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Wednesday, March 29, 2023

अंतरराष्ट्रीय शोध संगोष्ठी एवं एक्सीलेंस अवार्ड समारोह : कृष्ण बसंती रिसर्च एवं लिटरेचर एक्सिलेंस अवार्ड 2023 से अलंकृत किया गया देश के अनेक शोधकर्ताओं और साहित्यकारों को

 भारतीय ज्ञान परंपरा में मौजूद वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी महत्व के तथ्य नवीन अनुसंधान में उपयोगी हैं - कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय

प्राप्त ज्ञान को नई पीढ़ी तक ले जाने के साथ ज्ञान को आर्थिक मूल्य में बदलना होगा - कुलपति प्रो सी जी विजयकुमार मेनन
भारतीय लोक एवं जनजातीय संस्कृति और देशज ज्ञान परम्परा अत्यंत व्यापक और जीवंत है - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा
हमारी समृद्ध विरासत का अंग है भारतीय ज्ञान प्रणाली - प्रो दीक्षित

कृष्ण बसंती शैक्षणिक एवं सामाजिक जनकल्याण समिति, उज्जैन द्वारा अक्षर वार्ता अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका, विक्रम विश्वविद्यालय, महर्षि पाणिनि संस्कृत वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन द्वारा दो दिवसीय उज्जैन साहित्य महोत्सव कृष्ण बसंती रिसर्च / लिटरेचर एक्सिलेंस अवार्ड 2023 तथा भारतीय ज्ञान प्रणाली का योगदान और अनुसंधान में नवाचार पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय शोध संगोष्ठी 26 मार्च 2023 को अभिरंग नाट्यगृह, कालिदास अकादेमी, उज्जैन में विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। मुख्य अतिथि हिंदी संस्थान आगरा के विभागाध्यक्ष प्रो उमापति दीक्षित थे। विशिष्ट अतिथि विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के कुलानुशासक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा, डीएसडब्ल्यू प्रो सत्येंद्र किशोर मिश्रा, एवं प्रो जगदीश चंद्र शर्मा, प्रो दीनदयाल बेदिया, डॉ शुभम शर्मा, एवं अक्षरवार्ता शोध पत्रिका के संपादक डॉ मोहन बैरागी ने दीप दीपन कर संगोष्ठी का उद्घाटन किया। संगोष्ठी के समापन समारोह के मुख्य अतिथि महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय उज्जैन के कुलपति प्रो सी जी विजय कुमार मेनन थे एवं विशिष्ट अतिथि प्रो प्रेमलता चुटैल और डॉ तुलसीदास परोहा थे।
कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों से आए शोधकर्ता और साहित्यकारों को कृष्ण बसंती रिसर्च एवं लिटरेचर एक्सिलेंस अवार्ड 2023 से अलंकृत किया गया। कार्यक्रम में सुश्री वसंता, हैदराबाद में ओपन एक्सेस रिसर्च जनरल के प्रथम अंक के पोस्टर का विमोचन अतिथियों से करवाया, जो अक्षरवार्ता के सहयोग से प्रकाशित किया जाएगा।
विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय ने उद्घाटन व्याख्यान देते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का महत्वपूर्ण अंग बनाया गया है। इसे युवा पीढ़ी के मध्य ले जाने की आवश्यकता है भारतीय ज्ञान परंपरा में अनेक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी महत्व के तथ्य उपस्थित हैं। ये तथ्य नए दौर में किए जा रहे अनुसंधान में उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। भारत की बौद्धिक संपदा को आक्रांताओं ने क्षति पहुंचाई। यंत्र सर्वस्व जैसे ग्रंथ में अनेक प्रकार के विमानों और यंत्रों का वर्णन मिलता है सूर्य और दशमलव की खोज से पूरी दुनिया के गणित में परिवर्तन आया वर्तमान कंप्यूटर विज्ञान उन्हीं पर टिका हुआ है। भारतीय चिकित्सा, पर्यावरण, जीव विज्ञान, कृषि आदि से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण सूत्र आज भी उपयोगी बने हुए हैं। अंग प्रत्यारोपण, गर्भस्थ शिशु की देखभाल, पर्यावरण संरक्षण, व्यक्तित्व विकास, प्रबंधन आदि के अनेक सूत्र भारतीय ज्ञान प्रणाली के अंग हैं।
प्रो उमापति दीक्षित, आगरा ने व्याख्यान में कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली हमारी समृद्ध विरासत का अंग है। आचार्यों की अत्यंत समर्थ परंपरा रही है। चिकित्सा विज्ञान में इस प्रकार के औषधीय गुण युक्त लेपन के पदार्थों का उल्लेख मिलता है, जिनसे घायल योद्धा पुनः युद्ध के लिए तत्पर हो जाते थे। महाभारत में जल में छुपे हुए दुर्योधन से प्रहरी के वार्तालाप के प्रसंग में जो उस दौर की तकनीक संकेत करता है।
