Tuesday, December 10, 2019

भूमण्डलीकरण और स्त्री विमर्श          

इस पुरुष प्रधान देश में नारी की स्थिति प्राचीन काल से ही बड़ी दयनीय और चिंताजनक रही है। नारी की स्थिति को दर्शाने के लिए कई साहित्यकारों ने सफल प्रयास भी किये हैं। इधर कुछ वर्षों से इसकी चर्चा अधिक होने लगी है, क्योंकि नारी लेखिकाओं ने इस दिषा में विशेष प्रयास किए हैं। उस वर्ग से संबंधित होने के कारण वे नारी मन को अधिक प्रामाणिक ढ़ंग से व्यक्त कर सकती हैं।
 भूमण्डलीकरण का प्रभाव स्त्री पर भी उतना ही पड़ा है, जितना पुरुष पर। भूमण्डलीकरण स्त्री को नए ढ़ंग से सोचने-समझने, विकास में सहयोग देने, आत्मनिर्भर बनने आदि में प्रेरणा प्रदान करता है। इसमें नारी अपने अस्तित्व को लेकर खड़ी हुई और इस पुरुषवादी सामाजिक संरचना के भीतर अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक हुई। ''स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि उसे बना दिया जाता है। भूमण्डलीकरण में स्त्री को 'स्त्रीÓ बनाने की प्रक्रिया तेज हुई है, लेकिन इस प्रक्रिया ने अनजाने में स्त्री के प्रति एक द्वन्द्वात्मक स्थिति पैदा कर दी है।ÓÓ1 
 भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया के कारण स्त्री को काम के लिए क्षेत्र मिला है, फलत: वह शक्तिशाली और आत्मनिर्भर बनी है। उसकी सामाजिक भूमिका में परिर्वतन आया है। घर से बाहर जाने का अवसर मिला है तो दूसरी तरफ स्त्री पर इसका विपरीत प्रभाव भी पड़ा है। इसमें स्त्री श्रम का शोषण हुआ है, जिससे नई समस्याएँ भी उत्पन्न हुईं हैं। ''एक बहुत बड़े आर्थिक विस्तार की राजनीति में स्त्री को घर से बाहर निकालने और निकलने पर भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने मजबूर किया समाज और खुद स्त्री को, एक ओर जहाँ औद्योगिक विकास के लिए स्त्री की सबसे सस्ते श्रम के रूप में इस्तेमाल किया गया, वहीं दूसरी ओर कारपोरेट जगत में विज्ञापन के माध्यम से स्त्री द्वारा उत्पादों को बेचने के लिए उसका भोगपरक और परम्परावादी दृष्टिकोण बाजार ने अपनाया।ÓÓ2 नारी को किसी ऑफिस या संस्था में सेवा का मूल्य भी पुरुषों की अपेक्षा कम ही दिया जाता है। भले ही भूमण्डलीकरण ने नारी को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया है, परन्तु समस्त क्रियाकलापों को पुरुष ही नियंत्रित करता है।
 भूमण्डलीकरण के बाद सिर्फ व्यापार का आदान-प्रदान नहीं हुआ, बल्कि और कुछ सोची समझी तकनीकों से संस्कृतियों का आदान-प्रदान भी हुआ। कहीं-कहीं इन संस्कृतियों को स्त्री के संदर्भ में देखा जाए तो हम पाते हैं कि कुंठा, जड़ता, परम्परावादिता रहित जीवन पद्धति का आगमन विभिन्न विकासशील देशों में हो रहा है। जब एक देश की संस्कृति दूसरे देश की सरहद पार कर लोगों द्वारा अपनाई जाती है तो सामाजिक जीवन में विशेष परिवर्तन दिखाई पड़ता है, वह