Tuesday, December 10, 2019

अस्सी का दशक और हिन्दी नाटकों की नाटकीयता              

 ÓÓनाटक का तन्त्र लेखक को खुद निश्चित करना पड़ता है। नाट्य-तंत्र के नियमों से मार्ग-दर्शन होगा, लेकिन ऐसा नहीं कि उनके पालन से ही अच्छा नाटक लिखा जा सकता है। विश्व के बहुत से अच्छे नाटक तो इन नियमों के अपवाद ही साबित होंगे। नाटक का माध्यम खून में उतर जाना चाहिए, संज्ञा पर उसकी छाप उठनी चाहिए तभी कोई लेखक अच्छा नाटक लिख सकता है।ÓÓ- विजय तेन्दुलकर
 नाटक एक जीवंत अनुभव है। उसकी नाटकीयता अर्थात् रंगमंचीय संभावनाएँ कृति में ही विद्यमान रहती हैं और वह अपनी जीवंतता रंगमंच पर ही प्राप्त कर सकता है। नाटक का अपना नाटकीय यथार्थ होता है, जो यथार्थवादी नाटकों के यथार्थ से एकदम भिन्न है और जिसके लिए नाटककार की निजी रंग-दृष्टि-पहली शर्त है। नाटककार का दृष्टिकोण ही कथ्य की परियोजना इस ढ़ंग से करता है कि कथानक तत्व, पात्र तथा संवाद के सूत्र एक दूसरे से जुड़े मूल कार्य का विकास करते चले जाते हैं और कथ्य अपने अनुरूप रंगमंच सृजित करता चलता है। कथ्य और रंगमंच जब कृति में एक साथ अस्तित्व पाते हैं तभी वह नाट्य कहा जाता है।
 नाटक और रंगमंच अन्योन्याश्रित हैं। ये एक दूसरे से प्रभावित होते हैं और एक दूसरे को प्रभावित करते भी हैं। ये दोनों समाज से अपना रूपाकार ग्रहण करते हैं तथा समाज; अपने देश, काल और परिवेश से निर्धारित होता है। समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं और परिस्थितियों के साथ समाज। समाज का यह बदलाव धीरे-धीरे नाटक और रंगमंच दोनों को ही नहीं बल्कि साहित्य-और कलाओं के सभी रूपों में परिवर्तन करता चलता है। जब यह परिवर्तन स्पष्ट और मुखर होकर प्रत्यक्षत: प्रकट होने लगता है तो हम पाते हैं कि समाज, साहित्य और कलाएँ अपने पिछले रूप रंग से कुछ अलग अथवा भिन्न हैं, तो हम उन्हें नये विशेषण से पुकारने लगते हैं वस्तुत: प्रत्येक नाटककार का अपना नया नाटक और नया रंगमंच होता है।2 रंगमंच नाटक का निकर्ष है। निसंस्देह रंगमंच की आत्मा नाटकीयता है तो नाटक की आत्मा रंगमंचीयता। रंगमंच नाटक की सही कसौटी है किन्तु नाटक एक मात्र कसौटी या निरा रंगमंच ही नहीं है। यदि नाटक में रंगमंचीयता या अभिनयता का आग्रह होगा तो नाटक दिशा से भटक सकता है। नाटक न केवल साहित्य है और न केवल रंगमंचीय कला।
