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Thursday, June 4, 2020

शीर्षक : फ़ासला रखो

शीर्षक : फ़ासला रखो *


ओ ! मेरे अज़ीज़ो-अकरबा
ओ ! मेरे हमनफ़स, मेरे हमदम
यक़ीनन अभी ग़मगीं है ज़िन्दगी
दिल ख़ौफ़ज़द है और आँखें नम

वबा के दहाने में सारा जहां क़ैद है
लिबास-ए-ख़ुदा का रंग सुफ़ैद है
मगर नज़दीकियां, हाय! दुश्वारी है
क़फ़स में ज़िन्दगी मौत पे भारी है

मेरे हमदम अभी ज़माने की नब्ज़ नासाज़ है
हर कूचे से उठती बस सिसकी की आवाज़ है
अभी हमें तल्ख़ी-ए-तन्हाई का घूँट पीना है
दरिया-ए-वक़्त को कतरा कतरा जीना है

मेरे साथी, मेरे हमसफ़र
सादिक़ जज़्बे से अपनों की फ़िक्र करो तुम
फ़ासलों से ही जीत है इसका ज़िक्र करो तुम
फ़ासला न रक्खा, देखो शिकंजा कस गया
घुटकर जीने का ख़ौफ़ नस-नस में बस गया

फ़ासला रखो कि स्याह अंधी रात पसर रही है
फ़ासला रखो कि मुल्क़ पे क्या-क्या गुज़र रही है
फ़ासला रखो कि मज़दूर के पैरों में छाले फूट रहे हैं
फ़ासला रखो कि यहाँ बेटों की मौत पे बाप टूट रहे हैं
फ़ासला रखो कि नयी दुल्हन तक हिज्र में तड़प रही है
फ़ासला रखो कि बेवा पति की लाश को बिलख रही है
फ़ासला रखो कि लाखों पेट को रोटी नसीब नहीं है
फ़ासला रखो कि गिरजा में अब बची सलीब नहीं है
फ़ासला रखो कि अपनी माँ को अभी तीरथ कराना है
फ़ासला रखो कि उस पुराने दोस्त को गले लगाना है
फ़ासला रखो कि आँखों में नींद लौट आएगी
फ़ासला रखो कि ज़िन्दगी फिर से मुस्कुरायेगी
फ़ासला रखो कि महबूब के लबों पे शबनम ढलेगी
फ़ासला रखो कि वो हँसी फ़िज़ा में फिर से घुलेगी

मेरे दोस्त, तुम दिल में हौसला रखो
बस दिल-ओ-ज़हन से क़रीब आओ
मगर इक दूजे से अभी फ़ासला रखो
तुम फ़ासला रखो !
तुम फ़ासला रखो !

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प्रशान्त 'बेबार'



क्यों ईमानदारी फांसी पर झूल गई ?

क्यों ईमानदारी फांसी पर झूल गई ?


-------- डॉo सत्यवान सौरभ,


राजस्थान के सिंघम कहे जाने वाले थानाधिकारी विष्णु दत्त बिश्नोई का शव उनके सरकारी आवास पर फांसी के फंदे पर लटका मिला जिसके बाद प्रशासन व सियासी जगत में हड़कंप मच गया. प्रदेश की राजनीति और प्रशासन में भूचाल खड़ा हो गया. बिश्नोई पिछले कुछ दिनों से तनाव में थे तथा नौकरी छोड़ना चाहते थे. दरअसल, बिश्नोई की छवि विभाग में एक ईमानदार अफसर की थी. जिसने अपने क्षेत्र में कई तरह के अपराधों पर अंकुश लगाया था. शराब माफिया हो या विभिन्न मादक पदार्थों के तस्कर हो सभी के आंखों की किरकिरी बने बिश्नोई ने क्षेत्र की जनता का दिल जीत लिया था. लेकिन बिश्नोई पर ऐसा कौन सा दबाव आया कि उन्हें आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ा?


हजारों फॉलोवर, तेज तर्रार-ईमानदार अफसर की छवि-


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विष्णुदत्त एक तेज तर्रार अफसर थे। पुलिस महकमे में सामाजिक नवाचारों को लेकर उनकी कार्यप्रणाली खासी चर्चाओं में रहती थी। उनकी लोकप्रियता का इसी से पता चलता है कि सोशल मीडिया पर उनके हजारों की संख्या में फॉलोवर थे। महकमे में विष्णुदत्त की एक ईमानदार छवि थी। वे मूल रुप से रायसिंहनगर, हनुमानगढ़ के रहने वाले थे। वर्ष 1997 में पुलिस विभाग में सबइंस्पेक्टर भर्ती हुए थे। उनके चाचा सुभाष विश्नोई भी एडिशनल एसपी रहे है।


विष्णुदत्त विश्नोई बेस्ट पुलिसकर्मियों में से एक थे, यह पुलिस विभाग के लिए एक बड़ा लॉस है. सीआई विष्णुदत्त विश्नोई चूरू के राजगढ़ थाने में एसएचओ थे. उसी दिन वो इलाके में हुई एक हत्या के मामले में देर रात तक वह जांच कर रहे थे, सुसाइड नोट में विश्नोई ने लिखा है कि उनके चारों तरफ इतना दबाव था कि वे इसे झेल नहीं सके. उन्होंने खुद के तनाव में होने की बात कही. वकील को मैसेज भेज कर उन्होंने लिखा कि उन्हें गन्दी राजनीति के भंवर में फंसा दिया गया है. इसी मैसेज में उन्होंने बताया था कि वे सेवा से मुक्त होना चाहते हैं. उन्होंने लिखा था कि थाना भवन के निर्माण में उन पर 3.5 करोड़ रुपए का गबन का आरोप मढ़ा जा रहा है.


