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Monday, August 10, 2020

   हम न मरैं मरिहैं संसारा : कबीर

       किसी व्यक्ति को कमज़ोर करना हो तो उसका चारित्रिक हनन कर दिया जाय, व्यक्ति खुद गिर जाएगा। जिसका नैतिक मूल्य ही निराधार हो, जिसके बारे में सिर्फ अफ़वाह फैलाई जा रही हो, जहाँ उसका इतिहास इस तरह से पेश किया जा रहा हो जो केवल किवदंती मात्र बनकर रह जाए, वैज्ञानिकता का दूर- दूर तक कोई संबंध ही न हो, उसकी बात कोई क्यों मानेगा! सांस्कृतिक बनावट किसी भी विचारधारा की रीढ़ होती है जिसके आधार पर वह टिका रहता है, यही काम हुआ कबीर के मरने के बाद। कबीर अपने समय के एक ऐसे युगदृष्टा थे जिन्होंने समाज के उपेक्षित वर्गों की लड़ाई लड़ी, उन्हें सही राह दिखाने की कोशिश की, सही और ग़लत में फ़र्क देखने का नज़रिया विकसित किया, जो एक सच्चे सामाजिक नागरिक होने का फ़र्ज़ निभा रहे थे, उनके बारे में हमें आज अगर कुछ पता है तो सिर्फ़ अफ़वाफ। उनके जन्म, मृत्यु, संप्रदाय एवं गुरु सब कुछ अफवाहों के आधार पर पेश किया गया। यह बात यहीं नहीं रुकी, कबीर को समझने की जो सबसे ज़रूरी और अहम मुद्दा है उनकी रचनाएं उन्हें तक नहीं छोड़ा गया, जिसमें कबीर के नाम से क्या- क्या नहीं लिखा गया। कभी 'कबीरा' और 'होरी' के नाम पर अश्लीलता फैलाई जा रही है तो कभी उनको वैष्णव धर्म और रामानंद का शिष्य बताया गया, कबीर के नाम से कई ऐसे दोहे बनाए गए जो कबीर के चरित्र को पूरी तरह से शंशय में डाल देते हैं जिसका कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है। बचपन से हम एक ऐसे महान चरित्र के बारे में सिर्फ़ अफ़वाह सुनते अा रहे हैं जिसका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी से हुआ, जिसको रामानंद ने आशीर्वाद दिया था। यह बात एक ऐसे साहित्यकार ने लिख कर घोषित कर दिया जिसको पहली बार एक मुकम्मल हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन का गौरव प्राप्त है। जब हम चरित्रों के बारे में जानना शुरू किए उस उम्र में इस महान चरित्र के बारे में सिर्फ़ कपोल कल्पना परोसी गई है। यह ज्ञान यहीं नहीं रुका है बल्कि विश्वविद्यालय और प्रतियोगी परीक्षाओं तक यही मान्यता प्रचलित है और उसी के आधार पर छात्रों और नौजवानों का भविष्य तय किया जाता है।
             जिस कबीर के बारे में ब्रिटेन के अखबारों में १८१२ में ही चर्चा शुरू हो गई और १८४१ तक उनके बारे में गंभीरता पूर्वक लेख प्रकाशित होने लगे थे, उसी कबीर के बारे में उनके अपने देश के लोगों ने बहुत देर में जानने का प्रयास किया। सबसे पहला प्रयास श्यामसुंदर दास ने कबीर की मूल हस्तलिपियों के आधार पर 'कबीर ग्रंथावली' के माध्यम से १९२८ में किया जिनमें कबीर के दोहे सम्मिलित हैं, लेकिन कबीर के व्यक्तित्व से संबंधित किसी मुकम्मल किताब के आने में और भी समय लगा, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने १९४० में 'कबीर' लिखा। इन दोनों लेखकों ने आम जन के बीच कबीर के प्रति जागरूकता पैदा की और अलोचकीय दृष्टि से उनका विश्लेषण किया, लेकिन ऐसा लगता है कि कुछ बातों को उन्होंने अपने पूर्वर्ती साहित्य इतिहासकार से ही स्वीकार कर ली, उदारहरण के लिए उनका पंथ वैष्णव संप्रदाय का होना। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का 'हिंदी साहित्य का इतिहास' एक ऐसा ग्रंथ है जिसके आधार पर कई परवर्ती आलोचकों और इतिहासकारों ने उनके दिए गए उद्धरण को सहर्ष स्वीकार कर लिया, खुद से उन पर विश्लेषण करने की जहमत नहीं उठाई। कबीर से संबंधित सबसे तार्किक लेखन हजारी प्रसाद द्विवेदी के बाद अगर किसी ने किया है तो वह हैं डॉ. धर्मवीर। डॉ. धर्मवीर ने कबीर पर कई किताबें लिखी और उनके सत्य को तलाशने की कोशिश की। इससे पहले १९१५ में कबीर के सौ दोहों का अंग्रेजी अनुवाद रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 'कबीर्स पोयम्स' नाम से किया। हालांकि उसमें कबीर के कुछ दोहे प्रक्षिप्त बताए जाते हैं, लेकिन रवीन्द्रनाथ टैगोर को पहली बार अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ख्याति कबीर के उन्हीं दोहों की वजह से हुई। तत्कालीन ब्रिटिश और अमेरिकी अखबारों में रविन्द्र नाथ टैगोर की साहित्यिक दुनिया में खूब चर्चा हुई, इसमें मिस इवेलिन अंडरहिल और मैकमिलन का सहयोग रहा। 
           आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी किताब 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (पृष्ठ ४९) में कबीर के बारे में लिखा है - "कहते हैं कि आरम्भ से ही कबीर में हिन्दू भाव से भक्ति करने की प्रवृत्ति लक्षित होती थी जिसे उसे पालने वाले माता- पिता न दबा सके। वे 'राम राम' जपा करते थे और कभी- कभी माथे पर तिलक भी लगा लेते थे।" वहीं दूसरी तरफ (पृष्ठ ५०) लिखा कि "अद्वैतवाद के स्थूल रूप का कुछ परिज्ञान उन्हें रामानंद जी के सत्संग से पहले ही था।" श्यामसुन्दर दास की 'कबीर ग्रंथावली' के अनुसार रामानंद की मृत्यु १४१०ई. में हो चुकी थी, साथ ही रेवरेंड जी. एच. वेस्टकॉट ने प्रश्नवाचक चिन्ह के साथ रामानंद की मृत्यु १४०० ई. ही मानी है। कबीर के जन्म के बारे में शुक्ल जी ने भी लिखा है और कबीरपंथी भी मानते हैं कि उनका जन्म १३९८ -९९ ई. में हुआ था। अगर इन तिथियों को देखें तो पता चलता है कि कबीर के जन्म लेने और रामानंद की मृत्यु के बीच में जो फासला है वह मात्र १२ वर्ष का था। इतनी छोटी सी अवधि में रामानंद ने कबीर को ऐसा कौन सा ज्ञान पिला दिया जिससे उनके गुरु हो गए जिसके बारे में कबीर ने कुछ लिखा ही नहीं है, और शुक्ल जी ने लिखा भी है कि अद्वैतवाद के स्थूल रूप का कुछ परिज्ञान उन्हें रामानंद जी के सत्संग से पहले ही था। कबीर की उम्र जो देखते हुए यह बात तो और भी असत्य लगती है। दरअसल रामानंद सिर्फ कबीर के ही गुरु नहीं थे, कबीर के समकालीन और परवर्ती जितने भी प्रगतिशील संत कवि थे उनके भी गुरु थे जिसमें बनारस के समकालीन संत रविदास, राजस्थान के संत पीपा, मुंबई के संत धन्ना जाट और गुजरात के संत दादू आदि शामिल हैं। इनके कार्यकाल पर गौर करें तो