 नाटक संवादात्मक होने के कारण उसमें वाच्य तत्व मुख्य हो जाता है। संवाद अभिनेता से ही दर्शक तक पहुंचते हैं और नाटक एवम् नाटककार से साक्षात्कार कराते हैं इसलिए भरतमुनि ने वाचिक अभिनय को नाटक का शरीर माना है। नाटक एक त्रिकोण से आबद्ध है - नाटककार, सूत्रधार (निर्देशक) और दशर्क; लेकिन अभिनेता और अन्य सारा समूह भी उसका अनिवार्य अंग है। इसलिए सारी नाटक-प्रक्रिया इनके निरन्तर तारतम्य, सहयोग, सामंजस्य से ही संभव है। कई बार कोई नाटक पढऩे पर फीका लगता है और अभिनीत देखने पर प्रभावित करता है तो कभी अच्छे से अच्छा नाटक भी रंगमंच पर आकर मर जाता है; अत: नाटक एक सामूहिक संश्लेषणात्मक कला है जो रचनाकार से निर्देशक, निर्देशक से अभिनेता और अभिनेता से दर्शक तथा पूरी परिस्थितियों  तथा रंगकर्मियों से होती हुई प्रेक्षक तक पहुंचती है।3
 अत: नाटक को रंगमंच से अलग करके नहीं देखा जा सकता जैसे कथानक, चरित्र, संवाद, भाषा इत्यादि की उपस्थिति के बावजूद उपन्यास को नाटक नहीं कहा जा सकता; उसी प्रकार किसी भी ऐसी संवादबद्ध रचना को नाटक नहीं कहा जाना चाहिए जिसमें नाटकीयता न हो अथवा जो रंगमंच से अनिवार्यत: जुड़ी न हो फिर चाहे उसका अलग से कितना ही साहित्यिक मूल्य क्यों न हो।4
 नये और समसामयिक रंगमंच ने सिद्ध कर दिया है कि नाट्यालेख और प्रेक्षागृह के स्पेस कावैसा अनिवार्य एवम् आन्तरिक सम्बंध नहीं होता जैसा कि अब तक भारतीय और विदेशी नाट्यशास्त्र में माना जाता रहा है। निर्देशक और दृश्यांकनकार अपनी इच्छा एवम् कल्पनाशीलता से उसे बदल भी सकते हैं। इसी तरह प्रयोगधर्मी रंगकर्म और रंगस्थल के बीच केवल कलात्मक एवम् रचनात्मक ही नहीं; आर्थिक, सामाजिक तथा अन्य स्थूल रिश्ते भी होते हैं यही कारण है कि हिन्दी प्रयोगधर्मी रंगकर्म में दर्शकों की कमी घाटे का सौदा सिद्ध हो रही है।5 इसी क्रम में अंधेर नगरी के मंचन में निर्देशक सत्यव्रत सिन्हा द्वारा किये गये नवीन प्रयोग सराहनीय हैं। 
 नये और समसामयिक भारतीय हिन्दी नाटक ने बाह्य घटनात्मक स्थूल यथार्थ से आगे बढ़कर सूक्ष्म संवेदनात्मक अभ्यन्तर यथार्थ का चित्रण किया तथा आधुनिक व्यक्ति के आन्तरिक संकट और उसकी जटिल संश्लिष्ट मानसिकता को विश्लेषित करने का प्रयास किया। प्रसाद काल से चली आ रही रंगमंच की खाई पाटी गयी और निर्देशक नामक एक संयोजक व्यक्तित्व का आविर्भाव हुआ। रंगकार्य में दर्शक की सत्ता और महत्ता स्वीकार की गयी। रस का स्थान द्वंद्व, तनाव और संघर्ष ने ले लिया। वर्जित दृश्यों और अनेक पुरातन रूढिय़ों से नाटक को मुक्ति मिली।6
 नाटक की नाटकीयता को समझने हेतु भाषा अपरिहार्य माध्यम है। नाटककार के भावों और विचारों को साकार रूप भाषा वैशिष्ट्य ही प्रदान करता है। रचनाकार के लिए शब्द मात्र शब्द या वस्तु नहीं है - वह उन्हें नई संवेदना से छूता है। रचता है। वह लगातार संघर्ष करता है। शब्द को भावों की एक रेंज एक ताजगी देता है। रचनाकार की रचना का सत्य भाषा से ही फूटता है। शब्द विन्यास, भंगिमाएँ, लय, गति आदि अलग-अलग नहीं है। रचनाकार इनका विलक्षण संयोजन कर अपने अनुभव, युगीन संवेदना से जोड़ता है; उनमें एक ऊष्मा, एक द्वंद्व, एक तनाव को अर्थ के नये आलोक में भरता है। यह सत्य भी है कि मानवीय अनुभवों का जटिल संसार भाषा की संवेदना से ही अनुभूत और व्यक्त किया जा सकता है।