मामले में गरमाई राजनीति-


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विष्णुदत्त विश्नोई के सुसाइड के बाद राजनीति भी गरमा गई है। घटना के बाद वहां पूर्व विधायक मनोज न्यांगली और पूर्व सांसद कस्वां राजगढ़ थाने पहुंचे। वहां धरने पर बैठ गए। स्थानीय लोगों ने कांग्रेस विधायक के खिलाफ नारेबाजी की। वहीं, मामले में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने ट्वीट कर कहा कि इस घटना ने कांग्रेस सरकार के सिस्टम पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।


थानाधिकारी की आत्महत्या एक गम्भीर घटना है और यह हमारी व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर रही है। सरकार को इसकी जांच करवा कर तथ्यों का पता लगाना चाहिए कि ऐसे क्या कारण रहे की एक थानाधिकारी को आत्महत्या करनी पड़ी।


थाने का पूरा स्टाफ क्यों चाहता है ट्रांसफर?


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सीआई विष्णु दत्त विश्नोई सुसाइड केस के बाद थाने का अधिकतर स्टाफ ट्रांसफर चाहता है. सीआई के सुसाइड के बाद थाने के स्टाफ ने बीकानेर रेंज के आईजी को लैटर लिखा है कि वे भी थाना छोड़ना चाहता हैं, उनका भी ट्रांसफर कर दिया जाए. इस थाने से और शहर के अन्य थानों में लगा दिया जाए. इसमें अधिकतर पुलिस कार्मिकों ने हस्ताक्षर भी किए हैं. हांलाकि इस लैटर के बारे में अफसर मीडिया से कुछ बोल नहीं पाए.


आत्महत्या की घटना से आक्रोशित जनता ने क्षेत्रीय कांग्रेस विधायक कृष्णा पूनिया के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी. नारेबाजी करने वालों का आरोप था कि थानाधिकारी ने विधायक के दबाव में आकर आत्महत्या की है. वहीं कृष्णा पूनिया ने कहा है कि विश्नोई से 5-7 बार बैठक में ही उनकी मुलाकात हुई थी. विधायक ने बताया कि उन्होंने विश्नोई के बारे में सुन रखा था, लेकिन कभी अकेले में मुलाकात नहीं हुई. विश्नोई के बारे में ये भी कहा जा रहा है कि वो अपने थाने के कुछ पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर किए जाने से नाराज थे. आरोप है कि विधायक पूनिया ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से बात कर ऐसा कराया था. अब तक 13 थानों में रह चुके विश्नोई की आत्महत्या के मामले में एक क्षेत्रीय गैंगस्टर की गैंग का नाम भी सामने आ रहा है, क्योंकि वो जिस मर्डर केस की जांच कर रहे थे, उसके तार इसी गैंग से जुड़े थे.


सीबीआई जांच की मांग-


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21 साल से सेवारत विश्नोई वरिष्ठ अधिकारियों के भी चहेते थे. विष्णुदत्त राज्य के शीर्ष 10 एसएचओ में शामिल थे. पुलिसकर्मियों के लिए राजनीतिक, सामाजिक और आपराधिक दबाव आम बात है, जो विभाग में भर्ती के पहले दिन से ही शुरू हो जाता है. उन्होंने कहा कि सभी क्षेत्रों के वरिष्ठ अधिकारी सिफारिश करते थे कि अपराध को नियंत्रित करने के लिए उनके इलाके में विष्णुदत्त की पोस्टिंग की जाए. चूरू के राजगढ़ में भी अपराध नियंत्रण के लिए ही विष्णुदत्त की पोस्टिंग की गई थी. वहां उन्होंने अच्छा काम किया था, लेकिन आत्महत्या के पहले कैसी परिस्थितियां बनीं, ये जांच का विषय है. इसकी सच्चाई सीबीआई जांच के बिना सामने नहीं आएगी.


क्या ईमानदारी फांसी पर झूल गई ?


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विष्णुदत्त विश्नोई ऐसे अधिकारियों में से थे, जो हमेशा ईमानदारी से काम करते थे. उन्होंने कभी जात-पात जैसी घिनौनी सोच को खुद से मीलों दूर रखा। वे जहां भी रहे लोग उनकी ईमानदार छवि की मिसाल
आज भी देते है। उन्होंने जाति से पहले संबंधित व्यक्ति का जुर्म देखा और उसी लिहाज से उसके साथ न्याय किया। वे अपराध की दुनिया से जुड़े क्रिमनल और सफेदपोश नेताओं को कभी भी भाव नहीं देते थे।


उनका काम केवल लोगों को सुरक्षा व सुरक्षित माहौल देना था और वे हर उस आदमी की कद्र करते थे जो न्याय प्रणाली व पूरे समाज को संगठित करने में यकीन रखते थे। उनकी इसी सोच के कारण हर वर्ग के लोग उनके कायल हो गए थे। पर आज सवाल उनकी ईमानदारी पर है, हमारी भ्रष्ट व्यवस्था और राजनितिक चालों पर है, आखिर क्यों ईमानदारी फांसी पर झूल गई ?


( ये लेखक के निजी विचार है )


-- डॉo सत्यवान सौरभ,


     


कविताएं

शीर्षक -   उस रोज़..


 


सहेज रही हूं..

एक-एक क्षण.. एक-एक पल

गुल्लक में 

सिक्कों की तरह !!

 

सुनों न..

अक्सर, सम्मोहित सी करती है

जब भी सुनती हूं

ये खनक !!

 

तुम..

जब कभी मिलोगे

अंतरालों के बाद ,

..हो सकता है

बीत जाएं सदियां भी !!

 

सुनों..

तुम कर सकते हो इंतजार ,

तय करनें दो मुझे भी

इंतज़ार की हदें ,

मैं ऐसे ही मिलूंगी

बिल्कुल, ठीक आज की तरह

और..

