हैसियत (कहानी)

 बारिश... जोरों से गिरी। सभी तरफ पानी ही पानी...। मजदूर लोग परेशान थे। इसी समय नदी को बाढ़...। नजदीक बाँध होने के कारण पानी गाँव में घुसा। गाँव पानी में मिला। पानी बढ़ रहा था, लोगों की धड़कन बढ़ रही थी। अनाज भी खत्म हुआ। भूखमरी शुरू हुई। पानी के कारण दूसरे गाँव से संपर्क तुटा। गाँव की स्कूल, बिजली बंद हो गई। बड़े लोग गाँव छोड़कर सुरक्षित जगह जा रहे थे, लेकिन गरीब वही गाँव के स्कूल में रहने लगे। वो जी तो रहे थे, लेकिन लाश बनकर...।
 माँ.... क्या कर रही हो? कुछ नहीं बेटा सोच में हँू कि तेरी जिं़दगी कैसी होगी। तुझे पढ़ना है...। लेकिन मैं पढ़ाऊंगी क्या? तु भी ना.... माँ। ऐसा क्यों सोचती हो? हमारी बस्ती में प्रशांत, हीरा भी तो सामान्य परिवार से हैं, वह भी तो पढ़ रहे हैं। वो मेरे अच्छे दोस्त बने हैं। उनके विचार और मेरे विचारों में साम्य है। उनके साथ मैं पढूँगा। अब तो सो जाओ ना माँ...। लेकिन रमेश बेटा? माँ... 
 ‘‘प्रशांत...‘‘
‘‘हाँ... बोल¨ रमेश...।‘‘
हमंे पढ़ना हैं खुद के लिए नहीं माँ-बाप के सपनों के लिए....। पढ़ने के लिए पैसा ही सब कुछ नहीं, हिम्मत होनी चाहिए वह हमारे पास हैं। हम काम करके पढ़ाई करेगें। आर्थिक स्थिति बिकट हो तब भी...। हमारे माँ-बाप का संघर्ष व्यर्थ नहीं जाने देगें। हीरा भी हमारे साथ है। 
 हीरा नववीं कक्षा तक की पढ़ाई हो गई क्योंकि अध्यापक अच्छे थे इस कारण...। दसवीं कक्षा के लिए बोर्ड परीक्षा है। परीक्षा केन्द्र भी दूर। इस कारण अभी से तयारी करनी पढ़ेगी। पढ़ाई की भी... और पैसों की भी...। हाँ... सही है रमेश।
 हीरा हमारी दसवीं कक्षा की पढाई होगी क्या? क्यों नहीं होगी रमेश... जरूर होगी। हार मत मान। सुल सर जी का प्रोत्साहन भी तो हमारे साथ हैं। हमें सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देना है।
 ‘‘रमेश जल्दी चलो सुल सर इसी रास्तें से जाते है।‘‘ 
 ‘‘हाँ... चल-चल।‘‘
 ‘‘रमेश... पढ़ाई पर ध्यान दो।‘‘
 ‘‘हाँ... सर जी।‘‘
 ‘‘कोई जरूरत पढ़े तो बताना रमेश।‘‘
‘‘जरूर सर जी।‘‘
 हीरा दसवीं की परीक्षा तो नजदीक आई। परीक्षा केन्द्र भी दूर... दस-बारह पेपर... इतने दिनों का खर्चा...। रमेश इसके बारे में मत सोचो। रास्ता निकलेगा। 
‘‘हीरा...‘‘
‘‘बोलो रमेश।‘‘
 हम परीक्षा के कुछ दिन पहले कपास गाड़ी में भरने का काम करेंगें। कुछ पैसा मिल जाएगा। खर्चा भी निकलेगा। जो तुझे सही लगे रमेश। चल प्रशांत से मिलते है।
 प्रशांत कल पेपर है आज ही हाॅलटिकट लाना होगा। हाँ रमेश जाएॅंगें। नही... अभी चल सर इसी रास्तें से गुजरते है।
‘‘रमेश..‘‘
‘‘हाँ... सर...‘‘
‘‘कहाॅं घुम रहें हो। कल पेपर है न, हाॅलटिकट नहीं लेना है क्या? 
