Impact Factor - 7.125

Monday, August 31, 2020

’शोधालेख आमंत्रण’

’अक्षरवार्ता अंतरराष्ट्रीय मासिक शोध पत्रिका’


’शोधालेख आमंत्रण’


👉 अंतरराष्ट्रीय मासिक शोध पत्रिका अक्षरवार्ता के आगामी अंक के लिए ’इच्छुक लेखको, शोधार्थियों से शोधलेख आमंत्रित हैं।’


👉 अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका अक्षरवार्ता प्रिंट स्वरूप में मासिक छपने वाली पत्रिका अक्षरवार्ता आईएसएसएन नंबर, इंपेक्ट फेक्टर सहित आरएनआई (भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक कार्यालय ) से पंजीकृत प्रकाशन है।


👉 पूर्व में युजीसी की सूची में शामिल तथा वर्तमान में रेफर्ड जर्नल एवं पीर रेवियूड पत्रिका के रूप में प्रकाशित हो रही है।


👉 मल्टीडीसिप्लिनरी/विभिन्न विषयों पर मौलिक शोध,कृतिदेव फॉन्ट 010 अथवा युनिकोड फॉन्ट में फॉन्ट साइज 14 के साथ वर्ड फाइल में टाइप होकर 2000 से 3000 शब्दों का होना चाहिए।


👉 सहयोग शुल्क:- 1500/-


👉 बैंक विवरण:-


कॉर्पोरेशन बैंक


A/C Holder:- AKSHARWARTA


करंट खाता क्रमांक:-510101003522430


आईएफएससी कोड:- CORP0000762


शाखा:- ऋषिनगर,उज्जैन,मप्र.


👉 संपादक:- अक्षरवार्ता


Email :- aksharwartajournal@gmail.com


संपर्क :- 8989547427


Friday, August 28, 2020

ग़ज़ल




 

ग़ज़ल🌹




 

बहर-2122 2122

 

दूर है मुझसे खुशी क्यों 

बिखरी सी है ज़िन्दगी क्यों 

 

चार दिन जीना है सबको

दिल में फिर ये दुश्मनी क्यों 

 

रोशनी दी जिसने हमको 

उसके घर में तीरगी क्यों 

 

आदमी का खूँ है पीता

अब यहा हर आदमी क्यों

 

आधुनिकता के भँवर में

हो गई गुम सादगी क्यों

 

 

✍जितेंद्र सुकुमार  'साहिर '

       शायर



लघुकथा रिश्ते का लिहाज़

लघुकथा

 

रिश्ते का लिहाज़

 

लंबे समयांतराल बाद जिला कलेक्टर के आदेशानुसार लाकडाउन में थोड़ी छूट दी गई ।ज्यादातर लोग घरों से निकल कर बाजार की तरफ चल पड़े थे,दैनिक जीवन से जुड़ी आवश्यक सामग्री की खरीदी करने के लिए। बालकनी में बैठे-बैठे मैं लोगों को बाजार आते-जाते देख रहा था, इच्छा हुई कि बाजार घूम आता हूँ।मैं भी घर से निकल पड़ा बाजार की तरफ। बाजार पहुंचकर मैं समैय्या के होटल में एक कप चाय बोलकर चाय आने का इंतजार कर रहा था,तभी मेरी नज़र पड़ी होटल में एक कोने में बैठे तीन लोगों पर , जो कि एक ही स्टूल पर बैठे थे, जिनमें एक व्यक्ति ठीक बीच में बैठे थे, और शराब की बोतल से शराब गिलास में डालकर क्रमश: पहले और फिर दूसरे व्यक्ति को बारी-बारी से दे रहे थे।जब पहले व्यक्ति शराब पी रहे होते तो दूसरे सज्जन दूसरी तरफ नज़र घुमा लेते थे और जब दूसरे सज्जन शराब पी रहे होते तो पहले वाले सज्जन दूसरी तरफ नज़र घुमा लेते। यह दृश्य देखकर मुझे बड़ा अजीबोगरीब लगा इसलिए मैं उन दोनों के शराब पीकर जाते ही तीसरे व्यक्ति जो दोनों को गिलास में शराब डालकर दे रहे थे उनके पास गया और पूछा कि जब ये दोनों व्यक्ति शराब का सेवन ही कर रहे थे तो एक दूसरे की तरफ पीठ कर के क्यों....? एक दूसरे से नज़र बचाकर क्यों...? उस तीसरे व्यक्ति ने मुझे बड़ी विनम्रता पूर्वक बताया - कि जो दोनों व्यक्ति बारी-बारी शराब पी रहे थे इनकी उम्र में पिता-पुत्र के उम्र जितना अंतर है और अंतर ही नहीं है अपितु ये दोनों पिता-पुत्र ही हैं।

