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Saturday, April 24, 2021

आंँचलिक उपन्यास अंश __ ' पीर परबत -सी'

 ( उपन्यास अंश)

              पीर परबत - सी
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                  - भरत चन्द्र शर्मा

            रुपली के जीवन में बसंत आ चुका हैं। बसंत के आगमन के साथ ही हवाएँ खूब बसंती हो जाती हैं। सपने सतरंगे हो जाते हैं। देह की धरती पर न केवल फूल खिलते है बल्कि उन्मत्त भौंरों को आमन्त्रण भी देते हैं। देह की भाषा को क्या कहें, गूंगे का गुड़ ?संभवतः हाँ, संभवतः नहीं, न जाने कौन- से रसायन घुल जाते हैं कि वातायन का मौन आमंत्रण गंध के नाम होता है। आँखें भाषा के शब्दकोश को बहुत ही बौना कर कर देती हैं। एक चंचल और व्याकुल  हिरनी की तरह आँखें न जाने क्या, क्यों और किसे खोज रही होती हैं। कभी ओस की बूंद को, जो पत्ती पर ठहरती  और पत्ती  हवा के साथ हिलना बंद कर देती है, कहीं ओस की बूंद को कोई खरोंच न आ जाए। पलकों के भीतर कोई मधुर सपना बंद हो, तो वो भी झपकने से परहेज करने लगती हैं।
 रुपली की हय्योरण ( सहेली) कंकू का नोतरा क्या पडा  वो अपने सारे दुःख भूलकर आनंद के अतिरेक में हिलोरे  लेरही हैं। बचपन में ढेंगला - ढेंगली का खेल जिसके साथ खेलती थी उस चंचल , हँसमुख, मसखरी करने वाली कंकू का लगन गारा  प्रारंभ हो गया ।
     कंकू की देह पर हल्दी का उबटन लगाती महिलाएँ गा रही हैं 
       ' ओनी -ओनी लापी कंकू ने विवा में रांदी, ढोल ने ढमके पीटी सडावी।'
       रवे की गुड़ वाली लपसी बन रही हैं। कंकू को हल्दी लग रही हैं,ढोल बज रहा हैं।
     जब कंकू ने पाँव में तोड़े(पायजेब), गले में चाँदी की हंसुली, लाल टीपकी वाली ओढ़नी, नया घाघरा पहन कर गांवों के हाट-बाजार में जाने के लिए तैयार हो गयी। 
कंकू ने रुपली का हाथ पकड़ा
     चल मेरे साथ बाजार में , मैं काकी को बोल देती हूं ,आज वो भी नन्ना (ना) नहीं कर सकती हैं।
        हडकाया ( पागल) कुत्ता काटने से  असमय काल -कवलित नानजी हलवाहे की दुःखी बेटी रुपली जो रात-दिन कर्कश विमाता  के ताने उलाहनों से त्रस्त थी  ,उन्मुक्त आकाश में उडान को तैयार हो गई।
      हाट बाजार में कंकू के साथ लडकियों की टोली  - सोमली, मंगली, बुधी, वेस्ती -- 
 जो जिस वार को जन्मी वही उसका नाम, लेकिन रुपली तो बहुत रुपवती हैं सो यही नाम पड गया।
 विवाह और लगन गारे के दिनों में हाट बाजार नये लाड़े लाड़ियों से ठसाठस भरे हुए हैं।
दूल्हों की टोलियां  दुल्हनों को रोमांचित करती नाचती -गाती हैं - 
     'थावरी तारा पग मा रमजणियों रे पैजणियों वागे, हल कटुडी हल।'
   (पांव की पायजेब बज रही हैं, आगे बढो।)
      कंकू के संग उसकी टोली भी  खिल - खिलाकर हँसती हैं, लगता हैं अनारदाने झर रहे हों।
     रुपली -  कंकू तेरे हाथ में यह कटार क्यों हैं?
   कंकू - मेरी बा कहतीहैं ,यह कटार  गंदी हवा, बुरी नजर  से बचाती हैं।
रुपली - लाड़ो के हाथ में तलवार, लाड़ियों के हाथ में कटार -----------------
         विचारों में पड जाती हैं रुपली ,जाने कब आयेगा मेरा लाड़ा, ------
      कौन हैं उसका सपनों का राजकुमार ,कैसा होगा   उसका लाड़ा?
