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Friday, February 21, 2020

सर्वेष्वर दयाल सक्सेना के उपन्यास ‘‘सूने चैखटे‘‘ में संवेदना के विभिन्न आयाम

प्रस्तावना - हिन्दी साहित्य के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न कवि , नाट्यकार , कहानीकार , उपन्यासकार एवं सफल सम्पादक सर्वेष्वर दयाल सक्सेना अपने अनूठे व्याक्तित्व के लिए विषेष रुप से प्रसिद्ध हैं सर्वेष्वर दयाल सक्सेना मूलतः कवि होते हुए भी उपन्यास जगत में अपनी विषिष्ट पहचान रखते हैं।  सर्वेष्वर का साहित्यक  द्वष्टिकोण बहु आयामी है । जिसमें सुधार वादिता , संदेषात्मकता का समावेष है ‘सूने चोखटे’ उपन्यास में लेखक ने प्रेम और जीवन संघर्ष को आधार बनाया है । उपन्यास के माध्यम से हमारे समाज की परम्पराओं और रुढ़ियों पर व्यंग्य किया है। उपन्यास जीवन का सम्पूर्ण चित्र एवं मुगीन संस्कृति को प्रतिबिम्बित करने वाला दपर्ण है जिसकी लोकप्रियता आज भी साहित्य की अन्य विद्याओं में कही अधिक देखी जाती है , सर्वेष्वर दयाल सक्सेना का ‘‘सूने चैखटे’’ उपन्यास हिन्दी के नये यथार्थवादी उपन्यासों में बहुत चर्चित रहा है । 
निम्न मध्यमवर्गीय समाज की आर्थिक विवषताएँ रुढ़िया व खोखली मूल्य व्यवस्था पर व्यग्यं की षिल्प विधि को सर्वेष्वर दयाल सक्सेना के ‘सूने चैखटे’ उपन्यास में रामू और कमला की कहानी के माध्यम से आसाली से देखा जा सकता है। इस उपन्यास का कथानक सहज बाल प्रेम से प्रारम्भ होता है और गहरी कराह के साथ पाठक के मन को छीलकर संतोष पाता है इस उपन्यास का मुख्य उद्धेष्य समाज के भीतरी दर्द को बाहर लाना है । यह उपन्यास समाज की व्यवस्था पर गहरी चोट करता है । ‘‘सूने चैखटे ’’ उपन्यास में सर्वेष्वर द्धारा हमारी परम्पराओं और मूल्य व्यवस्था पर एक सामाजिक व्यंग्य किया गया है। इस उपन्यास का आरम्भ ‘जर्जर पृष्ठभूमि  से होता है । 
जर्जर पृष्ठभूमि  - प्रतिभाषाली बालिका कमला छोटे से रामू को अपना नाम लिखना सिखाती है । रामू द्वारा अपना नाम न बताने पर वह रुठ जाती है । रामू को अपनी गलती का अहसास होता है । इस प्रकार दोंनों में धीरे -धीरे सहज प्रेम पनपने लगता है , कमला और रामू बेहद गरीब बस्ती में रहते हैं इस बस्ती को कंजड़ टोला कहा जाता है । इसी मुहल्ले में लाला बालेदीन रहते हैं । जिनकी बिस्कुट बनाने की दुकान हैं । लाला रामू से बहुत प्यार करता है कमला बिस्कुट खाने से इनकार कर देती है उसे रामू का बिस्कुट माँगकर खाना अच्छा नही लमता है । रामू कमला को बताता है कि इतना बड़ा आदमी तेरा दोस्त कैसे हो सकता है यदि उसकी माँ को पता चल गया तो वह मारेगी रामू के घर के पास ही अन्धी नानी रहती है । जो बड़ा ही नारकीय जीवन व्यतीत कर रही हैं। रामू अंधी नानी से कहानी सुनता है । रामू के पिता की रोजमर्रा के इस्तमाल की छोटी सी दुकान है, कमला के पिता कचहरी में मोहरिर है । उनके पास गाँव में थोड़ी बहुत जमीन जायदाद भी है । वे बड़े ही मस्तमौला और