बालकवि बैरागी: लोक की भूमि पर खड़े अनूठे कवि

बालकवि बैरागी: लोक की भूमि पर खड़े अनूठे कवि



 



दादा बैरागी! कैसे कहें अंतिम प्रणाम!!!

प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा

मालव सूर्य बालकवि बैरागी जी आज अस्ताचलगामी सूर्य के साथ सदा के लिए विदा कह जाएँगे, यह विश्वास नहीं होता। मालवी और हिंदी के विलक्षण कवि बैरागी जी मंचजयी कवि तो थे ही, उन्होंने लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा - तीनों में प्रतिनिधित्व करने वाले अंगुली गणनीय लोकनायकों में स्थान बनाया है।
मालवी लोक संस्कारों और लोक संगीत से अनुप्राणित कवि बालकवि बैरागी (1931- 2018 ई.) ने स्वातंत्र्योत्तर मालवी कविता को अपने शृंगार, वीर एवं करुण रसों से सराबोर गीतों के माध्यम से समृद्ध किया। वे मालव भूमि, जन और उनकी संस्कृति से गहरे सम्पृक्त रहे। उन्होंने अपनी सृजन-यात्रा की शुरूआत शृंगार एवं सौंदर्य के मर्मस्पर्शी लोक-चित्रों को लोक के ही अंदाज में प्रस्तुत करते हुए की थी। ऐसी गीतों में पनिहारी, नणदल, चटक म्हारा चम्पा, बारामासी, बादरवा अइग्या, कामणगारा की याद, बरखा आई रे आदि बहुत लोकप्रिय हुए। अनेक देशभक्तिपरक और ओजप्रधान गीतों के माध्यम से उन्होंने भारत माता का ऋण चुकाने का उपक्रम भी किया। ऐसे गीतों में खादी की चुनरी, हार्या ने हिम्मत, लखारा, चेत भवानी आदि खूब गाये-गुनगुनाए गए। स्वतंत्र भारत में नवनिर्माण और विकास के सपनों के साथ उन्होंने श्रम के गीत भी रचे। बीच-बीच में युद्ध के तराने भी वे गाते रहे। उनकी काव्य-यात्रा के प्रथम चरण के शृंगार-सौंदर्य एवं ओजपूर्ण गीत ‘चटक म्हारा चम्पा’ (1983) में और द्वितीय चरण के श्रम एवं ओज के गीत ‘अई जाओ मैदान में’ (1986) में संकलित हैं। मालव लोक से गहरा तादात्म्य लिए उनके भाव एवं सौंदर्य-दृष्टि का साक्ष्य देतीं कुछ पंक्तियाँ देखिए: 

 उतारूँ थारा वारणा ए म्हारा कामणगारा की याद
 नेणा की काँवड़ को नीर चढ़ाऊँ
 हिवड़ा को रातो रातो हिंगलू लगाऊँ
 रूड़ा रूड़ा रतनारा थाक्या पगाँ से
 ओठाँ ही ओठाँ ती मेंहदी रचाऊँ
 ढब थारे चन्दा को चुड़लो चिराऊँ
 नौलख तारा की बिछिया पेराऊँ
 ने उतारूँ थारा वारणा ए म्हारा मन मतवारा की याद।

 बैरागीजी लोक की भूमि पर खड़े होकर नित नए प्रयोग करते रहे। उन्होंने मालवी में अपने गाँव-खेड़े से लेकर विश्व फलक पर आ रहे परिवर्तनों को बेहद आत्मीयता और सरल-तरल ढंग से उकेरा है। ‘देस म्हारो बदल्यो’ गीत में वे घर-आँगन, हाट-बाजार, गाँव-शहर सब ओर आ रहे परिवर्तनों के स्वर में स्वर मिलाने का आह्वान करते हैं। इस गीत के हर छंद की समापन पंक्तियों में उन्होंने एक-एक कर कुल छह लोकधुनों का अनूठा प्रयोग किया है।

 बदल्यो रे बदल्यो यो देस म्हारो बदल्यो
 आनी मानी लाल गुमानी अब विपता नहीं झेलेगा
 कंगाली की कम्मर तोड़ी मस्साणां में झेलेगा
 जामण को सिणगार करीर्या अपणा खून पसीना ती
 ईकी ई ललकाराँ अईरी मथरा और मदीना ती।

तू चंदा मैं चांदनी ... बालकवि बैरागी जी की मशहूर संगीतकार जयदेव द्वारा संगीतबद्ध रचना, जिसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया था।

तू चंदा मैं चांदनी, तू तरुवर मैं शाख रे
तू बादल मैं बिजुरी, तू पंछी मैं पात रे

ना सरोवर, ना बावड़ी, ना कोई ठंडी छांव
ना कोयल, ना पपीहरा, ऐसा मेरा गांव रे
कहाँ बुझे तन की तपन, ओ सैयां सिरमोल रे
चंद्र-किरन तो छोड़ कर, जाए कहाँ चकोर
जाग उठी है सांवरे, मेरी कुआंरी प्यास रे
(पिया) अंगारे भी लगने लगे आज मुझे मधुमास रे

तुझे आंचल मैं रखूँगी ओ सांवरे
काली अलकों से बाँधूँगी ये पांव रे
चल बैयाँ वो डालूं की छूटे नहीं
मेरा सपना साजन अब टूटे नहीं
मेंहदी रची हथेलियाँ, मेरे काजर-वाले नैन रे
(पिया) पल पल तुझे पुकारते, हो हो कर बेचैन रे

ओ मेरे सावन साजन, ओ मेरे सिंदूर
साजन संग सजनी बनी, मौसम संग मयूर
चार पहर की चांदनी, मेरे संग बिठा
अपने हाथों से पिया मुझे लाल चुनर उढ़ा
केसरिया धरती लगे, अम्बर लालम-लाल रे
अंग लगा कर साहिब रे, कर दे मुझे निहाल रे।

यूट्यूब लिंक पर जाएँ 
https://youtu.be/HHVEd_WhTSk