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Sunday, January 12, 2020

गोस्वामी तुलसीदास का काव्य एवं काव्य-दृष्टि

गोस्वामी तुलसीदास का काव्य एवं काव्य-दृष्टि
      डॉ. बॉबी यादव
मा. कांशीराम राजकीय महाविद्यालय,नंदग्राम, गाजियाबाद, उप्र.



 काव्य-दृष्टि से तात्पर्य है किसी विशिष्ट दृष्टिकोण से साहित्य का सृजन करना। कवि-दृष्टि वस्तुत: किसी कवि का  वैयक्तिक दृष्टिकोण होता है, जो उसके अंतरतम में समाहित रहता है एवं जिसे लेकर वह काव्य सृजन की ओर उन्मुख होता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने समय, समाज, परिवेश आदि से प्रेरणा ग्रहण करते हुए एवं उसके सार तत्व को आत्मसात करते हुए स्वयं को अभिव्यक्त करता है। इस स्व-अभिव्यक्ति को प्रकट करने की दृष्टि को, समय-काल विभेद के कारण अलग-अलग होना अवश्यंभावी है। यद्यपि उत्कृष्ट साहित्य सदैव कालातीत होता है तथापि उस पर समय की छाप अपना प्रभाव छोड़ती है और यही संधि-भेद वैयक्तिक दृष्टिकोण में परिवर्तन का कारक होता हैं और यही वैचारिक विभेद एवं भिन्नता ही किसी कवि की काव्य-दृष्टि के किसी अन्य कवि की काव्य-दृष्टि से पृथक होने का कारक होते हैं। मोटे तौर पर यह विभेद व्यष्टि और समष्टि का विभेद है, 'स्व' और 'पर' का विभेद है, आत्मनिष्ठता और समाजनिष्ठता का विभेद है। यही काव्य-दृष्टि का विभेद, कवि के समस्त रचना-कर्म की सार्थकता पुष्ट करता है।  यही दृष्टिकोण कवि के संपूर्ण जीवन-काल के समस्त अनुभव का सार हम सभी के समक्ष परिलक्षित करता है। कवि की यही काव्य-दृष्टि उसके रचना-कर्म के उद्देश्य को उद्घाटित करती है।
 प्रत्येक कवि-कर्म किसी न किसी उद्देश्य से प्रेरित होता है और विशेष तौर पर महाकाव्य तो किसी न किसी महान उद्देश्य से प्रेरित होकर सृजित किया ही जाता है। उस उद्देश्य का निर्धारण, उस कवि की काव्य-दृष्टि से उद्भूत होता है। किसी भी महाकाव्य में रचना-कर्म के विविध स्तर होते हैं जिसमें वैचारिक और बौद्धिक विमर्शों पर व्यापक चिंतन एवं मनन होता है। यह सब वैचारिक स्तरिकी उस कवि के काव्यात्मक दृष्टिकोण को उद्घाटित करती है एवं उसके व्यक्तित्व के विविध आयामों से भी परिचित करवाती है। गोस्वामी तुलसीदास की काव्य-दृष्टि का भी सवाज़्धिक निदर्शन उनके द्वारा सृजित महाकाव्यों में ही ज्यादा विश्वसनीय एवं प्रामाणिक रूप से होता है। विशेषत: मानस में उनके वैचारिक दृष्टिकोण के विविध पहलू अंकित हैं। 
 गोस्वामी तुलसीदास काव्य को 'लोक मंगल' का कारक मानते हैं। वे उसे 'स्वांत: सुखाय' मानते हैं जो सही मायने में 'परजन हिताय' हो जाता है। गोस्वामी जी के अनुसार-''कीरति भणिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सबकर हित होई।'' अर्थात गोस्वामी जी ने उसी 'भणिति'या काव्य को श्रेष्ठ माना है जिसमें सभी का हित हो एवं जिसमें लोक कल्याणकारिता निहित हो। साथ ही वही कविता श्रेष्ठ है जो मां गंगे के समान सर्वमंगलकारिणी हो। अत: हम कह सकते हैं कि तुलसी ने जनहित को सामने रखकर काव्य सृजन किया एवं उनका कवि-कर्म सामाजिक दायित्वों  को वहन करते हुए जन-जन के कुशल क्षेम का आग्रही है। उनके मत के अनुसार सार्थक साहित्य की परिभाषा यही है कि वह 'सर्वजन को सर्वहित का मार्ग प्रशस्त करे'तथा सभी लोगों को व्यापक मानव-हित के उद्देश्य  के लिए प्रेरित कर सके। उन्होंने अपने समय के अंधकार 'युग की पतनशील साहित्यिक प्रवृत्तियों को एक रचनात्मक दिशा' प्रदान की एवं अपने 'सात्विक जीवन के साक्ष्य पर साहित्य की सार्थक परंपरा का सूत्रपात किया'। 