फोड़ दूंगी ये गुल्लक

उस रोज !!

 

 

शीर्षक -    आखिर क्यों..

 


कोई भी क्यों चिल्लाता है दिनभर

जागरूकता रैली के लिए ,

छोटी होती रहती हैं कतारें

और ऊ़ंघती रहती हैं ई. वी. एम. मशीनें ,

राजनीति सिर्फ बहस का मुद्दा बनीं रहती है

कान्फ्रेंस-रूम में ,

क्यों शिक्षा सिमटी रहती है 

मैरिट के लेबल में ,

क्यों किताबें परिभाषाएं हैं डिप्रेशन की..

आखिर क्या प्रमाणित करते है

ये सारे एसिड-अटैक ..

क्यों आस्थाएं बिकतीं हैं अब

चैरिटी के नाम पर ,

क्यों ईश्वर बैठा दिखता है

मंदिर सी दुकानों पर ,

और..

अब तो ये भी समझ से परे हुआ

कि क्यों लिखती हूं मैं "मन का"

तुमसे मन का कहने को !!

 

 

शीर्षक -   वो बाहर आई..

 


सभी आत्मिक दीवारों को लांघते हुए..

स्वयं के अवरोधों को झेलते हुए..

थोड़ा सकुचाते हुए

वो बाहर आई ,

अपने ही संशय और भ्रम को किनारे रख

प्रेम की निशब्दता को महसूस किया ,

मन की उफनती लहरों पर

चहलकदमी करने की कोशिश की ,

ओस की बूंदों को छुआ..

रेत पर लिख दिए

अनगिनत स्पर्श ,

.. उड़ने लगी आसमान में

पतंग सी ,

बादलों को समेंटा..

बारिशों से बात की..

सदियों से दबी आकांक्षाएं

फिर से लहराईं..

हां, सभी आत्मिक दीवारों को लांघते हुए

थोड़ा सकुचाते हुए

वो बाहर आई !!

 

शीर्षक -  कविता कभी 'जरूरत' नहीं होती..

 


कविता कभी "जरूरत" नहीं होती

ऐसा होंनें भी मत देना ,

मत जांचना-परखना उसे

डिग्रीयों के मानकों से !!

 

सुनों..

निकलतें हैं अनगिनत

थामें डिग्रीयों को ,

जरा पूछो तो..

कोई पास भी हुआ है

मन-अभिव्यक्ति के प्रैक्टिकल में !!

 

सुनों..

रटा-रटाया फोर्मूला नहीं है कविता

भावों की गहनता से गुजरना ही होता है ,

वैसे..

"शब्द" तो मिल ही जातें हैं कहीं-न-कहीं

पर, मिलती नहीं

"आत्म-अभिव्यक्ति" हर जगह !!

 

शीर्षक -    मेरे एकांत की जगहें..

 


अक्सर..

मैं नहीं होती हूं अपने "शब्दों" में भी ,

विचार-विमर्श सी करती रहतीं हैं

मेरी कविताएं

मुझसे ही ,

एक मौन आवरण

हमेशा ही ढके रहता है ,

पता नहीं कैसे टोह लिया तुमने मुझे..

देख लिया बिन देखे ही ,

और..

सोचते चले गए

मुझे बिन बताए ही !!

 

मुझसे मेरे एकांत की जगहें भी छिनती गईं !!

 

नमिता गुप्ता "मनसी"

 

 



















आत्म परिचय -

नाम - नमिता गुप्ता

साहित्यिक नाम - नमिता गुप्ता "मनसी"


जन्म तिथि - 28 -4 -73


शिक्षा - एम.ए. अंग्रेजी
























रचनाएँ

१-पिता

संवेदना कराह की,
कांटों भरी राह की।
तू अश्रु मेरे नेत्र का,
रहस्य है हर क्षेत्र का।।

उत्साह मेरे जीत का,
तू राग मेरे गीत का।
तू अन्न मेरे भूख का,
तू ख़ुशी मेरे सीख का।।

हे पिता! तू है मित्र सा,
मझधार में अस्तित्व सा।
आत्मा व्यक्तित्व का,
व्यक्तित्व का चरित्र भी।।

हर हाल में तू ढाल है,
मैं मांस तू कंकाल है।
जिज्ञासा में मैं लिप्त था,
संतुष्ठ मैं तू तृप्त था।।

ज्ञान का प्रमाण है,
तू प्रेम में प्रगाढ़ है।
विद्वान तू विधान का,
ख़ुमार है परवान सा।।

उत्साह का दर्पण है तू,
प्रतिबिम्ब है गुरुज्ञान का
परमार्थ को अर्पण है तू।
परमात्मा है राष्ट्र का।।

अश्रु से परेशान तू,
स्वयं से अनजान सा।
हे पितृ! तू सर्वत्र है,
हृदय तेरा ब्रह्मांड सा।।


२-राग एक हो...

