रील  के  पीछे  की  रियल ‘दिल एक सादा कागज’  उपन्यास

राही मासूम रज़ा की 28 वीं पूण्य तिथि (15 मार्च) के विशेष अवसर पर


रील  के  पीछे  की  रियल दिल एक सादा कागज  उपन्यास


मनुष्य अन्य प्राणियों से भिन्न होने के कारण अपनी संवेदनाओं को लंबे समय तक सहेज कर रखने में सक्षम है। हर्ष, दु:ख, उल्लास आदि मनोभावों को समय-समय पर मानव व्यक्त करता रहता है। अपनी संवेदनाएं को सहेजे रखने के पीछे मूल कारण यह माना जाता है कि इससे वह अपना नैतिक ज्ञान एवं भविष्य को और भी सशक्त बना सके। इन सबके अतिरिक्त मनोरंजन की भावना भी इसमें निहित रहती है। व्यक्ति अपनी इन भावनाओं को व्यक्त करने के लिए प्रारंभ से ही कई तरह के माध्यमों का प्रयोग करता रहा है। अगर हम इसका ऐतिहासिक विकास क्रम देखें तो चित्रकला, लोकनाट्य, वार्ता, लिखित साहित्य एवं मौखिक साहित्य आदि विधाएं हमारे सामने इसके ऐतिहासिक सोपानों के रूप में विद्यमान है। जैसे-जैसे व्यक्ति की बुद्धि का विकास होता गया, वैसे-वैसे इन माध्यमों का स्वरूप भी बदलता गया। कालांतर में रंगमंच सभी साधनों पर भारी पड़ा, इसके पीछे मुख्य कारण इसका सामाजिक होना है। नाटक की इस विशेषता के संदर्भ में रामस्वरूप चतुर्वेदी कहते हैं, “इधर नाटक सभी साहित्य और कला माध्यमों के बीच अपनी शक्ति में सर्वाधिक सामाजिक है। रंगमंच पर उसका प्रस्तुतीकरण अनेक प्रकार से होता है वैसे ही उसका आस्वादन समाज के रूप में किया जाता है।“(1) चतुर्वेदी जी के इन वाक्यों में भारतीय उप महाद्वीप में हुए पुनर्जागरण के बीज भी देखे जा सकते हैं। अंग्रेजों के भारत में स्थाई रूप से स्थापित हो जाने के पश्चात भारतीय नाट्य रंगमंच भी बदला। पारसी थियेटर और परंपरागत भारतीय नाट्य मंडलियों के मध्य प्रारंभिक टकराव के पश्चात बीसवीं सदी के द्वितीय एवं तृतीय दशक में मनोरंजन एवं सम्वेदनाओं को उकेरने के संदर्भ में एक नई विधा सामने आई जो सिनेमा के रूप में जानी जाती हैं। यहां यह स्पष्ट करना उचित रहेगा कि सिनेमा भी नाट्य विधा का संशोधित रूप माना जाता है। अपने शुरुआती संघर्ष के पश्चात  हिंदी सिनेमा पर प्रगतिशील विचारधारा का प्रभाव पड़ा। इप्टा इसमें  से एक है।


हिंदी सिनेमा में कई साहित्यकारों ने अपना भाग्य आजमाने का प्रयास किया जिसमें कई सफल हुए और कई असफल। भारतीय साहित्यकार अभिव्यक्ति के इस माध्यम की प्रखरता के बारे में बहुत परिचित थे। वे यह भी मानकर चल रहे थे कि आने वाले समय में अभिव्यक्ति का यह माध्यम शिक्षा के रूप में भी प्रयुक्त हो सकता है क्योंकि भारतीय जनता का एक बहुत बड़ा वर्ग अशिक्षित है। ऐसे में सीमित साधनों वाले इस देश में इस साधन का उपयोग जनता को शिक्षित करने के लिए किया जा सकता है, इस संदर्भ में एक जगह राही मासूम रज़ा कहते हैं, “सिनेमा उन लोगों तक भी पहुंच जाता है जो पढ़ना लिखना नहीं जानते। भारत जैसे अशिक्षित देश में सिनेमा की कला के महत्त्व को अनदेखा नहीं कर सकते।......सिनेमा की इस बेपनाह ताकत के अतिरिक्त साहित्य की शिक्षा और समाज के लिए सिनेमा को साहित्य के रूप में स्वीकार कर उसे साहित्य के पाठ्यक्रम में शामिल करना आवश्यक है।”2 राही के यह विचार सिनेमा की प्रासंगिकता एवं भारतीय उपमहाद्वीप की विसंगतियों को स्पष्ट करने में सक्षम है।


