र्पति उन्हें अशोका हाल में सम्मानित कर रहे हों। कई तो पूछ रहें हैं भइया फोटू खिंचवाना भूल गए ....वैक्सीन असर तो करेगी न ? बेशक आधार कार्ड ले जाना भूल जाएं पर एक अदद कैमरा मैन या मोबाइल मैन को साथ ले जाना नहीं भूलते।
बहरहाल तुम कितनी जिंदगियों का लॉकडाउन कर चुके हो। पूरी दुनिया करोड़ों के नीचे आ गई है। कब अपना मुंह काला करवाओगे ? कोरोना तुम कब जाओगे ?
-- मदन गुप्ता सपाटू, मो- 9815619620

Wednesday, November 18, 2020

गलत और भ्रामक अनुवाद हिंदी माध्यम के परीक्षार्थियों पर पड़ रहा भारी






















भारतीय राजव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में सरकार के अलावा जिन संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है, उनमें चुनाव आयोग, उच्चतम न्यायालय आदि के साथ-साथ संघ लोक सेवा आयोग भी शामिल है। संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) का प्रमुख कार्य सिविल सेवा में नियुक्ति संबंधी विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं को संपन्न कराना है।



कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अन्य संवैधानिक संस्थाओं के मुकाबले यूपीएससी विवादों से मुक्त रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षो से यूपीएससी की परीक्षा पद्धति पर हिंदी माध्यम के परीक्षाíथयों द्वारा सवाल खड़े किए जा रहे हैं। यह परीक्षा हिंदी माध्यम के परीक्षाíथयों के लिए टेढ़ी खीर बनती जा रही है।


हिंदी अनुवाद को लेकर विवाद


दरअसल विभिन्न विषयों के प्रश्न-पत्र मूल रूप से अंग्रेजी में बनते हैं, फिर उनका हिंदी में अनुवाद किया जाता है। इन प्रश्नों के हिंदी अनुवाद को लेकर ही विवाद खड़ा हुआ है। पहले भी सामान्यतया प्रश्न-पत्र अंग्रेजी में ही बनते थे, फिर उनका हिंदी में अनुवाद होता था, लेकिन लगता है कि अनुवाद में अब तकनीक का ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है और इसीलिए गड़बड़ियां हो रही हैं।


अंग्रेजी की वाक्य रचना हिंदी से काफी अलग 


अनुवाद में तकनीक का उपयोग कई तरीकों से हो सकता है। एक तो मशीनी या कंप्यूटराइज्ड ट्रांसलेशन, जिसे गूगल ट्रांसलेशन भी कहते हैं। इसमें दिक्कत यह है कि इस अनुवाद में कई बार वाक्यों और शब्दों का सही अर्थ नहीं हो पाता। इसका कारण यह है कि अंग्रेजी की वाक्य रचना हिंदी से काफी अलग होती है।


अंग्रेजी वाक्यों के मशीनी ट्रांसलेशन में हिंदी में अर्थ कई बार स्पष्ट नहीं हो पाता






हिंदी की वाक्य रचना में कर्ता, कर्म और क्रिया का क्रम होता है (राम घर जाता है), जबकि अंग्रेजी में कर्ता, क्रिया और कर्म (राम गोज होम)। यह उदाहरण अत्यंत सरल और छोटे वाक्य का है, इसलिए इसे समझना कठिन नहीं, लेकिन जटिल और बड़े अंग्रेजी वाक्यों के मशीनी ट्रांसलेशन में हिंदी में अर्थ कई बार स्पष्ट नहीं हो पाता, जिसका खामियाजा हिंदी माध्यम के परीक्षार्थियों को भुगतान पड़ता है।


शब्दों के अर्थ का अनर्थ होने की आशंका 


मशीनी ट्रांसलेशन की दूसरी समस्या है कि शब्दों के अर्थ का अनर्थ होने की आशंका रहती है। इसका कारण यह है कि शब्दों के अर्थ अपनी संस्कृति और संदर्भ से भी निकलते हैं। उदाहरण के लिए कई बार अंग्रेजी के ‘बिग ब्रदर’ का अनुवाद ‘बड़ा भाई’ कर दिया जाता है।


 ‘बिग ब्रदर’ अंग्रेजी में नकारात्मक अर्थो में प्रयुक्त


समझना जरूरी है कि जॉर्ज ऑरवेल के प्रसिद्ध उपन्यास ‘1984’ से चर्चित; हुआ मुहावरा ‘बिग ब्रदर’ अंग्रेजी में नकारात्मक अर्थो में प्रयुक्त होता है, जहां इसका अर्थ है डराने-धमकाने वाला व्यक्ति या देश, जबकि इसके उलट भारत में बड़ा भाई का प्रयोग अत्यंत सकारात्मक अर्थो में होता है।