 भाषा की शक्ति का समग्र विकास नाटक में ही होता है। नाटक की भाषा में एक पूरी श्रृंखला होती है जिसमें स्थितियां, क्रिया, प्रतिक्रिया, पात्र की बेचैनी तथा अन्य भावों को व्यक्त करने की क्रिया व गतियां होती हैं। उसमें स्थिति का वर्णन न होकर उसकी प्रस्तुति होती है। नाटक में भाषा स्वयं एक स्थिति होती है क्योंकि वह पात्र को बोलने के लिए विवश कर देती है। नाटक के शब्दों को इस तरह रखा जाना महत्वपूर्ण होता है कि वे निर्देशक व अभिनेता को प्रेरित कर सकें।
 संस्कारी मानक भाषा और बोलचाल की जुबान को हरकत भरी जीवन्त नाट्य भाषा का रचनात्मक रूप  देने के साथ बोलियों का या आंचलिक शब्दों एवम् अभिव्यक्तियों के नाटकीय इस्तेमाल ने भी नये हिन्दी नाटक की सृजनात्मक उपलब्धि के एक अभिनव आयाम का उद्घाटन किया है।7 यह सत्य है कि मोहन राकेश, जगदीशचन्द्र माथुर, लक्ष्मीनारायण लाल, शंकर शेष, धर्मवीर भारती, शरद जोशी, ज्ञानदेव अग्निहोत्री, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, हम्मीदुल्ला, मणिमधुकर, भीष्म साहनी, बी.एम. शाह, रमेश बक्शी जैसे नाटककारों को हमने खो दिया है। परन्तु इस तथ्य से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद, संख्या की दृष्टि से जितने नये नाटककार सत्तर के दशक में उभरे हैं, उतने पिछले पचास वर्षों में भी नहीं उभरे थे।
 अस्सी के दशक (1980 ई. से 1989 ई. तक) में जो नाटकीय प्रयोग हुए, उनकी नींव नाटककार मोहन राकेश ने रखी। राकेश के नाटकों ने हिन्दी रंगमंच को सक्रियता ही नहीं दी, नाटक को सही मायने में रंगमंच से जोड़ा, प्रचलित नाट्य रूढिय़ों को तोड़कर आधुनिक रंगमंच की कल्पना को विकसित किया तथा प्रयोगशील कल्पना को साकार कर दिया। अस्सी के दशक के नाटकों ने उनकी इसी परम्परा को आगे बढ़ाया। सत्तर के दशक में नाटक तो पर्याप्त संख्या में लिखे गये लेकिन जिन नाटककारों ने अस्सी के दशक तक नाटकीय सम्भावनाओं को बनाए रखा उनमें प्रमुख रूप से डॉ. सुरेन्द्र वर्मा कृत Óछोटे सैयद, बड़े सैयदÓ (1982), Óएक दूनी एकÓ (1987), Óशकुन्तला की अंगूठीÓ (1990)। शंकर शेष कृत Óआधी रात के बादÓ (1981)। हम्मीदुल्ला कृत ÓहरवारÓ (1986), शिवमूरत सिंह कृत पूर्वाद्र्ध, सुदर्शन मजीठिया कृत ÓचौराहाÓ, नरेन्द्र मोहनÓ कृत Óकहै कबीर सुनो भई साधोÓ, विनय कृत Óएक प्रश्न मृत्युÓ, असगर वजाहत कृत Óजिन्न की आवाजÓ, दूधनाथ सिंह कृत ÓयमगाथाÓ, नन्दकिशोर आचार्य कृत ÓपागलघरÓ, Óइमइदम यक्षमÓ, Óदेहान्तरÓ, दयाप्रकाश सिन्हा कृत Óसीढिय़ांÓ, इत्यादि महत्वपूर्ण रहे।8 इनके अतिरिक्त मृणाल पाण्डे, कुसुम कुमार तथा मृदुला गर्ग का भी नाम विशेष रूप से लिया जा सकता है। इस दशक की नाटकीयता को निम्न बिन्दुओं द्वारा समझा जा सकता है -