बेफ्रिक किस्म के आदमी हैं । उनका अंधिकाषं समय या तो संतो की सेवा में व्यतीत होता है या ताष खेलने में , कमला की सौतेली माँ लड़ाकू और भयंकर क्रोधी है। वह बात - बात पर कमला पर बिगडती रहती है । लेकिन कमला के पिता कमला को बहुत प्यार करते है ं कमला अपनी माँ के मृत्यु के पश्चात गांव में अपने चाचा - चाची के पास पली बढ़ी है । वह माँ की मृत्यु के पश्चात बहुत उदासीन हो गयी है । कमला को शहर में पढने के लिए लाया गया है। रामू के साथ पढ़ने की बात सुनकर वह बहुत खुष होती है ,  वह बताती है कि गाँव मे किस प्रकार उसने पहाडे़ इत्यादि सीखे है थोडे दिनों पश्चात दोनो विद्यालय जाने लगतें है कमला पढ़ाई में होषियार है उसे विद्यालय से इनाम भी मिलता है  कमला के बालमन पर , उसकी सौतेली माँ और पिता के झगड़े का गहरा प्रभाव पड़ता है । 
टूटी आकृतियाँ 
इस उपन्यास का दूसरा अंष टूटी आकृतियाँ हैं । इस कथा का आरम्भ नौ वर्ष बाद होता है । कमला अब स़त्रह वर्ष की हो गई है। उसकी सौतेली माँ उसकी शादी की चिन्ता करती है । कमला के बाबू जी उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं देते है । आठ वर्ष से रामू का कोई पता नही है । उसके पिता की दुकान टूट गई थी । इसलिए वे किसी दूसरे शहर नौकरी करने चले गये थे। इसी बीच कमला मास्टरनी (हेम दीदी) के बहुत करीब आ गई थी । सीता ने चार वर्ष पूर्व पढ़ाई छोड़ दी और उसका विवाह हो गया था । अब उसकी जिन्दगी उपन्यास के सहारे व्यतीत हो रही थी । सत्तर वर्ष की अवस्था में अन्धी नानी की मृत्यु हो जाती है जब कमला को पता चलता है कि मृत्यु के समय वह भूखी थी तो उसे अत्यन्त ग्लानि होती है । मरने से पहले अंधी नाानी कमला से रामू के बारे में पूछती हैं।  कमला की माँ उसके पिता से छगड़ा करती है ं। कमला दुखी होकर घर छोड़कर हेमदीदी के यहां चली जाती है वह उसे अपने जीवन की कहानी सुनाती है और कहती है किस प्रकार छिप छिप कर मैने बी0ए0 किया है । शादी के समय मेरी पढ़ाई कम बताई गई हेमदीदी को पढ़ाई की वजह से अपना ससुराल छोड़ना पड़ा । रामू कमला से मिलने आता है  रामू और कमला एक दूसरे को प्यार करते है रामू उसके साथ चलने के लिए कहता है पर वह इतनी हिम्मत नही कर पायी वह पुराने मूल्यों रीति रिवाजों  और परम्पराओ को ढो रही है वह डर और कलह की वजह से उसके साथ जाने की हिम्मत नहीं कर पाती  ।


उड़े हुए रंग:-
उपन्यास का तीसरा अंष - ‘ उड़े हुए रंग है । तीन वर्ष बाद कमला की त्रासद कहानी आरम्भ होती है । कोमल चमकदार , प्रतिभाषाली कमला घुट , घुट कर क्षय रोग का षिकार हो जाती है । दो पूर्व परीक्षा के पश्चात वह अपने चाचा के साथ गँाव चली गई । वहां पर सब उसे किसी अजूबे की तरह देखने लगे गाँव में अकेले घुट -घुट कर कुछ किताबों और प्राकृतिक दृष्य तथा चैपायों के सहारे दो वर्ष व्यतीत किये , दो वर्ष के पश्चात पिता के आने पर उसे पहली बार अपनेपन का अहसास हुआ । वैद्य ने कमला के पिता से कहा कमला की शादी कर दो उसकी तबियत