लेखक से मिलिये (लोकार्पण और परिचर्चा), 'माटी मानुष चून' – अभय मिश्रा

 9 जनवरी 2020


हॉल, 12ए, स्टॉल नं. 233-252, शाम 4:00 बजे


प्रगति मैदान, नयी दिल्ली


विश्व पुस्तक मेले में 9 जनवरी 2020 को वाणी प्रकाशन के स्टॉल पर युवा रचनाकार एवं पर्यावरणविद अभय मिश्रा की पुस्तक 'माटी मानुष चून' का लोकार्पण और परिचर्चा की जायेगी। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता लेखक एवं पत्रकार सोपान जोशी, स्वतंत्र पत्रकार अरूण तिवारी और  लेखक व पत्रकार पंकज रामेंदु होंगे।


पुस्तक के बारे


अनुपम भाई अक्सर कहा करते थे कि प्रकृति का अपना कैलेण्डर होता है और कुछ सौ बरस में उसका एक पन्ना पलटता है। नदी को लेकर क्रान्ति एक भोली-भाली सोच है इससे ज़्यादा नहीं। वे कहते थे हम अपनी जीवन-चर्या से धीरे-धीरे ही नदी को ख़त्म करते हैं और जीवन-चर्या से धीरे-धीरे ही उसे बचा सकते हैं। उनका ‘प्रकृति का कैलेण्डर’ ही इस कथा का आधार बन सका है। नारों और वादों के स्वर्णयुग में जितनी बातें गंगा को लेकर कही जा रही हैं यदि वे सब लागू हो जाये तो क्या होगा? बस आज से 55-60 साल बाद सरकार और समाज के गंगा को गुनने-बुनने की कथा है ‘माटी मानुष चून'। -अभय मिश्रा


अभय मिश्रा की पैदाइश और पढ़ाई-मध्य प्रदेश में। पापा सरकारी नौकरी में थे इसलिए प्रदेश के कई हिस्सों (सीधी, रीवा, अम्बाह, होशंगाबाद, खण्डवा, इन्दौर, भिण्ड, ग्वालियर और भोपाल) की संस्कृति ने पोसा। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में डिग्री ली। रोजी रोटी की चिन्ता दिल्ली ले आयी वाया हैदराबाद। नवभारत, ईटीवी, वायस ऑफ़ इंडिया, राज्यसभा टीवी सहित कई चैनलों और अख़बारों में काम करने का मौका मिला। जब मुख्य धारा का मीडिया भरोसा पैदा नहीं कर पाया तो स्वतन्त्र लेखन की तरफ़ मुड़ गये। यथावत में पिछले पाँच सालों से नदियों पर नियमित कॉलम। द प्रिंट, जनसत्ता सहित डिजिटल और प्रिंट माध्यम में स्वतन्त्र लेखन। पूरे गंगापथ (गोमुख से गंगासागर) की अब तक चार बार यात्रा की। देश की तक़रीबन सभी नदियों को छूकर देखने-समझने की कोशिश अनवरत जारी। विभिन्न स्कूलों में बच्चों के साथ नदी संस्कृति और उसके बदलाव पर बातचीत होती रहती है। (लेक्चर थोड़ा भारी शब्द है।) पंकज रामेन्दु संग दर दर गंगे लिखी जो गंगा पर आधारित फ़िक्शनल ट्रैवेलॉग है। इन दिनों इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में नदी संस्कृति को समझने की कोशिश कर रहे हैं।


 


सोपान जोशी - पर्यावरणविद, लेखक, पत्रकार है।  गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान से जुड़े शोधकर्ता है। पर्यावरण के साथ खेल और विज्ञान में भी उनकी पकड़ है।


पंकज रमेन्दु– लेखक पत्रकार है। वाटर एड के फैलो हैं और कॉलम राइटर, फ़िक्शन राइटर के तौर पर भी जाने जाते है।


अरूण तिवारी - नदियों विषय पर लगातार लिखते है, स्वतंत्र पत्रकार है।