‘‘लेना है सर जी।‘‘ 
‘‘रमेश आपकी आँखें इतनी लाल क्यों? रात को ज्यादा पढ़ाई की।‘‘ 
‘‘हाँ... सर जी।‘‘
‘‘परीक्षा केन्द्र पर जाने के लिए पैसे है ना...।‘‘
‘‘हाँ, है सर जी।‘‘
‘‘नहीं होते तो आपको ही माँगता।‘‘
‘‘रमेश...।‘‘
‘‘हाँ... प्रशांत।‘‘
‘‘आपने सुल सर जी को झूठ क्यों बोला?‘‘ 
‘‘क्या?‘‘ 
‘‘वही रातभर पढ़ाई।‘‘
‘‘प्रशांत हम किसी के लिए बोझ नहीं बनना चाहते।‘‘
‘‘चल... चल... बस्स कर। कल पेपर है...।‘‘
 पेपर अच्छी तरह से गए। सिर्फ रिजल्ट की राह देख रहे थे। देखते-देखते समय कैसे बिता पता नहीं चला। जिस दिन की राह देख रहें थे, वो दिन भी आया। दसवीं का रिजल्ट घोषित हुआ। दिल की धड़कन बढ़ने लगी। हम पास होंगें क्या? यह चिंता सता रही थी। हीरा पास हुआ। लेकिन जो नहीं होना था वही हुआ। प्रशांत परीक्षा में असफल.... । दसवीं कक्षा में नापास। परिस्थिति ने तो साथ नहीं दिया... और वक्त ने भी नहीं। उसे बहुत समझाया लेकिन वह बहुत दुखी था। यहाँ तक की उसने पढ़ाई तक छोड़ दी। इतना समझाने के बावजूद भी...। 
‘‘हीरा... तु तो मेरा साथ देगा न...।‘‘
‘‘जरूर दूँगा...।‘‘
‘‘हीरा अब किस विषय में अॅडमिशन लेना है?‘‘
‘‘रमेश... कुछ न कुछ लेगें।‘‘
‘‘हीरा पढ़ने के लिए बहुत पैसे लगते हैं, इसके बारे में भी सोचना पड़ेगा।‘‘
‘‘हम आर्ट्स शाखा में जाएँगे हीरा।‘‘
‘‘क्यो..?‘‘
‘‘ज्यादा खर्चा नहीं होता।‘‘
‘‘लेकिन भविष्य में नौकरी मिलेगी रमेश...।‘‘
‘‘जरूर मिलेगी।‘‘
‘‘रमेश हमें जल्द से जल्द नौकरी करनी है, इसलिए हम कोई दूसरा डिप्लोमा करें तो...।‘‘
‘‘कौन-सा?‘‘
‘‘एम.सी.व्ही.सी. (व्यावसायिक कोर्स) कैसा रहेगा?‘‘
‘‘वही करेंगे हीरा।‘‘
 अॅडमिशन लिया। हँसते-खेलत कैसे दिन बीत गए पता नहीं चला। इसी में ग्यारहवीं, बारहवीं की शिक्षा हुई। फिर... वही सवाल आगे कौनसी पढ़ाई करेगें?‘‘
‘‘हीरा मैं बी.ए. को अॅडमिशन लेनेवाला हँूं?‘‘
‘‘आप हीरा।‘‘ 
‘‘मैं भी वहीं।‘‘
 हीरा इसमें खर्चा भी कम हैं। पढ़ाई के साथ-साथ कुछ काम करेंगें। इसी से बस पास का खर्चा निकलेगा। छुट्टी के दिनों में खेती में काम करेगें। इसी से शिक्षा पुरी करनी थी। समय के साथ हालात बदलते गए ओर स्नातक की शिक्षा हुई। पढ़कर क्या बनना है, कुछ तय नहीं । सिर्फ माँ-बाप के खातिर पढ़ना हैं यही मकसद....। 