देश एक और राग एक हो
हम सबका परित्याग एक हो
देश धर्म समभाव एक हो
देशभक्त की बात एक हो।।
 
जब संकट मंडराए सिर पर
राष्ट्र के नाम मुहिम ऊपर हो
आपदा आए यदि कृषक पर
कृषि प्रधान गूंज एक हो।।

संकट समय यदि सीमा पर
राष्ट्र प्रथम का राग एक हो
मिले शहादत यदि सैनिक को
भारत एक, परिवार एक हो।।

यदि किसी ने हिंसा की हो
हिंसक है का ज्ञान एक हो
भारतवासी एक सदा हो
भारत माँ की गूंज एक हो।।

विश्वधरा की बात यदि हो
वसुधैव कुटुम्बकम लाप एक हो
आंच यदि मानव पर आए
इंसान की प्रजाति एक हो।।


नाम: ज़हीर अली सिद्दीक़ी
स्थायी पता: ग्राम-जोगीबारी, पो.खुरहुरिया, जनपद-सिद्धार्थनगर, उत्तरप्रदेश-२७२२०४


ग़ज़ल

ग़ज़ल
ख़ुदा पर ठीकरें क्यों फोड़ता है
तेरी ही ख़्वाहिशों से दुःख बढ़ा है


ग़रीबी भुखमरी इसका सबब है
कोई अपनी ख़ुशी से कब मरा है


अगर दिल में फ़क़त उसके मोहब्बत
हवस से किसकी जानिब ताकता है


मुझे साया जो देता था शजर जो
मेरी हसरत के बाइस गिर गया है


तसव्वर से निकल आए हक़ीक़त
कहाँ अक्सर ये साहिब हो सका है


कविता     बंजारा.   (स्वरचित) 

कविता          बंजारा.   (स्वरचित) 


अनजाने रास्ते पर यकायक क्यों चल पड़ पांव।

पता है कठिन डगर नहीं मिलेगी रती भर छांव।।

मृगतृष्णा लिए घुम रहा पीछे छूट गया गांव। 

बेचारगी बैचेनी देख न जाने क्यों ठिठक जाते पांव।। 

धरा के इस छोर से उस छोर तक तूझे का ढूंढने चाव।

पथरीले पत्थरों से पग में पड़ छाले हुये घाव।।

क्रोध सी अनर्गल बातें सुन भी फूटे मधुर भाव।

अनासक्ति भाव की तामीर में बदलना है स्वभाव।। 

यायावर की जिंदगी में न जाने होगें कितने उतार चढाव। 

तेरे पाने की चाह में बन जाऊं बंजारा बने रहे सुंदर भाव।। 

 

 

हीरा सिंह कौशल गांव व डा महादेव सुंदरनगर मंडी हिमाचल प्रदेश 

कमलेश्वर की कहानियों में सामाजिक चेतना

कमलेश्वर की कहानियों में सामाजिक चेतना


                                                                                                                                 विजयलक्ष्मी यादव


                                                                                                                                  शोधकर्त्री हिंदी


                                                                                                           राजस्थान विश्वविद्यालविद्यालय, जयपुर


                                                                                                                               मो.9799964305


शोधपत्र-सारांश:


 


कोई भी रचनाकार एवं रचना विधा समाज से विलग हो ही नहीं सकती। समाज की रीति - नीति, परंपराओं, आदर्शों, मूल्यों, सिद्धांतों आदि रचना की संपत्ति हैं। इस दृष्टि से कमलेश्वर की कहानियों के मूल्यांकन के फलस्वरूप यह स्पष्ट हो जाता है कि वह समाज चेता एवं युग दृष्टा कहानीकार हैं। उनकी कहानियों में न केवल तत्कालीन समाज का चित्रण है बल्कि एक ऐसे समाज के निर्माण की ओर इशारा भी है जो वे बनाना चाहते थे। समाज, सामाजिक संबंध एवं सामाजिक समस्याओं तथा उन समस्याओं के निराकरण के उपायों पर विचार किया गया है।


 संकेताक्षर : नई कहानी, समांतर कहानी , यथार्थ,  भोगा हुआ यथार्थ,  काल्पनिक दुनिया,  समाज,  समाज चेतना, युग चेतना,  युगधर्म


 


कमलेश्वर स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्यकारों में प्रमुख हस्ताक्षर हैं। कमलेश्वर की स्वतंत्रता की संधि स्थल के प्रमुख कथाकारों में अपनी सक्रिय एवं सार्थक उपस्थिति दर्ज है।  स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय क्रांतिकारियों के साथ रहकर अपनी सक्रिय एवं सार्थक उपस्थिति, सहभागिता रखने वाले एवं उन समस्त गतिविधियों में  सम्मिलित रहकर देश प्रेम, समाज सेवा आदि के पुनीत यज्ञ में आहूति देने वाले बहुत कम साहित्यकार होंगे। उन विरले साहित्यकारों में से एक हैं -  कमलेश्वर। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के समय 1940 से 1950 के दशक के मध्य अनेक राजनीतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक क्षेत्र में परिवर्तन स्पष्ट रूप से देखने को मिलते हैं। इस समय हिंदी कहानी साहित्य में आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिलते हैं। अब कहानी केवल मनोरंजन का साधन न रहकर सामाजिक संदेश, आम आदमी के दु:ख-दर्द, पीड़ा, हताशा, कुंठा, सत्रांस को प्रकट करती है। अब तक यथार्थ जीवन के साथ काल्पनिक दुनिया की कहानियों को तरजीह दी जाती थी। 1940 के दशक बाद हिंदी कहानी साहित्य में 'नयी कहानी' का जन्म हुआ। इस 'नयी कहानी'  आंदोलन के प्रमुख त्रयी थी - कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश और एक मित्र थे दुष्यंत कुमार। इस त्रयी ने हिंदी साहित्य में एक जबरदस्त हलचल पैदा कर दी। उन्होंने कहानी विधा में रोचकता, शैलीगत, प्रयोग तथा विषयवस्तु की नवीनता से पाठकों, आलोचकों और साहित्य के अलम्बरदारों को आईना दिखाया। तीनों ही प्रमुख नाम न केवल युवा थे, बल्कि अच्छे दोस्त भी थे। इन तीनों में कमलेश्वर सबसे अधिक सक्रिय एवं मंचों एवं बहसों में करारा जवाब देने वाले थे। कमलेश्वर ने साहित्यिक मंचों पर अपनी 'नयी कहानी'  की प्रमुख 'थीम'  को न केवल समझाया बल्कि 'नयी कहानी की भूमिका'  नामक आलोचना पुस्तक लिखकर 'नयी कहानी' की संवैधानिक पृष्ठभूमि भी तैयार की।