पिता-पुत्र के रिश्ते की मर्यादा बनी रहे इसलिए बाप-बेटे दोनों एक दूसरे का और रिश्ते का लिहाज़ करते हुए शराब पीते समय नज़र दूसरी तरफ कर लेते थे।पिता-पुत्र के बीच यह मर्यादा,लिहाज़,सम्मान देख मैं नि:शब्द था आश्चर्यचकित था।जबकि यह वाकया फादर्स डे वाले दिन का ही था।

 

आशीष तिवारी निर्मल 

लालगांव, रीवा मध्यप्रदेश


धोनी को लिखे प्रधानमंत्री के पत्र पर बवाल और भाषाई राजनीति की चाल।

हिंदी से जुड़े कई मंचों पर एक चर्चा हो रही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने महेंद्र सिंह धोनी को जो पत्र लिखा है वह अंग्रेजी में क्यों लिखा गया है, हिंदी में क्यों नही? यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि प्रधानमंत्री सामान्य वार्तालाप हिंदी में करते हैं, उनकी हिंदी भी अच्छी है, जबकि उनकी अंग्रेजी सामान्य है । सबसे बड़ी बात यह है कि धोनी हिंदी भाषी हैं,अच्छी हिंदी बोल और समझ लेते हैं ,तो पत्र अंग्रेजी में क्यों? जो पत्र सामाजिक माध्यमों में घूम रहा है वह अंग्रेजी में है और प्रथमदृष्टया यह किसी भी लिहाज़ से प्रधानमंत्री जी की वाक शैली जैसा नहीं है बल्कि किसी अधिकारी द्वारा तैयार किया हुआ है।

उधर कन्नीमोई ने हंगामा किया हुआ है कि अप्रत्यक्ष रूप से हिंदी थोपी जा रही है और हमेशा की तरह पी चिदंबरम और शशि थरूर भी इस भभक में अपने हाथ सेंक रहे हैं।हालांकि मसला इतना बड़ा नहीं था पर उनके द्वारा सी.आई.एस.एफ. के बाद आयुष मंत्रालय को भी चपेट में ले लिया गया है।

राजनैतिक विवशताएं क्या क्या नहीं करवाती। प्रधानमंत्री और उनके सलाहकार जानते हैं कि धोनी एक अंतर्राष्ट्रीय हस्ती हैं और विशेषकर चेन्नई सुपरकिंग्स के कप्तान भी। अपने पत्र का प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने के लिए उन्होंने अंग्रेजी चुनी। कुछ लोगों का मानना है कि चूंकि तमिलनाडु में 2021 में विधानसभा चुनाव हैं और धोनी वहां की क्रिकेट टीम के कप्तान, अतः तमिलनाडु चुनावों को ध्यान में रखकर हिंदी में पत्र लिखकर वे वहां दूर से भी कोई ख़तरा मोल नहीं लेना चाहते थे। जो भी हो, दुर्भाग्यवश उनके हिंदी प्रशंसकों को इससे निराशा ही मिली।