मशीनी या गूगल अनुवाद भ्रामक हो सकता है


भारतीय संदर्भो में बड़ा भाई संरक्षक और अभिभावक होता है। कहने का आशय यह है कि हिंदी या भारतीय भाषाओं में अनुवाद करते समय संदर्भ को ध्यान में न रखने से मशीनी या गूगल अनुवाद भ्रामक हो सकता है। इसी तरह का एक और उदाहरण है अंग्रेजी शब्द ‘हॉट पोटैटो’। इसका अर्थ होता है एक विवादास्पद विषय या असहज करने वाला विषय, लेकिन इसका गूगल ट्रांसलेशन ‘गर्म आलू’ मिलता है, जो कहीं से भी मूल अर्थ को संप्रेषित नहीं करता।


डिलीवरी शब्द का अनुवाद परिदान किया गया


अनुवाद में तकनीक के उपयोग से होने वाली गड़बड़ी का एक अन्य आयाम यह है कि यूपीएससी अथवा विभिन्न एजेंसियों के अनुवादक मानक शब्दकोशों जैसे कि गृह मंत्रलय के राजभाषा विभाग द्वारा जारी ई-महाशब्दकोश की जगह अन्य वेबसाइटों के आधार पर अनुवाद कर देते हैं। जैसे इसी साल सिविल सेवा के प्रारंभिक परीक्षा में पूछे गए एक प्रश्न में अंग्रेजी के डिलीवरी शब्द का अनुवाद परिदान किया गया है। राजभाषा विभाग द्वारा जारी ई-महाशब्दकोश के अनुसार इसका अर्थ वितरण या सुपुर्दगी है।



परिदान शब्द का अर्थ भी थोड़ा भ्रामक 


परिदान शब्द न केवल अप्रचलित है, बल्कि इसका अर्थ भी थोड़ा भ्रामक है। इसी तरह अंग्रेजी के सिनेरियो का अनुवाद दृश्यलेख कर दिया गया है, जो सही नहीं है। कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि अगर हिंदी अनुवाद गलत या भ्रामक है, तो परीक्षाíथयों को मूल अंग्रेजी पाठ देख लेना चाहिए, लेकिन प्रारंभिक परीक्षा में समय इतना कम होता है कि बार-बार हिंदी और अंग्रेजी, दोनों पाठों में मिलान करना मुमकिन नहीं।



अनुवाद में अर्थ का अनर्थ भी कर दिया जाता है


दुबरेध, अबोधगम्य और भ्रामक अनुवाद के अतिरिक्त कई बार अनुवाद में अर्थ का अनर्थ भी कर दिया जाता है। जैसे 2020 की ही प्रारंभिक परीक्षा में सिविल डिसओबेडिएंस मूवमेंट अर्थात सविनय अवज्ञा आंदोलन को असहयोग आंदोलन अनूदित कर दिया गया, जो नितांत गलत है। इन सबका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि हिंदी माध्यम के परीक्षार्थी पिछड़ते जा रहे हैं। गलत और भ्रामक अनुवाद के कारण न केवल उनके उत्तर गलत हो जाते हैं, बल्कि भ्रामक अनूदित शब्दावलियों में उलझकर परीक्षा के दौरान उनका सीमित बहुमूल्य समय भी बर्बाद होता है।



गलत अनुवाद अवसर की समानता से भी वंचित करता है


जिस कठिन परीक्षा में एक-एक अंक के लिए संघर्ष होता हो, जहां एक-एक क्षण मूल्यवान हो, वहां जटिल, भ्रामक, दुबरेध और गलत अनुवाद हिंदी माध्यम के लोगों को अवसर की समानता से भी वंचित करता है। पिछले कुछ वर्षो से हिंदी माध्यम से सफल होने वाले उम्मीदवारों की संख्या में जो खासी गिरावट आई है, उसका एक बड़ा कारण इस तरह के अनुवाद भी हैं। यूपीएससी को समझना होगा कि अच्छे अनुवाद के लिए जरूरी है कि मशीनी अनुवाद का न्यूनतम सहारा लिया जाए।



अनुवादक को विषय का भी सम्यक ज्ञान हो


साथ ही अनुवाद के इस बुनियादी सिद्धांत को ध्यान में रखा जाए कि अनुवादक को न केवल दोनों भाषाओं अर्थात स्रोत भाषा (जिस भाषा से अनुवाद किया जा रहा है) और लक्ष्य भाषा (जिस भाषा में अनुवाद किया जा रहा है) का ठीक-ठाक ज्ञान हो, बल्कि विषय का भी सम्यक ज्ञान हो। भ्रामक अनुवाद से हिंदी माध्यम के परीक्षाíथयों के साथ अन्याय हो रहा है, जो परीक्षा के उद्देश्य के विपरीत है। भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी, यूपीएससी जैसी प्रोफेशनल संस्था से यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है।


(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं) 














बाल कविता      *बचपन* 

बाल कविता

 

     *बचपन* 

बचपन के दिन 

कितने है हसीन । 

मजा नहीं आएं 

दोस्तों के बिन ।। 

नीर में ढूंढे रेत 

खेलते ऐसे खेल । 

कभी मिट्टी आएं 

कभी आएं रेत ।। 

नीर में देख छवि

 भरें किलकारी । 

घर बनाने की कर 

रहें नन्हे तैयारी ।।

 

    ✍️ गोपाल कौशल 

नागदा जिला धार मध्यप्रदेश 

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