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Tuesday, May 12, 2020

कहानी... वागी...

रत्नेश को कभी लगा था कि आत्मा की  जिन सीढियों से उतरकर  वो वागी को पाता है, वो किसी दुर्गंध मारती नाली की तरह है.जिसके  ऊपर बैठकर वो नाली पे ढेर सारी उल्टियां करता है . उसे कभी कभी अपनी इस हरकत पर बहुत गुस्सा भी आता था . लेकिन वो करता  भी क्या? उसे वागी की आदत सी पड गई थी. वागी की देह रत्नेश की कमजोरी थी. वागी रत्नेश की पत्नी है.धीरे - धीरे रत्नेश आत्मा  की सीढियों से नीचे उतरने लगा. और अपनी खोह में गुम हो गया. यहां सब कुछ उसका है.एक भरा पूरा रत्नेश.एक मुकम्मल रत्नेश. लेकिन, जैसे ही वो आत्मा की सीढियों को चढकर आत्मा

की छत तक जाता है उसे वागी दिखाई पडती है. उसका देह दिखाई पड़ता है. उसकी देह को लेकर लोगों को चर्चाएं सुनाई पडती हैं. कैसी-कैसी चर्चाएं?  अजीबो -गरीब चर्चाएं. लोग वागी के बारे में कहते हैं कि वो परी है. स्त्री के भेष में एक परी. कि जिस दिन दुनिया से औरतें खत्म हो जाएगी, ये वागी भी कहीं उडकर दूर देश में चली जाएगी. कोई कहता कि वो परी नहीं है. कोई चुड़ैल है जो किसी राजा की राजकुमारी थी. कि राजा की बेटी ने किसी पागल से प्यार कर लिया था और राजा ने उसे और उसके पगले प्रेमी को पुराने तालाब के पीपल के पेड़ के नीचे वाले कब्रिस्तान में उन दोनों को दफना दिया था.आखिर कौन थी वागी? लेकिन जिस वागी को वो जानता था वो ये तो नहीं ही थी. रत्नेश धीरे धीरे अपने आत्मा के उजाले में आया.

 

रत्नेश टिफिन का डब्बा और दुकान की चाबियां लेकर अभी - अभी घर लौटा ही था. कि उसने वागी को उसके मौसरे भाई को घर के दरवाजा तक  छोडते जाते हुए देखा.

"और कैसे हैं रत्नेश भईया ..दुकान बढा दिए .? " पियूष ने रत्नेश से मुस्कुराते हुए पूछा .

 

ना चाहकर भी रत्नेश को पियूष से बोलना पडा - " हां.. 

अभी अभी बढाकर आ रहा हूं. तुमने खाना खाया कि नहीं.अगर नहीं खाया तो खाकर जाओ. " 

 

पियूष रत्नेश को आश्वस्त करते हुए बोला -" हां- हां भईया अभी अभी खाना खाया है. आपके घर से बिना खाना खाए दीदी मुझे थोडी ही जाने देगी." वो जूते के फीते को बांधता हुए बोला.

दरवाजे तक वागी पियूष को छोडने गई थी. जाते- जाते अपने मौसेरे भाई पियूष को हिदायत देते हुए बोली - " इस बार जरा जल्दी आना. तुम बहुत दिन - दिन पर आते हो. " फिर उसने मुस्कुराते हुए दरवाजा बंद कर दिया.

 

इस तरह से घर के बाहरी लोगों से कैसे हंस-हंस कर बतियाती है, वागी . लेकिन, मुझसे या घर के और लोगों से तो कभी ऐसे नहीं बतियाती. खैर, उसने टिफिन के डिब्बे को टेबल पर रखा और चाबियां अलमारी के दराज में. फिर वो वाश- वेशिन पर झुककर  साबुन से हाथ -मुंह धोने लगा.

रात काफी गहरा चुकी थी. वागी अभी- अभी बिस्तर पर आकर लेटी थी. रत्नेश ने वागी  को अपनी तरफ खींचना चाहा लेकिन वागी ने विरोध करते हुए रत्नेश को परे धकेल दिया और बोली - " मुझे सोने दो , सुबह मुझे स्कूल जल्दी जाना है."

रत्नेश को ये बात अपमानजनक लगी. वो वागी पर झपटते हुए बोला - " स्कूल तो तुम रोज जाती हो. लेकिन आदमी को कभी - कभी ये सब भी तो करने का मन करता है. " 

वागी ने रत्नेश का प्रतिकर करते हुए एक कहा - " मुझे अब ये सब करने का मन नहीं करता है, मुझे नींद आ रही है, मुझे सोने दो  . " 

 

रत्नेश को आखिर गुस्सा आ गया  वो वागी के ऊपर गुस्साते हुए बोला - " हां -हां अब तुम्हें ये सब करने का मन क्यों करेगा.तुम्हारे स्कूल के यार तो हैं हीं तु्म्हारे ये सब काम  करने के लिए. " 

रत्नेश के द्विअर्थी बातों का वागी सामना ना कर सकी , बोली - " क्या कहना चाहते हो तुम कि मैं बदचलन हूं! " 

रत्नेश उसी रौ में बोला - " नहीं तुम बदचलन नहीं हो तुम तो सती- सावित्री हो! "

"तुम कहना क्या चाहते हो. साफ - साफ कहो " वागी ने रत्नेश के चेहरे को घूरते हुए पूछा 

 

यही की तुम , तुम्हारे बारे में लोग बहुत कुछ कहते हैं.तुम्हारा और प्ले -टीचर मुकुंद का चक्कर है.और वो साइंस वाला मिश्रा उसके साथ तो तुमने खूब गुलछर्रे उडाये हैं. मैं कुछ नहीं बोलता हूं तो तुम उसका गलत मतलब निकाल रही हो."