वही हाल कन्नीमोई, चिदंबरम और शशि थरूर का है। 2021 के चुनाव के मद्देनजर वहां " तमिल विरुद्ध हिंदी भाषा " को एक महत्त्वपूर्ण चुनावी मुद्दा बनाकर, भाजपा और उनके सहयोगी दल ए,आई,डी,एम,के. को जनता की नज़रों में स्थानीय लोगों का दुश्मन बताया जा सकता है।जनता के हितों से किसी का कोई लेना देना नहीं है।मैं कई तमिल मित्रों को जानता हूं, जो कहते हैं कि तमिलनाडु में हिंदी के पक्ष में अनेक लोग और संस्थायें हैं ,लेकिन राजनेताओं ने भाषा के प्रश्न को स्थानीय लोगों की अस्मिता से जोड़कर, ऐसे लोगों की आवाज़ को दबाया हुआ है।

हिंदी के पक्षधर राजनेता पूर्णतः सापेक्षता में विश्वास रखते हैं। यदि हिंदीभाषियों से समर्थन चाहिए तो वे हिंदी के कसीदे पढ़ने लगते हैं। जब दूसरे भाषा भाषियों से समर्थन चाहिए, उनका हिंदी के प्रति समर्पण न जाने कहां गायब हो जाता है। वहीं दूसरी ओर हिंदी विरोधी राजनीति का दायरा जिन क्षेत्रों में है, वहां स्थानीय दलों ने जनता को भरमाया हुआ है। चूंकि उनके सरोकारों को हिंदी बहुल क्षेत्रों के समर्थन से कोई फ़र्क नहीं पड़ता, अतः वे हिंदी के विरुद्ध बोलने से चूकते नहीं हैं।

कष्ट तब होता है जब वे अंग्रेजी को हिंदी के विरुद्ध खड़ा करते हैं। यह हथियार क्यों कारगर साबित होता है, इसके मनोविज्ञान में जाना होगा। सोचने की बात यह है कि अगर स्थानीय भाषा को हिंदी के विरुद्ध खड़ा करेंगे तो चूंकि वह स्थानीय भाषा आमजन की भाषा है, अतः उन्हें इकट्ठा करके विरोध करने में मेहनत करनी पड़ेगी, आंदोलन करना पड़ेगा। उससे अराजकता का माहौल पैदा हो सकता है, जिससे आम व्यक्ति जो रोज कमाने जाता है और रोज खाता है, वह इस सबसे परेशान होकर स्वयं को इससे अलग कर लेगा। लेकिन अंग्रेजी को विकल्प कहते हुए, संचार माध्यमों में विरोध करेंगे तो बहुत से तथाकथित विशेषज्ञ मैदान में आ जायेंगे। ये लोग हिंदी का डर स्थानीय भाषाओं को दिखायेंगे और पैरवी अंग्रेजी की करेंगे। क्या वाहियात आकलन है?

अगर सही माने में वे लोग अपनी भाषाओं के हितचिंतक हैं तो क्यों नहीं वे उनके व्यापक प्रचार प्रसार की प्रक्रिया और नीति केंद्र सरकार के साथ बैठकर बनाते? कारण स्पष्ट है कि वे अभी तक जनतंत्र की व्यवस्था में राजतंत्र को भोगते रहे हैं। हमारे देश में अंग्रेजी "आभिजात्य" वर्ग की पहचान बन गई है और ऐसा वर्ग अपनी इस पहचान को अनंत काल तक कायम रखना चाहता है। वे नहीं चाहते कि सामान्य वर्ग आगे बढ़े। यही कारण है कि हमने जब भी स्थानीय स्तर पर कोई आंदोलन देखा है, वह मूलतः हिंदी विरोधी होता है, न कि स्थानीय भाषा के पक्ष में। वे यह भी जानते हैं कि उनके दुराग्रह से स्थानीय भाषा पीछे जा रही है और अंग्रेजी दिन ब दिन परिपुष्ट हो रही है, लेकिन निजी-स्वार्थवश वे इस तरह के नाटक करते रहते हैं।