01. ये नाटक रंगमंच की अपेक्षाओं व जरूरतों को ध्यान में रखकर लिखे गये परन्तु कभी-कभी इन्होंने मौज़ूदा रंगमंच का अतिक्रमण करके, उसके लिए नयी चुनौतियों की सृष्टि की।
02. यह वस्तु संरचना की दृष्टि से पारम्परिक नाट्य शास्त्रीय रूढिय़ों को तो अस्वीकार करता ही है साथ ही पश्चिमी समस्या नाटकों के रंग-शिल्प को भी ज्यों का त्यों न अपनाकर कथ्य के अनुसार नये-नये रंग-प्रयोग करता रहा है।
03. इन नाटकों में संघर्ष और घटना की परिकल्पना और चित्रण का भी रूप बदल गया है। बाह्य परिस्थितियों या नियति से मनुष्य का संघर्ष अब महत्वपूर्ण नहीं रहा। आधुनिक व्यक्ति का मानस सदैव एक अन्तद्र्वन्द्व, दुविधा और तनाव की स्थिति में रहता है, अत: व्यक्ति मानस स्वयं परिस्थिति है और यह तनावग्रस्तता ही संघर्ष है।
04. मनुष्य की मनुष्य के रूप में पहचान और नवीन मानव सम्बन्धों एवम् मूल्यों का अन्वेषण और चित्रण इसकी मूलभूत शर्त है। यह इतिहास, पुराण और मिथक का प्रयोग एक साधन के रूप में महज सुविधा की दृष्टि से करता है। नया नाटककार मानता है कि मानवीय धरातल पर भीÓ नहीं बल्कि मानवीय धरातल पर रहकर ÓहीÓ जीवन में कुछ महान किया जा सकता है।
05. इन नाटकों में नायक, खलनायक और विदूषक की विभेदक रेखाएँ परस्पर घुलमिल गयी हैं। व्यक्ति के अन्तर्विरोधों का स्पष्ट चित्रण, नये नाटकीय चरित्रांकन की एक प्रमुख विशेषता है।
06. Óकाव्यगत न्यायÓ और Óसंकलन-त्रयÓ जैसे सिद्धान्त अब सर्वमान्य नहीं रह गये हैं। वर्जनाओं के बंधन यह नाटक नहीं मानता।
07. नारी अब केवल प्रेमिका, प्रेरणा या सजावट की वस्तु मात्र न रहकर एक सतत् संघर्षरत, जीवन्त और सम्पूर्ण चरित्र बन गयी है।
08. उच्चरित सार्थक सटीक शब्दों, अस्पष्ट ध्वनियों, मौन, मुद्राओं, क्रियाओं, मंच-सज्जा। उपकरण, संगीत और छाया-लोक से मिलकर बनी हरकत भरी समग्र नाट्य भाषा (बोलियाँ जिसका अनिवार्य अंग हैं) और चरित्रों की आन्तरिकता से उद्भूत संवाद-लय का रचनात्मक उपयोग इन नाटकों की प्रमुख पहचान है।
09. इन नाटकों पर भारतीय या पश्चिमी किसी भी विचार एवम् रंगधारा का प्रभाव हो सकता है। इसका कोई एक निश्चित या पूर्वनिर्धारित रूप, रंग नहीं है। यह मूलत: और अन्तत: प्रयोगधर्मी है।
10. प्रभावान्विति के अतिरिक्त यह किसी सिद्धान्त और नियम को पूरी तरह स्वीकार नहीं करता।