‘‘हमारी पढ़ाई करने की हैसियत नहीं है हीरा...। हमें जो पढ़ना है वो हम पढ़ ही नहीं पाते। पैसो के कारण...। रमेश शिक्षा में हैसियत पैसों से नही ज्ञान से तय होती हैं। झूठ... सरासर झूठ हीरा... यह सच होता तो हम रुचि के अनुसार क्यों नहीं पढ़ पाएँ। रमेश समाज के कुछ बच्चें कुछ भी नहीं पढ़ पाते, मजबूरी के कारण...। हम कुछ न कुछ तो पढ रहें हैं।‘‘
 रमेश आगे की शिक्षा के बारे क्या सोचा? अब तक तो हुआ आगे... हीरा हम हार नहीं मानेंगे। पढ़ाई करेंगें, खर्चा कितना भी क्यो न हो।
 रमेश मैंने सुना है विश्ववि़द्यालय में पढ़ाई बहुत अच्छी तरह से होती है। अच्छे लेखक से बाते होती हैं। सही जिंदगी वही समझ में आती है। हाँ, सही है हीरा। हमारे काॅलेज के लड़के हैं वहाँ...। उनके सहारे हम रहेंगे। मैं जाकर आता हॅूं विश्वविद्यालय में। हाॅं...जरूर।
 विश्वविद्यालय का माहौल बहुत बढ़िया लगा। हम कई साथी विश्वविद्यालय में पढाई के लिए दाखिल हुए। अपने-अपने रूचि के अनुसार अॅडमिशन लिया। हीरा और  मैंने वही पैसों के हिसाब से एम.ए. के लिए अॅडमिशन लिया क्योंकि यहाॅं ज्यादा खर्चा नहीं था।  
 सभी पढ़ाई में व्यस्त रहते थे। किसी को कोई दिक्कत हो तो मदत करते थे। पढ़ाई में किस तरह से समय बीत रहा था, समझ में नहीं आता था। हीरा तो पुराना ही साथी था, लेकिन विश्वविद्यालय में विवेक, अमर, सोपान दिलीप, सुमन, जानवी आदि साथ मिले। उन्हीं में जानवी और विवेक मुझे बहुत करीब लगते थे, हर बात मैं उन्हें बता देता था एक भाई, बहन, दोस्त समझकर...। आज मैं जो कुछ भी हँू उन्हीं के कारण हँू। 
 सब मिलजुलकर रहते थे। एक-दूसरे के सुख, दुख में साथ रहते थे। खुन के रिश्तें से गहरे रिश्तें बने थे हमारे। शिक्षा होने के बाद जब जाने की नौबत आएगी तो कैसी अवस्था होगी यही चिंता सताती थी। सभी ने किसी न किसी विषय में एम.ए., एम.फिल्. नेट, सेट पास किया। मैंने भी उन्हीं के कारणवश शिक्षा पुरी की। इसी समय एम.फिल्. में सुजाता नाम की लड़की हमारे ग्रुप में शामिल हुई। वो बहुत शांत स्वभाव की लडकी थी। किसी से ज्यादा बात तक नहीं करती थी। कई दिन गुजरने के बाद वह थोड़ी बहुत बातें करने लगी। जिस दिन से उसे मैंने देखा था, उसी दिन से मैं उसे चाहने लगा था। 
‘‘एक दिन जानवी बहन से कहाँ... ‘‘
‘‘जानवी बहन मुझे आप से बात करनी है।‘‘
‘‘हाँ... कहो न रमेश.‘‘
‘‘मुझे सुजाता अच्छी लगने लगी है।‘‘
‘‘मैं उससे पे्रेम करता हूॅं।‘‘
‘‘सुंदरता देखकर नहीं... स्वभाव देखकर...।‘‘