कई विचारक मानते हैं कि एक सशक्त केंद्र सरकार हिंदी को राष्ट्रभाषा का गौरव प्रदान कर सकती है। मैं इस तरह के विचारों का स्वागत करता हूं,पर मेरी विचारधारा में सबसे पहले देश की सभी मान्य भाषाओं को उनका समुचित सम्मान तो मिले। सामान्यतः भाषा संबंधित विमर्श दो ध्रुवों पर अटका रहता है ""हिंदी या अंग्रेजी"", भले ही विषय ""भारतीय भाषाएं ""हो।स्थानीय भाषाओं के पक्षधर जब तक यह नहीं समझेंगे कि उनकी भाषा को अंग्रेजी से खतरा है, हिंदी से नहीं ,तब तक कन्नीमोई, चिदंबरम, या शशि थरूर जैसे नेता जनतंत्र के नाम पर जनता को भाषाई भ्रम में डालते रहेंगे। केंद्र में सरकार किसी की भी हो, वे भी मूकदर्शक
रहकर , राजनीतिक विवशतावश उनके विचारों के विरुद्ध कोई पहल नहीं करेंगे। जन-भावनाओं को प्रभावित करनेवाले भारतीय भाषाओं के प्रेमी समूह एक साथ आगे आयें, यह समय की आवश्यकता है,जो शनैः शनैः अब हर क्षेत्र में सक्रिय होने लगे हैं। समय लगेगा... पर परिणाम सकारात्मक होंगे...ध्यान रहे हमें किसी भाषा का विरोध नहीं करना है....बल्कि अपनी स्थानीय भाषाओं को उनका योग्य सम्मान दिलाना है...।
















 





























रविदत्त गौड़















चरित्रहीन

चरित्रहीन
 
बहुत दिनों से कहीं सवाल सता रहे थे, लेकिन उत्तर नहीं मिल रहा था। उसके उपाय भी...इसी समय पदमाबाई मिली,उसने कहा,
"रमेश  गांव कब आया?"
"दो माह हुए।"
"तेरी पढ़ाई कैसी शुरू है..."
"अच्छी।"
"आगे क्यां करने का सोचा है?"
"नौकरी के तलाश में हूं।"
"तुझे मेहनत का फल मिलेगा।"
जाने दो पदमाबाई जो होगा देखा जाएगा,आप का क्यां शुरू है, सब ठीक ठाक है न...हां...जो चल रहा है सही है समझो। जिस स्त्री को पति ने छोड़ दिया हो,उस स्री को  समाज के कहीं लोग  बुरी नज़र  से  देखते  हैं।  उसका  क्यां चलेगा? जो है अच्छा है।
"पदमाबाई सच- सच बताईए क्यां हुआ?"
"बताकर क्यां फायदा रमेश? जो चल रहा है उसे चलने दो।"
"पदमाबाई तुम्हें मेरी कसम क्यां हुआ साफ़- साफ़ बता दो।"
"तुझे प्रकाश साहब मालूम है न..."
"हां...गांव के प्रतिष्ठित, सुशिक्षित, चरित्रवान व्यक्ति..."
"वहीं प्रतिष्ठित, सुशिक्षित, चरित्रवान व्यक्ति...उसने मेरी ज़िंदगी बर्बाद की।"
"मतलब..."
तु विश्वास नहीं करेगा रमेश... लेकिन उसने मेरी मज़बुरी का फायदा उठाया...वोह मेरे ज़िस्म से खेलता रहा। मैं किसी को बता भी न सकी। कुछ ही दिनों में मुझे लड़की हुई। यह इल्जांम खुद पर आएगा, गांव में बदनामी होगी इसलिए उसने मेरे पति को ढूंढकर लाया।उसे पैसे दिए।जब तक पैसे थे तब तक वो रहा बाद में भाग गया। प्रकाश साहब का भी मन भरा था,अब वोह मेरी तरफ़ देखना नहीं चाहता था। लेकिन मैं  लड़की को पढ़ाउंगी। मेरी गलती की सज़ा उसे नहीं दूंगी। रमेश... उसने मेरी जैसी कहीं स्री की ज़िंदगी बर्बाद की।उसकी सच्चाई तुझे सुननी होगी।
"तुझे कोमलबाई पता है न..."
"हां... पता है।"
"उसे भी शिकार बनाया उसने।"
"ऐसी कहीं स्री उसके हवस की शिकार बनी।"
"उसे सिर्फ़ शरीर को नोचना आता है...भावना की कदर नहीं।"
"उसने उसकी ज़िंदगी ख़राब की इसी के साथ उसके लड़की भी..."
वो लड़की उसके बेटी जैसी थी,उसकी उम्र पंधरा साल ओर उसकी उम्र सत्तर साल...तब भी वोह शारीरिक शोषण करता रहा।  इतना करने के बाद भी उसका मन नहीं भरा।  उस लड़की की शादी होने के बाद भी कभी भी फोन लगाता था, मूर्ख...! एक दिन लड़की के पति ने फोन उठाया...उसे भूतकाल का पता चला इस कारणवंश उसने लड़की को कायम का छोड़ दिया।वो मां के पास रहती है।वो आज भी उसके ज़िंदगी से खेलता है।उसकी ज़िंदगी नर्ख बन गई है रमेश।वो जीकर भी मरी हुई है। वो मां की गलती की सजा भोग रहीं हैं।
    नाम में प्रकाश है... लेकिन कई व्यक्ति के ज़िंदगी में अंधेरा निर्माण किया। वोह कुत्ते की मौत मरेगा...मेरी बद्दुआ है...।इतना करके भी उसका पेट नहीं भरा रमेश...वो सही में दलाल है दलाल। गांव में विधवा,श्रावणबाळ निराधार योजना, पेंशन आदि योजना के लाभार्थी है उन लोगों से भी पांच सौ रूपय लेता है। जैसे उन्हें सरकार तनख्वाह नहीं देती हो।इतना ही नहीं तो जो आदमी मरा है उसके नाम पर आए पैसे भी खुद ही हड़पता है।गरीब लोगों का शोषण करता है... धमकियां देता है। लेकिन मैं उसे डरती नहीं हूं। मैंने विरोध नहीं किया तो वो कहीं ओर ज़िंदगी बर्बाद करेगा।   मैं   उसके ख़िलाफ़ अंत तक लढूंगी।  उसे  सजा  दिलाकर रहूंगी। तब तक मुझे सुकून नहीं मिलेगा...


