विकलांग पात्रों का आर्थिक संघर्ष: हिन्दी उपन्यास

 जीवन की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का मूल आधार अर्थ ही है जिसे किसी भी स्थिति में नकारना हमारे लिये असम्भव है। जहां आर्थिक संतुलन की अवस्था देश का विकास करती है, अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाती है, सामाजिक सद्भाव कायम रखती है, सतत् विकास को गति प्रदान करती है, वैश्विक परिदृश्य में उच्च स्थान का अधिकारी बनाती है, आन्तरिक शक्तियों में सुदृढ़ता आती है वहीं आर्थिक असन्तुलन विषमता, आर्थिक मन्दी, गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी बढ़ती जनसंख्या, असमानताएं, शोषण, प्रादेशिक विभिन्न समस्याएं, गिरता शैक्षिक व नैतिक स्तर अस्थिरता, संसाधनों की कमी, प्रति व्यक्ति औसत आय में गिरावट जैसी समस्याओं से हमारे देश को घेर लेती है। अत: समस्त विकासशील देशों ने आर्थिक असन्तुलन को दूर करने के लिये आर्थिक नियोजन को अपनाएं हैं। प्रो. रोबिन्स का कहना है कि ''आर्थिक नियोजन इस युग की रामबाण औषधि है, ''क्योंकि आर्थिक नियोजन द्वारा विकासशील राष्ट्र आर्थिक पिछड़ेपन की समस्या से निजात पाते हैं।1 
 प्रत्येक राष्ट्र का आर्थिक विकास आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास एवं स्थायित्व का विकास करता है, भारत जैसा विकासशील राष्ट्र आज पुन: आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है वहीं दूसरी ओर अरबों की लागत में चान्द की सतह पर जीवन खोजने के लिये उपग्रह भेजे जा रहे हैं। उन्नति अवनती के इस संक्रमण कालीन दौर में भारत की मूलभूत समस्याओं में आज भी कोई परिवर्तन दृष्टिगत नहीं हेाता है। सुधार के समस्त प्रयत्न एवं योजनाऐं कागजी कार्यवाही तक ही सीमित है। शिक्षा समानता, स्वायतता, प्रति व्यक्ति रोजगार उन्नत एवं सर्व सुलभ चिकित्सा, वर्ग रहित शोषण रहित समाज की परिकल्पना, उन्नत जीवन स्तर एवं जीवन मूल्य यथार्थ की धरातल पर देखा जाए तो काल्पनिक ही सिद्ध होते है।
 भारतीय गणराज्य 21वीं सदी में कदम बढा रहा है तथा विगत दो दशकों की विकास दर के लिए बधाईयां ग्रहण कर रहा है, अर्थ-व्यवस्था के पास व्यापक वस्तुओं और सेवाओं का दायरा भी बढ़ रहा है, वाहनों की खरीद, घर का सपना सच करने जैसे कार्यों को सुविधाजनक बनाया जा रहा है, चौड़ी सड़कें, फ्लाई ओवर, कारपार्क, एक्सप्रेस वे बड़े शॉपिग मॉल, हवाई यात्राएं, मेट्रो, हाई स्पीड बस एवं रेल, उच्च स्तरीय प्राइवेट हॉस्पिटल, शिक्षण संस्थान एवं न जाने कितने ही उन्नति के द्वार खुले है परन्तु आर्थिक विकास एवं सामान्य मानव की मूलभूत अवस्था में तालमेल का पूर्ण तथा अभाव है।
