Tuesday, December 10, 2019

नासिरा शर्मा की कहानियों में सामाजिक चेतना और मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति      

समकालीन परिदृष्य में सामाजिक परिवर्तनों की चर्चा कहानी, उपन्यास, नाटक तथा साहित्य की अन्य विधाओं के माध्यम से की जाती रही है। समकालीन महिला कहानिकारों में प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में नासिरा शर्मा का नाम विषेष रूप से उल्लेखनीय है। महिला कहानिकारों में यद्यपि सभी महिला लेखकों की अपनी कुछ विशेषताएँ हैं। जैसे मैत्रेयी पुष्पा को यदि बुंदेलखण्ड की संस्कृति एवं वहाँ की शोषित एवं दमित स्त्रियों की अच्छी परख है तो, मालती जोशी को मध्यम वर्ग की महिलाओं के अंतर्मन की समझ। इसी प्रकार नासिरा शर्मा को जहाँ हिन्दू और मुस्लिम दोनों संस्कृतियों का अच्छा अनुभव होने के साथ-साथ दोनों धर्मों तथा अन्य धर्मों की स्त्रियों की संवेदनाओं एवं मानवीय चेतना की गहरी अनुभूति भी है।
 नासिरा शर्मा की कहानियाँ स्त्री-पुरुष संबंधों की गहराई से पड़ताल भी करती हैं। वर्तमान समय में स्त्री जीवन की अनेक विडम्बनाओं और सवालों को भी उठाती हैं।1971 के दशक में सारे बदलावों के बाबजूद, स्त्री की आर्थिक, सामाजिक स्थिति में कोई उत्साहजनक परिवर्तन नहीं हुआ। इस दशक के बाद भारत में नारीवादी आंदोलन की सक्रियता बढ़ी। बालिका भू्रणहत्या, लिंगभेद, नारी स्वास्थ्य और स्त्री साक्षरता जैसे विषयों पर भी नारी आंदोलनकारी सक्रिय हुए।1
 हिन्दी कहानी ने भी इस तथ्य को गंभीरता से लिया। इस दशक की एक विशेष प्रवृत्ति नारी आंदोलन का नया रूप ग्रहण करना है, जिससे कहानियों में स्त्री विमर्श केन्द्रीयता प्राप्त करने लगता है। ध्यातव्य है कि नारी नियति का चित्रण करने में कहानी लेखिकाएँ प्रमुख भूमिका निभाती हैं, जिसमें नासिरा शर्मा प्रमुख रूप से उभरकर सामने आती हैं।
 नासिरा शर्मा के कहानी संग्रह 'बुतखानाÓ की पहली कहानी नमकदान है। यह कहानी पति-पत्नी के संबंधों को बया करती है, जिसमें कहानी का नायक जमाल और नायिका गुल दोनों पति-पत्नी हैं। कहानी के अंत में जमाल कहता है, ''तुम आजकल नमकदान मेज पर क्यों नहीं रखती हो?ÓÓ गुल ने धीरे से कहा, ''ताकि नमक की अहमियत याद रहे।ÓÓ क्या मतलब? लोग नमक को भूलते जा रहे हैं। गुल ने कहा। मैं चलता हूँ, शायद शाम को घर लौटने में देर हो जाए तो परेशान मत होना। कहता हुआ जमाल नैपकिन से मुँह पोछता हुआ उठा और बाहर की तरफ बढ़ा। गेट के बाहर कार स्टार्ट होने की आवाज गुल के कानों तक पहुँची। जमाल जिस राह पर निकल गया है, वहाँ इतनी जल्दी वापसी मुष्किल है।2
''मुझे चश्मपोशी की आदत डालनी चाहिए। दूसरों की बुराई को नजर अंदाज करने में ही अब जिंदगी की भलाई है। सोचते हुए ठीक अब्बू के अंदाज में कुछ बोले। गुल सर झुकाए नाश्ता करती रही।3
 उपर्युक्त कथन से यह बात निकलकर आती है कि भारतीय समाज को उन सभी स्त्रियों को यह अपनी नियति मान लेनी चाहिए, जिसके पति जमाल जैसे लोग हैं, नहीं तो आए दिन विवाद होगा या संबंध विच्छेद। दोनों के लिए एक स्त्री को तैयार रहना पड़ेगा, क्योंकि इन सभी के पीछे एक पुरुषवादी मानसिकता कार्य करती है। हम पुरुष हैं, चाहे जो करें, परन्तु तुम स्त्री हो। पतिव्रत का पालन करना तुम्हारा धर्म है, परन्तु पत्निव्रत का पालन करना हमारा धर्म नहीं है, क्योंकि यह नियम हमने बनाये हैं।