हानिकारक है या लाभदायक, इसका विचार लोग बाद में करते हैं। जब पाश्चात्य सभ्यता को कोई पुरुष अपनाता है तो उसे आधुनिक समझा जाता है, परन्तु जब उसे स्त्री अपनाती हे तो समाज अनैतिकता का आरोप लगाता है। ''समाज सिर्फ लड़कियों को ही नैतिकता की तराजू पर तौलकर क्यों उसकी आजादी को छीनना चाहता है। आज भूमण्डलीकरण का ही परिणाम है कि स्त्री के प्रति शोषण, अमानवीय जैसे कदम के विरोध को लेकर विष्व भर में अलग-अलग रूपों में ही सही एक प्रकार की स्त्री एकता है, जो शायद बिना भूमण्डलीकरण के इतना आसानी से संभव नहीं हो पाती।3
 बजार का आंशिक रूप तो भूमण्डलीकरण के पहले भी मौजूद था। इसी ने अपने विस्तृत रूप को फैलाकर भूमण्डलीकरण के बाद स्त्री को वस्तु के रूप में इस्तेमाल होने की प्रवृत्ति को व्यापक आयाम दिया। जहाँ कोई देष अपने यहाँ स्त्री सशक्तिकरण की बात करता है, वहीं दूसरी ओर उसके वस्तु के रूप में इस्तेमाल होने पर गैर जिम्मेदाराना रूख अपनाए हुए है, जो इसका रास्ता बहसों तक सिमटाये हुए हैं। पहले तो स्त्रियों को बाहर कामकाज या नौकरी करने की पाबंदी थी, परन्तु भूमण्डलीकरण के प्रभाव ने इस दिशा में महिलाओं को प्रेरणा प्रदान की, जिससे नारी समृद्ध और स्वतंत्र हो गई। अपनी रोजमर्रा के खर्च के लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता। ''किसी जमाने में विदेश जाकर नौकरी करने वाले अधिकांश श्रमिक पुरुष होते थे, लेकिन भूमण्डलीकरण के कारण उनमें अब महिलाओं की एक बड़ी संख्या शामिल हो गई। इटली में 95 फीसदी आव्रजक फिलीपिन की औरतें हैं। इनमें से ज्यादातर घरेलू कामकाज और बच्चों की देखभाल करती हैं।4 शारीरिक श्रम के अतिरिक्त भूमण्डलीकरण ने गैर शारीरिक श्रम का एक बहुत बड़ा क्षेत्र जो कामर्शियल फील्ड का दिया है। जहाँ स्त्री की भूमिका शारीरिक श्रम के आधार पर नहीं टिकती। शारीरिक श्रम की उम्मीद किसी भी समाज में स्त्री को लेकर परम्परागत रूप से बनी हुई है, लेकिन इतने बड़े स्तर पर कला, विज्ञान, सूचना, कम्प्यूटर और शारीरिक श्रम से स्त्री का जुड़ाव समाज की सोच में नहीं रहा। ये तो आज मानना ही पड़ेगा कि स्त्री को भूमण्डलीकरण ने इतना बड़ा स्टेज दिया है, जिससे उसने बड़े पैमाने पर विभिन्न क्षेत्रों में पुरुषों को अपनी ताकत सिद्ध करके दिखा दी है। सरकारी क्षेत्रों में जिस गति से स्त्री की संख्या बढ़ रही है, उससे कहीं ज्यादा निजी क्षेत्र में बढ़ रही है। ''भूमण्डलीकरण ने इस नई औरत को जन्म अवश्य दिया है, लेकिन एक नए मर्द को जन्म नहीं दे पाया, जो इस 'पॉवर वूमेनÓ के साथ नए तरीके से नर-नारी संबंधों का सिलसिला शुरु करता है।5 