ऐसे में जब शारीरिक रूप से सक्षम मानव आर्थिक स्थिति सुदृढ़ बनाने के लिये रात-दिन जद्दो-जहद करता है तो फिर समाज का वह वर्ग जिसे ईश्वरप्रदत्त अथवा कृत्रिम कारणों से विकलांगता प्राप्त हुई है, उनकी आर्थिक दशा अत्यन्त सोचनीय है। विकलांग व्यक्ति आज भी स्त्री, दलित, वृद्ध, कृषक आदिवासियों के समान हाशिये पर है उनकी अस्मिता का संघर्ष व्यक्तिगत संस्थागत व राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप ग्रहण कर चुका है। सरकार द्वारा विकलांगों के जीवन को आर्थिक सुदृढ़ता व सम्मान प्रदान करने के लिये नौकरियों से आरक्षण, रोजगारी की सुविधायें प्रशिक्षण, विभिन्न सशक्तता कार्यक्रम, आर्थिक सुधार उपक्रम चलाए जा रहे है परन्तु जमीनी तौर पर विकलांगों को रोटी, कपड़ा मकान के लिए आजीवन संघर्ष ही करते जाना है।
जहां मानव सामाजिक परिस्थितियों के कारण हीन भावना से भर जाता है वहीं से विकलांगता प्रारम्भ होती है। विकलांग केवल लूले-लंगड़े, अंधे, बहरे ही नहीं अपितु वैश्विकरण ने भी विकलांगता को बढ़ावा दिया है। स्वयं मानव द्वारा मानव को विकलांग समस्या में घेरा जाता जा रहा है हम देख सकते है कि भौतिक सुख-सुविधा ने प्रकृति का दोहन किया है, मादक पदार्थों के सेवन की बढ़ती लत ने गर्भ में ही मनुष्य को विकलांग बनाया है, बढ़ते युद्धों ने, अस्वच्छ आवासों, नीम हकीमों की दवाइयों, झांड-फूंक में विश्वास सड़े-जले भोजय पदार्थों के सेवन आदि के विषमता के कारण अर्थाभाव एवं अज्ञानता के सकलांग मनुष्य भी विकलांग हो जाता है।
 साहित्य मनुष्य के जीवन की कलापरक अभिव्यक्ति है। साहित्य में हित का भाव केन्द्रीय और सर्वोपरि होता है। विराट, व्यापक, विस्तृत जीवन को विभिन्न आयामों से साहित्य में प्रस्तुत किया जाता है। संस्कार, सभ्यता के साथ-साथ जानकारी, ज्ञान, शिक्षा प्रदान करने का प्रभावक और गरिमामय साधन साहित्य ही है। इसलिए पांडित्य, प्रतिभा, सम्मान का सूचक साहित्य पठन-पाठन के साथ-साथ साहित्य सृजन का अनुमान भी कसौटी बना है।
साहित्य का परीक्षण, मूल्यांकन की कसौटियां साहित्य प्रयोजन वो केन्द्र में रखकर निर्माण हुई है। कथ्य, शिल्प के साथ-साथ विचारधारा परिवेश को आधार बनाकर साहित्य की आलोचना की गई। साहित्य के विधा-रूप और भाषा, शिल्प की नूतनता या सर्जनपरकता आयोजना की मुख्य कसौटी है अलंकार, रीति, वक्रोन्ति, ध्वनि, रस के आधार पर भारतीय मनीषियों ने रस, विधाओं, भाषा-शिल्प, नूतनता, वैचारिकता से साहित्य को जांचा-परखा है, तो विदेश में उदात्तता, निर्वेयक्तिकता, वस्तुनिष्ठ प्रतिरूपता, अभिव्यंजनापरकता, विरेचन तत्व, कल्पना, लय, भाषा को आधार बना कर साहित्य का मूल्यांकन किया गया है। 19वीं शताब्दी के बाद सामाजिक शास्त्र मनुष्य जीवन के सभी क्षेत्र में प्रभावक हो गए। मनोविज्ञान, वर्णसंघर्ष, आर्थिक संघर्ष, जनतांत्रिक मूल्य, व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का बोलबाला, यथार्थपरकता की मांग ने साहित्य सृजन को भी प्रभावित किया, बिंब, प्रतीक, भाषा बदले, 'स्वÓ की अभिव्यक्ति महत्वपूर्ण बनी, 'अस्मिताÓ अस्तित्व के साथ-साथ समानता का भाव भी जनमानस में हावी हुआ, परिणामत: साहित्य में आलोचना की कसौटियों के रूप में विभिन्न विमर्शों का आगमन हुआ।2 