कमलेश्वर ने लगभग सैकड़ोंं लघु लंबी, कहानी लिखकर हिंदी साहित्य में अपनी गुरु गंभीर उपस्थिति दर्ज करवायी। पहले 'नयी कहानी' और तत्पश्चात् 'समांतर कहानी' के माध्यम से मध्यमवर्गीय आम आदमी की जीवन शैली, रीति-नीति, परंपराएं तथा सामाजिक समस्याओं को रखकर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया। कमलेश्वर ने अनेक कालजयी कहानियों की सृजना की। मसलन - राजा निरबंसिया, मांस का दरिया, चप्पलें, देवा की मां, सुबह का सपना, दिल्ली में एक मौत, दिल्ली में एक और मौत, बयान, आजादी मुबारक, जार्ज पंचम की नाम, इतने अच्छे दिन, खोई हुई दिशाएं, तलाश, नागमणि, बदनाम बस्ती, कोहरा, कस्बे का आदमी, उस रात वह मुझे ब्रीच कैण्डी मिली थी, इतिहास कथा, कितने पाकिस्तान आदि।


कमलेश्वर की इन तमाम कहानियों में कस्बाई, नगरीय एवं महानगरीय जीवन की तमाम गतिविधियों, लोगों के सहज मनोविज्ञान को देखा जा सकता है। कमलेश्वर मूलत: मैनपुरी (उत्तरप्रदेश) में जन्में होने के कारण और बाद में नौकरी के सिलसिले में दिल्ली बंबई में रहने से उनकी कहानियों में कस्बाई जीवन का चित्रण अधिक है।


समाज


 


समाज शब्द सम् उपसर्ग पूर्वक अज् धातु से बना है। अर्थात् अकर्तरिच कारके संज्ञायाम। सम्यक् अजन्ति जन: अस्मिन् इति समाज:। इस प्रकार जहाँ सभी लोग अच्छी तरह से रहें, वह समाज हैं।1 अनेक समाज शास्त्रियों ने समाज की परिभाषाएं दी है। मैकाइवर के अनुसार 'समाज'  शब्द में हर तरह का तथा हर अंग का वह संबंध आ जाता है, जो दूसरे मनुष्यों तथा किन्हीं भी अन्य सामाजिक प्राणियों द्वारा एक-दूसरे के साथ स्थापित किए जाते हैं।2 प्रसिद्ध पाश्चात्य विचारक राइट के अनुसार 'समाज का अर्थ केवल व्यक्तियों का समूह नहीं है, समूह में रहने वाले व्यक्तियों के आपस में जो संबंध है, उन संबंधों के संगठित रूप को समाज कहते हैं।"3 भारतीय समाजशास्त्री सत्यकेतु विद्यालंकार लिखते हैं कि - ''मनुष्यों के जीवन में एक दूसरे के साथ संबंधों का जाल सा बिछा हुआ है, समाजशास्त्र में उसी को समाज कहा जाता है।"4


समाज को विभिन्न विद्वानों द्वारा परिभाषित किया है। इन समस्त परिभाषाओं से यह देखने को मिला की समाज एक ऐसा समूह है जिसमें लोग अपने सामाजिक, पारिवारिक आदि संबंधों के चलते संगठित है, समाज में व्यक्ति की प्रतिभा का पूर्ण विकास होता है। उसकी बौद्धिक एवं शारीरिक क्षमता एवं सौष्ठव का विकास होता है। 


सामाजिक चेतना


 


समाज चेतना से तात्पर्य है - समाज के लोगों में चेतना। अर्थात् व्यक्ति के चारों तरफ फैले हुए जन-जीवन के यथार्थ, रीति-नीति, परंपराएं आदि से परिचित होना और उसे आत्मसात् करके सबके प्रति संवेदनशील बनना। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह समाज के सुख-दुख, हर्ष-विषाद, विभिन्न समस्याओं, कुंठाओं, सत्रांस आदि को लेकर अलग नही कर सकता। तमाम तरह के बदलावों को महसूस करना तथा अनुभूति के साथ अभिव्यक्ति के धरातल पर इन बदलावों को रेखांकित करना समाज के प्रत्येक नागरिक का कत्र्तव्य है। यह एक सामान्य सी अनुभूति एवं सोच है। अब एक साहित्यकार की सोच क्या हो सकती है। यह देख लेना अत्यावश्यक है।


समाज चेतना संबंध उपर्युक्त अनुभूति के पश्चात् यह कहना जरूरी है कि एक साहित्यकार की समाज चेतना क्या हो सकती है। एक साहित्यकार समाज के प्रति जो सोचता है, चिंतन करता है, बदलावों को महसूस करता है आदि को अभिव्यक्ति देता है, वह उसकी सामाजिक चेतना मानी जाती है। इस सामाजिक चेतना के आलोक में कमलेश्वर की कहानियों का अध्ययन करना हमारा अभीष्ट है। कमलेश्वर स्वतंत्र्योत्तर हिंदी कथा साहित्य में एक क्रांतिकारी बदलाव के फलस्वरूप उपजी 'नयी कहानी'के न केवल प्रवर्तक हैं, बल्कि पुरोधा भी हैं। कमलेश्वर की समस्त कहानियां स्वातंत्र्योत्तर सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद, समस्याएं, कुंठाएं, सत्रांस, पराजित मानसिकता के साथ नयी परिस्थितियों के मध्य उपजा जीवन राग हैं। मध्यमवर्गीय हताशा, निराशा, बैचेनी, व्याकुलता, आकुलता, टीस, दुरभिसंधियां, संबंधों की टूटन, संबंधों के निवर्हण, रूढिय़ों- रीतियों दूषित परंपराओं को देखा जा सकता है। कोई भी साहित्यकार समाज से कटकर साहित्य सृजन कर ही नहीं सकता। ठीक ही कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण है। इस कथन की सार्थकता एवं व्यावहारिकता कमलेश्वर की कहानियों में स्पष्टत: परिलक्षित होता है। कमलेश्वर की कहानियों में मध्यमवर्गीय समाज ठाठे मारता नजर आता है।