हम पाते हैं कि रामानंद का कार्यकाल कई सदियों तक चलता रहा। जबकि विचारधार को ध्यान दिया जाए तो सभी उनसे भिन्न और विरोधी थे। "समय और विचार की खाई को परखने की संभवत सबसे पहली कोशिश डॉ राकेश गुप्ता ने की थी जिन्होंने 1944 में सम्मेलन पत्रिका में 'क्या कबीर रामानंद के शिष्य थे?' शीर्षक से लेख लिखकर इस संबंध में गंभीर सवाल उठाया।" (कबीर हैं कि मरते नहीं पृष्ठ ५१,५५) इस आधार पर कबीर को रामानंद का शिष्य नहीं माना जा सकता। कबीर को रामानंद का शिष्य घोषित करने के लिए भक्तमाल में कई किवदंतियाँ लिखी गई जिनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कोई मेल जोल नहीं है। वे सारी किवदंतियाँ चमत्कार मात्र पर आधारित हैं जो सत्य हो ही नहीं सकती। कबीर के बारे दोहा भी प्रचलित किया गया - 'हम काशी में प्रकट भए, रामानंद चेताय।' जबकि कबीर की चेतना 'ब्राह्मण गुरु जगत का, साधु का गुरु नाहि' की रही है।
             कबीर को रामानंद का समकालीन साबित करने के लिए तमाम तरह के प्रयास किए गए उनके जन्म को लेकर। कबीर का जन्म १३९८ माना जाता है। उनके समकालीन नानक और पूर्ववर्ती गोरखनाथ के बारे में कई जानकारी स्पष्ट मिल जाएगी लेकिन उनसे ज्यादा प्रखर, स्पष्ट और प्रगतिशील कवि के बारे में सब कुछ किवदंती मात्र बनाकर रख दिया गया है। कबीर के जन्म के बारे में कई दोहे देखने को मिलते हैं जिनमें उनका समय अलग- अलग बताया गया है जिसका कोई तार्किक आधार नहीं है। कबीर के प्रभाव का एक उदाहरण यह भी माना जा सकता है कि कबीर की प्रसिद्धि सुनकर ही नानक ने उनसे मुलाकात की। निर्विवाद सत्य है कि नानक का जन्म १४६९ ई. में हुआ था, जन्म के २७ साल बाद वे कबीर से मिले, जाहिर है १४९६ तक कबीर जीवित रहे होंगे। कबीर का सिकंदर लोदी के साथ भी जिक्र आता है, सिकंदर लोदी ने बनारस के पास शर्की शासक हुसैन शाह (१४९३- १५१८) को पराजित किया और छ: महीने तक जौनपुर में रहा। नानक ने भी लिखा है की सिकंदर लोदी (१४८९- १५१७) हर वर्ष जौनपुर घूमने आता था। कबीर के बारे में एक कहानी यह भी मिलती है कि उनकी शादी तीस वर्ष की उम्र में हुई, उनकी बीस वर्षीय पुत्री ने कबीर को एक पंडित से मिलवाया, उस समय कबीर की उम्र ५० साल रही होगी। अगर इसे सही मान लिया जाए तब कबीर से संबंधित सिकंदर लोदी और नानक का प्रसंग ही छूट जाएगा। कबीर के जन्म के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है लेकिन कुछ विदेशी अखबार और चिन्तक कबीर का जन्म इस प्रकार मानते हैं - जी. एच. वेस्टकॉट ने कबीर का समय १४४० से १५१८ई. माना है, न्यूयार्क टाइम्स ने बुनकर कबीर को मुसलमान दम्पत्ति द्वारा १४४०ई. में पैदा हुआ बताया है, एस. ए. ए. रिजवी ने कबीर का जीवनकाल १४२५ से १५०५ई. माना है। तात्कालिक समय को देखा जाय तो (१३९८- १५१८) १२० साल किसी भी समाज सुधारक का जीवन नहीं रहा, उस पर भी कबीर जैसे विद्रोही चेतना वाले कवि का, जिसको सिकंदर के द्वारा कई बार मारने के प्रयासों का भी जिक्र मिलता है। इसको देखते हुए कबीर के जन्म के बारे में दो समय प्राप्त होते हैं - १३९८- १५२० ई. और १४४०- १५१८ ई.।