11. इसका उद्देश्य प्रेक्षक को रस विभोर करने के बजाय उसे विचलित तथा उत्तेजित कर, सोचने और प्रतिक्रिया करने पर मजबूर करना है। यह दर्शक की संवेदनशीलता को सजग, उदार और व्यापक बनाता है।9
स्पष्ट है कि हिन्दी के इन नाटकों का फिलहाल कोई एक निश्चित और पूर्व निर्धारित रूपाकार नहीं है। इसे वर्गों में बांटना और पारम्परिक सिद्धान्तों के आधार पर विवेचित, विश्लेषित या पूरी तरह मूल्यांकित करना न तो सम्भव है और न ही उचित। प्रयोगधर्मिता ही उसकी परिकल्पना का मूल आधार है। फिर भी अस्सी के दशक के प्रमुख नाटककारों के प्रमुख नाटकों का एक विश्लेषण प्रस्तुत है। 
 सुरेन्द्र वर्मा के Óछोटे सैयद बड़े सैयदÓ नाटक में स्त्री पुरुष के काम सम्बन्धों के मिथ को तोड़ा है तो Óएक दूनी एकÓ में वे स्पष्ट करते हैं कि भीतरी रिक्तता ने स्त्री पुरुष, आदिम सहजात सम्बन्धों को भी ग्लोबल कर दिया जिससे उनके व्यक्तित्व जटिलताओं में फँस गये हैं। Óशकुन्तला की अंगूठीÓ नाटक में वे दुष्यन्त व शकुन्तला के बहाने स्त्री पुरुषों के काम सम्बन्धों के नियति दर्शनों की व्याख्या करते हैं। नाट्य शिल्प, भाषा सम्बन्धी दुर्बलताओं तथा काम सम्बन्धों के खुले चित्रण के बावजूद सुरेन्द्र वर्मा हिन्दी नाट्य को नवीन कथ्य, रंगमंच विधान तथा नयी प्रयोग दृष्टि देते हैं।
 शंकर शेष एक पूर्णकालिक नाटककार थे। वे अपने चारों ओर नाटक ही नाटक देखते थे। नाटक की कोई प्रविधि ऐसी नहीं थी जिसका उन्हें ज्ञान न हो। इसका कारण यह है कि शेष ने जीवन की विद्रूपताओं और क्रूरताओं को बहुत गहराई से महसूस किया। शंकर शेष की नाट्यकला का विस्तार बहुत व्यापक है। उन्होंने अपने नाटकों में वर्तमान की पदचाप की हर लय को रूपान्तरित किया है। अपनी नाट्यधर्मी रचनात्मकता का प्रयोग उन्होंने जीवन बोध की व्याकुलता, अकुलाहट, संघर्षशीलता, अन्तद्र्वन्द्व आदि को व्यक्त करने के लिए किया है।
 रंगमंच की दृष्टि से इनके नाटक पूरी तरह सफल हैं। इनके नाटकों ने नया मंचीय इतिहास बनाया क्योंकि इनके नाटक बार-बार मंचित हुए हैं। शंकर शेष राकेशोत्तर साहित्य का एक विलक्षण और प्रयोगशील अध्याय है। डॉ. वीणा गौतम उनकी नाट्यकला पर विचार करते हुए लिखती हैं - ÓÓशंकर शेष की अंदाज-ए-बयानी में काव्यात्मकता, चारूरता व जीवन के सूक्त्यात्मक मुहावरे एक ओर देहधारी होकर केशर-लौ से लहकते हैं तो दूसरी ओर दहकते मध्यान्ह में झुलसते ग्रीष्म ऋतु के मरु उत्सव की सौन्दर्य ऊर्जा भी जगाते हैं। ... इनके प्रत्येक नाटक में नव्य परिबोध, शैली की वक्रता, भाषायी उठान, जल की तरह जगह बनाता कथ्य, आइना दिखाती सांवादिक संरचना, जीते जागते सशरीर पात्र, महाकाव्यात्मक औदात्य, रंगधर्मी मंचीय कौशल आदि सभी दृष्टियों से शेष की नाट्यकला विस्तार मुखी है।