भारतीय सिनेमा का एक बड़ा भाग हिंदी सिनेमा के नाम में भी जाना जाताहै। हिंदी प्रदेश के कई साहित्यकार जो हिंदी और उर्दू दोनो भाषाओं में लिखते थे, उन्होंने भी इस क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया जिनमें प्रेमचंद, इस्मत चुगताई, ख्वाजा अब्बास, कृष्ण चंदर जैसे बड़े नाम प्रमुख हैं। इनमें से कई बुरी तरह से असफल रहे। राही मासूम रज़ा, कमलेश्वर, विष्णु खरे, यशपाल, धर्मवीर भारती, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, गुलजार, निदा फाजली, जैसे साहित्यकार सिनेमा में अपने आपको स्थापित करने में सफल रहे। राही मासूम रज़ा ने अभिव्यक्ति के इस माध्यम में पटकथा लेखक एवं संवाद लेखक के रूप में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उनके द्वारा महाभारत सीरियल के लिए लिखे गए संवाद अब तक के श्रेष्ठ संवाद माने जाते हैं।


सन् 1973 में प्रकाशित दिल एक सादा कागज उपन्यास एक लेखक के बिकने की कहानी है। इस उपन्यास के लेखन तक राही एक सफल फिल्म पटकथा एवं संवाद लेखक के रूप में फिल्मी जगत में स्थापित हो चुके थे। यह उपन्यास इस क्षेत्र में किए गए उनके संघर्ष की गाथा है। आप इस क्षेत्र में नहीं आना चाहते थे, बल्कि एक शिक्षक बनना चाहते थे। मगर जीवन के कड़वे अनुभवों ने उन्हें अपने ख्वाबों से समझौता करने के लिए मजबूर कर दिया। पर वे अपनी बात कहने के लिए कोई न कोई रास्ता तलाश कर ही लेते थे। फिल्म में समाजोपयोगी सामग्री किस तरह से डाली जाए इसे लेकर वे हमेशा तत्पर रहते थे। एक साक्षात्कार में वे कहते हैं, “13-14 हजार फुट की फिल्म मे से 50 फुट में मैं अपने बात कहता हूं, बस उसी के सहारे जिंदा हूँ।”3 राही के इन विचारों से स्पष्ट होता है कि समाज को शिक्षित करने के इस बड़े माध्यम का प्रयोग दबाव के बावजूद अपनी बात कहने के लिए कहीं न कहीं जगह बना लेते थे और इसी जगह के सहारे उनका लेखक रूप जिंदा रहता था।


पर राही जैसा अवसर हर लेखक को नहीं मिलता है। प्रस्तुत उपन्यास का मुख्य पात्र रफ्फन जब अपनी कहानी बेचने के लिए मँझले प्रोड्यूसर के घर जाता है तो हीरो-हीरोइन और वहां पर बैठे लोग जो साहित्य और सिनेमा की बारीकियों से दूर-दूर तक परिचित नहीं है, वे उनकी कहानी को अस्वीकार कर देते हैं। बार-बार असफलता के कारण रफ्फन मानसिक द्वंद्व से घिरा हुआ है। कहानी न बिकने पर रफ्फन की कैसी स्थिति होती है, उसे लेखक कुछ इस तरह परिचय करवाता है, “साहित्य जरूरी है या घर का किराया? साहित्य का महत्त्व ज्यादा है या राशन कार्ड का? जिंदगी को एक खूबसूरत नज़्म एवं उदाम चौपाई ज्यादा खूबसूरत बनाती है या पत्नी की मुस्कुराहट? गालिब का दीवान या धोबी का हिसाब? लड़ाई या कंप्रोमाइज?”4 रफ्फन की इस मनोस्थिति को भापते हुए उसकी पत्नी हिम्मत बढ़ाते हुए कहती है, “कहानी नहीं बिकी तो घबराते क्यों हो?” जन्नत ने कहा, “मैं घर का खर्च और कम कर लूंगी।”5 पर जन्नत की इस हौसला अफजाई का रफ्फन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। वह महंगाई के सामने हार मानते हुए गंदी, तड़क-भड़क व रोमांच से भरपूर कहानियां लिखना शुरू कर देता है। शीघ्र ही रफ्फन ऐसी कहानियों की बदौलत एक नामी फिल्म लेखक के रूप में इस इंडस्ट्रीज में स्वीकार कर लिया जाता है। पर यह परिवर्तन एक लेखक की मौत के बाद सामने आता है। ऐसे दर्दनाक परिवर्तन के संदर्भ में राही का मानना है कि व्यक्ति का पेट उसके फैसलों में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। खुद को और अपने परिवार वालों को जिंदा रखने के लिए अगर ऐसा कुछ करना पड़े तो राही उसे जायज मानते हैं। राही को स्वयं ऐसी परिस्थिति से गुजरना पड़ा था जिसके कारण जब उनकी आलोचना भी हुई। आलोचक को करारा जवाब देते हुए वह कहते हैं, “मुझे जीना भी है। हिंदुस्तान में आप अच्छा लिखकर जी नहीं सकते। कुछ अच्छा लिख सकूं इसके लिए ‘सबस्टैंडर्ड’ काम करता हूं ताकि जी सकूं। जीऊँगा तभी तो कुछ अच्छा भी लिख पाऊंगा।”6