‘‘लेकिन मुझ में बोलने की हिम्मत नहीं है।‘‘
‘‘लेकिन वो आप से प्रेम करती हैं क्या रमेश?‘‘ 
‘‘पता नहीं।‘‘
‘‘समय मिलने के बाद मैं पूछँूगी रमेश।‘‘
‘‘कुछ दिन गुजरने के बाद जानवी ने कहाँ.... रमेश वो तुमसे प्रेम नहीं करती।‘‘
‘‘क्यों? जानवी बहन...।‘‘
‘‘जानवी मैं उसे बहुत चाहता हूँ।‘‘
‘‘एकबार तुम बोलकर देखो रमेश।‘‘
‘‘जरूर...जरूर...।‘‘
‘‘न बोलने से अच्छा है बोलना।‘‘
‘‘एक दिन हिम्मत करके कह दिया कि सुजाता मैं तुमसे प्रेम करता हूँ।‘‘
उसने कहा ..... ‘‘मैं नहीं करती।‘‘
‘‘क्यों सुजाता।‘‘
‘‘मेरे पास कुछ नहीं इसलिए...।‘‘
‘‘ऐसा कुछ नहीं रमेश।‘‘
 सुजाता में तुम्हें चाहता हूँ। हाँ, मेरे पास नौकरी नहीं... प्राॅप्रर्टी नहीं...। लेकिन इतना तो कह देता हँू तुम्हें जिंदगी भर खुश रखँूगा।‘‘
‘‘रमेश... आप मुझे अच्छे लगते हो, लेकिन...‘‘
‘‘लेकिन क्या सुजाता?‘‘
‘‘आप की जाति...।‘‘
‘‘आप ठहरे सवर्ण जाति के मैं निम्न जाति की।‘‘
‘‘सुजाता मैंने प्रेम जाति को देखकर तो नहीं किया।‘‘
‘‘जाति बदलने से विचार बदलते है?‘‘
‘‘मेरे कहने का मतलब यह नहीं था रमेश...।‘‘
‘‘किसी भी जाति का व्यक्ति किसी भी विचारधारा को आत्मसात कर सकता हैं।‘‘
‘‘सही है रमेश।‘‘
‘‘समय आने के बाद देखेंगे। तब तक पढ़ाई पर ध्यान दो।‘‘
 विवेक जिंदगी में नौकरी मायने रखती है। इसके बिना कोई महत्त्व नहीं देता। कई लोग पढे लिखे हैं लेकिन नौकरी नहीं। बेरोजगार है। राज्यसेवा हो या लोकसेवा या दूसरी नौकरी इसमें भी भ्रष्टाचार हो रहा हैं। पैसे देकर नौकरी हासिल की जा रही हैं। आम बच्चें पढ़ाई तो करते हैं लेकिन पैसे कहाँ से लाएंगे। यह व्यवस्था बदलनी चाहिए।
 विवेक हमारा ही देख न.. हमारे पास योग्यता हैं लेकिन नौकरी नहीं क्योंकि हमारी बड़े लोगों से पहचान नहीं और न ही पैसा है। ज्ञान हैं त¨ उसे महत्व नहीं। 
‘‘रमेश छोड़ न यह बाते।‘‘
‘‘क्यो छोडू? गंभीर होकर भी...।‘‘
‘‘अध्यापक के साक्षात्कार में क्या पूछते है? पता है न तुझे।‘‘
‘‘रमेश परिवर्तन होगा।‘‘
‘‘लेकिन कब?‘‘
‘‘विवेक बहुत दुख होता हैं... योग्यता के बावजूद भी नौकरी नहीं। माँ-बाप के सपने होते हैं बच्चो से। उन्हें तो नहीं न कह सकते अध्यापक बनने के लिए पैसों की जरूरत हैं क्योंकि उन्होंने अनपढ़ होकर हमें पढ़ाया। एक समय की रोटी तक नहीं खाते थे वह... हमारे खातिर। उन्हें और दुख क्यो दूँ? सुख तो नहीं दे सकता तो दुख क्यो?