           कबीर के माता- पिता और धर्म को लेकर तमाम तरह की विसंगतियाँ हैं जिनमें कई दोहे एक दूसरे के विरोधी ठहरते हैं 'काशी का मैं वासी बाम्हन, मेरा नाम परवीना' - 'तू बाम्हन मैं काशी का जुलाहा'। कबीर के माता- पिता और धर्म सभी को जोड़कर उन्हें ब्राह्मण के रूप में प्रस्तुत किया जाना कोई अनायास बात नहीं हो सकती। उस समय धार्मिक आडंबरों के केंद्र में ब्राह्मणवाद का विस्तार था, हर ज्ञानी पुरुष का जन्म सिर्फ ब्राह्मण कुल में ही हो सकता था। क्योंकि ब्राह्मण जाति ही सबसे श्रेष्ठ जाति थी, निचली जाति में पैदा होकर कोई ज्ञानी कैसे हो सकता है। इसलिए कबीर को ब्राह्मण के रूप में दिखाने की कोशिश की गई। जबकि कबीर ने अपने कई दोहों में स्वयं को जुलाहा और कोरी कहा है। उनके दोहों का जो स्वर है वह किसी भी पाखंडी संप्रदाय से ताल्लुक नहीं रखता। 'जाति जुलाहा मतिकौ धीर,  हरषि- हरषि गुन रमै कबीर'/ मेरे राम की अभै पद नगरी कहै जुलाहा कबीर/ हरि को नांव अभै- पद- दाता, कहै कबीरा कोरी। कोरी जाति धर्मपरिवर्तन करके जुलाहा जाति में शामिल हुई थी यह बात आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भी मानते हैं। किंवदंतियों को ध्यान से देखा जाए तो कबीर का पूरा परिवार नदी में बहता हुआ मिला था। कबीर को नीरू- नीमा ने तालाब में पाया था जब कबीर बहते हुए चले अा रहे थे। कबीर की पत्नी लोई जो ऊन की लोई में लिपटी हुई नदी में एक वैरागी को मिली थी। जिसके आधार पर उसका नाम लोई रखा गया। एक कहानी में कबीर और उनके गुरु शेख तकी नदी के किनारे टहल रहे थे, नदी में एक मेरे हुए बच्चे की लाश अाई, कबीर उसके कान में कुछ कहा और बच्चा जीवित हो उठा, कबीर ने उसका नाम कमाल रख दिया।  इन भ्रामक पाखंडियों का वास्तविकता से कोई संबंध ही नहीं है लेकिन सच यही है कि कबीर के बारे में अगर कुछ जुटा कर रखा गया है बाद के लोगों को जानने के लिए तो सिर्फ़ अफ़वाह और लगातार यही प्रचारित भी हो रहा है। जिन पाखंडियों के सामने कबीर झुके नहीं, जिसने हिंसा, मंदिर- मस्जिद, मूर्तिपूजा, वाह्य आडंबर, ऊँच- नीच, छुआ- छूत आदि का विरोध किया उसे तोड़ने के लिए दुनिया भर के मिथक बनाए गए, उनके बारे में कोई सही जानकारी उपलब्ध ही नहीं है। कबीर के जन्म या मृत्यु के इन चमत्कारिक आख्यानों को विदेश के किसी भी समाचार पत्र या लेखक ने नहीं माना है।
             कबीर पर गोरखनाथ और बौद्ध दर्शन का प्रभाव था। जिस प्रकार कबीरपंथी निम्न जातियों से संबंधित हैं उसी प्रकार गोरखनाथ के अनुयायी भी उन्हीं जातियों से आते हैं। लोगों को जाति हीनता की कीलें चुभा- चुभाकर इतना त्रस्त कर दिया गया कि उन्हें किसी दूसरे पंथ की शरण में जाना ही पड़ा, जहाँ उन्हें सम्मान मिल सके और जहाँ उनके मन को शांति, जहाँ पर ज्ञान की वर्षा मात्र से ही सुकून मिलता हो, किसी पुराण का पाठ या मंदिर के दर्शन से नहीं। कबीर पर गोरखनाथ और बौद्ध धर्म का प्रभाव इसलिए भी स्वीकरा जा सकता है कि उनके विचारों का