पिछले कुछ दशकों से स्त्री-आत्म निर्भरता में लगातार वृद्धि हो रही है। शिक्षा के प्रसार ने इस वर्ग में नई चेतना पैदा की है। आर्थिक स्वतंत्रता ने भी स्त्री के हौसलों को नई उड़ान दी है। पर परंपरागत भारतीय समाज में स्त्री अधिकारों को लेकर कई नए प्रश्न सामने आए हैं। समाज के एक वर्ग ने स्त्री को हमेशा एक दासी समझा है। जब यह दासी अपने दासत्व को त्यागकर उन कार्यस्थलों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई जिन पर सदियों से प्रायः पुरुषों का दबदबा था तो अचानक स्त्री की उपस्थिति को लेकर पुरुष वर्ग में उसे लेकर स्वीकारने और अस्वीकारने से जुड़ा अंतर्द्वंद्व शुरू हुआ। हितों की टकराहट में स्त्री को कुछ ज्यादा गंभीर स्थितियों का सामना करना पड़ता है। इसे स्पष्ट करते हुए राष्ट्रीय सहारा की स्तंभकार सुमिता एक जगह लिखती है, “तमाम विरोधी परिस्थितियों के बीच खड़े होना, अपनी जगह बनाना आसान नहीं है। औरत के लिए तो यह संघर्ष दोहरा संघर्ष है। किसी भी सामान्य व्यक्ति की लड़ाई तो उसकी है ही, औरत होने की वजह से एक दूसरे स्तर पर भी उसे निरंतर मोर्चा बद्ध रहना होता है। इन दोनों मोर्चो पर सतर्कता से डटे रहने के लिए चाहिए ज्यादा तर्क संगत दृष्टिकोण, सुलझा हुआ व्यक्तित्व तथा कुछ अन्य मानसिक और शारीरिक क्षमताएं भी। इसके ना होने का अर्थ है किंकर्तव्यविमूढ़ता। सो चलते हुए बार-बार औरत को बार-बार झिझकना पड़ता है।“7 इस झिझक के साथ स्त्रियों को मानसिक उत्पीड़न एवं कार्यस्थलों पर यौन हिंसा का सामना भी करना पड़ता है। यह उत्पीड़न प्रायः फिल्मी दुनिया में ज्यादा होता है। इसके पीछे इसकी नाटकीयता है जिसकी वजह से पुरुष वर्ग स्त्री के शरीर को छूने के बहाने तलाशता रहता है और अभिनेत्रियां अपनी भावी तरक्की के लिए मौन बनी रहती है। ऐसा ही एक दृश्य उपन्यास में लेखक प्रस्तुत करता है, “बडा हीरो कहानी सुनने में इतना गुम था कि छोटी हीरोइन की जांघ पर पड़ा हुआ अपना हाथ भूल गया था और उसके सारे बदन पर अपने खोए हुए हाथ को बेखयाली में ढूंढ रहा था।“.....अपनी छुपी हुई कुंठा को उजागर करते हुए फिल्म का हीरो एक सीन के बहाने आगे कहता है, “मेरा कोई लव सॉन्ग डालो।“ बड़ा हीरो बोला, “रात का टाइम है। पानी बरस रहा है। हीरोइन के कपड़े उसके बदन से चिपक गए। मैं कहता हूं, लाजो! काश में तुम्हारे बदन का कपड़ा होता।“8 बडे हीरो के ये वाक्य फिल्मी तड़क-भड़क के शोर में दबी पुरुषों की मानसिक विकृति को सामने लाते हैं।