"मेरा प्ले टीचर मुकुंद का और मिश्रा जी का.. छी.. छी.. तुम मेरे ऊपर झूठा और बेबुनियाद इल्ज़ाम लगा रहे हो! तुम्हें शर्म आनी चाहिए इस तरह के घटिया और बेहूदा इ्ल्जाम मेरे ऊपर लगाते हुए." वागी बोली.

 

" नहीं, मैनें तुम्हारी बात बेकार ही मानी. अगर मैंने तुम्हारी

बात नहीं मानी होती तो मुझे लोगों से इस तरह की बातें नहीं सुननी पडती. लेकिन, मैं भी क्या करता तुम्हारी चिकनी- चुपड़ी बातों में आ गया. मैं क्या जानता था कि तुम्हारी बातों में आकर तुम्हें तुम्हारा स्कूल खोलने दूंगा और मेरी इज्जत खराब हो जाएगी. ओह, बेकार ही मैनें तम्हारी बात मान ली." रत्नेश अपने आप को कोसते हुए बोला.

वागी भी गर्म तेवर दिखाते हुई बोली - " हां मैनें तुम्हें कहा था कि मैं पढाना चाहती हूं लेकिन, बाद में तुम्हारा दुकान भी तो खराब चलने लगा था.घर  में पैसे की तंगी होने लगी थी. तुम दुकान में लगातार घाटा दे रहे थे.आज भी दे रहो हो. मैंने कितनी बार तुम्हें दस हजार, बीस हजार, और कभी - कभी तो पचास हजार रुपये भी दिये. तुम दुकान की पूंजी खाते गए. आज भी कौन सी अच्छी चल रही है तुम्हारी दुकान किसी दिन एक हजार तो किसी दिन बारह सौ  रूपये बेचते हो.क्या कमाई करते हो तुम अपने गल्लेकी दुकान में, कभी खुद से पूछो. कभी सौ तो कभी दो सो, दसियों बार मैं तुम्हें पूंजी दे चुकी हूं. उससे तो अच्छा मेरा स्कूल है. कम से कम चालीस- पचास हजार रुपये महीने तो कमा  कर दे ही रहा है. अगर ये स्कूल न होता तो सडक पर आ गए होते."

रत्नेश को आखिर के शब्द गड़ गए. वो चोटिल सांप की तरह फुंफकारते हुए बोला -" मेरे बाप की वजह से ही तुम ये स्कूल खडा कर पायी थी . मेरे बाप ने ही तुम्हारी मदद की थी. तुम्हें याद है ना पूरे पचास हजार रुपये दिये थे मेरे बाप ने तब जाकर तुम्हारा स्कूल खुला था. नहीं तो तुम्हारे सपने आज हवा में झूल रहे होते. बड़ी आयी दूसरों की मदद करने वाली."

रत्नेश अपने बाप के द्वारा किए गये एहसान की आड़ में अपनी कमजोरी को ढंक रहा था. पता नहीं क्यों रत्नेश को लग रहा था कि वो बीच बाज़ार में खडा़ है और वागी ने उसे सरेआम झापड़ रसीद   कर दिया है .

फिर अपनी नाकाम को छुपाते हुए बोला - " तुम तो मेरे बाप के एहसानों को भी नहीं मानोगी."

वागी भी उसी रौ में बोली - " नहीं मैं नहीं मानती, तुम्हारे बाप के किये हुए एहसानों को, मैनें पैसे लिए थे तो लौटाए भी थे. तुम्हें ये क्यों नहीं दिखता."

रत्नेश गुस्से से बोला - " बहुत ही एहसान - फरामोश औरत हो तुम. आखिर तुमने पैसे लिए न ! भले ही तुमने उसे बाद में लौटा दिया तो क्या वो एहसान नहीं कहा जाएगा! "

वागी बोली - " नहीं मैं उसे एहसान नही मानती." 

आखिर, रत्नेश का सब्र जबाब दे गया और वो बोला - " तुम्हें आखिर इतना घमंड क्यों है. क्या तुम्हारा स्कूल बहुत बढिया चल रहा है इसलिए, या तुम मुझसे ज्यादा पैसे कमाने लगी हो इसलिए? मुझे समझ नहीं आ रहा है कि तुम्हें इतना घमंड किस बात का है? तुम मेरे लिए मनहूस हो मनहूस! जब से तुम मेरी जिंदगी में आयी हो मेरे घर से बरकत चली गई है. मेरी एक बात को आज कान खोलकर सुन लो कि आज के बाद अपने किसी रिश्तेदार को मेरे घर नहीं बुलाओगी." 

वागी के तेवर भी गर्म थे, वो बोली - " ऐसा बिल्कुल नहीं होगा."

आखिर, रत्नेश को भी ताव आ गया और उसने खींचकर वागी को एक झापड मारा. रत्नेश बेतहाशा वागी को मारता रहा जब तक कि वो थक ना गया.

अगली सुबह वागी अपने कमरे में नहीं थीं. वो शायद परी बन गयी थी. लोग कहते हैं कि उसके बाद से ही धरती पर परियों ने आना बंद कर दिया.और अगर यही हाल रहा तो औरतें भी इस धरती से गायब हो जाएंगी! जैसे वागी गायब हो गई थी! 

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महेश कुमार केशरी

 मेघदूत मार्केट फुसरो  

बोकारो झारखंड 829144

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