 पुरुष और स्त्री का संबंध भी इससे प्रभावित हुआ है, जिससे परिवार में बिखराव, तनाव और अनेक सामाजिक परेशानियाँ उत्पन्न हो रही हैं। टूटते हुए संयुक्त परिवार इसका एक प्रमुख उदाहरण हैं। एक बात तो अवश्य है कि भूमण्डलीकरण ने स्त्री की माँ, बहन, देवी आदि संबंधों की आदर्षवादी छवि को तोड़ा है और आज वह आदर्शवाद से मुक्त एक स्त्री के अपने मनोभावों के रूप में कुछ हद तक दिखने लगी है। ''संयुक्त परिवार अब टूट रहें हैं, जिसके टूटने में भूमण्डलीकरण का भी दबाव है। ऐसा लगता है कि संयुक्त परिवार का टूटना स्त्री के लिए अच्छा ही साबित हुआ है, क्योंकि इतने बड़े परिवार का खाना, कपड़े की साफ-सफाई आदि का इतना बड़ा बोझ और साथ ही परम्परा के दबाव को सहना पड़ता है।6
 भूमण्डलीकरण से जो दोयम की स्थिति आई है, उसमें सबसे ज्यादा घाटा गरीब स्त्रियों का हुआ है। समाज, घरेलू, मजदूरी, वेश्यावृत्ति इन्हीं चारों के बीच इन स्त्रियों की पहचान सीमित रह गई है, जिसे भूमण्डलीकरण से हर हाल में घाटा ही हुआ है। इसके जिम्मेदार दोनों (स्त्री-पुरुष) ही हैं। भूमण्डलीकरण से स्त्रियों पर एक अत्याचार यह हुआ है कि स्त्री की पहचान, नौकरी आदि को उसके सौंदर्य से जोड़ दिया गया है। जब तक उसका सौंदर्य, आकर्षण युक्त है तब तक उसकी नौकरी है, सौंदर्य गया तो नौकरी गई। ''जिस साल अमेरिका में औरतों का आयोग बना, उसी वर्ष एक एयर होस्टेज को किसी एयर लाइन ने सिर्फ इस अपराध पर नौकरी से निकाल दिया कि वह 32 साल की हो गई थी और उसने शादी कर ली थी। यह दौर अमेरिकी नारीवाद का गरम दौर था, तो भी 1971 ई. में ऐसे कानून बने जो सुन्दरता को औरत की पात्रता मानकर चलते थे। सेंट क्रास बरक्स प्लेवॉय पत्रिका का केस बताता है कि प्लेवॉय ने सेंटक्रास को इसलिए निकाला, क्योंकि इस औरत की 'बन्नी इमेजÓ (खरगोशनी छवि) खत्म हो गई थी।ÓÓ7 इन संदर्भों से पता चलता है कि यह भूमण्डलीकरण स्त्री के पक्ष और विपक्ष दोनों में खड़ा नजर आता है। 
 भूमण्डलीकरण और स्त्री का जो आंतरिक और बाह्य संबंध है वह दोनों अर्थ में दिखाई देता है। जहाँ यह नारी को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करके शोषण, अत्याचार आदि के विरोध की ताकत पैदा करता है तो वहीं सौंदर्य के नाम पर स्वतंत्रता की इच्छा भी रखती है। अध्ययन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचना आवष्यक है कि जिस प्रकार एक पुरुष अपनी अच्छाइयों और बुराईयों के साथ होता है। प्रत्येक मनुष्य एक जैसा नहीं हो सकता, उसी प्रकार ये सारी बातें स्त्री पर भी लागू होती हैं। सामाजिक नजरिये से भी और व्यावहारिक दृष्टिकोण से भी। भूमण्डलीकरण ने नारी के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित किया है, जहाँ से उसका उत्थान और पतन दोनों दिखाई पड़ते हैं।


संदर्भ सूची:-
1. कुमार भाष्कर, भूमण्डलीकरण और स्त्री, संजय प्रकाशन,   नईदिल्ली, संस्करण 2008, प्राक्कथन
2. वही
3. वही
4. वही, पृ. 14
5. वही, पृ. 25
6. वही, पृ. 44
7. दुवे अभयकुमार, भारत का भूमण्डलीकरण, वाणी प्रकाशन,   नईदिल्ली, पृ. 50


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