वास्तव में लेखक अपने अनुभव से यह जानता है कि उसे जो कहना है वह कहना महत्वपूर्ण है, और जिस तरह से वह बीज धारणकरता है उसी में उसकी आकृति स्वभाव, गुण सब निहित होते है।3  अत: निर्विवाद रूप से यह सत्य है कि साहित्य समाज का गहन आन्तरिक विश्लेषण करता है तथा अपनीरचना को उसी ताने-बाने में बुनता है। आज विमर्शों के दौर में विकलांग विमर्श की विचारधारा का पनपना कोई नयी बात नहीं अपितु प्राचीन काल से विकलांगों की स्थिति पर चिन्तन चला आ रहा है। दादी-नानी की कहानी से लेकर आज के साहित्य की विधाओं में अवगाहन करें तो हम पाते है कि जो विकलांग है वे कहीं न कहीं संकलागों को चुनौति देते है।
 उनकी ज्ञान चक्षु इतनी तीक्ष्ण होती है कि वे किसी भी संदर्भ में वे पीछे रह सकते है। हम सभी कुब्जा, अष्टावक्र जैसे विकलांग विभूतियों की कथाओं से अनभिज्ञ नहीं है। विकलांग विमर्श की परम्परा अतीत से चली आ रही है कथाकारों ने विकलांगों को सम्मान देने एवं उन्हें सम्मान पूर्वक स्थान दिलाने का अपनी कथा-विधाओं के माध्यम से बहुतायत प्रयास किया है साहित्यकारों ने उनकी समग्र समस्याओं को करीब से समझा। ''विकलांगों की समस्त प्रतिभा क्षमता को उर्जस्वित कर समाज के समक्ष प्रस्तुत करना हमारा धर्म होना चाहिये।ÓÓ यह नारा दिया।4 
 हिन्दी उपन्यास साहित्य में विकलांग विमर्श आधारित हिन्दी उपन्यासों का सृजन बहुत प्रारम्भ से होता चला आया है। हां आधुनिक उपन्यासों में जैसे जैसे विषय वैविध्य एवं बदलाव की स्थितियां दृष्टि गोचर हुई वैसे विकलांग पात्रों की मजबूरी व परिस्थितियों से संघर्ष करते हुये दृढ़ता के साथ उभारा गया सामान्त: हमारे समाज में यह प्रचलन है कि यदि कोई विकलांग है तो उसे भीख मांग कर ही गुजारा करना पड़ेगा।
 साहित्य समाज के सर्वांगीण पक्षों को उभारता है अत: विकलांग पात्रों को चित्रण की उनकी समाज में जो दशा है उनके उसी के अनुरूप निर्मित मन:ििसति के अनुसार ही चित्रित किया गया है। हिन्दी में विकलांग पात्र आधारित 50 से अधिक उपन्यासों का सृजन हुआ है जिसमें से मुख्य उपन्यासों के पात्रों का आर्थिक संघर्ष का अंकन अग्रांकित है यथा ''रंग भूमिÓÓ उपन्यास का नायक अंधा सूरदास भीख मांग कर गुजारा करता है जबकि वह करोड़ों की जमीन का मालिक होता है, लेकिन तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों का शिकार हो कर पूंजीपति वर्ग द्वारा उसकी जमीन हथियाने के अन्त तक कोशिश की जाती है। 'खंजन नयनÓ उपन्यास को नायक सूरदास कृष्ण भजन गा कर आजीविका को साधन अपनाता है परन्तु तत्कालीन सामाजिक परिवेश के कारण उसे आजीवन आर्थिक संघर्ष के क्षेत्र से गुजरना पड़ता है। 