कुछ दिनों से रुपली को अपनी  विमात के स्वभाव में आश्चर्य जनक बदलाव नजर आ रहा हैं । रुपली के पास कभी नहीं खत्म होनेवाले इतने काम हैं जिनका कोई अंत नहीं हैं -   सौतेले भाई बहन की सार संभाल से लेकर वगडा (लकडी लाना) , चारा लाना, हवेली के खेत संभालना, चूल्हा चौका, नदी पर कपडे धोना, पानी लाना
 ऊपर से विमाता के कडुए बोल ताने
    पर आज तो विमाता की बोली में मिसरी घुली हैं ।
        रात को विमाता रुपली के माथे पर प्यार से हाथ फेर रही हैं -
      देख। बेटी आज तेरा बापू तो है नही। आई -बाप जो समझे मैं ही हूँ। रात-दिन यही विचार करती हूं, ऊपरवाला तेरी जोड़ी जमा दे। लड़का कमाता-धमाता हों,दाल रोटी का फांका न रहे। रुप रंग तो औरत का होता हैं  आदमी का क्या मर्दों जैसी कदकाठी हों, दो पैसा कमाता हो।
 थोड़ी साँस लेकर फिर बोली
                तेरी सब सहेलियाँ ब्याह कर ससुराल गई। अब तू ज्यादा दिन बैठी रही तो जोने पाणी की कन्या (शादी की उम्र पार कर चुकी लड़की) कहलाने लग जाएगी। रुप की रानी भी हैं तो लोग दूसरी शंकाएं भी करेंगे।
      हम इतने गरीब है कि शादी ब्याह कराने की हैसियत नहीं हैं। नातरा ही कराना पडेगा।
     हां नातरा पातरा ( कमजोर) नहीं हो, इसका ध्यान रखूंगी।
अनेक लड़के  वाले पूछ रहे हैं पर निठल्ले हैं। खूब विचार कर एक समझ में आया हैं, 'शंकरिया'  माही बांध पर चौकीदारी करता हैं।
   सो जा बेटी रामधणी सब अच्छा करेंगे।
आज रुपली के जीवन में भी अजनबी की तरह व दिन आ खडा हुआ।
आंगन में कुछ हलचल हो रही हैं, विमाता ने कहा आज ही पामणे (मेहमान) आ रहे हैं , ।जा ।नदी से नहाकर आजा
            रुपली  ने माही माता में अनेक दिए तैराये हैं, किधर कहां तक गए वो नहीं जानती।
          आज उसने स्नान करने से पहले मइ माता ( माही नदी) को प्रणाम किया।
  आज नदी शांत और गंम्भीर हैं। बापू बताते थे, एक बार बरसात में इतनी बाढ़ आयी थी कि बूढ़े बरगद तक को बहा ले गयी थी। क्यों बिफरती हैं नदी ,क्यों आती हैं बाढ़, जो बहा ले जाती हैं मकान, टापरे,खलिहान, मवेशी,इन्सान सब कुछ।
आखिर क्यों क्रुद्ध हो गई मई माता। सुना है माही माता पर बांध बांधा जा रहा हैं। माही माता को बंधन में बांधना कैसा होगा? लोग कहते हैं , जमीने चली जाएंगी, कोई कहता हैं, खूब हरेभरे हो जाएंगें खेत । धान से भर जाएंगे कोठार गोदाम। माही माता के पानी से बिजली पैदा होगी। आज तक तो आकाश में कड़कती बिजलियाँ ही देखी--------पानी से बिजली, पानी के भीतर बिजली। 
एक दिन बापू से पूछा भी था - क्या कभी बांध टूटते भी हैं
       बापू ने कहा था - मनक नी नियत में खोट आवी जाए तो नदी वकरी जाए ने बांद टूटी जाए।(  मनुष्य की नियत में खोट आ जाए तो नदी के बिफरने से टूटते हैं बांध)
 क्या वो स्वंय भी एक नदी हैं? क्या उस पर बाँध बांधा जा रहा है?नदी पर बांधा बाँध  नदी के नाम से जाना जाता हैं, पर स्त्री पर बांधा गया बाँध स्त्री के नाम से नहीं जाना जाता।नदी से निकली धाराएँ जो बंजर भूमि को सब्ज करती हैं,उसी नदी के नाम से जानी जाती हैं,पर स्त्री के गर्भ से पैदा हुई संततियां उसके नाम से नहीं जानी जाती। क्या नदी और स्त्री में कोई समानता हैं।
क्या बाँध शब्द प्रतीक हैं बंधन का? क्या पुरुष रुपी बाँध उसे अपनी  सीमाओं के भीतर बांधता हैं? क्या वह जीवन को अपने पक्ष में भरपूर दोहन और अधिकतम उपयोग करने की कला का नाम है?