 


वाढेकर रामेश्वर महादेव
                        हिंदी विभाग
       डाॅ.बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा          


विश्वविद्यालय,औरंगाबाद (महाराष्ट्र-431004)


हिंदी दिवस;14 सितम्बरद्ध पर विशेष एक उत्सव से कम नहीं हिन्दी दिवस

हिंदी दिवस;14 सितम्बरद्ध पर विशेष
एक उत्सव से कम नहीं हिन्दी दिवस


 मैं वही भाषा हूँ जिसने हिन्दुस्तान को स्वराज दिलाया.... मैं वहीं हिन्दी हूँ जिसने घर-घर में अलख जगाया.... फिर आखिर क्यों मुझे आज वह स्वाभिमान, सम्मान और जहाँ नहीं मिल पाया, अपनी ही मातृभूमि पर.... आखिर क्यों.... क्या सभी शहादतें एक जल बिन्दु की तरह सूख जाएँगी....राष्ट्रपिता का सपना, नेताओं और राजर्षि की वो अमृत वाणी कब साकार होगी.... साल दर साल गुज़र रहे हैं, लेकिन इस प्रश्न का उत्तर हम अभी तक नहीं दे पाए हैं.... आखिर क्यों? सब मौन हैं।
हिन्दी दिवस एक उत्सव से कम नहीं


