Friday, March 6, 2020

कविता

*"अपनत्व के अहसास से"*

"भीग गई पलके फिर उनकी,

अपनत्व के अहसास से।

सूख गये वो गम के आँसू,

अपनो के व्यवहार से।।

मिलकर उनसे जग में एक पल,

मन महके विश्वास से।

जीत ले यहाँ मन अपनों का,

प्रेम-सेवा-त्याग से।।

डूब जाये धरती अम्बर,

स्नेंह की बरसात से।

बन जाये सागर ये धरती,

अपनत्व के अहसास से।।"

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 *" मिट्टी का घर"*

"मिट्टी की भीनी भीनी खुशबू,

भाँति है मन को-

चलो चले गाँव की ओर।

मिट्टी से बने घरो में साथी,

मिलती ठंड़क-

मन भाये हर छोर।

भूल जाओगे शहर की तपन ,

मिलेगा दिल को सकून-

होगी हरियाली चारो ओर।

मिटेगी जलन नैंनो की,

मिलेगी शांति मन को-

होगी शांति चारो ओर। 

माटी का घर माटी का तन,

सब मिल जाना माटी में-

फिर भी भाता मन को माटी का घर।

मिट्टी की भीनी भीनी खुशबू,

भाँति हैं मन को-

चलो गाँव की ओर।।"

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     *"पूनम की चाँदनी"*

"पूनम की चाँदनी में साथी,

नहाया धरती -अंबर -

महका रहा उपवन सारा।

ब्रज भूमि के कण कण में,

बसे कृष्ण-

फिर भी राह देखे राधा।

राधा रानी कृष्ण दीवानी,

अँजुली भर फूलों से-

कर रही प्रेम तपस्या।

पूनम का चाँद भी इतरा रहा,

ब्रज भूमि पर चाँद-

अमृत बरसा रहा।

राधा रानी के हर साँस में

बसे कृष्ण ,

हवा का हर झोखा- 

अहसास करा रहा।

पूनम की चाँदनी में साथी,

नहाया धरती -अंबर-

महका रहा उपवन सारा।।"

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          *"मन"*

"मन की पीड़ा को साथी,

जग में मन ही जाने।

कोई न जगत में तेरा,

जो इसको पहचाने।।

सच्चे संबंधों को भी,

कोई अपना न माने।

स्वार्थ की धरा पर तो,

हर कोई पहचाने।।

मैं-ही-मैं बसा मन जो,

अपनत्व को न माने।

जीवन है-अनमोल यहाँ,

इसे भी न पहचाने।।

दे शांति तन-मन जो यहाँ,

ऐसा गीत न जाने।

भक्ति रस में डूबे तन मन,

तब प्रभु को पहचाने।।"

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      *"किसान"*

"किसान परेशान हैरान,

जीवन में-

जाने न कोई इसकी व्यथा।

बाढ़ आये तो भी रोता,

किसान पल पल-

क्या- कहे उसकी व्यथा?

कर्ज़ में डूबा हो गई ओलावृष्टी,

सिर पकड़ कर बैठ गया-

जाने न कोई उसकी व्यथा।

फसल का मिले न मोल,

कैसे-बोले सच्चे बोल-

सूखा पड़ा रोया नयन खोल।

रात -दिन करता मेहनत,

मिला न उसका मोल-

यही है-किसान की व्यथा।।"

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        *"जग में"*

"इतनी चाह रखो साथी,

बना रहे स्नेंह जग में।

इतना न तड़पाना यहाँ,

बस जाये नफरत मन में।।

संग चले जो फिर साथी,

माने न साथी मन में।

स्वार्थ बसा रहा साथी,

कैसे- साथी वो जग में?

सुख दु:ख में संग रहे जो,

साथी वो साथी जग में।

बहके जो कदम मिल उनसे,

साथी नहीं साथी जग में।।"

 

  सुनील कुमार गुप्ता

S/0श्री बी.आर.गुप्ता

3/1355-सी,न्यू भगत सिंह कालोनी,

बाजोरिया मार्ग, सहारनपुर-247001(उ.प्र.)

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