में सुधार हो जायेगा । उसकी नौकरानी भी यही कहती है । कमला के विवाह की तैयारी की जाती है हेमदीदी तथा सभी को बुलाया जाता है कमला का विवाह एक मोटे व्यापारी लड़के के साथ हो जाता है ज्वर होने पर भी उसकी विदा कर दी जाती है । ट्रेन लेट हो जाती है बारात स्टेषन पर ठहरती है वहाँ रामू और कमला मिलते है कमला सामाजिक मर्यादा के कारण रामू को न पा सकी रामू सीमा में रहने के कारण कमला को हासिल न कर सका । इस प्रकार इस उपन्यास का त्रासदी भरा अन्त होता है । 
सामाजिक संवेदना 
भारतीय हिन्दु समाज वर्ण व्यवस्था पर आधिरित है इसके अतिरिक्त यह धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है । जिसमें विभिन्न धर्मो एवं सम्प्रदायो का समान अधिकार है। परिणामस्वरुप सभी जातीय एवं साम्प्रदायिक संवेदना का प्रत्यक्ष प्रभाव समाज पर देखने को मिलता है । परन्तु आज समाज में एक विषेष जाति वर्ग के सम्पन्न लोग दूसरी निम्न जाति के कमजोर लोगों को हेय दृष्टि से देखते है  क्योंकि उनकी सभी संवेदनाओं की जगह जातीय कटृटरता ने ले ली है जो एक दूसरे से घृणा करने पर मजबूर करती है । 
स्ूाने चैखटे उपन्यास में जर्जर पृष्टभूमि षीर्षक के अन्र्तगत जातिवाद की भावना का एक उदाहरण मिलता है । जब रामू और कमला खून्नू मेहतर का ढोल वजाते है । ‘‘और फिर रामू और कमला ने बारी बारी से काफी देर तक मन भर खुन्नु का ढोल बजाया और फिर अपने - अपने बजाने की तारीफ करते हुए चले गऐ ’’। 1  जब उनके घर उनके बजाने का पता चला तो उन दोनों पर सोने छुला हुआ पानी छिड़का जाता है । और माँ डाँटती है । 
‘‘ लेकिन इसके जबाव में जो माँ से पूरी फौज से अकेले सामना करने के आष्वासन के बजाय उन्हें मार मिली उनके कान ऐठे गए, उन पर सोने से पानी छुलाकर छिड़का गया, उन पर गहरी डाँट पड़ी और उन्हे इस बात की चेतावनी दी गई कि भाविष्य में उनका बाहर निकलना बन्द कर दिया जाऐगा यदि वे उस मेहतर वाली गली में गए या उन्होने खुन्नू की ढ़ोल बजाई ’’ । 2 
उपन्यास में ‘‘टूटी आकृतियाँ नामक शीर्षक के अन्र्तगत भी लेखक ने सामाजिक ऊँच नीच का उदाहरण प्रस्तुत किया है । 
‘‘ नीच जात ऊँच जात की साख नहीं कर सकता , नही करनी चाहिए । भगवान ने जब नीच बनाकर भेजा है तब वैसे ही रहना चाहिए । अपनी जाति में भी भली बुरी लड़कियाँ हैं ही किसी का हाथ पीला कर देता । ऊँच जात की तरफ देखने से क्या फायदा’’ । 3
इस प्रकार सर्वेष्वर के इस उपन्यसा में समाज बढ़ते हुए जातिवाद व उसकी संकीर्ण मानसिकता की झलक मिलती हैं। 
नारीगत संवेदना - सर्वेष्वर ने ‘सूने चैखटे ’ उपन्यास नारी संवेदना को बड़ी सूक्ष्मता के साथ चित्रित किया है । उन्होने नारी जीवन से सम्बन्धित सभी पक्षों को बड़ी सूक्ष्मता से उजागर किया है । उपन्यास में कमला की माँ कमला की पढ़ाई का विरोध करती है और कहती है - ‘‘मैं कहती हूँ लड़की सयानी हो गई सत्रह साल की उम्र कोई कम नहीं होती ं कब तक पढ़ाओगे उसे आखिर ज्यादा पढ़ जायेगी तो और मुसीबत बढ़ जायेंगी । मेरी क्या मैं तो सौतेली माँ हूँ ,हर तरफ से बदनाम हूँ , भुगतना तुम्हे पड़ेगा । कमला के बाबू जी अभी तुम मेरी बात नही सुन रहे हो, बाद मे पछताओगें’’ ।