Monday, March 23, 2020

 कब तक ,क्यों , किसलिए !!

 कब तक ,क्यों , किसलिए !!


आदि काल से नकारात्मक शक्तियों का अस्तित्व रहा।पौराणिक काल में इन्हें दानव, दुष्ट ,राक्षस कहा गया और इन आसुरी शक्तियों पर विजय बुराइयों पर अच्छाइयों की प्रतीक बनी ।साहित्य तो हमेशा ही वह आवाज़ बना जो शासकों को सही दिशा निर्देश दे , जनहित की ओर प्रेरित करे ।समाज की विसंगतियों, बुरी प्रवृत्तियों को दूर करने हेतु जन संचेतना पैदा करें ।अपनी प्रखर लेखनी से झकझोर दे,आंदोलित कर दे ,ऊर्जा का ऐसा प्रवाह कर दे ,कि हर व्यक्ति अपनी सही भूमिका निभाने हेतु उत्साहित, आतुर हो उठे।


लेखनी सिर्फ़ श्रंगार के गीत न गाए ,ज़रुरत पड़ने पर आग उगलती तलवार बन जाए,और शब्दों की मार से कोई न बच पाऐ।
बहुत सारे उदाहरणों से हम परिचित हैं जहां कवि दरबार में बैठे मखमली शब्दों की माला गूंथ कर गीतों की महफ़िल ही नहीं सज़ा रहे बल्कि कुशल योद्धा की तरह रणभूमि में उतरे,और बड़े बड़े क्रांतिकारी परिवर्तनों का इतिहास साक्षी है।
हर दौर में नकारात्मक शक्तियां भिन्न-भिन्न रुपों में सामने आती रही हैं। आधुनिक काल में भी नक्सली , आतंकवादी , उग्रवादी नामों से हमारे सामने खड़ी हैं और गाहे-बगाहे निर्दोष लोगों को इनका शिकार होना पड़ता है , जो सिर्फ़ एक सवाल उत्पन्न करता है कि अच्छाई, सच्चाई कमज़ोरी है !! नहीं ! "बुराइयां तभी तक मुखर हैं ,जब तक अच्छाइयां मौन हैं" । सवाल यहां भी है कि क्यों मौन हैं, पस्त हैं ! रुग्ण हैं!! क्यों नहीं अपनी समस्त ऊर्जा और शक्ति के साथ इन आसुरी शक्तियों का फन नहीं कुचल देते! क्यों और कब तक तमाशबीन , मूकदर्शक हैं !! क्यों अलमस्त हैं अपने आनंद में कि निर्दोष लोगों का ख़ून बहते देख , अन्याय का शिकार बनते देख, ख़ून नहीं खौलता!! क्यों मौन रह मूक समर्थन दे , अन्याय में शामिल है! क्यों पलटवार करके एक स्वस्थ, सुरक्षित समाज की स्थापना में योगदान नहीं देते!!


कविवर दिनकर जी की कुछ पंक्तियां उद्घृत करती हूं ।
" कहता हूँ¸ ओ मखमल–भोगियो।
श्रवण खोलो¸
रूक सुनो¸ विकल यह नाद
कहां से आता है।
है आग लगी या कहीं लुटेरे लूट रहे?
वह कौन दूर पर गांवों में चिल्लाता है?


जनता की छाती भिदें
और तुम नींद करो¸
अपने भर तो यह जुल्म नहीं होने दूँगा।
तुम बुरा कहो या भला¸
मुझे परवाह नहीं¸
पर दोपहरी में तुम्हें नहीं सोने दूँगा।।


हो कहां अग्निधर्मा
नवीन ऋषियो? जागो¸
कुछ नयी आग¸
नूतन ज्वाला की सृष्टि करो।
शीतल प्रमाद से ऊंघ रहे हैं जो¸ उनकी
मखमली सेज पर चिनगारी की वृष्टि करो।


गीतों से फिर चट्टान तोड़ता हूं साथी¸
झुरमुटें काट आगे की राह बनाता हूँ।
है जहां–जहां तमतोम
सिमट कर छिपा हुआ¸
चुनचुन कर उन कुंजों में
आग लगाता हूँ।


आज भी अन्यायियों, अत्याचारियों, आतंक का जहर उगल रहे आतंकवादियों को उनकी सही जगह दिखाना ,करारा सबक़ सिखाना, मुंह तोड जवाब देना ज़रूरी है।
" अन्याय,अत्याचार देख, रहे ख़ामोश ।
मेरे देश में ऐसी, जवानी न रहे।
दुश्मनों की जड़ें, हिला दे जो,
ख़ूं वह ख़ूं हो , पानी न रहे।


@अनुपमा श्रीवास्तव 'अनुश्री'


 


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