‘‘वैष्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय दर्षन’’ (पर्यावरण संरक्षण के सन्दर्भ में)

 मानव इतिहास के प्रारम्भ से ही अपने चारों ओर के पर्यावरण में रूचि रखता आया है । जीवों के चारों ओर की वस्तुएँ जो उनकी जीवन क्रियाओं को प्रभावित करती है, वातावरण का निर्माण करती है । यथार्थ में जीव और पर्यावरण एक दूसरे पर आश्रित है । सभी जीवों का अस्तित्व चारों ओर के पर्यावरण पर निर्भर करता है । अन्य जीवों की भांति मानव भी पर्यावरण का एक अंग है । परन्तु अन्य जीवों की तुलना में अपने चारों ओर के पर्यावरण को प्रभावित तथा नियंत्रित करता है । इसी कारण मानव का पर्यावरण के साथ सम्बन्धों को अधिक महत्व दिया जाता है । प्रकृति एवं मानव का सृश्टि की उत्पत्ति से ही घनिश्ठ सम्बन्ध रहा है । मानव का सम्पूर्ण जीवन प्रकृति पर ही निर्भर रहा है । 
 विद्वानों ने प्रकृति की सत्ता आदिकाल से ही स्वीकार की है । भारतीय दर्षन में दर्षनषास्त्रियों ने प्रकृति को ही प्रधान माना है । सांख्य दर्षन में प्रकृति और पुरूश ये दो स्वतंत्र मूलतत्व माने गये है । इन्हीं के परस्पर सम्बन्ध से संसार का विकास होता है । यहाँ प्रकृति को जड़ तथा एक कहा गया है और पुरूश को चेतन तथा अनेक बताया गया है । सांख्य दर्षन में प्रकृति में विद्यमान तीनों गुणों का उल्लेख किया गया है । सत्व, रजस और तामस् । इन्हीं तीनों गुणों का उल्लेख किया गया है । इसलिये कहा भी गया है -
‘‘गुणानां साम्यावस्था प्रकृतिः ।’’1
 इसी से संसार की उत्पत्ति और विनाष होता है । उपनिशदों के अनुसार जगत ब्रह्मा से उत्पन्न होता है और उसी में समा जाता है । जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि और आकाष आदि पँचभूत प्राण इन्द्रियों और मन भी ब्रह्मा से अद्भुत है। 
 सृश्टि से पहले सभी गुण साम्यावस्था में रहते है । प्रकृति और पुरूश का सानिध्य होने से इस साम्यावस्था में विकास होता है । इन तीनों गुणों में सर्वप्रथम रजोगुण में बदलाव उत्पन्न होता है क्योंकि यह गुण क्रियात्मक है। रजोगुण के बदलाव के कारण अन्य दोनों गुण भी बदलने लगते है । जिससे प्रकृति की व्यवस्था में अड़चने होती है । प्रकृति अपना कार्य ठीक प्रकार से नहीं कर पाती है और इसी से प्रकृति के संचालन में असंतुलन उत्पन्न हो जाता है और यहीं असन्तुलनावस्था पर्यावरण प्रदूशण का कारण बनती है । 
 पर्यावरण की समस्या विष्व के समक्ष एक यक्ष प्रष्न बन रही है । पर्यावरण संरक्षण के लिये समाधान प्रस्तुत करना आज की सबसे महत्वपूर्ण नैतिक जिम्मेदारी है । इसके समाधान के लिये पर्यावरण षिक्षा की आवष्यकता है । इससे पर्यावरण के विविध पक्षों, मानवीय सम्बन्धों घटकों, परिस्थितिकी तन्त्र, प्रदूशण षहरीकरण जनसंख्या व उसके द्वारा होने वाले प्रभावों का ज्ञान हो सकता है । वेदों की षिक्षा से वर्तमान व भविश्य की समस्याओं का निदान हो सकेगा । इससे पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागृति उत्पन्न होगी तथा प्रकृति व पर्यावरण के सम्बन्ध में समग्र ज्ञान का बोध होता है । यजुर्वेद में पृथ्वी की रक्षा विशयक उल्लेख मिलता है -