 हम कब तक हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह, हिंदी मास परम्परा का निर्वाह करते रहेंगे....हम हिंदी के नाम पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन करते-करते अपने-अपने चहेतों को आतिथ्य दिलवाकर गर्वोन्मत्त होते रहेंगे..... आखिर कब तक....शायद ही विश्व की किसी भाषा का इस तरह मंचन किया जाता हो...प्रत्येक राष्ट्र की अपनी राष्ट्रभाशा हैं....फिर आखिर क्यों करोड़ों-करोड़ों की जुबान आज भी गुलामी की जिन्दगी जीने को मजबूर हैं.... हम अपनी-अपनी ताजपोशी करने और धर्मध्वजता फहराने में व्यस्त और मस्त हैं....। आजादी अभी अधूरी हैं....!
हिन्दी भाषा राष्ट्र को एकता के सूत्र में बाँधती
 राष्ट्रभाषा का प्रश्न मेरे मस्तिष्क में जब-तब उमड़ा-घुमड़ा करता हैं। क्योंकि शहीदों की शहादतें मुझसे ऐसे प्रश्न पूछने आती रहती हैं, मेरे पास इसका कोई उत्तर नहीं होता हैं। मैं मौन बना देखा करता हूँ पूरी व्यवस्था को। वो इसलिए कि मेरी जुबान पर ताला हैं, हाथों में हथकड़ियाँ हैं और पैरों में बेड़ियाँ। मेरे जैसे कितने ही लोगों के साथ ऐसी परिस्थितियाँ सम्भव हैं।
 कुछेक राजकीय प्रतिष्ठानों में राष्ट्रभाषा से सम्बन्धित, राष्ट्र निर्माताओं के कहे वाक्य दीवारों पर टँगे शोभा बढ़़ा रहे हैं- ’’हिन्दी भाषा ही राष्ट्रभाषा, राजभाषा और सम्पर्कभाषा की पूरी अधिकारिणी है’’..... ’’हिन्दी भाषा राष्ट्र को एकता के सूत्र में बाँधती हैं’’.... आदि-आदि। आखिर उसे अब तक वो अधिकार क्यों नहीं मिल पाया हैं। क्यों अब तक अमलीजामा नहीं पहनाया गया?
 मुझे अपने जीवन में कटु यथार्थ से रू-ब-रू होना पड़ा हैं, यहाँ इसका जिक्र करना प्रासंगिक होगा।
मातृभाषा से प्रेम आवश्यक
  राष्ट्र निर्माताओं ने आज देश का ढाँचा इस तरह खड़ा कर दिया हैं कि अंग्रेजी के बिना सभी को जीवन अधूरा लगने लगा हैं। चाहे वो हिन्दीभाषी क्षेत्र हों, या तमिल, तेलुगु, कन्नड़, असमी और मराठी आदि वाले। चुँनाचे हर जगह अंग्रेजी का भूत सवार हैं। चपरासी से लेकर अफसर तक, सब ही अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में पढ़ाना चाहते हैं। इसीलिए इन विद्यालयों की बाढ़-सी आ गई हैं। ये कुकुरमुत्ते-से खूब फल-फूल रहे हैं। ऐसे विद्यालयों में बच्चा जो भी पढ़े या न पढ़े, लेकिन संरक्षकों को पूरी तरह सन्तुष्टि रहती हैं कि उनका बच्चा इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ रहा हैं। वह बड़ा होकर निश्चित ही उनका नाम रोशन करेगा। आज इस तरह अंग्रेजी माध्यम के