 रुपली ने मन की नाव को अज्ञात दिशा में छोड़ दिया।श्रद्धाभाव से  माही माता को प्रणाम कर  गजगामिनी की तरह अपने गंतव्य टापरे की तरफ लौटने लगी। संभवतः टापरा भी नातरे के माध्यम से उसकी मार्मिक विदाई की प्रतीक्षा कर रहा होगा।  कंकू के लगन से इस नातरे में जमीन आसमान का फर्क हैं।
    एक आह उठी रुपली के मन में काश, आज मेरा बापू जीवित होता।
नदी से लौटती हुई रुपली आगे की रस्म अदायगी संकेत समझ चुकी थी। रास्ते में खडा था महुआ वन उसकी कटू स्मृतियों में कालिये की नादानियाँ,छेडखानियां थी। सुना हे वो रुपली को हर कीमत पर खरीदने का प्रण लेकर ढेर सारा रुपया कमाने खाड़ी देशों में गया हैं।
      दूर से दिख रही हैं ठाकुर साहब की हवेली  ,जिनका हाली था उसका बापू मनजी।  उसे याद आरहा हैं , छोटे बाई साहब का घियोरी आणा( पहली जच्चगी के बाद की विदाई) ,जब वो हवेली में काम करने गई थी।
 ठाकुर साहब का छोटा बेटा अभय जो उसका हमउम्र ही था, उसकी भानजी को विचित्र प्रकार के खिलौने से खेला रहा था। एक नीली आंखों वाली गुडिया जिसके बाल बहुत लंबे थे,उसमें चाबी भरने से वो गुड़िया चलती थी ,मुंह हिलाती थी। अभय ने वो गुड़िया रुपली को भी खेलने दी तो आंखों ने अनायास मौन की नई भाषा रच दी। 
बहुत बाद में पता चला ठाकुर साहब ने अभय को बहुत बडा आदमी बनाने पढ़ने के लिए विलायत भेज दिया हैं।
        स्मृतियों को छिटककर रुपली एक चाबीवाली गुडिया की तरह टापरे पर लौट आई।
       विमाता ने बताया मेहमान आगये हैं  ,आंगन में जीमण चल रहा हैं, तू अब लाड़ी बन रही हैं घूंघट निकाल ले।
 विदाई के मार्मिक क्षणों में   छोटे भाई बहनों के रुदन के साथ अनेक प्रश्न थे, जीजी कहाँ जारही हैं,क्यों जारही हैं?