मेल उनसे अक्सर होता दिखाई देता है। ब्राह्मणवाद का जो छद्म चारित्रिक दावा कबीर को अपने खेमे में मिलाने के लिए किया गया उसका कोई भी मेल नहीं है- 'मन गोरख मन गोविंद, मन ही औघड़ होइ'। कई जगह कबीर और गोरख नाथ के विचार एकदम नज़दीक देखे जा सकते हैं। गोरखनाथ - 'वेदे न सास्त्रे कतेब न कुरांने पुस्तके न बांच्या जाई,/ ते पद जांनां बिरला जोगी और दुनी सब धंधे लाई।' वहीं कबीर कहते हैं - 'पोथी पढ़- पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय,/ ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।' 
              बौद्ध, सिद्ध और नाथ के पंथ की प्रवृतियों को देखकर तथा कबीर के मूल काव्य रचना का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट पता चलता है कि उनके ऊपर बौद्ध दर्शन और गोरखनाथ का प्रभाव था न कि वैष्णव संप्रदाय का। विरोध में उन्होंने कट्टरपंथियों और मुल्लाओं को चेताने की कोशिश की है। उन पर रामानंद का बिल्कुल भी प्रभाव नहीं था। हर धर्म के रक्षकों को यह डर होता है कि उनके पंथ के लोग किसी दूसरे धर्म में परिवर्तित न हो जाएं और धर्म के रक्षक वही बने हैं जो जाति श्रेष्ठता में ऊँचे हैं अगर इसी तरह परिवर्तित होते रहे तो उनकी गुलामी कौन करेगा क्योंकि जातीय हीनता से त्रस्त होकर धर्मांतरण निम्न जाति के लोग ही करते हैं। धार्मिक नफरत फैलाने का एक मतलब यह भी हो सकता है कि दूसरे धर्म के बारे में इतनी नफ़रत भर दी जाए कि व्यक्ति को तात्कालिक धर्म में जाति हीनता के कारण जीना भले ही दूभर हो जाए लेकिन वह धर्म परिवर्तन करने के लिए सोचे ही न। यही कारण है कि गोरखनाथ और कबीर के अनुयायी वही लोग हुए जो जाति हीनता के आधार पर कुचले गए थे। कबीर ने एक ऐसी प्रथा को नकारा जहाँ पढ़ने का अधिकार शूद्रों को नहीं था, उनके ज्ञान का रास्ता सिर्फ सुनने तक सीमित था, इसलिए कबीर ने उनके लिए यह रास्ता अपनाया और उनको अपनी बानियों के माध्यम से सही गलत का फ़र्क समझाया। पाखंडों के नाम पर शोषण की तरफ़ आगाह किया।
              इतिहास में भारतीय नवजागरण का दौर एक ऐसा समय था जब सामाजिक, धार्मिक और शैक्षणिक आदि प्रकार के सुधार हुए। जिसके आधार पर समाज में फैली कुरीतियाँ, ढोंग, पाखंड, आदि को उखाड़ फेकने की एक मुहिम चली। उस आंदोलन में लोगों ने अपने आप को पूरी तरह से समर्पित किया। उनका चरित्र उनके काम से अलग नहीं था। यही रूप हम कबीर में देखत हैं। समाज की भलाई के लिए उन्होंने अपने जीवन संघर्ष में कभी किसी चीज से समझौता नहीं किया, उन्होंने जो बोला वही किया, कबीर के विचार इतने क्रांतिकारी थे कि उनको सच बोलने में किसी की परवाह नहीं थी, उन्होंने अपनी कविता का प्रयोग समाज की भलाई के लिए किया। जो लोग भी आडंबरों के नाम पर शोषित, पीड़ित थे उनके हक में लड़ाई लड़ी। 