'राग दरबारीÓ उपन्यास का नायक लंगड़ अपनी जीवन के कागज बनवाने के चक्कर में अपन घर बार सब छोड़ कर संघर्ष करता है गरीब होने के कारण अदालती भ्रष्टता का शिकार हाता है। ''कठ गुलाबÓÓ उपन्यास की नायिका स्मिता माता-पिता की आर्थिक विषमता के कारण मजबूर होती है कहीं ओर रहने के लिये तथा सामाजिक व मानसिक दृष्टि से कमजोर चरित्र बन जाती है। 'बेघरÓ उपन्यास में विकलांग मां की देखभाल हेतु संजीवनी आजीवन आर्थिक संधर्ष करती है। 'अंधेरे बन्द कमरेÓ में नीलिमा के पिता पक्षाघात के रोगी होने के कारण परिवार आर्थिक विषमता में जीवन यापन करता है। ''यह पथ बंधु थाÓÓ उपन्यास में विकलांगता के पश्चात भी कथानायक व्यापार करता है तथा अपनी आर्थिक स्थिति के सन्तुलित बनाता है। ''आंवाÓÓ उपन्यास स्त्री नायिका नमिता पिता के पक्षाघात होने के पश्चात आजीवन परिवार को आर्थिक सुदृढ़ता प्रदान करने व पिता की देखभाल के लिये समय व समाज के शोषण की शिकार हो कर भी आर्थिक संघर्ष करती है। 'उसके हिस्से की धूपÓ का विकलांग नवयुवक पालियों में अपने दोनों हाथ खो चुकने के बाद भी शिक्षा प्राप्त कर नौकरी पाने की उम्मीद में संघर्ष करता है। 'विजनÓ उपन्यास की नायिका आंखों की डॉ. होती है परन्तु आर्थिक लालच के लिये अपने ससुराल वाले की साजिश की शिकार होती है अंतत: वह विक्षिप्त सी अवस्था में आ जाती है एवं 'ज्यों मेहन्दी का रंगÓ उपन्यास विकलांग विमर्श आधारित ऐसा उपन्यास है जिसके सभी पात्र विकलांग है तथा दद्दा जी द्वारा चलाए जा रहे अस्पताल में सभी विकलांगों को योग्यता अनुसार रोजगार दिया जाता है ताकि वे भीख न मांगे तथा आत्म सम्मान से भरा जीवन जी सके।
 विकलांग पात्रों का हिन्दी उपन्यासों में आर्थिक संघर्ष के विभिन्न पक्षों का अंकन किया गया है तथा अनेको दृष्टिकोणों से विकलांगता किस तरह परिवार व समाज को आर्थिक दृष्टि से प्रभावित करती है, का सार्थक अंकन किया गया है जो पाठक को विश्लेषणात्मक बुद्धि से सोचने पर विवश करता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के लिये रोजगार आर्थिक स्वतन्त्रता को प्रदान करता ही है बल्कि आत्म सम्मान भी बढ़ता है विकलांग व्यक्ति के लिये यह और आवश्यक होता है क्योंकि आम तौर पर विकलांगता अभिशाप मानीजाती है और इससे विकलांग व्यक्ति कार्य क्षमता में कम लेकिन आत्म सम्मान और सामाजिक स्वीकार्यता का अधिक नुकसान होता है विकलांगों को रोजगार इसलिये भी आवश्यक है ताकि बोझ बनने की अपेक्षा समाज के लिये आर्थिक योगदान करसके। विनोद कुमार मिश्र का यह कथन हिन्दी उपन्यासों के विकलांग पात्रों के जीवन व आर्थिक पक्ष पर सटीक सिद्ध होता है।5 
आर्थिक स्वालम्बन का व्यक्ति के व्यक्तितव पर गहरा प्रभाव पड़ता है हिन्दी उपन्यासों में विकलांग चरित्रों को जिन आर्थिक समस्याओं से गुजर कर संघर्ष करना पड़ता है वे अग्रांकित बिन्दुओं में उल्लेखित कर रही हूँ।6 