‘‘देहि में ददामि ते निमेधेहि निते दध ।’’2
 यदि हम पृथ्वी माता की रक्षा करेंगे तो वह भी मातृवत् हमारी रक्षा करेगी। पृथ्वी पर पर्यावरण को स्वच्छ रखकर और वृक्षों के अभिवर्धन के लिये हम पृथ्वी की रक्षा कर सकते है । इस धरती पर परमाणु परीक्षण को रोककर हम पर्यावरण को स्वच्छ रखने में प्रयत्न करें तो बेहतर होगा । पर्यावरण के दोहन से पृथ्वी पर अनेकानेक परिवर्तन हो रहे है । कहीं ज्वारभाटा, कहीं भौतिक रासायनिक, भूगर्भीय, ज्वालामुखी, भूकम्प, अतिवृश्टि, बाढ़ आदि का रौद्र रूप दिखाई दे रहा है । पर्वतों की बर्फ पिघल रही है । इसके साथ-साथ नदियों का प्रवाह रूक गया है । कहीं गैस त्रासदी आदि के कारण भूमि बंजर होती जा रही है । वैदिक ऋशियों ने प्रकृति व पर्यावरण के लिये अपना जीवन ही समर्पित कर दिया है । विष्व को पर्यावरण के विशय में विभिन्न वेदों और उपनिशदों में उल्लेख किया गया है। जिनमें उन ऋशि मुनियों ने कई नियमों, दिषा-निर्देषों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण विशयक आवष्यक संकेत और समाधान बताए है ।  
 भारतीयों का जीवन प्रकृति जीवन से इतना अधिक घुला मिला था कि पषु पक्षियों के उदाहरण द्वारा बालकों को व्यावहारिक उपदेष देने की प्रथा वैदिक काल से ही चली आई है । मनुश्य और मछली की एक कथा ऋग्वेद में पाई जाती है । छन्दोग्योपनिशद् में ष्वान का आख्यान वर्णित है । पुराणों में तो अनेक पर्यावरण सम्बन्धित नीति कथाएँ वर्णित है । ‘प´चतन्त्र’ संस्कृत नीति कथा साहित्य की अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ है जिसमें पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धित एवं वन्य जीवों के संरक्षण के माध्यम से कथाएँ वर्णित है । 
 मनुस्मृति में पर्यावरण संरक्षण व सवंर्धन के संकेत यत्र-तत्र-सर्वत्र दिखाई देते है । जिनमें प्रमुखतः पर्यावरण के प्रति छेड़छाड़ या हस्तक्षेप करने वालों के लिये दण्ड का विधान निहित किया गया है ।3 मनुस्मृति में पद-पद पर वन्य जीवों की हिंसा न करने व मानवों को उनका माँस भक्षण न करने का सबसे बड़ा उदाहरण हमारे सामने महशि वाल्मीकि जी अपने छन्द के माध्यम से प्रस्तुत किया है । 
‘‘मा निशाद प्रतिश्ठां त्वमगमः षाष्वतीः समाः । 
यत् कौ´्चमिथुनादेवमवधीः काममोहितम् ।।’’4
 षाकाहारी व्यक्ति माँसाहारी की अपेक्षा निरोगी स्वस्थ व दीर्घजीवी होता है । महर्शि मनु के इन तथ्यों को आधुनिक वैज्ञानिक भी मानते है । आधुनिकता के आज के दौर में मानव अपसंस्कृति की ओर अग्रसर हो रहा है और अपने सार्थक मूल्यों को भूलता जा रहा है । मनुस्मृति में वृक्षों को क्षत-विक्षत करने और उसकी छाल को छीलने का प्रबल विरोध किया है । स्वप्न में भी वृक्षों पर कुल्हाड़ी न चलाने के संकेत दिये है । मनुस्मृति पर्यावरण संरक्षण का सागर है। संस्कृत वाङ्मय में हमारी संस्कृति पारिवारिक और सामुदायिक आचारों में पर्यावरण के महत्व की चेतना उसके प्रति सजगता और उससे सम्बन्धित विशयों की जानकारी को संरक्षित करने की परम्परा सदियों से है। धार्मिक आचार पर्यावरणीय अपेक्षाओं को दृश्टि में रखकर होते ही रहे है । जिनमें सनातन धर्म, जैन, बौद्ध आदि सम्प्रदाय भी सम्मिलित है ।  