तीन प्रकार की श्रेणी के हो गए हैं - प्रथम वो नामी-गिरामी स्कूल जिनका भार-वहन दस-पन्द्रह प्रतिशत लोग उठाने में सक्षम हैं, दूसरे वे हैं जो नामी-गिरामी स्कूलों की नकल कर रहे हैं, इनका वहन बीस प्रतिशत लोग तथा तीसरे वे विद्यालय हैं जो कुकुरमुत्तों की तरह गली-कूचों में खुल गए हैं, चाहे उनकी मान्यता हिन्दी माध्यम से हो अथवा न हो, लेकिन बोर्ड इंग्लिश मीडियम का लगा रखा हैं। 
कुकुरमुत्ते-से खूब फल-फूल रहे इंग्लिश मीडियम स्कूल
इसी सबके चलते राजकीय प्राइमरी और उच्च प्राइमरी विद्यालयों से बच्चे नदारद हैं, उनके भवन भुतहा लग रहे हैं और शिक्षक वेतन ले रहे हैं। मैं यह ही नहीं समझ पाया कि इन राजकीय विद्यालयों की महत्ता दिन प्रतिदिन गिरती क्यों जा रही हैं। यानी स्थिति यहाँ तक पहुँच गई हैं कि राजकीय प्राइमरी स्कूल के शिक्षक का बच्चा भी इन स्कूलों में पढ़ने को राजी नहीं हैं या शिक्षक ही वहाँ पढ़ाना नहीं चाहते। एक तरफ भवन भुतहा हैं, तो दूसरी तरफ कंकरीट का जंगल बढ़ता जा रहा हैं। जैसे अंग्रेजी के नाम पर नया व्यापार खड़ा किया जा रहा हैं। इस त्रासद स्थिति को मजबूती प्रदान करने वाले कौन हैं, इसकी पहचान के नाम पर सारा समाज मौन हैं।
यह सब है आज का कटु यथार्थ
 यह सब आज का कटु यथार्थ हैं, जिससे हम मुँह मोड़कर भौतिकवाद की अंधी दौड़ में भागने के लिए आतुर हैं। हम हिन्दी भाषा पर बड़े-बड़े व्याख्यान को बड़े-बड़े मंचों से पढ़करी इतिश्री कर लेते हैं, तालियाँ बजवा लेते हैं, या क्लिष्टम आलेख लिखकर नामी-गिरामी पत्र-पत्रिकाओं में छपवा लेते हैं और प्रथम श्रेणी के अमलदार हिन्दी साहित्यकार बुद्धिजीवी कहलवाने में अपना बड़़प्पन महसूस करते हैं। मै कुछ ऐसे वरिष्ठतम ख्यातिप्राप्त हिन्दी साहित्यकारों को जानती हूँ जो सत्ता के बहुत नजदीक रहे, लेकिन निजी हित साधने के माया मोह में उन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की पुरजोर वकालत नहीं की, यदि वे हिन्दी की वकालत करते तो निज लाभ पाने से वंचित रह जाते। हाँ, ये एक काम बड़ी मुस्तैदी से करते रहे कि सत्ता से नज़दीकियाँ बढ़ाने के घमासान में आपस में टाँग-खिंचाई करते रहे और अपनी क्रान्तिकारी विचार-धाराओं का पाखण्ड करते रहे। अब तो और ज्यादा बुरा हाल हैं कि हिन्दी भाषा में नई-नई विचारधाराओं को श्रेष्ठतम मानने के ्रव्यामोह में खेमे, गुटबंदियाँ और मठाधीसी बहुत बढ़ गई हैं। हिन्दी राष्ट्रभाषा बने इसकी पुरजोर वकालत कौन करेगा,? हिन्दी के कवि, साहित्यकार, बुद्धिजीवी और जनता मौन....।