4 कमला की माँ उसके चरित्र पर तरह तरह के आरोप लगाती है । वह कमला के पिता से कहती है ं ...... ‘‘तुम्हे क्या मालूम चारों तहफ कितनी बदनामी हो रही है । सुनना तो मुझे पड़ता है । मेरे तो कानपक गए  । अकेले स्कूल जाती है । रास्ते में न जाने किन - किन लड़को से बोलती चालती है , हँसी मजाक करती है । नाचने - गाने में उसे शोक है अभी स्कूल में जाने क्या हुआ था , औरत आदमी सभी थे और उनमें बेषर्म सी वह नाच रही थी । लोंग देख देखकर तालियाँ बजा रहे थे’’। 5
‘‘एक दिन तुम्हारा मुँह काला करके किसी के साथ भाग जाऐगी बस जो थोड़ी इज्जत बची है वह भी चली जाऐगी ।’’ 6
इस प्रकार सर्वेष्वर के इस उपन्यास में यह देखने को मिलता है कि भले ही समाज षिक्षित हो गया , लेकिन नारी को लेकर अभी तक पुरुष प्रधान समाज की सोच बदली नहीं है, पुरुष की नही नारी ही नारी की षिक्षा की विरोधी है । 
राजनीतिक संवेदना:- 
राजनीतिक संवेदनाओं का आधार राजा और प्रजा होते है । लेकिन आधुनिक युग में राज्य की जगह देष , राजा की जगह आम जनता ने ले ली है । पूरे राष्ट्र में लोकतान्त्रिक संरचना है । आज राजनीतिक मूल्यों में इस कदर गिरावट आ गई है , कि वह किसी भी हद तक अपने को गिरा सकती है । पहले राजनीति का क्षेत्र केवल राज्य तक की सीमित था, लेकिन आधुनिक समय में राजनीति ने देष का कोई कोना नहीं छोड़ा है । हर जगह राजनीति , राजनीति ने अपने लिए जगह बना ली है, धर्म , समाज , घर परिवार 
षिक्षा आदि सभी क्षेत्रों पर राजनीति का प्रत्यक्ष प्रभाव देखने को मिलता है । अगर हम यह कहे कि आधुनिक युग में राजनीति में राष्ट्रप्रेम की अपेक्षा स्वप्रेम और स्वार्थ का ज्यादा महत्व दिया जा रहा है । कहा जाता है कि साहित्य समाज का दपर्ण होता है, साहित्य जैसा चाहे समाज को वैसा ही बनाता है लेकिन आज के समय में वैसा नही ंहै ं आज राजनीति समाज के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित कर रही है। अतः साहित्य नही राजनीति समाज में बदलाव लाती है , वह उसे अपने ढ़ग से निर्मित करती है । सूने चैखटे उपन्यास के माध्यम से कहा है । कमला रामू को बड़ा आदमी बनता देखना चाहती है, इसलिए वह रामू को लेखक बनने की प्रेरणा देती है ताकि वह समाज की खोखली मूल्य व्यवस्था में बदलाव कर सके ं वह रामू से कहती है -
‘‘ तू लेखक क्यों नही होता ? सुनते है लेखक जैसा चाहे समाज को बना सकता है ।’’ 7
वर्तमान समय में राजनीति का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि वह समाज के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित कर रही है अतः साहित्य नहीं राजनीति समाज को बदलती है रामू कमला से कहता है - 
‘‘गलत सुनती है तू , समाज जैसा चाहे लेखक को बना सकता है । लेखक समाज को नहीं बदल सकता । समाज को बदलती है राजनीति ’’। 8 . 
