कविताएं

धरती और अंबर


सुनों,
स्वीकार करना होगा तुमको

मेरा ये

मौन और निशब्द प्रेम ही ,

क्योंकि

चाहकर भी नहीं मिलते

धरती-अंबर कभी !!

 

सुनों,

करती हूं स्पर्श तुम्हें

अद्रश्य हवाओं से ,

और..

बरस जाते हो तुम भी

अतृप्त मेघ से !!

 

 

शीर्षक - एक बीज अपने लिए..

 


कब से भींचे हुए थी

ये मुट्ठी

बहुत कसकर,

..संभाल रखे थे

अनगिनत बीज

और उनके अनगिनत जंगल ,

पर कब तक..

लो, गिरने लगे एक-एक कर

सब कहीं

इधर-उधर !!

 

हां, जरूरी था..

बहुत जरूरी था

अंकुरित होना इन बीजों का

कि उपजने लगी थी

कंक्रीट-कल्चर चारों ओर !

 

पर, रहनें देती हूं एक बीज

अपने लिए

.. सिर्फ अपनें लिए

बिना पर्यावरण की चिंता किए हुए !!

 

 

शीर्षक - पुरानें पन्नें

 


क्यों ढूंढ रही हूं

अब भी

पुराने "शब्द"

बरसों से बंद अलमारी में !!

 

एक दिन ,

फ़ाड़ दिये थे सब

वो कुछ पन्नें..

पुरानी डायरी..

पर, छूट गया था

"थोड़ा कुछ" कि

कर रही हूं कोशिश

उन्हें "पढ़ने" की ,

और..

समझने की

वो सारे "अर्थ"

जो होने लगे थे धुंधले

समय की गर्त में !!

 

..खोज रही हूं मायने

उनके होनें के !!

 

 

शीर्षक - नाम उसका..

 






उस दिन

नम होकर

ओस की नमी में

आखिर लिख ही दिया न

.."नाम" उसका !!

 

सुनों..

गीलेपन में उसके

सुलग रहा है

भीतर ही भीतर

अब तक "कुछ" ,

..महसूस किया क्या ??

 

हलचल मन की

स्पष्ट दिखी थी

उंगलियों में तुम्हारी

कि सिमट सा गया था

कुछ.. बहुत कुछ

हां, उसी ओस में !!

 

 

शीर्षक - तेरे ये शब्द..

 


..ये शब्द

हां, यही शब्द.. अक्सर

ढक लेते हैं मुझको

आवरण से ,

..कि नितांत असमर्थताओं में भी

जन्मनें लगती हैं

आकांक्षाएं !!

 

..ये शब्द

हां, यही शब्द.. अक्सर

बचा लेते हैं मुझको

सुरक्षित

प्रत्येक अवरोधों से ,

..कि लौट आती हूं मैं वापस

अपनी कविताओं में

कुछ कहने को नया !!

 

Namita Gupta"मनसी"