       अश्रुधारा के बीच जीजी बमुश्किल कह पा रही थी - जल्दी ही आऊँगी।
 पता नहीं नीम के पेड की पत्तियां हिल रही थी या रो रही थी।
     एक ऊपर से ढकी हुई बैलगाड़ी खडी थी जिसमें  मेहमानों के साथ आई किसी लुगाई ने रुपली का हाथ थाम कर  गाडी में चढ़ाया। आगे कोई तीन आदमी थे जिसमें एक बैलगाड़ी हांक रहा था। यही पालकी है, यही डोली हैं, बैल ही कहार हैं।   यह बैलगाड़ी माही डेम के मजदूरों की कच्ची बस्ती की दिशा में चल पडी। अस्ताचलगामी सूर्य के साथ  बैलगाड़ी अपने गंतव्य पर पहुंची। नववधू बनी रुपली का ध्यान भंग हुआ। साथ आयी महिला ने सहारा दे कर नीचे उतारा टीन शेड के मजदूरों की खोली के बाहर खड़े रहने का संकेत किया। उसका प्रतीकात्मक द्वाराचार हुआ। पडौस की उत्सुक लुगाइयाँ  फुसफुसा रही थी
      ' हंस के गले में कागला बांध दिया।'
साथ वाली महिला ने सबको दूर हटाया
रुपली ने अनुमान लगा लिया बापू के घर में खुली पडसाल और नीम का पेड हैं यहाँ धणी का घर बंद संकरी खोली हैं। साथ वाली महिला ने उसे भीतर चटाई पर बिठाया। गुड की डली खिलाकर मुंह मीठा कराया।
     आज तेरी पहली रात है, सगुन करा रही हूं। उम्र में तो मैं बडी हूं, मेरा नाम बुदी हैं पर रिश्ते में तू बडी हुई , मेरी जेठानी हुई। अब हम गांव जाते हैं ,तेरा देवर बाहर खडा है। जेठ जी आते ही होंगे अब वो ही तेरे धणी हैं,रामधणी  हैं जो भी समझे ।
         खोली में कन्दील की मरियल रोशनी अन्तिम चरण में हैं।
 सुहाग रात, मधुयामिनी, मधुर मिलन जैसी शब्दावली  से अनभिज्ञ रुपली  आज उसी रात की चौखट पर खड़ी है। आत्मिक, शारीरि मिलन, देह यात्रा का प्रथम पडाव यह सब कुछ तो यात्रा के अनुभव और परिणाम से तय होगा। पर्वत के शिखर से जब किसी नदी का प्राकट्य होता हैं,उसे भी अपने यात्रा पथ का कोई ज्ञान नहीं होता है। सबकुछ भावी के गर्भ में रहस्य की तरह छुपा होता हैं। आखिर  वह किसमें मिलने को  हाँफती-काँपती दौड़ती हैं? कहाँ जाकर रुकेगी, कहाँ जाकर सुखेगी, कहाँ जाकर  बिखरेगी, कहाँ जाकर बंधेगी, किन अस्थियों को गलाएगी या स्वंय सूख खर कंकाल हो जाएगी, देह यात्रा, बाँध, नदी क्या इन सबमें कोई अन्तर्सम्बन्ध हैं, क्या जीवन देह गाथा है?
     विचार मग्न रुपली कभी कंकू के अनुभवों से रोमांचित होती हैं तो दूसरे ही पल विमाता के संभावित षड्यंत्रों से आशंकित होती हैं।
 उसके पति ने उसका घूंघट उल्टा, ठुड्डी पर हाथ रखा और एकदम चहक उठा-  'अरे वा। तू तो बहुत ही खूबसूरत हैं। मैने तो आज तक तेरे जैसी सुन्दर स्त्री नहीं देखी। जितना बताया था ,उससे भी कहीं ज्यादा सुन्दर निकली तू तो।
रुपली का मुख मंडल थोड़ा ऊपर उठा। उसने देखी - ' बड़ी भद्दी मुखाकृति, अधेड़ आदमी की भीमकाय थुलथुली काया।' भारी -भरकम काया से  बिस्तर पर बहते पसीने के रेले, मुंह से उठी मउड़ी की दुर्गंध।
      रुपली के मुंह से एक आह निकली -
        तू   शं  क रि या ------
  ' हाँ, हाँ, मैं ही शंकरिया हूँ, तेरा धणी ......।'
 शंकरिया की विभत्स हँसी में  उसके काले आबनूसी चेहरे पर चमकती श्वेत दंत पंक्ति स्पष्ट  दिखाई दी।
