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Friday, June 26, 2020

चरित्र छिपाते चेहरे


चरित्र छिपाते चेहरे

 

आजकल  उस  पर अपनापन  छाया है।

लगता है फिर चेहरे पर चेहरा लगाया है।।

 

उसके अपनेपन से,तूने हर बार धोखा खाया है।

क्या करें , उसने गिरगिट जैसा हुनर जो पाया है।।

 

वो जल से निश्छल रंग को भी बदल देता है।

उसने मयखाने की मय का हुनर जो पाया है।।

 

बता  मुझे  तू  कैसे बचेगा उसकी अय्यारी से,

उसके हुनर से तो आईना भी ना बच पाया है।

 

वो जो कहते है कि आईना झूठ बोलता ही नही,

उन्हें    जाकर    जरा    ये    समझा    दे    कोई,

झूठा मुखोटा चेहरे का,आईना भी ना हटा पाया है।

 

अब चैन से जीना है  तो तू भी रंग बदलना शीख ले,

सीधे-साधे लोगो को तो सबने बेवकूफ ही बताया है।

 

जो आजकल तेरे काँधे पर हाथ रख साथ चल रहा है।

ध्यान से देख,उसने  दूसरे  हाथ  मे  छुरा  छुपाया  है।।

 

किसी भी पल वो तेरी पीठ में छुरा घोप सकता है।

उसने हर बार की तरह  चेहरे पर चेहरा लगाया है।।

 

 

नीरज त्यागी

ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश ).


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Aksharwarta International Research Journal, February - 2023 Issue