अतः कहा जा सकता है कि साहित्य समाज को उतना प्रभावित नहीं करता जितना कि राजनीति करती है आज राजनीति का क्षेत्र इतना बढ़ गया है कि इससे कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं है। 
आर्थिक संवेदना 
आर्थिक संवेदना मुख्य रुप से आधुनिक साहित्य का विषय है । वीरगाथा काल, भक्तिकाल , रीतिकाल , छायावादी , कविता में यह देखने को मिलता है । वास्तव में आर्थिक संवेदना का जन्म प्रगतिवादी साहित्य से होता है , क्यों कि प्रगतिवादी साहित्य का जन्म पूँजीवाद के विरोध में हुआ । शासकों द्वारा शासितों का आर्थिक शोषण की एक प्रतिक्रिया के रुप में हुआ । सर्वेष्वर दयाल सक्सेना के इस उपन्यास में धन के महत्व को चित्रित करने का प्रयास किया है । आज जिस व्यक्ति के पास पैसा है तथा सभी सुख सुविधाऐं है । 
उसी की समाज में पूछ होती है ं। यही कारण था कि रामू कमला की अपेक्षा सीता को अधिक महत्व देता है ं यह बात कमला को अच्छी नहीं लगती , वह रामू से सीता से बोलने के लिए मना करती है तो रामू कहता है  -
‘‘वाह क्यों नहीं बोलूँ ? वह मुझे अपने हिस्से की मिठाई देती है । अपने पास इक्के पर बैठाती है , तेरे पास मिठाई है , इक्का है ?’’9 इस प्रकार सर्वेष्वर ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि आज जिसके पास धन तथा सुख -सुविधाऐं हैं , लोग उसे ही महत्व देते है । 
 सर्वेष्वर दयाल सक्सेना ने ‘सूने चैखटे उपन्यास में आर्थिक पक्ष को भी उभारा है जिस प्रकार मध्यवर्गीय लोग आर्थिक परिस्थितियों से मुकाबला करते हैं सर्वेष्वर ने उसे महसूस किया है तथा अपने उपन्यास में इसे विषेष महत्व दिया है आर्थिक तंगी के कारण की अन्धी नानी भूखी मर जाती है । कमला को जब यह पता चलता हे तो उसे बहुत दुःख होता है  ....‘‘ और वह भूखी मरी थी , उसने किसी से नहीं बताया था । वह इस बात की प्रतीक्षा करती रही कि वह कब तक इस लायक हो सके कि अपने हाथ चलाकर खाए ं ऐसा क्यों हुआ ? उसने किसी पर क्यों अपना इतना अधिकार तक नहीं समझा कि वह इतना कह सकती कि वह हाथ - पैर चलाने में असमर्थ है , उसे दो रोटी चाहिऐ ’’। 10
सर्वेष्वर ने रामू की आर्थिक समस्या को भी चित्रित किया है । आर्थिक तंगी के कारण रामू अपने परिवार में भी कटा -कटा सा रहता है । वह कमला को बताता है उसे परिवार काटता है । खाने और सोने के अतिरिक्त घर में कोई आकर्षण नहीें है ं माँ बीमार रहते - रहते चिड़चिडी हो गई है तथा पिता अधिक काम करने के कारण थककर उदास रहते है ं कहने का तात्पर्य हैं कि आर्थिक कठिनाइयों के कारण उसके जीवन में निराष है ।  वह कमला को बताता है ... ‘‘आर्थिक कठिनाइयां इतनी कि घर का काम नहीं चलता और इन्ही परेषानियां केा लेकर अक्सर घर में चख चख । आठवीं के बाद से में भी ट्यूषन कर रही हॅू अपनी पढ़ाई का खर्च निकालना पड़ता है और आगे भी इसी शर्त पर पढ़ सकता है कि घर से अधिक सहायता की आषा ना करुॅ ’’। 11