अक्सर समाचार पत्रों एवं मीडिया के अन्य माध्यमों से फिल्मी अभिनेत्रियों की कई खौफनाक कहानियां सामने आती रहती है जिसमें उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर यौन शोषण किए जाने का वर्णन होता है। फिल्म जगत में औरतों का यह उत्पीड़न अपने चरम पर होता है। इस उत्पीड़न में हर उम्र का व्यक्ति हिस्सेदार होता है, यानि कि यह कहा जा सकता है कि जिसे भी अवसर मिला, वह इस घिनौने काम में हिस्सेदार बनने की अभिलाषा रखता है। अपनी व्यथा को उजागर करते हुए एक अभिनेत्री अपने साथी मिथिलेश को एक पत्र में लिखती है, “और वह अधेड़ मेकअप मैन बार-बार मुझे छूने की कोशिश कर रहा था। कभी ब्लाउज ठीक करने की कोशिश करता, कभी बालों को ठीक करता। कभी रुई से चेहरे का मेल उतारने का नाटक करता। गुस्सा तो आ रहा था, पर चुप रही।“9 इसी क्रम में अभिनेत्रियों को फिल्मी जगत में स्थान प्राप्त करने के लिए जो साक्षात्कार देने होते हैं उनके सवालों से परिचय कराती वह अभिनेत्री पत्र में लिखती है, “बाद में कुछ सवाल फिल्मों में अंग प्रदर्शन को लेकर जरूर होते थे। क्या मैं सेक्सी पोशाक पहनूंगी? रोमांटिक द्रश्य में कहां तक कपड़े उतारूंगी? एक सवाल तो मैं भूल नहीं सकती। एक 70 साल के सज्जन थे। वह जब कमरे में आए तो उन्हें बैठने में भी मदद करनी पड़ी। रात को उन्हें दिखता कम था। किसी तरह से एक पेग उन्होंने लिया, मुझसे बोले, “सोनाली जी, आप क्या ऐसी ही सेक्सी पोशाके फिल्मों में भी पहनेगी?”10 आधुनिकता का अभिप्राय परंपराओं में प्रयोग से हैं, मगर अपने आपको आधुनिकता का झंडेदार कहने वाले सिनेमा जगत  में आधुनिकता के नाम पर स्त्री अधिकारों को किस हद तक रौंदा जाता है, यह इन उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है। आज अगर सिनेमा में सेक्स,रोमांस और तड़क भड़क की आंधी में नैतिक मूल्य उड़ रहे है तो इसके लिए फिल्म उद्योग से जुड़े लोग भी कम जिम्मेदार नहीं है। फिल्म निर्माताओं के ऐसे व्यवहार के कारण आज ऐसी फिल्मे बन रही है जिसके कारण परंपरागत भारतीय समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग अपने पूरे परिवार के साथ उन फिल्मों को भी देखने में हिचक महसूस करता है जो प्रायः पारिवारिक होने का दावा करती है।


सफलता के साथ-साथ प्रायः कुछ बुराइयां भी आती है। कुछ बुराइयां तो मजबूरी में व्यक्ति के साथ लग जाती है, पर ज्यादातर मामलों में अवसरवादी दृष्टिकोण ज्यादा जिम्मेदार होता है। तरक्की की बुलंदी पाने के लिए व्यक्ति अक्सर अपनों को ही पाँव तले रौंदता भी है। मानव से अपेक्षा की जाती है कि चुनौतियों के बावजूद मानव मूल्यों की उपेक्षा न करें। पर यह उपेक्षा तरक्की के बढ़ते कदमों के साथ-साथ बढ़ती जाती है। फिल्म जगत् नैतिकता का पाठ पढ़ाने का श्रेष्ठ माध्यम माना जाता है जबकि पर्दे की पीछे की हकीकत कुछ ज़ुदा है। इस हकीकत से सामना उपन्यास में कई जगह होता है। रफ्फन का सहयोग पाकर सामाजिक और आर्थिक स्तर पर सबल हुए काली चरण और शारदा उसे उस वक्त भूल जाते हैं जब दोनों फिल्म जगत में अपना केरियर बना रहे होते हैं। मँझले प्रोड्यूसर के घर रफ्फन का कालीचरण और शारदा से आमना-सामना होता है, तब उस स्थिति को रचनाकार पाठकों के सामने कुछ इस तरह से रखता है, “कालीचरण ने उसे देख लिया। पर उसे देख कर न वह मुस्कराया, न मिलने के लिए उठा।