1. निर्धनता 2. भीख मांग कर गुजारा करना 3. दयनीय स्थिति 4. सामाजिक उपेक्षा के शिकार 5. विभिन्न पारिवारिक समस्याएं 6. शैक्षिक अवनति 7. उचित चिकित्सा का अभाव 8. बलात्कार 9. शोषण 10. भ्रष्ट राजनीति व कानून के शिकार 11. अनेक संघर्षो के बाद भी असफलता 12.  बेरोजगार 13. आरक्षण व अनेक कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर विकलांग 14. आहत आत्म सम्मान 15. रिश्वत खोरी 16. गिरता जीवन स्तर 17. जाति गत भेदभाव 18. कर्ज में डूबना 19. जमीनें, गहने पैसे विकलांगता के कारण बचा नहीं पाना 20. सत्य व आत्मबल के जरिये स्वयं को स्थापित करने की कोशिश करना 21. विकलांग स्वंय अथवा मुखिया की विकलांगता के कारण अवैध संबंधों की शिकार 22. नशे की लत के कारण आर्थिक भयावहता ....  जैसी अनेकानेक समस्याएं है जो विकलांग पात्रों को जीवन संघर्ष करने के लिये मजबूर करती है। एक स्थान पर आवां की लेखिका चित्रा मुद्गल देवीशंकर पाण्डे की स्थिति का आंकन करती हुई कहती है - ''पैसे की ताकत मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत है पैसे की ताकत से बुद्धिहीन, अपाहित, असमर्थ व्यक्ति बुद्धिमान का मस्तिक और सबल की शक्ति खरीद बड़ी आसानी से अपने हितों के लिये उसका उपयोग कर समाज और संसार का सबसे समर्थ व्यक्ति बन सकता है।7 अत: आर्थिक आत्म निर्भरता आत्म सम्मान में वृद्धि करती है एक विकलांग के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि सामाजिक विकास विकलांगों का अभिशाप मुक्त जीवन से मुक्त नहीं कर पा रहा। रोजगार, उद्योग धन्धों, अवसरों की समानता के अभाव में विकलांगों का आर्थिक नुकसान तो होता ही है, उनका आत्मसम्मान भी आहत होता है। अत: आवश्यक ही नहीं अपितु प्राथमिकता के आधार पर विकलांगों हेतु आर्थिक अवनति से बाहर निकलने के लिए स्वयं विकलांग, स्वयं सेवी संस्थाएं, सामाजिक व न्याय अधिकारिता मंत्रालय, सरकार तथा साहित्य चिन्तक ऐसी व्यवस्था व आदर्श रास्ता सुझाए जिससे वे गौरवान्वित जीवन व्यतीत कर सके।


संदर्भ सूची: -
1. त्रिपाठी डॉ. रेणू: भारत में आर्थिक नियोजन, पृ. सं. 43, ओमेगा  पब्लिकेशन, दिल्ली
2. प्रा. डॉ. माहेश्वरी सुरेश: 21 वंी सदी का नव विमर्श -विकलांग   विमर्श, पृ. 19 विकलांग विमर्श का वितान: डॉ. माहेश्वरी शैलजा
3. मिश्र अनन्त राम, ब्रदीनारायण: साहित्य और सामाजिक    परिवर्तन, पृ. 103 वाणी प्रकाशन, दिल्ली
4. पाठक डॉ. विनय कुमार कथा साहित्य में विकलांग विमर्श, पृ.   242 प्रकाशन अखिल भारतीय विकलांग चेतना परिषद्,    बिलासपुर
5. मिश्र विनोद कमार, विकंलागता समस्याएं व समाधान पृ. 101,   प्रकाशक - जगत राम एण्ड सन्स
6. ''उपन्यास साहित्य में विकलांगों की समस्याएंÓÓ, 
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7. मुद्गल चित्रा: आवां, पृ. 201, सामयिक प्रकाशन