'लिखी लिखा की है नहीं देखा देखी बात की'। कबीर के विचार हर एक विषय पर स्पष्ट थे। उनके भगवान निर्गुण राम थे जिनको कभी देखा नहीं जा सकता, जिनको मंदिरों ,मस्जिदों और मूर्तियों में स्थापित नहीं किया जा सकता। प्रेम के विषय में उनकी स्थापना एकदम अचूक थी, उन्हें पता था समाज में समरसता सिर्फ़ प्रेम के जरिए ही लाया जा सकता है - 'कबीर यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहि/ प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाय।' कई जगह कबीर को स्त्री विरोधी दिखाने की कोशिश की गई, ऐसा लगता है कबीरपंथियों ने उन्हें स्त्री विरोधी दर्शाने की सबसे अहम भूमिका निभाई जिसका उल्लेख 'कबीर कसौटी' में मिलता है। जबकि कबीर ने जिन विषयों को छुआ उन सभी में तात्कालिक दृष्टियों के आधार पर वे प्रगतिशील रहे - 'नारी निंदा ना करो, नारी रतन की खान। नारी से नर होत हैं, साधु, संत, सुजान।।'
               'कबीर हैं कि मरते नहीं' किताब कबीर के ऊपर लगाए आरोपों का जवाब है। परंपरागत रूप से जो अफवाह पीढ़ी दर पीढ़ी प्रसारित किया जाता रहा है उसे इतिहास, समाचार पत्रों, पूर्ववर्ती आलोचकों और साहित्य इतिहास लेखकों के हवाले से सच को उघाड़ने की कोशिश की गई है। कबीर की प्रक्षिप्त रचनाओं को उनकी भाषा और दर्शन के आधार पर चिन्हित किया जा सकता है। कबीर की वही चेतना जो जन मानस को सचेत करने की कोशिश करती है, जो तमाम आडंबरों का विरोध करती है, सच मायने में वही उनका साहित्य है। इसमें कबीर की सच्चाई से रूबरू कराने के लिए कई सारे विदेशी समाचार पत्र और विदेशी लेखकों के तार्किक और दोषमुक्त उद्धरणों को शामिल किया गया है। कबीर के लगभग उन सभी पक्षों पर बात की गई है जो उनसे संबंधित है। आधुनिक काल में कबीर के ऊपर किया गया यह एक वैज्ञानिक शोध है, जिससे कबीर के विचारों में स्पष्टता मिलेगी। भक्ति काल में समाज की उन्नति, सभी वर्गों में समन्वय, समरसता और वैज्ञानिक नज़रिए का विकास निर्गुण संत काव्य धारा में होता है लेकिन भक्ति काल के ज्यादातर आलोचकों ने उसका श्रेय लोगों की भावना के आधार पर सगुण भक्ति को दिया। जिन्होंने खुद को समर्पित करके आडंबरों के ख़िलाफ़ मुहिम चलाई उनके साथ चारित्रिक छेड़- छाड़ करके उनको कमज़ोर बनाया गया। बुद्ध को बुद्धू और गोरखनाथ को गोरखधंधा के नाम से दुष्प्रचारित किया गया। लेकिन जिनका नज़रिया स्पष्ट है, जिनका उद्देश्य स्पष्ट है उनको कभी मारा नहीं जा सकता वे समाज में तब तक जिंदा रहेंगे जब तक उनके द्वारा चलाए गए आंदोलन की ज़रूरत वर्तमान रहेगी। 
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पुस्तक - कबीर हैं कि मरते नहीं
लेखक - सुभाष चन्द्र कुशवाहा
प्रकाशक - अनामिका प्रकाशन, प्रयागराज 
प्रकाशन वर्ष - २०२०
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परिचय____
जुगेश कुमार गुप्ता
शोधार्थी, हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
(आधुनिक हिन्दी रंगमंच के विकास में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का योगदान) विषय पर शोधरत
 बनास जन, शिवना साहित्यिकी, रचना उत्सव, सुबह की धूप, पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख।


 


 


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