 तुलसी की रामकथा ऐसी कविता है जो- 'मंगल करनी कलिमल हरनीए तुलसी कथा रघुनाथ की'  है एवं 'संभुक भेक सिवार समाना। इहां न विषय कथा नाना।'  आदि के द्वारा भी इसी सिद्धांत का ही प्रतिपादन किया है। उनके अनुसार 'जो कविता भावक के चित्त को केवल विषय-रस से ही प्रभावित करती है, वह हेय है। तुलसी प्रत्येक भाव की सहजाभिव्यक्ति को श्रेष्ठ कविता नहीं मानते। उनकी दृष्टि में श्रेष्ठ विचारों से अनुप्राणित रसाभिव्यंजक रमणीय वाणी ही'श्रेष्ठ कविता है:-
      'हृदय सिंधु मति सीप समाना। स्वाती सरद कहहिं सुजाना॥ 
      जो बरखै बर बारि बिचारू। होहिं कबित्त मुकता मनि चारू॥ 
              जुगुति बेधि पुनि पोही अहीं रामचरित बर लाग।
              पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग॥'
 उपर्युक्त पंक्तियों में तुलसी ने रूपक के माध्यम से काव्य के चार तत्वों के समन्वित होने पर बल दिया है। वे चार तत्व है-रामचरित (कथानक), हृदय (भाव), बिचारू (बुद्धि-पक्ष) और जुगुति (युक्ति, रचना कौशल)। 'सद्विचार रहित भावों के उच्छंखल मात्र से निर्मल हृदय सज्जनों की परितुष्टि नहीं हो सकती है। वही काव्य महान है जिसकी कलात्मक भाव-व्यंजना उत्कृष्ट जीवन दर्शन से संबंधित हो।'
 गोस्वामी जी की दृष्टि में- 'परहित सरिस धरम नहीं भाई।  परपीड़ा सम नहिं अधमाई।' अर्थात दूसरों की भलाई (परहित) करने से बड़ा कोई धर्म नहीं है और दूसरों को दु:ख पहुंचाने (परपीड़ा) के सामान कोई पाप नहीं है। मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है मानवता का होना। सही मायनों में केवल वह व्यक्ति ही धन्य है जो  सदैव सर्वजन हित कार्यो में संलग्न  रहता है  एवं परोपकार से बड़ा कोई पुण्य नहीं है। जो व्यक्ति स्व की चिंता न कर परोपकार का कार्य करता है, वही सच्चे अर्थों में मनुष्य है। ईश्वर ने हमें जो भी शक्तियां व सार्मथ्य दिए हैं वे दूसरों का कल्याण करने के लिए ही दिए हैं। प्रकृति के प्रत्येक कण-कण में परोपकार की भावना दिखती है। सूर्य, चंद्रमा, हवा, पेड़-पौधे, नदी, बादल आदि सभी बिना किसी स्वार्थ के सेवा में लगे रहते हैं। उन्होंने परहित, लोकमंगल आदि शाश्वत मूल्यों की वकालत की और अपने समय के बहुवाद के वातावरण में मानवतावादी सिद्धांत एवं व्यापक मानवीय मूल्यों के आधार पर समाज की रचना पर बल दिया। गोस्वामी जी ने यद्यपि यह घोषित किया कि वे रघुनाथ गाथा को 'स्वांत: सुखाय' और 'स्वान्तस्तम: शांतये' के उद्देश्य से लिख रहे हैं किंतु आरंभ में 'मंगल करनी कलिमल हरनी' राम कथा को अपना प्रतिपाद्य बताते हैं। यह बात हम लोग भली भाँति जानते हैं कि किसी 'सच्चे भक्त कवि का 'स्व' अपूर्ण, संकुचित और वैयक्तिक सीमा में आबद्ध नहीं हो सकता'। लोकमंगल का विधान, सच्चे कवि और भक्त का आत्यंतिक लक्ष्य है-'स्वांत:सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा।'  आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कविता का लक्ष्य स्पष्ट करते हुए लिखा है कि-''कविता वह साधन है जिसके द्वारा शेष सृष्टि के साथ मनुष्य के रागात्मक संबंध की रक्षा या निर्वाह होता है।''रागात्मक साधना का जो स्वरूप कवियों के लिए आवश्यक है वही भक्ति के लिए भी चरितार्थ है। इसीलिए कवि और भक्त का 'स्वान्त: सुख' व्यापक स्तर पर  विश्व मंगल में ही निहित रहता है। 
 आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास का मानना है कि श्रामचरित प्रकृतया मंगलमय है और राम कथा गायन वैश्विक स्तर पर लोकमंगल के विधान का उपक्रम है तथा राम अपने बाल्यकाल से ही वही करते हैं जो लोकहित साधक होता है- 'जेहि विधि सुखी होहीं पुर लोगा। करहीं कृपा निधि सोई संजोगा॥'आचार्य रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार तुलसी की दो दृष्टियां है। एक है 'ईश्वर में पूरी आस्था'और दूसरी है 'मनुष्य का पूरा सम्मान'। उनके अनुसार 'ये दोनों दृष्टियां तुलसी में एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। 'सिया-राममय सब जग जानी। करहूँ प्रनाम जोरि जुग पानी।' जैसी पंक्तियां इस गहरे आत्मविश्वास पर ही लिखी जा सकती हैं, जहां ईश्वर और मनुष्य दोनों की एक साथ प्रतिष्ठा हो। 'सिया-राम' यदि उनकी भक्ति के लिए आश्रय-स्थल हैं तो 'सब जग' उनके रचना-कर्म के लिए। आलोचक को कभी-कभी अटपटा लग सकता है कि बाबा कहे जाने वाले तुलसीदास मानव-मन और रचना-कर्म की इतनी सूक्ष्म गहराइयों तक पैठ कैसे और क्योंकर रखते हैं ! अनुभूति और अभिव्यक्ति का जैसा संश्लिष्ट रूप रचना में वस्तुत:  प्रत्याशित है वह ईश्वर और मनुष्य की इस एकरूपता में से निकलता है।' उनके अनुसार 'उनकी काव्य-दृष्टि ईश्वर और मनुष्य दोनों को एक साथ प्रतिष्ठित करती है'एवं दोनों का आपस में अन्योन्याश्रित संबंध है। वे यह भी मानते हैं कि- 'अहं से संघर्ष का ही यह परिणाम है कि तुलसी रामचरितमानस में बार-बार आग्रह पूर्वक बताते हैं कि उनकी रचना स्वान्त:सुखाय, आत्मतोष और आत्म-प्रबोधन के लिए है। अर्थात जो रचना वे कर रहे हैं वह न किसी के निर्देश पर है और न किसी को उपदेश के लिए है। भक्त से उपदेशक की भूमिका में वे नहीं जाना चाहते। रचना में यदि उपदेश है तो वह राम-कथा के अंतर्गत है, कवि की ओर से नहीं। कवि की ओर से तो एक ही उपदेश है राम-कथा में अनुराग का।' 
 गोस्वामी तुलसीदास की दृष्टि में रामोन्मुखता ही उनके काव्य का प्रतिपाद्य है। उन्होंने राम विमुख जीवन को जीवन नहीं माना और राम नाम हीन कविता को कविता नहीं माना। उदाहरणतया-  'राम विमुख अस हाल तुम्हारा। रहा न कोउ कुल रोवन हारा।', 'भनिति बिचित्र सुकवि कृत जोऊ। राम नाम बिनु सोह न सोऊ॥' उनकी कवि-दृष्टि के केंद्र में 'राम विमुख'और 'राम सम्मुख'आचरण है और वे मानते हैं कि कोई सजीव प्राणी राम विमुख हो ही नहीं सकता और यदि कोई है तो-'जाके प्रिय न राम वैदेही, तजि, ताहि कोटि बैरी सम जदपी परम स्नेही।'
  डॉ विद्यानिवास मिश्र मानते हैं कि तुलसी की काव्य दृष्टि ने रस दृष्टि को आगे बढ़ाया है। रस का आधार सामंजस्य, स्वातंपय एवं स्वप्रकाशता है। उन्होंने रस और भक्ति का अविनाभाव स्थापित किया है: 'भनिति भदेस बस्तु कवि बरनी, राम कथा जग मंगल करनी॥'  इस प्रकार शास्त्रीय रस बहिर्भूत है, मुख्य आधार है राम-सीता का यश।