 दूधनाथ सिंह की कृति ÓयमगाथाÓ हिन्दी नाट्य साहित्य की आधुनिक चेतना से युक्त कृति है। हिन्दी कथा साहित्य में दूधनाथ एक प्रतिबद्ध कथाकार के रूप में चर्चित रहे हैं। ÓयमगाथाÓ ऋग्वेद के मिथकीय संसार से पुरूरवा व उर्वशी के कथानक को आधार बनाता है। सिंह ने कालिदास के उत्कृष्ट रोमांटिक घटाटोप से पुरूरवा, उर्वशी को बाहर लाकर, उनके मिथक की नयी अर्थ उद्भावना पूरे तर्क के साथ की है। इसका कथ्य आगे चलकर सरलीकरण, आरोपित विचारधारा का शिकार हो जाता है और नाटक का स्वर कहीं कहीं निरर्थक तीव्रता से भर जाता है लेकिन उसकी नाटकीयता को क्षति नहीं पहुंचती। इसका शिल्प विशद् कैनवास पर शास्त्रीय पद्धति का विराटत्व लिये हुए है जिसके मंचन के लिए भारतीय परम्परा नाट्यशास्त्र के सैद्धान्तिक व्यवहारिक ज्ञान और वैदिक कालीन जीवन पद्धति आदि का पूर्ण ज्ञान अपेक्षित है। यह कृति प्रशिक्षित, समृद्ध और पूर्णत: विकसित रंगमंच की मांग करती है। रंगमंचीय व्यवस्था, नाटक और काव्य के अंत:सम्बन्ध की लय, अभिनय शैली, सौन्दर्यशास्त्र और सांस्कृतिक चेतना के बिना इसे सम्प्रेषित करना सम्भव नहीं है।10
 लक्ष्मीनारायण लाल के नाटक Óबलराम की तीर्थ यात्राÓ व Óकजरी वनÓ में अपने अन्य नाटकों की ही भांति वस्तु व शिल्प दोनों स्तरों पर अनेक प्रयोग किये हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के बाद लोक नाट्य शैली का प्रयोग इन्होंने किया है। आधुनिक यूरोपीय नाट्य शैली और भारतीय नाट्य शैली सभी के प्रयोग इनके नाटकों में देखने को मिलते हैं। डॉ. बच्चन सिंह ने कहा है कि ÓÓडॉ. लाल नाट्य कौशलों से पूरी तरह परिचित है लेकिन प्रयोग के उत्साह में उनका सम्यक समायोजन नहीं कर पाते। उनकी दूसरी दिक्कत है कि उनके पास कोई अपनी जीवनदृष्टि नहीं है। रह-रह कर प्रयोग साधन न होकर साध्य हो जाता है।
 इसी क्रम में नन्दकिशोर आचार्य के नाटक भी अपने कथ्य, नाट्य संरचना, आन्तरिक गठन और चरित्रों की जटिल सांकेतिकता में उल्लेखनीय है। देहान्तर नाटक से चर्चित नन्दकिशोर आचार्य के अन्य नाटकों में Óगुलाम बादशाहÓ, ÓपागलघरÓ, Óइमिइदम राक्षमÓ, व Óहस्तिनापुरÓ हैं इनके नाटकों की नाट्यभाषा व शिल्प की मौलिकता, सूक्ष्मता व नुकीलापन महत्वपूर्ण है। बहुत कम शब्दों में सघन और गहराई से अपनी बात कहते हैं। Óहस्तिनापुरÓ नाटक में सर्जनात्मक शिल्प प्रयोग, तीव्र द्वन्द्वात्मक लय और सूक्ष्म काव्यात्मक नाट्यभाषीय प्रयोग द्रष्टव्य हैं। इनके नाटक, निर्देशक और अभिनेता को चुनौती देने वाले हैं तथा रंगमंच का नवीन सौन्दर्यबोध रचते हैं। अन्य नाटकों में दयाप्रकाश सिन्हा का Óसीढिय़ांÓ, वर्तमान कुचक्रों के बीच आदमी की महत्वाकांक्षा और उसकी परिणति का मार्मिक चित्र खींचता है। जिंदादिली और रवानगी इस नाटक की प्रमुख विशेषता है।