इस प्रकार सर्वेष्वर ने अपने जीवन की कठिनाइयों एवं आर्थिक संवेदना को दिखाने का प्रयास किया है । इसी प्रकार सर्वेष्वर ने उपन्यास में राम गुलाम इक्केपन की आर्थिक कठिनाइयों पर प्रकाष डाला है ‘‘इक्का बहुत पहले ही हटा देना पड़ा । जितना पैसा मिलता था उतने से घोड़े का ही पेट नही भरता था, आदमी की तो बात ही अलग ...... वो (राम गुलाम) अब खोंचा लगाते है थोड़ा बहुत जो मिलता है उसमें सड़क वाले इंस्पेक्टर , सिपाही लोग ले लेते है , नही तो बैठने न दें । बाकी में किसी तरह खर्च चलता है ’’। 12
सर्वेष्वर दयाल सक्सेना ने समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को सभी के समक्ष लाने का प्रयास किया है किस प्रकार गरीब लोगों का शोषण होता है उपन्यास में आर्थिक तंगी के कारण ही रामू कमला को न पा सका । 
निष्कर्ष - सर्वेष्वर दयाल सक्सेना के सूने चैखटे उपन्यास का अध्ययन एवं विष्लेषण करने के पश्चात हमने देखा कि सर्वेष्वर दयाल सक्सेना ने समाज में व्याप्त झूटी परम्पराओं तथा खोखली मूल्य व्यवस्था का चित्रण एवं निम्न मध्यवर्गीय समाज की आर्थिक विवषताऐं , रुढ़ियां , खोखली मूल्य व्यवस्था पर गहरी चोट करता है इस उपन्यास में सामाजिक , राजनैतिक , आर्थिक , एवं नारीगत संवेदनाओं के माध्यम से निम्न मध्यवर्गीय समाज को जाग्रति प्रदान की गई है । 
सहायक ग्रन्थ 
1. सूने चैखटे: सर्वेष्वर दयाल सक्सेना वाणी प्रकाषन नई दिल्ली 
2. सर्वेष्वर: सम्पूर्ण गद्य रचनाएं - सर्वेष्वर दयाल सक्सेना , किताबघर प्रकाषन नई दिल्ली 
सन्दर्भ:- 
1. सूने चैखटे उपन्यास , सर्वेष्वर दयाल सक्सेना पृ. स. - 19
2. सूने चैखटे उपन्यास , सर्वेष्वर दयाल सक्सेना पृ. स. - 20
3. सूने चैखटे उपन्यास , सर्वेष्वर दयाल सक्सेना पृ. स. - 56
4. सूने चैखटे उपन्यास , सर्वेष्वर दयाल सक्सेना पृ. स. - 30
5. सूने चैखटे उपन्यास , सर्वेष्वर दयाल सक्सेना पृ. स. - 39
6. सूने चैखटे उपन्यास , सर्वेष्वर दयाल सक्सेना पृ. स. - 39
7. सूने चैखटे उपन्यास , सर्वेष्वर दयाल सक्सेना पृ. स. - 52
8. सूने चैखटे उपन्यास , सर्वेष्वर दयाल सक्सेना पृ. स. - 52
9. सूने चैखटे उपन्यास , सर्वेष्वर दयाल सक्सेना पृ. स. - 25
10. सूने चैखटे उपन्यास , सर्वेष्वर दयाल सक्सेना पृ. स. - 52
11. सूने चैखटे उपन्यास , सर्वेष्वर दयाल सक्सेना पृ. स. - 52
12. सूने चैखटे उपन्यास , सर्वेष्वर दयाल सक्सेना पृ. स. - 55-56


      तनु कुलश्रेष्ठ 
शोध छात्रा - हिन्दी विभाग आगरा काॅलेज आगरा 
     ड़ा0 भीमराव आंबेडकर वि0 वि0 आगरा
     78 पष्चिम पुरी सिकन्दरा, आगरा
     मोबाइल न0 - 9410000141  
म्.उंपस.जंदनानस18/हउंपसण्बवउ


 


 


 


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