कमलेश्वर एक समाजचेता कहानीकार हैं, तो भला उनकी कहानियाँ समाज की गतिविधियों से कैसे वंचित रह सकती हैं। कमलेश्वर ने जहां समाज में एक तरफ सामाजिक विषमता को देखा, दूसरी तरफ उस वैषम्य स्थिति को भोगा भी। 'कस्बे का आदमी' कहानी में सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति है, तो 'देवी की  मां' कहानी में एक स्त्री के आत्म सम्मान एवं दयनीयता को देखा जा सकता है। यह आत्म सम्मान की कहानी है जिसमें देवा युवाओं को एक आदर्श रूप दिखाता है। यह देवा की सामाजिक सक्रियता तथा बलिदान की कहानी है। 'खोई हुई दिशाएँ' कहानी में महानगरीय जीवन के अकेलेपन, अजनबीयता, सत्रांस तथा विवशता, खोखलेपन को चित्रित करती है। सीधे, ईमानदार तथा दयनीय व्यक्ति का शोषण किन-किन स्तरों पर होता है, यह इस कहानी में स्पष्ट दिखाया हैं।


कमलेश्वर की कहानियों में मध्यमवर्गीय आम आदमी को अभिव्यक्त किया है। आम आदमी को परिभाषित करते हुए कमलेश्वर लिखते हैं ''यह आदमी न जैन संशयवाद का शिकार है, न बौद्ध दु:खवाद, का न हिंदू भाग्यवाद का, वह चाहे अतिशय अकिंचन और अति सा धारण हो, चाहे नितांत भौतिक आवश्यकताओं का मारा हुआ, पर है वह मात्र आदमी। अपने यथार्थ परिवेश में साँस लेता, जिजीविषा से सम्पन्न व्यक्ति।5 इस आदमी का कोई धर्म, संप्रदाय, जाति नहीं होती। यह सभी धर्मों, समुदायों, जातियों में मिलता है। इस आम आदमी की अभिव्यक्ति कमलेश्वर की अनेक कहानियों में दिखलायी पड़ती है। मसलन - बेकार आदमी, युद्ध, दिल्ली में एक मौत, पराया शहर, खोई हुई दिशाएँ, दु:खभरी दुनिया, एक थी विमला, मांस का दरिया, चप्पलें आदि। 'जार्ज पंचम की नाक' कहानी में आम आदमी की इज्जत से बड़ी है मूर्ति की हिफाजत। यहां दिखाया है कि भले एक व्यक्ति की नाक कटी पर देश की नाक कटने से बच गयी। स्पष्ट है कि आम आदमी का कोई महत्व नहीं। कमलेश्वर ने 'अपने-अपने अजनबी' लोक सेवकों की 'लोकसेवा' शब्द के माध्यम से गंभीर, तीक्ष्ण व्यंग्य किया है। लोकसेवा के उद्देश्य से इन लोकसेवकों की शोषण एवं विलासिता की प्रवृति पर गहरा व्यंग्य किया है। कहानीकार लिखते हैं - ''हिंदुस्तान में दो ही तरह के तबके हैं - अमीरों के और गरीबों के सोचने वालो और काम करने वालो के। और यह अच्छी बात है कि सोच रहा है, वह काम नहीं कर रहा है और जो काम कर रहा है, वह सोच नहीं रहा है।6


सामाजिक संबंध


 


समाज निर्माण के साथ समाज के विभिन्न स्तरों पर संबंधों की निर्मित हो जाती है। जिनको सामाजिक संबंध कहते हैं। इसमें पारिवारिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय संबंधों का मिश्रित रूप सामाजिक संबंधों के अभिधान से जाना जाता है। स्वातंत्र्योत्तर भारतीय परिवार एवं समाज के निरंतर परिवर्तन के फलस्वरूप संबंधों में दरार, बिखराव, टूटन आदि देखने को मिलता है। एक समाज चेता साहित्यकार इस बदलते परिवेश को अपनी कलम से देश एवं समाज के पाठकों को परिचित कराता है। कमलेश्वर ऐसे कलमजीवी हैं, जिनका साहित्य समाज के सूक्ष्म बदलाव को भी चित्रित करता है। कमलेश्वर की कहानी 'शोक समारोह' में प्रियजनों की मृत्यु को दु:ख की बेला को अपने बड़प्पन दिखाने हेतु आधुनिक सभ्य लोगों द्वारा बाह्य खोखले सामाजिक संबंधों का व्यंग्यपूर्ण चित्रण उपलब्ध है- ''बित्रा की विधवा दीपा और बहु मृत्यु पर आने वाले तार पर आत्म गौरव का अनुभव करती हैं और उन्हें उनकी संख्या की जानकारी भी है। साथ ही शोक प्रकट करने आने वाले लोगों की अधिकता से सतर्क रहने की बात करती है। - ''तार पर तार' मैं तो देखते - देखते थक गई। डेथवाले दिन के तार से आलमारी भरी पड़ी हैं।7