मँझले प्रोड्यूसर ने परिचय करवाया,


“यह है श्री दिनेश ठाकुर मस्ताना और यह है श्री बागी आजमी।“


कालीचरण ने एक फॉर्मल सी मुस्कुराहट उसकी तरफ लुड़का दी। शारदा ने तो उसकी तरफ देखा तक नहीं।“11 यहां यह बात स्पष्ट कर देना उचित होगा कि शारदा और कालीचरण दोनों भाई बहन है, मगर बॉलीवुड में जगह बनाने के अवसर को भुनाने के लिए कालीचरण शारदा का भाई नहीं, बल्कि असिस्टेंट के तौर पर दूसरों के सामने अपना परिचय देता है। आर्थिक तरक्की की भाग-दौड़ में परंपरागत रिश्ते किस तरह पीछे छूट गए हैं, इसका उदाहरण भी हमें यहां देखने को मिलता है। व्यक्ति अपने केरियर को बनाने के लिए अवसरवादिता की हदें पार करने के लिए तैयार रहता है। इन सभी पर उपन्यासकार एक जगह टिप्पणी करते हुए कहता है, “वहां सब को अपने काम से काम था। छोटी हीरोइन बडी हीरोइन बनना चाहती थी। मझला प्रोड्यूसर बडा प्रोड्यूसर बनना चाहता था। बडे हीरो की तीन फिल्में फ्लॉप हो चुकी थी, इसीलिए वह एक नई हीरोइन की जवानी की टेप लगाना चाहता था अपने केरियर में।”12 आर्थिकता की ओर आकर्षण एवं नैतिकता की ओर विकर्षण के भाव के पीछे बदलती हुई मानवीय जरुरते हैं। सिनेमा जगत में स्थापित होना बहुत मुश्किल है और अगर कोई स्थापित व्यक्ति नीचे गिरता है तो उसका उठना भी बहुत मुश्किल है। यहां पुराने दौर के सिनेमा को याद करते हुए त्रिपुरारी शर्मा का वक्तव्य ज्यादा प्रासंगिक होगा, वह कहती है, “उस दौर के इस तरह के जो लोग जीवित और सक्रिय है जैसे श्याम बेनेगल, उनका महत्त्व भी पिछले वर्ष में बहुत कम हुआ है। कला और कलाकारों के बारे में दृष्टि ही बदल गई है। उस दौर की अभिनेत्रियों को देखें स्मिता पाटिल हो या शबाना आजमी या दीप्ति नवल ये अपनी शक्ल सूरत के बल पर नहीं, बल्कि प्रतिभा के बल पर अभिनेत्रियां बनी। अलग सिनेमा की अलग तरह की अभिनेत्रियां। शक्ल सूरत के लिहाज से ओमपुरी क्या थे? लेकिन उनकी प्रतिभा को पहचाना गया। अब प्रतिभा वगैरह कोई नहीं देखता। अब सफलता ही सब कुछ है। जो सफल नहीं होता, वह अप्रासंगिक हो जाता है। फिल्मों में ही नहीं,फिल्मों की समीक्षा तक में यह चीज दिखाई दे रही है। उसमें भी अब सार्थकता को नहीं, सफलता को देखा जाता है। जो चीज किसी भी कारण से हिट हो जाए, वही मानो सब कुछ है अपनी।।“13 अवसरवादिता को सामने लाने के साथ-साथ यह टिप्पणी योग्यता के महत्त्व को भी रेखांकित करती है। बदलते हुए दौर में सिनेमा ने जो मूल्य खोए हैं उस नुकसान की तरफ भी त्रिपुरारी शर्मा ने इशारा किया है। भारतीय सिनेमा ‘भूमंडीकरण’ के प्रभाव में आज कतार की अंतिम व्यक्ति की पीड़ा को उठाने में असफल दिख रहा है। यह स्थिति भारत जैसे विकासशील और विविधता प्रधान समाज के लिए अत्यंत घातक है।