 संग्रह की दूसरी कहानी का शीर्षक 'बुतखानाÓ है, जो फारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ मंदिर या देवालय होता है। परन्तु यहाँ बुतखाना से तात्पय्र ऐसे स्थान से है, जहाँ सभी मानव, मनुष्य नहीं 'बुतÓ अर्थात् बेजान मूर्ति की भाँति हैं, जिसमें न कोई संवेदना है, न कोई भावना और न ही मनुष्यता। परन्तु इसके शाब्दिक अर्थ की ज्यादा पड़ताल न करते हुए कहानी के मूल कथ्य पर आते हैं, जिसमें लेखिका ने समाज की उस सच्चाई को व्यक्त किया है, जो कहीं न कहीं आधुनिक समय में स्पष्ट दिखाई दे रहा है। शीर्षक कहानी का मुख्य पात्र 'रमेशÓ है, जो छोटे शहर इलाहाबाद से महानगर दिल्ली में नौकरी के सिलसिले में जाता है। वहाँ पहुँचकर रमेश देखता है किस तरह मानवीय संवेदना दम तोड़ रही है। सभ्यता, संस्कृति और संस्कार भी जमीनदोह हो रहे हैं। शिक्षा बड़े व्यवसायियों का व्यवसाय मात्र बनकर रह गई है। रमेश एक दिन बस में यात्रा कर रहा था तो बस अचानक रूकी और देखते-देखते ही भीड़ इक_ी होने लगी। रमेश देखता है कि बस के नीचे एक युवक की लाश है। यह और कोई नहीं यह वही युवक है, जिससे एक दिन सिनेमा देखते समय मिला था। वह आगे बढ़ा तो कंडक्टर की सीटी गूँजी, चलो-चलो। शोर मचाती, गाली बकती भीड़, यंत्र चालित-सी सीटों पर जमने लगी। वह जड़-सा वहीं खड़ा रहा, किसी ने उससे धीरे से कहा-क्या? वह अपनी पहचान वाला था? वह क्या उत्तर दे। उसको कुछ समझ में नहीं आ रहा था।4 उसने कहा - मेरी मानिए तो फूट लीजिए। ड्राइवर-पुलिस जाने बेकार में आप फसियेगा। यह एक महानगरीय सभ्यता, मानवीय सोच के साथ उसकी सच्चाई को बया कर रहा था, क्योंकि हम सभी उसी भीड़ का हिस्सा बने रहना चाहते हैं, जो केवल मूक दर्षक हैं। आपस में कुछ छींटाकशी की और चलते बने, क्योंकि इसकी हमें आदत-सी बन गई है। हम प्रत्येक प्रश्न से बचकर निकलना चाहते है, हम सुरक्षित हैं, हमारे बीबी बच्चे सुरक्षित हैं और हमें क्या चाहिए? परन्तु यह सत्य नहीं है। आज जो सड़क पर दम तोड़ दिया वह कोई और नहीं, हमारे और आपके बीच का है।4 परन्तु संवेदनाएँ कहीं मर सी गई हैं। चाहे वह व्यर्थ के पचड़ों में न पडऩे के कारण या हम इतने आत्मकेन्द्रित हो गए हैं कि हम और हमारे परिवार के लोग सुरक्षित रहें बस। दूसरे की जान की कोई कीमत नहीं है। इस आर्थिक जीवन की भाग-दौड़ में हमें पैसे के अलावा और कुछ दिखाई नहीं देता, चाहे वह मानवीय संवेदना हो या नैतिक मूल्य। सभी को हम तार-तार कर रहे हैं। कहानी का पात्र रमेश तमाम सवालों और जबावों के बीच गुजरता हुआ अंत में उसी बुतखाने की 'बुतÓ मात्र बन रह जाता है। नसिरा शर्मा 'अपनी कोखÓ कहानी में स्त्री की उस समस्या को उजागर करती हैं, जिसका स्त्री प्राचीनकाल से ही सामना कर रही है। यह प्रश्न है स्त्री के पहचान का, यह प्रश्न है स्त्री के अस्तित्व का और यह प्रश्न है उसके अधिकार का। जिसका यह पुरुष समाज सत्तात्मक समाज हमेशा से गला घोटता आया है। यद्यपि आज हम बात करते हैं समानता, समान अधिकारों, बराबरी का दर्जा देने की और सबसे बड़ी बात कि लड़के-लड़की में भेद न करने की। क्या हम आज 21 वीं सदी में इस मानसिकता से बाहर आ पाए हैं, कि लड़की हो या लड़का उसमें कोई अंतर नहीं है। यदि हम इसकी पड़ताल करें तो पायेंगे कि कुछेक परिवर्तनों के साथ उसमे कोई अंतर नहीं, बल्कि सोच जस की तस बनी हुई है।