कमलेश्वर की कहानी 'दिल्ली में एक मौत'आधुनिक सामाजिक संबंधों की विलक्षणता एवं गैर मानवीय स्थिति को रूपायित करती है। नगरीय जीवन शैली एवं दिखावे की प्रवृति को उजागर किया है। नगरों में सामाजिक, मानवीय संबंधों की क्रूरता मानवीयता का चित्रण किया गया है। कहानी के मुख्य नायक सेठ दीवानचंद की अंत्येष्टि के माध्यम से नगर के लोगों की संवेदनहीनता, स्वार्थपरकता तथा अमानवीय औपचारिकता को प्रकट करती है। अपनी व्यवस्तता के बीच दीवानचंद की अंत्येष्टि में लोग कपड़ों के आयरन करके सीधे शमसान घाट पहुंचते हैं। यानी किसी को पैदल चलने की फुर्सत और हिम्मत नहीं। सज धज कर, बूट पॉलिस, कोट पेंट, टाई आदि लगाकर, महिलाएं सज संवरकर घर पहुंचती है। एक बार कोरा दिखावा करके वापस अपने कार्यस्थल पहुंचकर अपने कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं जिस सेठ दीवानचंद ने अपने जीवन में सभी की मदद, सहायता की उनकी अंत्येष्टि में कुछ समय निकालकर पैदल चलने में गुरेज हैं। यह है आज का नागर जीवन। जब तक सेठ दीवानचन्द जीवित थे, उनके आगे-पीछे लोग घूम रहे थे। आज उनकी अंतिम क्रिया कर्म पर महज औपचारिकता की जा रही है। ''सामने बारजे पर मुझे मिसेज वासवानी दिखाई पड़ती है। उनके खूबसूरत चेहरे पर अजीब - सी सफेदी है। और होठों पर पिछली शाम की लिपस्टिक की हल्की लाली अभी भी मौजूद है। गाउन पहने हुए ही वह निकली है और अपना जूड़ा बांध रही है। उनकी आवाज सुनाई पड़ती है, डार्लिंग जरा मुझे पेस्ट देना प्लीज।8


बदलते सामाजिक संबंधों का चित्रण


 


आधुनिक कहानीकार अपने परिवेश के प्रति सजग तथा विशेष रूप से जागरूक है। वह भोगा यथार्थ को रेखांकित करता है। अनुभूति की सच्चाई आज के कहानीकार की प्रमुख विशेषता है। किसी भी कहानी की श्रेष्ठता के पीछे उसके परिवेश से जुड़े होना बहुत अधिक महत्व रखता है। इस परिवेश या वातावरण के सभी प्रमुख पक्षों को उद्घाटित करना आवश्यक हो जाता है। मसलन - राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक पक्ष अंतनिर्हित होते हैं।


भारत में सामाजिक, पारिवारिक संबंधों में बदलाव या विघटन के अनेक प्रमुख कारण हैं। इनमें प्रमुख हैं - बेकारी, गरीबी, स्वार्थता, खेती का स्रास, मूल्यों में गिरावट, भौतिकता, आधुनिकता की अंधी दौड़ एकल परिवार व्यवस्था। डॉ. ज्ञानवती अरोड़ा इनके ह्रास के प्रमुख कारण मानती है - ''आठवें दशक तक आते-आते महानगरीय जीवन में परिवार की संस्था नहीं के बराबर है। आधुनिकीकरण, नगरीकरण एवं औद्योगिकीकरण मात्र परिवार के आपसी संबंधों में ही परिवर्तन नहीं लाए किंतु परिवर्तन समाज के सभी सदस्यों के जीवन में प्रतिबिंबित हुआ। बल्कि दूसरा तीव्रतम प्रभाव पारिवारिक संबंधों पर ही पड़ा लक्षित होता है।"9


कमलेश्वर ने इस पारिवारिक, सामाजिक बदलाव और विघटन को अपनी कहानियों में उद्घाटित किया है। मेरी प्रेमिका, आत्मा की आवाज, दु:खों के रास्ते, जो लिखा नहीं जाता, अपना एकांत, तलाश, आदि कहानियों में स्त्री-पुरुष संबंधों के साथ बदलते सामाजिक रिश्तों को चित्रित किया है। 'मेरी प्रेमिका'  कहानी में प्रेम के वास्तविक रूप पर व्यंग्य किया है। प्रेम की अमरता और जान देने का दावा करने वाली कमला बड़े भाई की एक डाट पर उस प्यार से इंकार कर देती है और भाई को सूचना देने वाले रतन के पत्र में अपने प्रेमी विरेन्द्र को भला बुरा कहकर उससे नफरत करने की बात कहने लगती है। मैं बहुत परेशान हो गई। मेरा चैन मुझसे छिन गया। मैं क्या थी और क्या घबराकर शादी कर ली। और क्या कर सकती थी, यह उस समय समझ के बाहर था। यह मेरे जीवन की कितनी भयानक बिडंबना थी।10


सामाजिक समस्याएँ


 


समाज निर्माण के साथ-साथ नीति नियंताओं की कमजोर नीतियों के चलते कुछ समस्याएँ भी घर कर जाती हैं। आधुनिक काल में सबसे अधिक समस्याएँ उभरकर सामने आयी है। इनमें प्रमुख हैं - बेरोजगारी, भूखमरी, अकाल, गरीबी, आवास, नारी के प्रति दृष्टिकोण आदि। आजादी के बाद भारतीय लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के पश्चात् कुछ तो हमें पहले ही से मिली समस्याएँ थी और कुछ आधुनिकीकरण, औद्योगिकीकरण के चलते मजदूरों, किसानों, कामगारों के सामने आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इन सबको साहित्यकारों ने समय-समय पर उजागर किया है और समाज निर्माण का कार्य करने में अहम भूमिका अदा की है।