“फिल्म केवल ड्रामा नहीं है बल्कि उसमें उपन्यास का पुट भी है। उपन्यास के इस पुट ने ड्रामे के पैरों में पड़ी हुई तमाम जंजीरें काट दी है। ड्रामा अब आजाद हो गया है। अब वह आदमी के खयालों के साथ कहीं भी जा सकता है। अब तक ड्रामा सेट या स्टेज की सलीब में संवाद की कीलों से ठुका हुआ था। अब यह मजबूरी नहीं है। इस आजाद ड्रामे ने वास्तव में लेखक को आजाद कर दिया है।“14 तमाम परेशानियों के बावजूद सिनेमा के संदर्भ में कहे गए राही मासूम रज़ाके ये विचार एक आशामय भविष्य की ओर इशारा करते हैं। सिनेमा को यथार्थ की जमीन पर देखने का जो साहस राही मासूम रज़ाकरते हैं, वह उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है। बदलते हुए सिनेमा को आपने बहुत बारिकी से समझा है। साथ ही लगभग 25 वर्षों तक फिल्म लेखक के रूप में जुड़े हुए होने के साथ भारतीय सिनेमा के लिए भविष्य का एक रोड मैप भी बनाने का प्रयास किया है। प्रस्तुत उपन्यास में उसी रोड मैप को राही समाज के सामने रखते है।



  • रामस्वरुप चतुर्वेदी : हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2015, पृ. 84

  • राही मासूम रज़ा : सिनेमा और संस्कृति, कुंवर पाल सिंह (सं.), फ्रीडम बुक्स, नई दिल्ली, 2008, पृ. 18-19

  • वाड़्मय : त्रैमासिक हिंदी पत्रिका, अप्रैल-सितंबर 2008 अंक, फिरोज अहमद (सं.), अलीगढ़, पृ.168-169

  • राही मासूम रज़ा : दिल एक सादा कागज, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012,पृ. 188

  • वही, पृ.189

  • वाड़्मय : त्रैमासिक हिंदी पत्रिका, अप्रैल-सितंबर 2008 अंक, फिरोज अहमद (सं.), अलीगढ़, पृ.168

  • राजकिशोर (सं.) : स्त्री के लिए जगह, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, आवर्ती 2014, पृ. 156

  • राही मासूम रज़ा : दिल एक सादा कागज, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012, पृ.44 और 57

  • राजकिशोर (सं.) : स्त्री के लिए जगह, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, आवर्ती 2014, पृ.45

  • वही, पृ.47

  • राही मासूम रज़ा : दिल एक सादा कागज, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012, पृ. 44

  • वही, पृ.56

  • रमेश उपाध्याय और संज्ञा उपाध्याय (सं.) : भूमंडलीकरण और भारतीय सिनेमा, शब्द संधान प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012,पृ.24

  • राही मासूम रज़ा : सिनेमा और संस्कृति, कुंवर पाल सिंह(सं.), फ्रीडम बुक्स, नईदिल्ली, 2008,पृ.64


 


डॉ. मोहम्मद हुसैन डायर


संक्षिप्त परिचय


शिक्षा


Net, Jrf, Ph.d.


 कुल 16 शोध पत्र विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित। कई विख्यात साहित्यकारों का साक्षात्कार  एवं उनमें से 15 साक्षात्कारों का विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशन। 30 से अधिक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों में भागीदारी एवं पत्र वाचन। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय उदयपुर के हिंदी विभाग से राही मासूम रज़ाके कथा साहित्य में स्वातंत्र्योत्तर भारतीय परिदृश्य  विषय पर पी-एच. डी.। वर्तमान समय में रा. उ . मा. वी. मनोहरगढ़, ज़िला प्रतापगढ़ (राज.) में व्याख्याता (हिंदी) के पद पर कार्यरत.


पत्र व्यवहार का पता


डॉ. मोहम्मद हुसैन डायर


रा. उ . मा. वी. मनोहरगढ़, ज़िला प्रतापगढ़ (राज.)


Email. dayerkgn@gmail.com


9887843273