 आयुर्वेद में तो द्रव्य गुण के परीक्षण के षास्त्र उपलब्ध होते है । मानव जीवन के आचरण उपचार के आधार हमारी जड़ी बूटियाँ पर्यावरणीय दषाएँ आदि बताए गए है । आयुर्वेद में गुण धर्म के आधार से वनस्पतियों और उनके उत्पाद का औशधियों के रूप में तथा पर्यावरण संरक्षण के लिये उपयोग किये जाने के निर्देष है । 
 आज प्रदूशित वातावरण और परिवेष में जीवन षैली भी परिवर्तित, प्रदूशित होती जा रही है । जिसके कारण लोग असाध्य रोागें से ग्रसित हो रहे है । ऐसी स्थिति में आयुर्वेद एवं जीव विज्ञान जिनमें पौधों के समग्र रूपों, अंगों का प्रयोग किया जाता है । सन्तुलित आहार षुद्ध, जल षुद्ध, वायु और उसका सेवन तनाव रहित निद्रा तथा विश्राम से मानसिक षान्ति मिलती है । सात्विक जीवन संतुलित आहार सन्तुलित दिनचर्या प्रकृति का वरदान है । 
 पर्यावरण संरक्षण की दृश्टि में मानव षरीर, मन ये सभी प्रकृति के अनुपम उपहार है क्योंकि यह मानव षरीर, मन किसी वैज्ञानिक प्रयोगषाला में तैयार नहीं किया जा सकता है । यह मानव षरीर प´्चमाहाभूत से मिलकर बना है । यह प´्चमहाभूत प्रकृति की ही देन है । (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाष) आज का मानव इनकी ही अवहेलना करने में तत्पर है । मनुश्य प्रकृति के नियमों का पालन नहीं कर रहा है, जिससे पर्यावरण प्रदूशण एक भयावह राक्षस की तरह हमारे सामने खड़ा है । समस्त मानव जाति को लील जाने के लिये । इसलिये हमें सैद्वान्तिक रूप से प्रकृति के नियमों का पालन करते हुए पर्यावरण विशयक तथा आध्यात्मिक जीवन  को मानवीय प्रतिश्ठा व सुरक्षा, संरक्षण की आवष्यकता है । इन विषेशणों से वंचित होकर हम मानवता को परिभाशित नहीं कर सकते । स्वस्थ प्रकृति और पर्यावरण से वंचित व्यक्ति का जीवन प्रायः अन्धकारमय रहता है और निष्चित ही हम ऐसे अन्धकार में रहना नहीं चाहेंगे । 


संदर्भ सूची 
1. सांख्यकारिका - 16 (सांख्य दर्षन) डाॅ. विमला कर्नाटक
2. यजुर्वेद - (3.50)
3. मनुस्मृति (तृतीय अध्याय)
4. संस्कृत साहित्य का सुबोध इतिहास (डाॅ. जयकिषन प्रसाद खण्डेलवाल)
संदर्भ पुस्तकें 
1. संस्कृत साहित्य में पर्यावरण चेतना (धनंजय वासुदेव द्विवेदी)
2. संस्कृत साहित्य में पर्यावरण (रत्ना षुक्ल, कुसुम भूरिया)
3. संस्कृत वाङ्मय में पर्यावरण (षंकरलाल षास्त्री)
4. सृश्टि का रहस्य तथा पंचमहापातक (वासुदेव परांजपे)
5. संस्कृत आख्यान साहित्य (पं. चन्द्रषेखर पाण्डेय)


षोधार्थी 
कु. गरिमा दवे 
महर्शि पाणिनी संस्कृत एवं वैदिक 
विष्वविद्यालय, उज्जैन (म.प्र.)
मो. 93408-19798