 आचार्य राम स्वरूप चतुवेदज़्ी तुलसी के रचनात्मक चरित्र को 'चरम आदर्शात्मक'मानते हैं और 'कवित्त बिबेक एक नहिं मोहे' उद्धृत करते हुए कहते हैं कि या तो यह प्रच्छन्न अहंकार है या फिर भक्ति के सघनतम रूप में विलीन अहम भाव। 'वह भक्ति कैसी होगी जो इस कोटी के अहं का विलीनीकरण कर सके! रचना और भक्ति दोनों की प्रक्रियाएँ इसी विलीनीकरण में लगती हैं।' यह सब एक अत्यंत संवेदनशील और ईमानदार कवि का आत्म निरीक्षण है। 
 डॉ बच्चन सिंह तुलसी को 'प्रतिरोधात्मक' (रेजिस्टेंट) दृष्टिकोण का मानते हैं। उनके अनुसार- 'इस दृष्टिकोण के कारण ही वे मानस को पौराणिक महाकाव्य का रूप दे देते हैं। उनकी  मूल विचारधारा वर्णाश्रम धर्म की पोषिका है जो इस देश की सामंती व्यवस्था का मूल आधार है। शुक्लजी उनके इसी दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं- 'निर्गुणधारा के संतो की वाणी में किस प्रकार लोकधर्म की अवहेलना छिपी हुई थी! सगुणधारा के भारतीय पद्धति के भक्तों में कबीर, दादू आदि के लोकधर्म-विरोधी स्वरूप को यदि किसी ने पहचाना तो गोस्वामीजी ने।' इसी कारण वह वर्णाश्रम धर्म का समर्थन करते हुए उससे समस्त दुखों के नष्ट होने का मूल मानते हैं. 'वर्णाश्रम निज निज धरम निरत बेदपथ लोग। चलहीं सदा पावहीं सुख नहीं भय सोक न रोग॥' काव्य-दृष्टि किसी कवि का  नितांत वैयक्तिक वैचारिक दृष्टिकोण होता है जो उसके समस्त साहित्य सृजन के मर्म का मूलाधार होता है। यह स्व-अभिव्यक्त दृष्टि समय-काल की अतिक्रमित अभिव्यक्ति का वैचारिक आग्रह होती है। गोस्वामी तुलसीदास काव्य को 'लोक मंगल' का कारक मानते हैं। वे उसे 'स्वांत: सुखाय' मानते हैं जो सही मायने में 'परजन हिताय' हो जाता है। गोस्वामी जी ने परहित, लोकमंगल आदि शाश्वत मूल्यों की वकालत की और अपने समय के बहुवाद के वातावरण में मानवतावादी सिद्धांत एवं व्यापक मानवीय मूल्यों के आधार पर समाज की रचना पर बल दिया। उनकी काव्य-दृष्टि का आधार वस्तुत: राम-राज्य कि स्थापना से ही संभव है एवं वे राम-नाम को समस्त सृष्टि का मूल मानते हैं।
 इस प्रकार अंतत: हम कह सकते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास की काव्य-दृष्टि का आधार लोकमंगल है जो वस्तुत: राम-राज्य कि स्थापना से ही संभव है एवं वे राम-नाम को समस्त सृष्टि का मूल मानते हैं, दूसरे शब्दों में कहें तो समस्त सृष्टि  सियाराममय है तथा वह लोकमंगल, लोक कल्याण, जनहित से ओत-प्रोत है। 


संदर्भ सूची:-
1. तुलसीदास- श्रीरामचरितमानस,  गीता प्रेस, गोरखपुर, सं.2057
2. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, ना.प्र.,सभा,   वाराणसी, सं. 2053 
3. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, गोस्वामी तुलसीदास, ना.प.सभा,    वाराणसी, सं. 2053
4. बच्चन सिंह,हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, राधाकृष्ण,    दिल्ली,2000
5. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला',तुलसीदास, भारती भंडार, इलाहाबाद,   1962
6. रामस्वरूप  चतुर्वेदी,  हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास,    लोकभारती, इलाहाबाद, 1998


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