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Thursday, May 14, 2020

गजल "महफ़िल वो तेरी"


  "महफ़िल वो तेरी"



 



गैर हुए तेरे अपने अब, और ये अपने आज बेगाने हो गए!
कलम रो पड़ी है "मलिक",और वो गैरों के दीवाने हो गए!!



 



महफ़िल वो तेरी थी जहां, किसी ने बेइज्जत हमें किया था!
खड़ा था तू गैरो के साथ,कैसा अपनेपन का सिला दिया था!
बहुुत खामोशी से मेरे दिल ने, वहां घूंट जहर का पिया था!
अंधेरा था मेरी जिंदगी में, तू तो गैरों की बाती का दिया था!!
हमारी अंधी मोहब्बत के , सरेआम ये कैसे फसाने हो गए!
गैर हुए तेरे अपने अब, और ये अपने आज बेगाने हो गए!



 



वो खामोशी मेरी कमजोरी नही,तेरी इज्जत का ख्याल था!
मेरी आँखों मे आंसू थे और, तू  गैरों के नशे में निढाल था!
मैंने तब भी हाथ थामा जब, तेरे किस्से का हाल बेहाल था!
क्यो दोष दूं आज तुझे मैं, अरे जा यार तू तो बेमिसाल था!!
अंधेरे सी हो गयी हूँ मैं, वो शमा पर जलते परवाने हो गए!
गैर हुए तेरे अपने अब, और ये अपने आज बेगाने हो गए!



 



गैरों का पलड़ा आज भारी है, और खोल ली तूने अदालत।
आज कटघरे में खड़ी कर मुझे, करने लगा उनकी वकालत!
"मलिक" पल भर में हुई पराई, कर बैठा तू इससे बगावत!
मुबारक हो तुझको वो रंगीनियां, रहे तेरी दुनिया सलामत!
तबाह हुआ मेरा भरोसा, नए आज उनके ठिकाने हो गए!!
गैर हुए तेरे अपने अब और ये अपने आज बेगाने हो गए!



 



सुषमा मलिक "अदब"
रोहतक (हरियाणा)



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Aksharwarta International Research Journal, February - 2023 Issue