 विवेक कही परिवार गरीब होकर भी बच्चों को पढ़ाते है। लेकिन इस व्यवस्था को ज्ञान मायने नहीं रखता, जाति मायने रखती हैं। बचपन में कुछ मालून नहीं होता लेकिन जब सब कुछ जान लेते हैं, तो बचपन ही अच्छा लगता है।
 विवेक मेरी तो दसवीं कक्षा में हैसियत तय की व्यवस्था ने। मेरी ही नहीं तो मेरे जैसे कही बच्चें हैं जो विज्ञान, संगणकशास्त्र या दूसरी शाखा में जाना चाहते हैं लेकिन... हैसियत बता देती है आप उधर नहीं जा सकते। क्योंकि आपके पास इतना बोझ उठाने की ताकत नहीं। बोझ ज्ञान का नहीं पैसों का। मेरी उस समय हैसियत तय हुई थी, आज भी हो रही है। 
‘‘सुजाता...।‘‘
‘‘हाँ... रमेश बोलो।‘‘
‘‘सुजाता मेरे परिवार के सदस्य मेरी शादी तय कर रहे हैं मैं क्या करू?‘‘
 कुछ दिन गुजरने के बाद सुजाता ने एक दिन कहाँ... मैं आप से शादी करुँंगी। अंतिम क्षण तर साथ दँूगी। 
‘‘सुजाता हम शादी कब करेंगें?‘‘
‘‘रमेश आप भी न... मुझे समय तो दो। मुझे परिवार के सदस्यों का दिल जितना पड़ेगा।‘‘
‘‘आप जो ठीक समझे।‘‘
 एक दिन अचानक सुजाता ने कह दिया मुुझे परिवारवालों ने लड़का देखा हैं, यह सुनकर कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, करे तो क्यों करें। 
‘‘सुजाता मैं आपके परिवारवालों से बात करूं...।‘‘
‘‘नहीं...‘‘
‘‘मैं करूंगी। समय आने के बाद। आप चिंता मत करो। देखने आए लड़के को सुजाता अच्छी लगी। परिवारवाले भी राजी हुए। ’’कुछ दिनों बाद सुजाता ने कहाॅं... ‘‘
‘‘रमेश मुझे आप से कुछ बात करनी है।‘‘
’’हाँ.... ब¨ल¨ सुजाता’’
‘‘हमारी शादी नहीं हो सकती रमेश...।‘‘
‘‘क्यो?‘‘
‘‘मेरे परिवारवाले जो तय करेंगें वही मुझे मंजुर हैं।‘‘
‘‘सुजाता मैं कैसे रहूं आप के बिना... आप परिवार के विश्वासपात्र व्यक्ति से बात करके देखो ना...।‘‘
‘‘रमेश मैंने मेरी बहन से कहाॅं... लेकिन उसने ना कह दी।‘‘
‘‘क्यो सुजाता?‘‘
‘‘जाति...।‘‘
‘‘माॅं से एक बार... माॅं भी ना ही बोलेगी। सुजाता को ही मुझ से शादी करना पसंद नहीं है, ऐसा कभी-कभी उसके बोलने से लगता था।‘‘
‘‘रमेश... माँ को बी.पी.है... मैं कैसे बताऊं? उन्हें कुछ हुआ तो। कुछ नहीं होगा सुजाता... बताना तो पड़ेगा। सुजाता ने एक दिन फोन किया और कहाॅं... माँ से बात कीजिए। 
‘‘हैलो...।‘‘
‘‘नमस्ते...।‘‘
‘‘आपका नाम?‘‘
‘‘रमेश...।‘‘
‘‘आप कहाँ से हो?‘‘
‘‘देहात से।‘‘ 
‘‘पढाई?‘‘
‘‘शुरू है।‘‘ 
‘‘शादी को आपके परिवारवालों ने ना कहाँ तो?‘‘
‘‘मुझे उनके नजर में विश्वासपात्र होना पड़ेगा।‘‘
‘‘आपकी जाति?‘‘
मैं सोच में पडा। कुछ देर ठहरा... झूठ बोलने से अच्छा है सच ही बोल दूँ। 
‘‘सवर्ण जाति का हूँ।‘‘ कहाॅं और फोन रख दिया। 
 कुछ देर बाद सुजाता से फोन करके पुछा की माँ ने क्या कहाँ। वो कहने लगी शादी को माँ ना कहती है। 
‘‘रमेश...।‘‘
‘‘बोलो सुजाता...।‘‘
‘‘आप मुझे भूल जाओ। आपको मुझ से अच्छी लड़की मिलेगी।‘‘
‘‘मैं शांत रहा सुनकर।‘‘
 विवेक... मेरी सुजाता से शादी नहीं हो सकती। क्यो रमेश? मेरे पास क्या है? न पैसा न नौकरी न अच्छा घर...। रमेश प्रेम में यह मायने नहीं रहता। सही हकीकत तो वही है विवेक...। सुजाता कुछ नहीं बोली... लेकिन उसकी खामोशी सब कुछ कह गयी क्योंकि वो जिस लड़के से शादी कर रही है उसके पास नौकरी है, पैसा है, मोटारगाड़ी है, आराम की जिंदगी और जाति भी एक ही है। मेरे पास तो कुछ भी नहीं... है तो जिंदगी भर संघर्ष...। 