' अब तू पूछेगी, कानिया कौन हैं?' मैं ही कानिया हूँ। यह देख मेरी एक आंख बचपन से फूटी हैं।' फूटी आँख रुपली को दिखा दी, बचपन से छोरे ' काणिया- काणिया ' कह कर चिढ़ाते थे, सो दूसरा नाम हो गया कानिया। कभी कानिया आगे खड़ा हो जाता हैं, कभी शंकरिया। तू जिसमें खुश हो , वो ही मान ले। नाम पीछे रह गया , अब मैं रुप की राणी का धणी हूं, पर चोरों का राजा नहीं हूं।  म़ै तुझे किसी धोखे में नहीं रखूँगा। यदि तुझे लगता हैं कि तेरे साथ धोखा हुआ है तो वो तुझे तेरी माँ ने दिया हैं। सत्य कडुवा एवं नंगा होता हैं।
 मैंने तेरे साथ सात फेरे ले कर विवाह नहीं किया है, न ही मैं तुझे भगाकर लाया हूँ। तेरी माँ ने मेरे साथ तेरा नातरा कराया हैं। तेरे रुप जोबन को देखने के लिए हजार आंँखें भी कम पड़ती हैं, मेरे पास तो एक ही आँख हैं।
     शंकरिया की वो आँख ज्यादा खुलने लगी -   
     मेरे कोई औलाद थी नहीं। बयालीस बरस की उमर में जब उम्मीद जगी थी तो मैं खुशी के मारे बावला हो रहा था। मेरी लुगाई जब औलाद जनने अस्पताल गई तो जापे में न लुगाई बची न औलाद। भगवान ने निवाला दे कर थाली सहित निवाला  छीन लिया। मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा हिम्मत हार कर बैठ गया। बयालीस साल के अधेड़ ,भद्दे , बदसूरत आदमी को कौन लड़की देता।      पर वाह। रे ऊपरवाले तेरी माया , जो एक हाथ से लिया दूसरे हाथ से छप्पर फाड़कर दे दिया, तभी तो गौरी -चिट्टी  रुपली मेरे सामने बैठी हैं।
मेरा बाप जो इसी खोली में रहता था, यहीं चौकीदारी करता था, संभवतः उससे मेरा दुःख देखा न गया। दारु पी कर नशे में बीच रास्ते ट्रक के नीचे आ गया ।उसका माथा फूट गया, पर मौताणे में मुझे अपने हिस्से के पचास हजार  रुपये मिले, वो ही कड़क-कड़क नोट तेरी माँ के हाथ में दिये।अनपढ़ है पर चार बार गिनकर लिये, तब तेरा नातरा मेरे साथ करने को मानी।देख तेरे ससुर का भूत यहीं कहीं होगा। बेटे की बहू को आशीर्वाद दे रहा होगा।

 तू चिन्ता मत कर। मैं पियक्कड़ ,शराबी नहीं हूं।वार -तेवार पर कभी-कभार एकाध घूंट ले लेता हूं, वह तो आज छोटे भाई ने जिद कर पिला दी, कह रहा था- 
           'पुराने सदमे से उबर कर नयी भाभू के साथ नयी जिन्दगी शुरु कर।'

रुपली  जम कर  एकदम बर्फ होती जा रही हैं, उसको पग-पग पर धोखे  मिले  हैं, क्या शंकरिया कोई अचूक शिकारी हैं, अचूक निशाने के वक्त प्रायः  शिकारी की एक आँख बंद हो जाती हैं, कानिया ऊर्फ शंकरिया ने पेड़ों की ओट में छिपकर  क्या अपना वांछित शिकार कर लिया, क्या इस युद्ध का वो स्वघोषित विजेता हैं।  
        एक सिहरन से जब रुपली के पांव की रमजोड़ ( चांदी का आभूषण) के घूंघरू स्पन्दित हुए तो शंकरिया के मन में अनेक घंटियाँ एक साथ बज उठी।
 डेर-पेर( चेतना शून्य) रुपली के दुस्वप्न में बाज के पंजों के भीतर फड़फड़ाता कबूतर हैं।वो किंकर्तव्यविमूढ़ होकर  कभी मरे भूत को देखती हैं तो कभी जिंदे भूत को जो धणी के स्थान पर कोई कसाई लग रहा हैं। इस रात्रि को वो किसके नाम का रंडापा रुदन करे, उसका धणी तो उसके सामने बैठा हैं, जैसे यम का दूत किसी द्वार से आत्मा को देह से चुरा लेना चाहता हैं।
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 रश्मि प्रकाशन लखनऊ से सद्य प्रकाशित उपन्यास ' पीर परबत- सी' का एक अंश
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   -भरत चन्द्र शर्मा, बाँसवाड़ा राजस्थान

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