 यह सच हैं कि राष्ट्र में हिन्दी भाषा के अलावा उसकी छोटी बहनें तमिल, तेलुगु, बंगला, मलयाली और पंजाबी आदि कई एक भाषाएं हैं, जिनका विस्तार और सम्पर्क एक सीमित क्षेत्र में ही हैं, जबकि हिन्दी भाषा का विस्तार और सम्पर्क देश की सीमाओं के बाहर भी हैं। पूरे विश्व पटल पर बोलने और समझने वालों की संख्या दूसरे नम्बर पर हैं, चुँनाचे इसे वह मान-सम्मान और जहाँन मिलना ही चाहिए, जिसकी ये पूरी तरह अधिकारिणी हैं।


राष्ट्रभाषा का दर्जा कैसे मिले हिन्दी भाषा को
1. हिन्दी के लेखकों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और प्रेमियों को एक मंच पर आना होगा अपने-अपने दुराव छोड़कर। मजबूत संगठन बनाकर अपनी बात भी मजबूती से केन्द्र की सत्ता के सम्मुख रखनी होगी। सब तरह की गुट खेमेबंदी और मठाधीसी पूरी तरह ध्वस्त कर दी जाए।
2. एकता में शक्ति हैं। चुँनाचे जब तक हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल जाता, तब तक वह स्थापित संगठन अपनी बात मजबूती से रखता रहे।
3. उच्च शिक्षा में सम्बन्धित विषयों का हिन्दी में सरल भाषा में अनुवाद हो, उसके साॅफ्टवेयर बनें, कम्प्यूटर, मोबाइल, लैपटाॅप या अन्य आधुनिक तकनीकी ज्ञान हिन्दी में हो। उसके लिए आवश्यक संसाधन अपनाए जाएँ। उच्च शिक्षा हिन्दी माध्यम से सुलभ कराई जाए।
4. उच्च प्रशासनिक, न्यायिक और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में से कुछ हिन्दी में देने के लिए विकल्पित हैं, लेकिन चयन वाली टीम आज भी उन्हें दोयम दर्जे का मानती हैं। इसलिए हिन्दी माध्यम से प्रतियोगी परीक्षाएँ देने वाले परीक्षार्थी न के बराबर ही चयनित होते हैं, यदि उनमें से कुछ लिखित परीक्षा मे ंउत्तीर्ण हो भी गए तो साक्षात्कार में अच्छी अंग्रेजी का होना बहुत जरूरी हैं। इसी कारण अधिकतर परीक्षार्थी अंग्रेजी को ही देवी मानकर इसी के माध्यम से परीक्षा देने को मजबूर होते हैं। इस दिशा में गंभीर मंथन जरूरी हैं।
5. केन्द्र की सत्ता का मूलमंत्र हिन्दी-भाषी क्षेत्रों पर हैं, अतः वहाँ के नागरिकों के लिए भी जागरूक होना बहुत आवश्यक हैं। जब कोई कठोर संकल्प होता हैं तभी अपनी बात को मनवाया जा सकता हैं।
6. उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय व अन्य न्यायालयों में हिन्दी भाषा में अपनी बात रखनें का अधिकार दिया जाए। जब हिन्दी को वहाँ दोयम दर्जे का भी स्थान नहीं हैं, तो कौन चाहेगा कि वह हिन्दी माध्यम से पढ़कर विधि स्नातक की डिग्री ले। आज भी सब कुछ अंग्रेजों की परम्परा के हिसाब से चल रहा हैं सारे कानून अधिकांशतः वही के वही।
7. प्राइमरी, उच्च प्राइमरी और उच्चतर माध्यमिक हिन्दी माध्यम के राजकीय और गैर-राजकीय विद्यालयों में पढ़ाई का स्तर सुधारा जाए। अंग्रेजी की शिक्षा भी वहाँ दी जाए, वैसे वहाँ दी भी जाती हैं, लेकिन और सुधार करा जाए, जिससे लोग अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की ओर न भागें। किसी भी भाषा का ज्ञान बुरा नही हैं। अन्य प्रान्तों की भाषाएं भी सिखाई जा सकती हैं, वहाँ का साहित्य पढ़ाया जा सकता हैं।



डाॅ.विभा खरे 
जी-9, सूर्यपुरम्, नन्दनपुरा, झाँसी-284003


 


 


 



 


राँची का राजकुमार 

राँची का राजकुमार 


::::::::::::::::::::::::::::::::::


 


राँची के राजकुमार हो|


धोनी सबके माही हो|


विश्व की पहचान हो|


ख़ुशबू का झोंका हो|


दिल के दिलदार हो|


क्रिकेट जगत का आफ़ताब हो|


बल्ले का सरताज हो|


विकेट के पीछे चपल चीता से हो|


यारों के यार हो|


कुशल सफल कप्तान हो|


विजय के बादशाह हो|


चौंकों छक्कों के सरताज हो|


हेलिकॉप्टर शॉट के जनक हो|


बॉल को पहुँचाते मैदान के पार ,


विरोधी के जवाब हो|


जीत की आख़िरी कील हो|


डूबती नैया के खेवनहार हो|


पुरुस्कार के सिरमौर हो|


जीत सदा क़दम चूमती,


देश के सच्चे सपूत हो|


चुना आर्मी में योगदान का,


जाँबाज़ एक कर्नल हो|


नहीं तुम सा खेल जगत में,


खिलाड़ी नहीं महताब हो|


चमकता ध्रुव तारा  हो|


 


सविता गुप्ता-स्वरचित


राँची झारखंड


Aksharwarta's PDF

Aksharwarta International Resarch Journal - September - 2025 Issue