इन्हीं बातों और विचारों को व्यक्त करती है यह कहानी 'अपनी कोखÓ। इसके पात्र साधना, संदीप और सरिता हैं। इस कहानी की मुख्य पात्र साधना एम.ए. में सर्वोच्च अंक जाना चाहती है, परन्तु उसके घर वाले अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होना चाहते हैं। साधना विवाहित होकर जब ससुराल आती है तो उसके सपने जमीनदोह होने लगते हैं। अब शुरु होती है उसकी वास्तविक लड़ाई। सास को अपनी बहू की गोद हरी-भरी चाहिए, वह भी बेटे से। परन्तु साधना के बच्ची के आगमन से जैसे सम्पूर्ण खुशियाँ काफूर हो गईं। अभी सरिता छ: माह की ही थी। साधना फिर गर्भवती हो गई, परन्तु साधना की सास को पुत्र चाहिए, क्योंकि पुत्र ही परिवार का तरण-तारण करता है। ऐसी मान्यता हम बनाये हैं, परन्तु साधना ने इस बार भी पुत्री को ही जन्म दिया तो उसकी सास को जैसे साँप सूँघ गया। तीसरी बार जब साधना को पता चला कि इस बार उसके गर्भ में पुत्र पल रहा है, इस खबर ने साधना को भी अत्यन्त खुषी प्रदान की।5 परन्तु एक प्रष्न साधना के मन को लगातार व्यथित कर रहा था। यदि लड़का पैदा हुआ तो मेरी दोनों लड़कियों को निगल जाएगा। अनगिनत प्रश्नों और उत्तरों से जूझती साधना अपने मन-मस्तिष्क के ऊहापोह से निकलने में कामयाब हो गई और संवेदना के उस बिन्दू पर जाकर अटक गई कि लड़के-लड़कियों में भेद करने वाला यह समाज तब तक बलवान बना रहेगा जब तक नारी उसके इशारों पर चलती रहेगी। कोख उसकी अपनी कोख है, चाहे वह बच्चा पैदा करे, चाहे पैदा न करे। चयनकर्ता वही है। अगर वह मर्दों को पैदा करना बंद कर दे तो इस समाज का क्या होगा? जिसके ठेकेदार अपनी ही जननी के विरोध में हत्याओं का काफिला बना रहे हैं। कानून तो वह बनाते है पर पारित औरतों पर करते हैं और हम औरतें भी उसकी भागीदार बन अपनी मानिसकता खो संज्ञा शून्य बन जाते हैं और अपने ही विरोध में खड़ी हो जाती हैं, परन्तु साधना अपने विरोध में नहीं खड़ी होगी। यह जीवन उसका है, इस जीवन को अपनी इच्छा से आकार देगी। अपनी जमीन ही नहीं अपने आसमान को भी खुद नापेगी, यही तो उसके एक स्वतंत्र स्त्री होने की पहचान है। वह इस पहचान को बरकरार रखेगी और पूरी दुनिया को दिखायेगी। अपनी बेटियों के सपनों को पंख देने के लिए साधना बेटे का गर्भपात करेगी, उसने निश्चय कर लिया। 'इस प्रकार यह कहानी बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ कथन को भी सार्थक करती है। यह कहानी इसके साथ-साथ नारी मन तथा उसके मनोविज्ञान को खोलती है।
 इस प्रकार नासिरा शर्मा की कहानियाँ स्त्री मनोविज्ञान के साथ-साथ उसके अन्तर्मन को परत-दर-परत खोलती हैं। इसके अतिरिक्त मानवीय संवेदनाओं एवं मनुष्यता को उजागर करती हैं। इनकी कहानियाँ सामाजिक चेतना, मानवीय संवेदना और इंसानी जटिल प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति का दस्तावेज हैं। यह वर्तमान समय की विषमताओं को इस सहजता से पिरोती हैं कि इंसानी ललक पात्रों में बाकी ही नहीं रहती, बल्कि टूटे रिश्तों और बदलते मानवीय मूल्यों और सरोकारों की कचोट पाठकों को गहरी तपकन का एहसास देती हैं।
संदर्भ सूची :-
1. हिन्दी कहानी का इतिहास, डॉ. गोपालराय, राजकमल प्रकाशन,  पृ. 122
2. 'बुतखानाÓ संग्रह, नमकदान कहानी, नासिरा शर्मा, लोकभारती   प्रकाशन, नईदिल्ली पृ. 15,
3. वही, पृ. 16
4. बुतखाना, पृ. 48,49
5. 'अपनी कोखÓ कहानी, पृ. 22
6. वही, पृ. 27,28


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