कमलेश्वर आधुनिककालीन उन कहानीकारों में से एक है, जिन्होंने अपने समय के समाज की समस्याओं को बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। इन समस्याओं के उद्घाटन में कही उन्होंने सपाटबयानी का प्रयोग किया है, तो कहीं व्यंग्य एवं विडंबना की भाषा को चुना है। आजादी के पश्चात् शिक्षित बेरोजगारों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती ही गयी। कमलेश्वर ने अपनी कहानी 'दूसरे' की सुनीता के माध्यम से शिक्षित बेकारी की समस्या को उद्घाटित किया है - ''जिन दिनों कोई काम उनके हाथ में नहीं होता, तब न जाने क्यों घर पराया - सा लगने लगता है। इसलिए नहीं कि घर में कोई कुछ रहता है, बल्कि इसलिए कि इस संबंध में कोई कुछ नहीं कहता।11 'राजा निरबंसिया'  कहानी के जगपति के माध्यम से एक मनुष्य अपने मन में यह सोच बैठता है कि यह बेकारी उसके अस्तित्व को ही समाप्त कर बैठेगी। यहां मानव मन की अभिव्यक्ति है - ''उसे लग रहा था कि अब वह पंगु हो गया है, बिल्कुल लंगड़ा है। एक रेंगता हुआ कीड़ा जिसके न आँख है, न कान, न मन, न इच्छा।12


शिक्षित बेरोजगारी के साथ निर्धनता, गरीबी भी सभ्य समाज के लिए एक फोड़ा है। एक सामाजिक कोढ़ है, जो समाज में बहुत जल्दी पैर पसारता है, औद्योगिक क्रांति का सबसे बड़ा दुष्परिणाम जो सामने आया वह है - गरीबी। अनेक कामगार, कारीगर, मजदूर इससे न केवल बेरोजगार हुए बल्कि गरीबी के दल-दल में डूबते चले गए। 'देवा की माँ' कहानी में एक परित्यक्ता स्त्री की व्यथा-कथा है, जो सभ्य समाज के मुंह पर जोरदार तमाचा है। एक स्त्री स्वयं एवं अपने पुत्र की जिंदगी बसर करने के लिए दरी-पट्टी बुनकर गरीबी से संघर्ष करती है। यह गरीबी का तांडव है, जिससे गरीब व्यक्ति और अधिक गरीब बनता चला गया। अब भला गरीब व्यक्ति समाज के निर्माण में अपना क्या योगदान दें सकता है। उसका जीवन तो दो समय के भोजन जुटाने में व्यतीत हो जाता है।


बरोजगारी, गरीबी के साथ आवास की समस्या भी बहुत बड़ी समस्या है। अधिकांश लोग बिना आवास के अपनी पूरी जिंदगी व्यतीत कर देते हैं। आवास के अभाव में खानाबदोश जीवन व्यतीत करने पर अभिशप्त हैं। गाडिय़ा लुहार, झोंपड़ पट्टी में रहने वाले लोग, गंदी बस्तियों, सड़क किनारे खुले आसमान के नीचे जिंदगी बसर करने वाले अपने दिल में एक आवास का सपना लिये मर जाते हैं। यह सिलसिला निरंतर चलता रहता हैं, परंतु एक मकान नहीं बना सकते। अस्पतालों, राशन डिपो, सिनेमाघरों, यातायात के साधनों आदि में अत्यधिक जनसंख्या के चलते मकान का सपना पूर्ण नहीं हो पाता । महानगरों के विस्तार, कस्बो की तंग गलियों के चलते ग्रामीण आबादी का शहरों की ओर पलायन से शहरों पर बहुत दबाव बढ़ता गया।  शुद्ध पेयजल, खाद्य पदार्थ आदि पर ध्यान नहीं गया। नतीजन गरीबों की संख्या दिनों दिन वृद्धि करती गयी। कमलेश्वर ने अपनी कहानियों में आवास की समस्या को भी आकार दिया है। 'राजा निरबंसिया'  कहानी का नायक जागपति काम की तलाश में भटकता है। जगपति मानसिक उत्पीडऩ का शिकार होता है और अंत में मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।


कमलेश्वर समाजचेत्ता कहानीकार हैं। उनकी प्रत्येक कहानियों में सामाजिक सत्य का उद्घाटन हुआ है। सामाजिक समस्याओं, संबंधों तथा समाज निर्माण के प्रमुख घटकों को मद्देनजर रखते हुए आकार दिया है। समाज कमलेश्वर की कहानियों में हिलौरे लेता नजर आता है। कमलेश्वर का संपूर्ण कथा साहित्य इस बात का सबूत हैं। नयी कहानी, समांतर कहानी आंदोलन के पुरोधा कमलेश्वर सार्वजनिक भूमिका में एक कुशल शिल्पकार साबित होते हैं। समाज की रीति, नीतियों, परंपराओं की सूक्ष्म पड़ताल करने में कुशलता हासिल करते हैं।


संदर्भ:—



  1. डॉ. सीताराम 'झा' श्याम - भारतीय समाज का स्वरूप, पृ. 76

  2. मेकाइवर एण्ड पेज - सोसाइटी (ए टेक्स्ट बुक ऑफ सोशियोलॉजी) पृ. 6

  3. राइट - एैलिमैण्ट ऑफ दा सोसाइटी, पृ. 21

  4. सत्यकेतु विद्यालंकार - समाजशास्त्र, पृ. 36

  5. कमलेश्वर और कमलेश्वर- पृ. 171-172

  6. कमलेश्वर - समग्र कहानियां, पृ. 643, 664

  7. वही, पृ. 282

  8. वही, पृ. 385

  9. डॉ. ज्ञानवती अरोड़ा - समसामयिक हिंदी कहानी के बदलते पारिवारिक संबंध, पृ. 109

  10. कमलेश्वर - समग्र कहानियाँ, पृ. 325-326

  11. वही, पृ. 276-277

  12. वही, पृ. 143


 


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Aksharwarta International Resarch Journal - September - 2025 Issue