कुलपति प्रो सी जी विजय कुमार मेनन ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत में ज्ञान का नवोदय हो रहा है। जी 20 और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के साथ भारतीय ज्ञान प्रणाली चर्चा के केंद्र में आ गई है। यह चार महत्वपूर्ण आयामों पर टिकी है, आत्म परिचय, संस्कृति, प्राप्त ज्ञान और आर्थिक मूल्य। वर्तमान समय में प्राप्त ज्ञान को नई पीढ़ी तक ले जाने की आवश्यकता है। इसके साथ ज्ञान को आर्थिक मूल्य में बदलना होगा। भारतीय ज्ञान प्रणाली सही अर्थों में भारतीयता का पोषण है।
कुलानुशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि भारतीय लोक एवं जनजातीय संस्कृति और देशज ज्ञान परम्परा अत्यंत व्यापक और जीवंत है। वे जीवन के सभी क्षेत्रों में गतिशीलता दिखा रहे हैं और हमारी सभ्यता के विकास को निरन्तर रख रहे हैं। लोक और शास्त्रीय परंपराओं के बीच संबंध स्थापित करने के साथ हाल के वर्षों में पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों में जैव-संसाधनों के उपयोग का एक मजबूत पुनरुद्धार हुआ है। प्राचीन काल से महर्षियों ने वनवासियों की ज्ञान संपदा का ऋण स्वीकार किया है और विज्ञान सम्मत ज्ञान का मूल उनके अनुभवों में निहित माना है। आधुनिक तकनीकों के आविष्कार में भारत की पारंपरिक तकनीकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
कार्यक्रम में प्रो जगदीश चंद्र शर्मा ने भारतविद्या के विकास के साथ भाषा विज्ञान, व्याकरण शास्त्र की परंपरा के योगदान पर प्रकाश डाला। प्रो दीनदयाल बेदिया ने प्राचीन भारत में आर्थिक शक्ति के रूप में भारत की प्रतिष्ठा के मूल में पुरातन ज्ञान प्रणाली के महत्व को रेखांकित किया। प्रो सत्येंद्र किशोर मिश्रा ने कहा कि पुराण एवं अन्य शास्त्रों में भारतीय ज्ञान प्रणाली के अनेक महत्वपूर्ण तत्व विद्यमान है। प्रो प्रेमलता चुटैल ने कहा कि भारत के पुराख्यानों में विज्ञान के अनेक तत्व मौजूद हैं। भारतीय ज्ञान प्रणाली के साथ पारिवारिक मूल्यों को भी महत्व दिया जाना चाहिए। डॉ तुलसीदास परोहा ने कहा कि प्राचीन साहित्य में अनेक प्रक्षिप्त अंश जोड़ दिए गए हैं, जिन पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
कार्यक्रम में शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए कुलपति प्रो अखिलेश कुमार पांडेय, कुलपति प्रो सी जी विजय कुमार मेनन, प्रो उमापति दीक्षित, डॉ आशुतोष द्विवेदी, सुवा, फिजी, प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा, प्रो जगदीश चंद्र शर्मा आदि को सम्मान पत्र अर्पित कर उनका सारस्वत सम्मान कृष्ण बसंती शैक्षणिक एवं सामाजिक जनकल्याण समिति, उज्जैन द्वारा किया गया।
दो सत्रों में देश भर से आए शोध पत्र प्रस्तोताओं ने अपने आलेखों का वाचन किया। इनमें डॉ बुद्धिप्रकाश, कोटा, डॉ अरुणा सर्राफ, डॉ कृष्णा जोशी, इंदौर, डॉ के आर सूर्यवंशी, मंदसौर, श्री अनिल तिवारी, भोपाल, योगगुरु मिलिंद त्रिपाठी, डॉ परीक्षित लायेक, कोडरमा, झारखंड, डॉ आशुतोष मिश्रा, हिमाचल प्रदेश, वनजा तनया नायक, तिरुपति, डॉ ललित कुमार सिंह, दिल्ली, डॉ भावनासिंह, लखनऊ, देवांशु द्विवेदी, भोपाल, डॉ पोपसिंह परमार, शाजापुर आदि सम्मिलित थे। प्रारम्भ में विषय की पीठिका डॉ शुभम शर्मा ने प्रस्तुत की।
अतिथियों का स्वागत प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा, डॉ मोहन बैरागी, अशोक भाटी, श्री दिनेश दिग्गज डॉ शुभम शर्मा, डॉ ओ पी वैष्णव, सुरेश बैरागी, डॉ भेरूलाल मालवीय, डॉ सर्वेश्वर शर्मा, डॉ रुपाली सारये, डॉ श्वेता पंड्या, डॉ अजय शर्मा, डॉ संदीप पांडे आदि ने किया।
शोध संगोष्ठी एवं अलंकरण समारोह का संचालन अक्षर वार्ता के संपादक डॉ मोहन बैरागी ने किया। आभार प्रदर्शन पाणिनि विश्वविद्यालय की डॉ रूपाली सारये एवं डॉ अखिलेश कुमार पांडेय ने किया। अंत में प्रसिद्ध कवयित्री निशा पंडित ने राष्ट्रभक्ति पूर्ण गीत की प्रस्तुति की।





















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Aksharwarta Internationa Research Journal - July - 2024 Issue