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Tuesday, December 31, 2019

बधाइयों का लेन-देन

होगा बधाइयों का लेन-देन, फिर से ये नया साल आया है!
नही सोचा पिछले साल में,क्या खोया और क्या पाया है!!


बॉर्डर पर खड़ा फौजी, क्यों नही नया साल मनाता है!
कड़ाके की इस सर्दी में, उसका भी तो बदन थर्राता है!
फौजियों की अर्थी देख, ये कलेजा मुँह को आता है!
एक आह भी ना निकले , ये पत्थर दिल  हो जाता है!!
भारत माँ की रक्षा का जिम्मा, इनके मन मे समाया है!
होगा बधाइयों का लेन-देन, फिर से नया साल आया है!!


आज आत्महत्या कर रहा वो, जो सबका पेट भरता है!
मौसम के हर रंग देख, उसका दिल भी कितना डरता है!
भावों के उतार-चढ़ाव से, वो पल पल भी तो मरता है!
हर तरह का टूटा कहर, जो आकर उस पर पड़ता है!
दिन रात बिताता खेत मे, रात में साथ इसका साया है!
होगा बधाइयों का लेन-देन, फिर से नया साल आया है!!


किस बात की दे रहे बधाई, यहां होती कितनी हत्याएं हैं!
रेप की शिकार यहां पर, जाने हुई कितनी बालिकाएं हैं!
कितनी लाशे आयी जवानों की, हुई कितनी विधवाएं हैं!
किसान ने जाने कब कब, बच्चे भूखे पेट सुलाये हैं!
किस खुशी को देखकर के, हम पर ये सुरूर छाया है!
होगा बधाइयों का लेन-देन, फिर से नया साल आया है!!



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Aksharwarta International Research Journal, February - 2023 Issue