 महिला नाटककारों में मन्नू भंडारी का ÓमहाभोजÓ (1982), उनकेउपन्यास महाभोज का नाट्य रूपान्तरण है। मृदुला गर्ग के Óएक और अजनबीÓ में पारिवारिक विघटन को मूर्त किया है। मृणाल पाण्डे का Óजो राम रचि राखाÓ एक प्रसिद्ध नाटक है। इसके अतिरिक्त Óमौज़ूदा हालात को देखते हुएÓ, दूसरा नाटक Óआदमी जो मछुआरा नहीं थाÓ हैं।
 निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि नाटक सिर्फ पात्र साहित्य नहीं है न केवल रंगमंच। नाटक के साहित्येतर भी विविध आयाम हैं जो रंगमंच से सम्बद्ध हैं, नाटक केवल नाट्य या वाच्य संवाद नहीं है न केवल शब्दबद्ध रचना और भाषागत अभिव्यक्ति। जो शब्द किसी अनुभूति को, स्थिति को अभिव्यक्त करते हैं वे अभिनेता द्वारा उसकी सृजनात्मक प्रक्रिया से मंच पर रूपायित और मूर्त होते हैं। इसलिए नाटक को साहित्य और रंगमंच दो भागों में बांटकर नहीं देखना चाहिए।
 मोहन राकेश के अनुसार नाट्य और रंगमंच के लिए निश्चित सिद्धान्त प्रतिपादित नहीं किये जा सकते क्योंकि बदलते समय और समाज के सरोकारों व सवालों से रंगकर्म में भी निरन्तर बदलाव बना रहता है। ÓÓआज का रंगमंच पहले से कहीं अधिक निर्देशक का माध्यम बनता जा रहा है - नाटककार इसमें उपेक्षित होता जा रहा है। रंगमंच की पूरी प्रयोग प्रक्रिया में नाटककार केवल एक अभ्यागत, सम्मानित दर्शक या बाहर की इकाई बना रहे, यह स्थिति मुझे स्वीकार्य नहीं है।ÓÓ 
 आज शक्तिशाली व व्यापक इलेक्ट्रोनिक मीडिया के भयानक आक्रमण ने नाटक और रंगमंच के सामने जबरदस्त चुनौती उपस्थित कर दी है परन्तु हमें विश्वास करना चाहिए कि जीवन्त अनुभव का यह प्राचीनतम और प्रखर अभिव्यक्ति माध्यम अपने प्रयोगधर्मी चरित्र के कारण ही कोई न कोई नया रूपाकार लेकर, इस वर्तमान संकट का न केवल मुकाबला करेगा बल्कि नित नवीन, कल्पनाशील और प्रभावशाली बना रहकर अधिकाधिक प्रेक्षकों, पाठकों को अपने जादू से बांधे रखने में सफल भी होगा क्योंकि -
 ÓÓकल्पना की जीभ में भी धार होती है
 बांण ही होते विचारों के नहीं केवल
 स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।ÓÓ
सन्दर्भ सूची :-
1. आधुनिक भारतीय रंगलोक - जयदेव तनेजा (पृ. 35)
2. वही (पृ. 53)
3. रंगभाषा - गिरीश रस्तोगी (पृ. 46)
4. आधुनिक भारतीय रंगलोक -जयदेव तनेजा (पृ. 43)
5. वही (पृ. 9)
6. वही (पृ. 20)
7. वही (पृ. 33)
8. हिन्दी गद्य साहित्य - डॉ. रामचन्द्र तिवारी (पृ. 254)
9. आ.भा.रंग - (पृ. 53)


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