‘‘रमेश छोड़ दे विषय।‘‘
‘‘उसका अंतिम निर्णय क्या है? पुछ ले।‘‘
‘‘बहुत दिनों बाद सुजाता रास्ते में दिखाई दी।‘‘
‘‘सुजाता...।‘‘
‘‘हाँ... जल्दी बोलो रमेश...।‘‘
‘‘सुजाता तुम खुश रह सकती हो तो शादी करों...। तुम्हारी खुशी में मेरी खुशी हैं। बस तुम खुश रहो। तुम्हारी खुशी के खातिर मैं तुम्हें भूल जाऊंगा।‘‘
‘‘चलता हँूूॅं, सुजाता मुझे बाहर जाना है।‘‘
 कुछ दिनों बाद सुजाता विश्वविद्यालय में आने लगी, लेकिन बात करने से इनकार कर दिया। यकीन दिलाने के बाद भी कि मैं तुम्हें भूला हँू। उसे लगने लगा था मैं उसकी जिंदगी में दरार निर्माण करुँगा। वो दोस्त बनकर भी रहना नहीं चाहती थी। वो मुझे घृणा से देख रही थी। उसे रिश्ता ही तोड़ना था। इतना तक कह दिया कि दोस्त के रिश्ते से भी मुझे मत बोलो रमेश... मैं खुश रहना चाहती हँू । आप मेरे बर्बादी का कारण मत बनो। यह सुनकर बहुत दुख हुआ। 
‘‘विवेक दुनिया मतलबी हैं, समय-समय पर बदलती है।‘‘
‘‘विवेक एक बात कहूॅं?‘‘
‘‘बोल¨ रमेश...।‘‘
‘‘माँ-बाप का प्रेम ही सच्चा प्रेम होता है कभी बदलता नहीं...। सुख में भी और दुख में भी। बाकी सब तो ढकोसले है समय के साथ बदलते है...।’’
 विवेक लोग अपने हिसाब से हैसियत तय करते हैं इन्सान की। जो मेरी शिक्षा, नौकरी और यहाँ तक की प्रेम में भी हैसियत तय हुई। 
 ‘‘विवेक माँ कहती थी दुनिया में हर कोई अपने हिसाब से हैसियत ठहराते हैं। लेकिन वह गलत हैं हैसियत तब समझ में आती है जो खुद के नजर में क्या है?‘‘ 
सही है रमेश... माँ सही कहती है... दुनिया क्यो न उनके नजर से हमारी हैसियत तय करें खुद के नजर में हम नहीं गिरे तो हमारी हैसियत हैं। 
 विवेक मैं भूल जाऊंगा बिते हुए कल को। वो खुश है इसके अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए। प्रेम मिले ही ऐसा थोडे ही होता है... प्रेम में त्याग, समर्पण तो मायने रखता है। मैंने भी वही किया। लेकिन अफसोस इस बात का है कि वो फुले, शाहू, आंबेडकर के विचारों को मानती थी, लेकिन आचरण में क्यो नहीं ला सकी? रमेश जाने द¨ न...। तु जिंदगी की नई शुरूआत कर¨। आप अपनी जिंदगी में खुश रहो और उसे भी खुश रहने दो। तुम्हारे प्रेम का उसे कभी न कभी अहसास होगा। इसी में तुम्हारे प्रेम की जीत है। अब तुझे अपने माँ-बाप के लिए जीना हैं। वही तो तुम्हारा सपना था। हाॅं... विवेक मैं अपने माँ-बाप के लिए जिऊंगा। जिंदगी में हार नहीं मानूगाॅं। खुद में काबिलीयत बनाऊंगा। इस भ्रष्ट व्यवस्था से संघर्ष करता रहूँगा। अपने माँ-बाप के खातिर...


संक्षिप्त परिचय
नाम ः वाढेकर रामेश्वर महादेव
पता ः हिंदी विभाग, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विश्वविद्यालय, अ©रंगाबाद -431004 (महाराष्ट्र)
ल्¨खन ः आंबेडकरी इंडिया, भाषा, विवरण, श¨धदिशा, हिंदुस्थानी जबान युवा आदि पत्र्ा-पत्र्ािकाअ¨ं में ल्¨ख तथा    संग¨ष्ठिय¨ं में प्रपत्र्ा प्रस्तुति।
संप्रति ः श¨ध कार्य में अध्ययनरत।
संपर्क ः म¨. 9022561824
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